अरुणाचल की लोक संस्कृति (अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में) :

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अरुणाचल की लोक संस्कृति

(अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में)

मदालसा मणि त्रिपाठी
शोधार्थी, हिंदी विभाग,
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
दोइमुख, ईटानगर

भारत के पूर्व  एवं पूर्वोत्तर, प्राकृतिक बुनावट के कारण उसका  न केवल अभिन्न भाग है बल्कि भारत की समृद्धि में उसकी भूमिका बहुआयामी है । उत्तरपूर्व की भाषाओं की विविधता ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृतियों की उच्चता भी अलग से आकर्षित करती है। पूर्व एवं पूर्वोतर के आठ राज्यों में क्रमशः असम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा सिक्किम भारतीय राज्य के कुछ ऐसे राज्य है जिनकी वर्तमान जानकारी समाचारों के माध्यम से भारत के नागरिकों को तो है किन्तु उनकी संस्कृति, भाषा उनके त्यौहार आदि के बारे में बहुत कम आधिकारिक जानकारी शेष भारत को उपलब्ध है। इन राज्यों का इतिहास भी अपने आप में एक रोचक विषय है। यहाँ के लोगो के जातीय ढांचे का अध्ययन तो विद्वानों ने किया है किन्तु मात्रसत्तात्मक वृति की रेखाएँ तो इन प्रांतो की यात्रा से ही पहचानी जा सकती हैं।

       इन पूर्वोत्तर राज्यों का ढांचा जनजातिय रहा है जिसके कारण इनके त्यौहारों और इनकी संस्कृति में इनकी धार्मिक आस्था और विश्वास झलकता है। इन सभी पूर्वोत्तर राज्यों में सभी भिन्न संस्कारों के लिए भिन्न सांस्कारिक क्रिया- कलाप तथा अलग पर्व एवं त्यौहार है। लेकिन वास्तविकता यही है कि इतनी विविधता होते हुए भी सब एक दूसरे के उत्सव और त्यौहारों में हाथ बटाते हैं और उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ उन त्यौहारों को मानते भी है। जैसे की अरुणाचल प्रदेश में

भिन्न- भिन्न जातियों के भिन्न त्यौहार है- निशी जनजाति का न्योकुम, आदि-गालो जनजाति का मोपिन, आपातानी का मोरोम आदि। अरुणाचल प्रदेश के इन पर्व त्यौहारों को  जानने से ही इन राज्यों की संस्कृति को जाना जा सकता है।

कई अलग-अलग जनजातियाँ हैं जो अरुणाचल प्रदेश में निवास करती हैं और जो इसे विविध संस्कृतियों और परंपराओं का एक बड़ा मिश्रण बना देती है। ये विभिन्न जनजातियाँ कृषि, धार्मिक और सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाती हैं, जहां वे नाचते, गाते, प्रार्थना करते हैं, एक समुदाय के रूप में आभार और भोज करते हैं। इन त्यौहारों का अनुष्ठान पुजारी द्वारा किया जाता है और अन्य व्यवस्थाएँ लोगों द्वारा सामुदायिक स्तर पर की जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश में अधिकांश त्यौहारों में पशु बलि दी जाती है, यह अरुणाचल का एक सामान्य अनुष्ठान है। अधिकांश त्यौहार कृषि से जुड़े होते है और बड़े पैमाने पर देवताओं को खुश करने और अच्छी फसल के लिए देवताओं को धन्यवाद करने के लिए मनाया जाता है। त्यौहारों को पूरे वर्ष विभिन्न जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। अरुणाचल के ऐसे ही कुछ कृषि, पशु बलि, प्रार्थनाओं से जुड़े त्यौहार इस प्रकार है:-

 

 

  • सोलुंग त्यौहार

सोलुंग आदि जनजाति का एक बहुत ही प्रमुख सामाजिक-धार्मिक त्यौहार है, जिसे मुख्यतः सितम्बर माह में मनाया जाता है, परंतु हर वर्ष इसकी तिथि बदलती रहती है। यह ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग और दिबांग वेली जिलों में प्रमुखता से मनाया जाता है। सोलुंग त्यौहार फसल से जुड़ा त्यौहार है जो कृषि से संबन्धित है, जिसमें धान के बीजों को खेतों में रोपने के बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार पाँच से अधिक दिन भी रेहता है तथा इसके तीन मुख्य भाग होते है, जिसमें प्रथम दिन पूजा की तैयारी से शुरू होता है, जिसमें आगे के दिनों में बलि देने के साथ सहभोज किया जाता है और शाम को पूनुंग नृत्य और संगीत की व्यवस्था होती है। पूनुंग एक गीत होता है जिसमें विभिन्न प्रकार के जानवरों की उत्पत्ति की कथाएँ कही जाती है जिसे “लिमिर लिबांग आबांग’ भी कहते हैं। यह त्यौहार देवी-देवताओं अर्थात किने-नाने और दोइंगबोते  को प्रसन्न करने हेतु, अच्छी फसल और लोगों की सुख-शांति की कामना के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के अंतिम दिन पोपुंग नृत्य किया जाता है जिसमें तरह-तरह के हथियारों की उत्पत्ति की कहानी गीतों के रूप में गया जाता है।

यह एक ऐसा अवसर है जहां लोग अपने कालातीत विश्वासों और परंपराओं को फिर से स्थापित करते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों के मध्याम से आध्यात्मिकता के साथ अपने संबंधों को नवीनीकृत करते हैं।

  • मोपिन त्यौहार

मोपिन, अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजाति के गालो समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है और हर साल इसे पूरे राज्य में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार प्राकृतिक आपदा, रोग, बुरी आत्माओं के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए और स्वास्थ्य, धन और समृद्धि पाने के लिए मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान मोपिन देवी जिन्हें प्रजनन क्षमता और समृद्धि का जनक भी माना जाता है उनकी पूजा की जाती है। त्यौहार के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक उज्व्वल रंग के गाले और गालुक पहनती है, सिर पर बांस निर्मित ऊपर से खुली टोपी के साथ पीले मूँगों की माला पहनती है जिसे ‘तादोक’ कहते है और यह पोशाकों और आभूषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध करती हुई लोकप्रिय ‘पोपिर’ नृत्य करती है। इस त्यौहार में मिथुन की बलि और चावल के आटे का घोल एक-दूसरे पर लगाना आदि कुछ महत्वपूर्ण क्रियाएं हैं। इस प्रकार मोपिन त्यौहार द्वारा अप्रैल माह के शुरुवात में पांच दिनों तक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

  • न्योकुम त्यौहार

न्योकुम के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में स्पष्ट रूप से कहते है की “ ‘न्योकुम’ निशी जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। न्योकुम दो शब्दों के संयोग से (न्योक+उम) बना है, इनकी भाषा में  ‘न्योक’ का अर्थ है सम्पूर्ण धरती और ‘उम’ का अर्थ है चीजों को एक जगह इकट्ठा करना अर्थात न्योकुम का अध्यात्मिक अर्थ है पृथ्वी पर के सभी देवी और देवताओं को ‘न्योकुम’ देवी के पास किसी मुख्य स्थान पर तथा निश्चित समय पर एकत्र करके सब की पूजा एक साथ सामूहिक रूप से करना।’’

           

यह पूजा लोअर वेली के निशी मनाते है। इस पूजा में किसी जाति, धर्म, भाषा, सामाजिक स्तर को महत्त्व नहीं दिया जाता। निशी जनजाति के सभी लोग धन, वैभव, प्रसन्नता, कृषि में अच्छी उपज तथा बिमारियों से बचने के लिए, यह पूजा बड़ी श्रद्धा और लगन के साथ सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष 24 फ़रवरी से 28 फरवरी के मध्य करते है। निशी लोग यह भी मानते है की पृथ्वी पर कई देवता और आत्माएं हैं। ये पहाड़, नदी, जंगल, जानवर, फसल, गृहस्थी आदि के देवता और आत्माएं है और मनुष्य इस पृथ्वी पर शांति और समृद्धि का जीवन तभी जी सकता है, जब मनुष्य, देवता और प्रकृति के बीच पूर्ण सामंजस्य बना रहे। इनके मुख्य प्रार्थना के स्थान पर बांस से बनी संरचना होती है, जहाँ बलि देने वाले जानवरों को रखा जाता है। पुरुष एवं स्त्रियाँ सुन्दर पारंपरिक कपड़े पहनते है, पुरुष सफ़ेद सूती पोशाक पहनते है जो उनके कंधे पर लिपटा हुआ होता है और सर पर लकड़ी की टोपी पहनते है जिस पर हार्नबिल की चोच लगी होती है। इस त्यौहार में सामूहिक रूप से नाच-गाना किया जाता है। आमतौर पर पुरुष और महिलाएं गोलाकार वृत्त बनाकर, हाथ पकड़कर एक साथ गाते हैं और नृत्य करते हैं। इस त्यौहार को वार्षिक कृषि पर्व के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें मेल-मिलाप और भाई-चारे के दृश्य देखने को मिलते हैं।

 

  • ताम्लाडू त्यौहार-

ताम्लाडू त्यौहार मुख्य रूप से दिगारू मिशमी जनजाति द्वारा मनाया जाता है। प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए यह लोग पानी के देवता बुयुया और पृथ्वी के देवता ‘दुयुया’ से प्रार्थना करते हैं। इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में मनाया जाता है और यह नव वर्ष का सूचक होता है। इस पर्व में मुख्यतः जेबमालू की पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वे उनको हर प्रकार की सुख-समृद्धि दे, मानव जाति का कल्याण करें। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण नृत्य और संगीत होता है। यह नृत्य और संगीत सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

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बूरीबूत त्यौहार-

बूरीबूत अपर वेली के निशी जनजाति का बड़ा ही महत्वपूर्ण त्यौहार है, ये नए बने कामले जिला के निशियों का उत्सव है। यह त्यौहार फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इनकी भाषा में बूरीबूत का तात्पर्य है- पूर्ण एकता अर्थात् ऐसी एकता जिसमें धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर या सामाजिक स्तर के नाम पर किसी भी प्रकार का अंतर न हो। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण पुरूषों, महिलाओं और बच्चों द्वारा स्थानीय पुजारी के नेतृत्व में निकाला जा रहा जुलूस  होता है, जिसके लिए सभी अपने पारंपरिक परिधानों में तैयार होते हैं। इस त्यौहार में भी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मिथुन और अन्य जानवरों की बलि दी जाती है। यह हिलमिरी लोगों की एकता और सौहार्द का त्यौहार है।

सी दोन्यी त्यौहार-

सी-दोन्यी तागिन जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। धान की फसल कट जाने के बाद ही यह त्यौहार सामूहिक रूप से समस्त ग्रामीणों द्वारा एक जगह मनाया जाता है। ‘सी’ पृथ्वी का प्रतीक है और ‘दोन्यी’ सूर्य का प्रतीक है। तागिन लोगों का मानना है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी मनुष्य के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस त्यौहार के दौरान चावल के आँटे में अपोंग (चावल की शराब) मिलायी जाती है और सभी को इसे उदारतापूर्वक पिलाया जाता है। सी

 

दोन्यी उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है जिसमें सभी अपनी क्षमतानुसार योगदान देते है, इसलिए यह एक सामूहिक उत्सव भी बन जाता है। तागिन जनजाति के बुजुर्ग सी-दोन्यी समिति के सदस्यों का गठन करते हैं और चयनित निबू (पुजारी) के निर्देशन में सी दोन्यी उत्सव मनाते हैं। यह माना जाता है कि सी दोन्यी उत्सव मनाने से, इस सृष्टि के निर्माता सी और दोन्यी न केवल संतुष्ट होंगे बल्कि लोगों को अच्छी फसल के साथ उन्हें बीमारियों से बचने का आशीर्वाद भी देंगे। यह समृद्धि, सफलता और प्रचुरता के लिए मनाया जाने वाले त्यौहार है। इस त्यौहार के दौरान लड़के-लड़कियाँ बाँस के डोंगर के साथ रंगीन पोशाक पहनते हैं तथा साथ में गीत और नृत्य का प्रदर्शन भी करते हैं।

द्री त्यौहार-

द्री त्यौहार आपातानी जनजाति का बड़ा महत्वपूर्ण तथा आनंददायक त्यौहार है। यह प्रति वर्ष जुलाई माह में तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस त्यौहार में देवताओं को जानवरों की बलि समर्पित की जाती है। इस त्यौहार के दौरान तमू, मति, दानी और हारनियांग नामक देवताओं को पूजा जाता है। इन देवताओं को खुश करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है। इस द्री उत्सव के दौरान हर घर में अपोंग तैयार किया जाता है और घरों और उसके आसपास की सफाई का जाती है। प्रधान पुजारी इन समारोहों और अनुष्ठानों के नेता के रूप में कार्य करते है। त्यौहार के लिए स्थान का निर्धारण गांव के पुजारी और बुजुर्ग लोग करते हैं। दानी भगवान की प्रार्थना रक्षा और समृद्धि के लिए की जाती है, पौधों को हानिकारक कीटों और कीड़ों से बचाने के लिए तमू की प्रार्थना की जाती है और मति से अकाल और महामारी के संक्रमण से बचने के लिए प्रार्थना की जाती है। हारनियांग से मिट्टी को स्थिर रखने और धान के पौधों को सूखने से रोकने के लिए प्रार्थना की जाती है। इस उत्सव में लड़के-लड़कियाँ साथ मिलकर प्री नामक नृत्य करते हैं।बूढ़े लोगों के सम्मानार्थ उनको लोग अलग से विशेष रूप से चावल की शराब देते हैं।

द्री के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में वर्णन करते है की “पूजा के समय जमीन को खोदना या खेतों में हल चलाना वर्जित है कहा जाता है कि इस समय धरती माँ उत्पत्ति विषयक विशेष शक्ति का अर्जन करती है। अतः हल चलाकर या मिट्टी खोदकर उसे क्षति नहीं पहुँचाना चाहिए। आपातानी लोग पूजा के तीन दिनों तक किसी भी प्रकार की हरी साग-सब्जी नहीं तोड़ते हैं, घास और वृक्ष भी नहीं काटते।’’ इस प्रकार द्री त्यौहार में आपसी मिलना-जुलना कई दिनों तक चलता है।

लोसर त्यौहार- 

लोसर त्यौहार वेस्ट कामेंग के मोन्पा तथा तवांग के शेरदुक्पेन के लोग बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ नये साल के प्रथम दिवस के रूप में मनाते हैं। यह त्यौहार आम तौर पर फरवरी के अंतिम दिनों या मार्च के शुरूवाती सप्ताह में पड़ता है। यह त्यौहार आठ से पंद्रह दिनों तक रहता है और खुशी और उत्साह से मनाया जाता है। लोसर आरंभ होने से पहले ही सभी लोग खाप्से, चामर, चांगफुल आदि स्वादिष्ट व्यंजन बनाते है। पूजा आरंभ होने पर इन स्वादिष्ट पकवानों को भगवान को समर्पित करते हैं।

बुद्धिष्ट वर्ष के प्रथम महीने के प्रथम दिन से लोसर पूजा आरंभ होती है। पूजा के प्रथम दिन को ‘लामा लोसर’ कहते हैं। उस दिन नए लामा लोग पुराने लामाओं के पास जाकर उनका अभिवादन करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं। पूजा का दूसरा दिन ‘राजा लोसर’ के रूप में मनाया जाता है। इन लोगों का ऐसा विश्वास है कि प्राचीन काल में लोसर पूजा के समय

 

आज के दिन राजा अपनी प्रजा से मिलने के लिए उनके घरों में आते थे। इसी भावना से प्रेरित होकर सभी लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और नव वर्ष के उपलक्ष्य में अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं।  

भविष्य की कामना और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाती है और लोग अपने घरों में धार्मिक झंडे फहराते हैं। सभी घरों में मक्खन से दीपक जलाये जाते है और जनजातीय लोग अपनी भूमि को बुरी नज़र अथवा किसी आपदा से बचने के लिए प्रार्थना करते है। यह त्यौहार स्थानीय जनजातीय परम्पराओं और रीती-रिवाजों का गवाह है। इस त्यौहार से ‘मोन्पा’ लोगों के सामाजिक सांस्कृतिक और ग्रामीण जीवन को जाना जा सकता है।

इन उपरोक्त त्योहारों के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में कई और भी त्यौहार मनाये जाते है जैसे की मेम्बा जनजाति का ‘दूबा’ त्यौहार, इदु-मिशमी जनजाति का ‘रेह’ त्यौहार, वांचू जनजाति का ‘ओजीएल’ उत्सव, सिंग्फो जनजाति का ‘संजो’ नामक उत्सव आदि। अरुणाचल में जनजातियों की जितनी विविधता है उतनी ही विविधता त्योहारों और उत्सवों में भी है। परन्तु एक बात जो गौर करने वाली है वह यह है की अरुणाचल की सभी जनजातियों के त्यौहारों के नाम भले ही अलग-अलग क्यों न हो परन्तु सभी त्योहारों का उद्देश्य और मर्म एक ही है। सभी त्यौहार लोगों की सुख-शान्ति, फसल की अच्छी उपज, प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति की कामना ही करते है और सभी जनजातियों के देवता प्रकृति से सम्बंधित है। अरुणाचल के सभी त्यौहारों में मिथुन, मुर्गी, बकरे की बलि, आपोंग और चावल के आटे का सेवन, विभिन्न रंग के पारंपरिक पोशाक और मालाएं-मनके पहनना, बांस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने के मिलते-जुलते रिवाजों की प्रमुखता है।

अतः अरुणाचल के इन त्यौहारों को देखकर अनेकता में एकता याद आती है ।

सहायक पुस्तकें और वेबसाईट

  1. Batem, Pertin, 2018, Folksongs of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 181 751 6185X
  2. Batem, Pertin, 2014, Ethnic Communities of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 81 751 61351
  3. Vidyarthi, L.P., 1986, Art and Culture of North-East India, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India.
  4. सिंह, रामवीर, अंक 3, जुलाई-सितम्बर, 2008, समन्वय पूर्वोत्तर (त्रैमासिक पत्रिका), केन्द्रीय हिंदी संस्थान (गुवाहाटी,दीमापुर, शिलांग)
  5. सिंह, धर्मराज, 1995, अरुणाचल के त्यौहार, अनुसंधान निर्देशालय, अरुणाचल प्रदेश सरकार, ईटानगर
  6. Wikipedia
  7. com
  8. http;//www.indianholiday.com
  9. com
  10. gktoday.com

 

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अरुणाचल की लोक संस्कृति

(अरुणाचल प्रदेश के त्यौहारों के विशेष संदर्भ में)

मदालसा मणि त्रिपाठी                                        

शोधार्थी, हिंदी विभाग,

राजीव गाँधी विश्वविद्यालय

दोइमुख, ईटानगर

 

 

 

 

भारत के पूर्व  एवं पूर्वोत्तर, प्राकृतिक बुनावट के कारण उसका  न केवल अभिन्न भाग है बल्कि भारत की समृद्धि में उसकी भूमिका बहुआयामी है । उत्तरपूर्व की भाषाओं की विविधता ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृतियों की उच्चता भी अलग से आकर्षित करती है। पूर्व एवं पूर्वोतर के आठ राज्यों में क्रमशः असम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम तथा सिक्किम भारतीय राज्य के कुछ ऐसे राज्य है जिनकी वर्तमान जानकारी समाचारों के माध्यम से भारत के नागरिकों को तो है किन्तु उनकी संस्कृति, भाषा उनके त्यौहार आदि के बारे में बहुत कम आधिकारिक जानकारी शेष भारत को उपलब्ध है। इन राज्यों का इतिहास भी अपने आप में एक रोचक विषय है। यहाँ के लोगो के जातीय ढांचे का अध्ययन तो विद्वानों ने किया है किन्तु मात्रसत्तात्मक वृति की रेखाएँ तो इन प्रांतो की यात्रा से ही पहचानी जा सकती हैं।

       इन पूर्वोत्तर राज्यों का ढांचा जनजातिय रहा है जिसके कारण इनके त्यौहारों और इनकी संस्कृति में इनकी धार्मिक आस्था और विश्वास झलकता है। इन सभी पूर्वोत्तर राज्यों में सभी भिन्न संस्कारों के लिए भिन्न सांस्कारिक क्रिया- कलाप तथा अलग पर्व एवं त्यौहार है। लेकिन वास्तविकता यही है कि इतनी विविधता होते हुए भी सब एक दूसरे के उत्सव और त्यौहारों में हाथ बटाते हैं और उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ उन त्यौहारों को मानते भी है। जैसे की अरुणाचल प्रदेश में

भिन्न- भिन्न जातियों के भिन्न त्यौहार है- निशी जनजाति का न्योकुम, आदि-गालो जनजाति का मोपिन, आपातानी का मोरोम आदि। अरुणाचल प्रदेश के इन पर्व त्यौहारों को  जानने से ही इन राज्यों की संस्कृति को जाना जा सकता है।

कई अलग-अलग जनजातियाँ हैं जो अरुणाचल प्रदेश में निवास करती हैं और जो इसे विविध संस्कृतियों और परंपराओं का एक बड़ा मिश्रण बना देती है। ये विभिन्न जनजातियाँ कृषि, धार्मिक और सामाजिक, सांस्कृतिक उत्सव मनाती हैं, जहां वे नाचते, गाते, प्रार्थना करते हैं, एक समुदाय के रूप में आभार और भोज करते हैं। इन त्यौहारों का अनुष्ठान पुजारी द्वारा किया जाता है और अन्य व्यवस्थाएँ लोगों द्वारा सामुदायिक स्तर पर की जाती हैं। अरुणाचल प्रदेश में अधिकांश त्यौहारों में पशु बलि दी जाती है, यह अरुणाचल का एक सामान्य अनुष्ठान है। अधिकांश त्यौहार कृषि से जुड़े होते है और बड़े पैमाने पर देवताओं को खुश करने और अच्छी फसल के लिए देवताओं को धन्यवाद करने के लिए मनाया जाता है। त्यौहारों को पूरे वर्ष विभिन्न जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। अरुणाचल के ऐसे ही कुछ कृषि, पशु बलि, प्रार्थनाओं से जुड़े त्यौहार इस प्रकार है:-

 

 

  • सोलुंग त्यौहार

सोलुंग आदि जनजाति का एक बहुत ही प्रमुख सामाजिक-धार्मिक त्यौहार है, जिसे मुख्यतः सितम्बर माह में मनाया जाता है, परंतु हर वर्ष इसकी तिथि बदलती रहती है। यह ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग और दिबांग वेली जिलों में प्रमुखता से मनाया जाता है। सोलुंग त्यौहार फसल से जुड़ा त्यौहार है जो कृषि से संबन्धित है, जिसमें धान के बीजों को खेतों में रोपने के बाद मनाया जाता है। यह त्यौहार पाँच से अधिक दिन भी रेहता है तथा इसके तीन मुख्य भाग होते है, जिसमें प्रथम दिन पूजा की तैयारी से शुरू होता है, जिसमें आगे के दिनों में बलि देने के साथ सहभोज किया जाता है और शाम को पूनुंग नृत्य और संगीत की व्यवस्था होती है। पूनुंग एक गीत होता है जिसमें विभिन्न प्रकार के जानवरों की उत्पत्ति की कथाएँ कही जाती है जिसे “लिमिर लिबांग आबांग’ भी कहते हैं। यह त्यौहार देवी-देवताओं अर्थात किने-नाने और दोइंगबोते  को प्रसन्न करने हेतु, अच्छी फसल और लोगों की सुख-शांति की कामना के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार के अंतिम दिन पोपुंग नृत्य किया जाता है जिसमें तरह-तरह के हथियारों की उत्पत्ति की कहानी गीतों के रूप में गया जाता है।

यह एक ऐसा अवसर है जहां लोग अपने कालातीत विश्वासों और परंपराओं को फिर से स्थापित करते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों के मध्याम से आध्यात्मिकता के साथ अपने संबंधों को नवीनीकृत करते हैं।

  • मोपिन त्यौहार

मोपिन, अरुणाचल प्रदेश के आदि जनजाति के गालो समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है और हर साल इसे पूरे राज्य में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार प्राकृतिक आपदा, रोग, बुरी आत्माओं के प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए और स्वास्थ्य, धन और समृद्धि पाने के लिए मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान मोपिन देवी जिन्हें प्रजनन क्षमता और समृद्धि का जनक भी माना जाता है उनकी पूजा की जाती है। त्यौहार के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक उज्व्वल रंग के गाले और गालुक पहनती है, सिर पर बांस निर्मित ऊपर से खुली टोपी के साथ पीले मूँगों की माला पहनती है जिसे ‘तादोक’ कहते है और यह पोशाकों और आभूषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध करती हुई लोकप्रिय ‘पोपिर’ नृत्य करती है। इस त्यौहार में मिथुन की बलि और चावल के आटे का घोल एक-दूसरे पर लगाना आदि कुछ महत्वपूर्ण क्रियाएं हैं। इस प्रकार मोपिन त्यौहार द्वारा अप्रैल माह के शुरुवात में पांच दिनों तक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

  • न्योकुम त्यौहार

न्योकुम के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में स्पष्ट रूप से कहते है की “ ‘न्योकुम’ निशी जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। न्योकुम दो शब्दों के संयोग से (न्योक+उम) बना है, इनकी भाषा में  ‘न्योक’ का अर्थ है सम्पूर्ण धरती और ‘उम’ का अर्थ है चीजों को एक जगह इकट्ठा करना अर्थात न्योकुम का अध्यात्मिक अर्थ है पृथ्वी पर के सभी देवी और देवताओं को ‘न्योकुम’ देवी के पास किसी मुख्य स्थान पर तथा निश्चित समय पर एकत्र करके सब की पूजा एक साथ सामूहिक रूप से करना।’’

           

यह पूजा लोअर वेली के निशी मनाते है। इस पूजा में किसी जाति, धर्म, भाषा, सामाजिक स्तर को महत्त्व नहीं दिया जाता। निशी जनजाति के सभी लोग धन, वैभव, प्रसन्नता, कृषि में अच्छी उपज तथा बिमारियों से बचने के लिए, यह पूजा बड़ी श्रद्धा और लगन के साथ सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष 24 फ़रवरी से 28 फरवरी के मध्य करते है। निशी लोग यह भी मानते है की पृथ्वी पर कई देवता और आत्माएं हैं। ये पहाड़, नदी, जंगल, जानवर, फसल, गृहस्थी आदि के देवता और आत्माएं है और मनुष्य इस पृथ्वी पर शांति और समृद्धि का जीवन तभी जी सकता है, जब मनुष्य, देवता और प्रकृति के बीच पूर्ण सामंजस्य बना रहे। इनके मुख्य प्रार्थना के स्थान पर बांस से बनी संरचना होती है, जहाँ बलि देने वाले जानवरों को रखा जाता है। पुरुष एवं स्त्रियाँ सुन्दर पारंपरिक कपड़े पहनते है, पुरुष सफ़ेद सूती पोशाक पहनते है जो उनके कंधे पर लिपटा हुआ होता है और सर पर लकड़ी की टोपी पहनते है जिस पर हार्नबिल की चोच लगी होती है। इस त्यौहार में सामूहिक रूप से नाच-गाना किया जाता है। आमतौर पर पुरुष और महिलाएं गोलाकार वृत्त बनाकर, हाथ पकड़कर एक साथ गाते हैं और नृत्य करते हैं। इस त्यौहार को वार्षिक कृषि पर्व के रूप में भी मनाते हैं, जिसमें मेल-मिलाप और भाई-चारे के दृश्य देखने को मिलते हैं।

 

  • ताम्लाडू त्यौहार-

ताम्लाडू त्यौहार मुख्य रूप से दिगारू मिशमी जनजाति द्वारा मनाया जाता है। प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए यह लोग पानी के देवता बुयुया और पृथ्वी के देवता ‘दुयुया’ से प्रार्थना करते हैं। इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में मनाया जाता है और यह नव वर्ष का सूचक होता है। इस पर्व में मुख्यतः जेबमालू की पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वे उनको हर प्रकार की सुख-समृद्धि दे, मानव जाति का कल्याण करें। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण नृत्य और संगीत होता है। यह नृत्य और संगीत सूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

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बूरीबूत त्यौहार-

बूरीबूत अपर वेली के निशी जनजाति का बड़ा ही महत्वपूर्ण त्यौहार है, ये नए बने कामले जिला के निशियों का उत्सव है। यह त्यौहार फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इनकी भाषा में बूरीबूत का तात्पर्य है- पूर्ण एकता अर्थात् ऐसी एकता जिसमें धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर या सामाजिक स्तर के नाम पर किसी भी प्रकार का अंतर न हो। इस त्यौहार का मुख्य आकर्षण पुरूषों, महिलाओं और बच्चों द्वारा स्थानीय पुजारी के नेतृत्व में निकाला जा रहा जुलूस  होता है, जिसके लिए सभी अपने पारंपरिक परिधानों में तैयार होते हैं। इस त्यौहार में भी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मिथुन और अन्य जानवरों की बलि दी जाती है। यह हिलमिरी लोगों की एकता और सौहार्द का त्यौहार है।

सी दोन्यी त्यौहार-

सी-दोन्यी तागिन जनजाति का सर्वप्रमुख त्यौहार है। धान की फसल कट जाने के बाद ही यह त्यौहार सामूहिक रूप से समस्त ग्रामीणों द्वारा एक जगह मनाया जाता है। ‘सी’ पृथ्वी का प्रतीक है और ‘दोन्यी’ सूर्य का प्रतीक है। तागिन लोगों का मानना है कि सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी मनुष्य के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस त्यौहार के दौरान चावल के आँटे में अपोंग (चावल की शराब) मिलायी जाती है और सभी को इसे उदारतापूर्वक पिलाया जाता है। सी

 

दोन्यी उत्सव को बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाता है जिसमें सभी अपनी क्षमतानुसार योगदान देते है, इसलिए यह एक सामूहिक उत्सव भी बन जाता है। तागिन जनजाति के बुजुर्ग सी-दोन्यी समिति के सदस्यों का गठन करते हैं और चयनित निबू (पुजारी) के निर्देशन में सी दोन्यी उत्सव मनाते हैं। यह माना जाता है कि सी दोन्यी उत्सव मनाने से, इस सृष्टि के निर्माता सी और दोन्यी न केवल संतुष्ट होंगे बल्कि लोगों को अच्छी फसल के साथ उन्हें बीमारियों से बचने का आशीर्वाद भी देंगे। यह समृद्धि, सफलता और प्रचुरता के लिए मनाया जाने वाले त्यौहार है। इस त्यौहार के दौरान लड़के-लड़कियाँ बाँस के डोंगर के साथ रंगीन पोशाक पहनते हैं तथा साथ में गीत और नृत्य का प्रदर्शन भी करते हैं।

द्री त्यौहार-

द्री त्यौहार आपातानी जनजाति का बड़ा महत्वपूर्ण तथा आनंददायक त्यौहार है। यह प्रति वर्ष जुलाई माह में तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस त्यौहार में देवताओं को जानवरों की बलि समर्पित की जाती है। इस त्यौहार के दौरान तमू, मति, दानी और हारनियांग नामक देवताओं को पूजा जाता है। इन देवताओं को खुश करने के लिए ही यह त्यौहार मनाया जाता है। इस द्री उत्सव के दौरान हर घर में अपोंग तैयार किया जाता है और घरों और उसके आसपास की सफाई का जाती है। प्रधान पुजारी इन समारोहों और अनुष्ठानों के नेता के रूप में कार्य करते है। त्यौहार के लिए स्थान का निर्धारण गांव के पुजारी और बुजुर्ग लोग करते हैं। दानी भगवान की प्रार्थना रक्षा और समृद्धि के लिए की जाती है, पौधों को हानिकारक कीटों और कीड़ों से बचाने के लिए तमू की प्रार्थना की जाती है और मति से अकाल और महामारी के संक्रमण से बचने के लिए प्रार्थना की जाती है। हारनियांग से मिट्टी को स्थिर रखने और धान के पौधों को सूखने से रोकने के लिए प्रार्थना की जाती है। इस उत्सव में लड़के-लड़कियाँ साथ मिलकर प्री नामक नृत्य करते हैं।बूढ़े लोगों के सम्मानार्थ उनको लोग अलग से विशेष रूप से चावल की शराब देते हैं।

द्री के विषय में लेखक धर्मराज सिंह अपनी पुस्तक ‘अरुणाचल के त्यौहार’ में वर्णन करते है की “पूजा के समय जमीन को खोदना या खेतों में हल चलाना वर्जित है कहा जाता है कि इस समय धरती माँ उत्पत्ति विषयक विशेष शक्ति का अर्जन करती है। अतः हल चलाकर या मिट्टी खोदकर उसे क्षति नहीं पहुँचाना चाहिए। आपातानी लोग पूजा के तीन दिनों तक किसी भी प्रकार की हरी साग-सब्जी नहीं तोड़ते हैं, घास और वृक्ष भी नहीं काटते।’’ इस प्रकार द्री त्यौहार में आपसी मिलना-जुलना कई दिनों तक चलता है।

लोसर त्यौहार- 

लोसर त्यौहार वेस्ट कामेंग के मोन्पा तथा तवांग के शेरदुक्पेन के लोग बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ नये साल के प्रथम दिवस के रूप में मनाते हैं। यह त्यौहार आम तौर पर फरवरी के अंतिम दिनों या मार्च के शुरूवाती सप्ताह में पड़ता है। यह त्यौहार आठ से पंद्रह दिनों तक रहता है और खुशी और उत्साह से मनाया जाता है। लोसर आरंभ होने से पहले ही सभी लोग खाप्से, चामर, चांगफुल आदि स्वादिष्ट व्यंजन बनाते है। पूजा आरंभ होने पर इन स्वादिष्ट पकवानों को भगवान को समर्पित करते हैं।

बुद्धिष्ट वर्ष के प्रथम महीने के प्रथम दिन से लोसर पूजा आरंभ होती है। पूजा के प्रथम दिन को ‘लामा लोसर’ कहते हैं। उस दिन नए लामा लोग पुराने लामाओं के पास जाकर उनका अभिवादन करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं। पूजा का दूसरा दिन ‘राजा लोसर’ के रूप में मनाया जाता है। इन लोगों का ऐसा विश्वास है कि प्राचीन काल में लोसर पूजा के समय

 

आज के दिन राजा अपनी प्रजा से मिलने के लिए उनके घरों में आते थे। इसी भावना से प्रेरित होकर सभी लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और नव वर्ष के उपलक्ष्य में अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं।  

भविष्य की कामना और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाती है और लोग अपने घरों में धार्मिक झंडे फहराते हैं। सभी घरों में मक्खन से दीपक जलाये जाते है और जनजातीय लोग अपनी भूमि को बुरी नज़र अथवा किसी आपदा से बचने के लिए प्रार्थना करते है। यह त्यौहार स्थानीय जनजातीय परम्पराओं और रीती-रिवाजों का गवाह है। इस त्यौहार से ‘मोन्पा’ लोगों के सामाजिक सांस्कृतिक और ग्रामीण जीवन को जाना जा सकता है।

इन उपरोक्त त्योहारों के अतिरिक्त अरुणाचल प्रदेश में कई और भी त्यौहार मनाये जाते है जैसे की मेम्बा जनजाति का ‘दूबा’ त्यौहार, इदु-मिशमी जनजाति का ‘रेह’ त्यौहार, वांचू जनजाति का ‘ओजीएल’ उत्सव, सिंग्फो जनजाति का ‘संजो’ नामक उत्सव आदि। अरुणाचल में जनजातियों की जितनी विविधता है उतनी ही विविधता त्योहारों और उत्सवों में भी है। परन्तु एक बात जो गौर करने वाली है वह यह है की अरुणाचल की सभी जनजातियों के त्यौहारों के नाम भले ही अलग-अलग क्यों न हो परन्तु सभी त्योहारों का उद्देश्य और मर्म एक ही है। सभी त्यौहार लोगों की सुख-शान्ति, फसल की अच्छी उपज, प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति की कामना ही करते है और सभी जनजातियों के देवता प्रकृति से सम्बंधित है। अरुणाचल के सभी त्यौहारों में मिथुन, मुर्गी, बकरे की बलि, आपोंग और चावल के आटे का सेवन, विभिन्न रंग के पारंपरिक पोशाक और मालाएं-मनके पहनना, बांस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने के मिलते-जुलते रिवाजों की प्रमुखता है।

अतः अरुणाचल के इन त्यौहारों को देखकर अनेकता में एकता याद आती है ।

सहायक पुस्तकें और वेबसाईट

  1. Batem, Pertin, 2018, Folksongs of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 181 751 6185X
  2. Batem, Pertin, 2014, Ethnic Communities of Arunachal Pradesh, The Directorate of Research, Arunachal Pradesh, Itanagar, ISBN: 81 751 61351
  3. Vidyarthi, L.P., 1986, Art and Culture of North-East India, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India.
  4. सिंह, रामवीर, अंक 3, जुलाई-सितम्बर, 2008, समन्वय पूर्वोत्तर (त्रैमासिक पत्रिका), केन्द्रीय हिंदी संस्थान (गुवाहाटी,दीमापुर, शिलांग)
  5. सिंह, धर्मराज, 1995, अरुणाचल के त्यौहार, अनुसंधान निर्देशालय, अरुणाचल प्रदेश सरकार, ईटानगर
  6. Wikipedia
  7. com
  8. http;//www.indianholiday.com
  9. com
  10. gktoday.com

 

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