आदिवासी सांस्कृतिक बोध और जीवन दर्शन-रविन्द्र कुमार मीना 

Please share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

आदिवासी सांस्कृतिक बोध और जीवन दर्शन

रविन्द्र कुमार मीना  
शोधार्थी,
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
गांधीनगर, गुजरात 382030
मोबाइल नं.- 9414497899
ई-मेल : ravindraghunawat@gmail.com

शोध सारांश

किसी भी समाज के पास जीवन जीने की विशेष पद्धति होती है, जो उसे अन्य मानव समुदायों से अलग करती है । उसी संस्कृति और परंपरा का अनुसरण करते हुए वह समुदाय अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है । यह विशेष जीवन शैली उसे अपने पूर्वजों से पारंपरिक रूप में प्राप्त होती है । जिसमें समय के साथ थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता रहता है । आदिवासी जीवन शैली मानवीय संवेदनाओं एवं प्रकृति के सामंजस्य पर निर्भर रही है । इसलिए उसके दर्शन में समस्त संसार के उत्थान एवं प्रगति की भूमिका निहित है । वहां आत्म से अधिक महत्व सामुदायिकता को दिया जाता है । इसे आदिवासी दर्शन का सार तत्व भी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी । क्योंकि आदिवासी दर्शन मनुष्य के श्रेष्ठ होने को अहं (घमंड) को खारिज करते हुए समस्त सृष्टि एवं प्रकृति के सहअस्तित्व को स्वीकार करता है ।

बीज शब्द

जीवन दर्शन, सामूहिकता, समानता, सहभागिता, सहजीविता, सहअस्तित्व, सहजता, सरलता, आदिधरम (सरना), टोटम (गणचिन्ह)

आमुख

भारतीय संस्कृति के निर्माण में आदिवासियों का बहुमूल्य योगदान रहा है । भारतीय समाज एवं भारतीय संस्कृति को उनकी देन कई मायनों में आधारभूत है, क्योंकि यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों में जो सामाजिक संरचना विकसित हुई और जो संस्कृतियाँ फली-फूली उनके आधार पर कई ऐसे तत्व हैं जो आदिवासियों से जुड़े हुए हैं । वर्तमान भारतीय संस्कृति की जड़ मुंडा आदिवासी संस्कृति में निहित है । “जातियों तथा संस्कृति के विद्वानों के मतानुसार भारतीय संस्कृति को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, द्रविड तथा आर्य । इन दो वर्गों को ही दूसरे विभिन्न नामों यथा – द्रविड – गैर द्रविड, आर्य – अनार्य दिये जाते रहे हैं ; किन्तु वे उपयुक्त नहीं है । भारतीय संस्कृति के लिए सटीक शब्द तो मुंडा संस्कृति ही है ।”1 अन्य संस्कृतियों की तुलना में आदिवासी संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान को बचाए हुए है । इस संदर्भ में प.ह. गुप्ता कहते हैं कि – “प्राचीन भारत की सभ्यता व संस्कृति इस देश में आर्यों के साथ नहीं आई थी, द्रविड़ या आर्यों से पूर्ववर्ती सभ्यता व संस्कृति (मुंडा, निषाद संस्कृति) आक्रांताओं (आर्यों) की सभ्यता व संस्कृति से उच्च थी ।”2

वनों, पहाड़ों, गिरिकुहरों के बीच सदियों से पुष्पित-पल्लवित एवं संरक्षित आदिवासी संस्कृति और उनके लोकाचार को भारतीय संदर्भ में देखा जाय तो वहाँ मानवीय मूल्यों का संग्रहण मिलता है । इस संदर्भ में डॉ. सावित्री कुमारी लिखती हैं कि – “आदिवासी समाज, जो अपने विशिष्ट भौगोलिक परिवेश के कारण शहरी प्रभाव से अछूता है, उनमें अपनी संस्कृति और कला के प्रति गहरी निष्ठा है । समानता, सहअस्तित्व, सहजीविता, सहभागिता, सामूहिकता, श्रम की निष्ठा, स्त्री-पुरुषों की बराबरी आदि जीवन-मूल्यों के साथ आदिवासी समाज धरती, प्रकृति और जीवन को सुंदर बनाने में सक्षम है । जिस सामूहिकता, सहभागिता, सहकारिता का पाठ दुनिया सीख रही है, वह आदिवासियों के जीवन-दर्शन में सहज ही उपलब्ध है ।”3

जीवन दर्शन से अभिप्राय जीवन जीने की कला या शैली से है । क्योंकि कोई भी समाज अपनी परंपराओं और मान्यताओं के अनुरूप ही जीवन का निर्वाह करता चलता है । इसलिए प्रत्येक समाज के पास अपना-अपना जीवन दर्शन होता है । “किसी भी समाज विशेष की पहचान उसके सामाजिक तथा सांस्कृतिक लक्षणों से ही होती है, क्योंकि यह संस्कृति ही है, जो किसी समाज विशेष को अन्य समाजों से पृथक करती है । किसी भी समुदाय का सामाजिक, सांस्कृतिक अध्ययन तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक उस समाज की मूलभूत परम्पराएँ, विश्वास, साहित्य, लोक संस्कृति का वर्णन न किया जाये ; क्योंकि संस्कृति ही एक ऐसा सामाजिक मूलभूत तत्व है जो उस समाज, समुदाय के अंत:भावों को प्रदर्शित करती है ।”4

आदिवासी जीवन दर्शन में सृष्टि के समस्त सजीव और निर्जीव प्राणियों को देखने का अलग दृष्टिकोण है । आदिवासी दर्शन मनुष्य के महान होने के दंभ को ख़ारिज करता है । आदिवासी समुदाय न सिर्फ सांसारिक प्राणियों के प्रति पूर्ण श्रद्धा का भाव रखता है, अपितु जंगल, नदी, पहाड़, परिवेश तथा प्रकृति के प्रति प्रेम को भी अभिव्यक्त करता है जो उनकी मौखिक कथाओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता रहता है । उनके जन्मजात गुणों में सरलता, सहजता, सामूहिकता, समानता, ईमानदारी, परिश्रमशीलता एवं प्रकृति से घनिष्ठता की प्रधानता है ।

आदिवासी समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता अत्यंत सुगठित समाज व्यवस्था है । आदिवासी घने बसे होने के बजाय अपेक्षाकृत फैले हुए होते हैं, लेकिन भौगोलिक बिखराव के बावजूद भी उनमें समग्रता और एकता का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है । अर्थात् सामूहिकता आदिवासी संस्कृति का सार तत्व है । आदिवासी समाज अन्य समाजों की तरह कभी भी व्यक्तिवादी नहीं रहा और न ही उसने वैसा बनने का कभी प्रयास किया । आदिवासी समाज आज तक समूह में ही रहता आया है अर्थात् वहाँ वह व्यक्तियों में नहीं, समूहों में जिन्दा रहते हुए एक समाज के रूप में अक्षुण्ण रहा है । बाहरी सभ्यताओं के हमलों के बावजूद भी सामूहिकता और परस्पर सहयोग की प्रवृत्तियाँ इनके बीच बनी हुई हैं । आदिवासियों में सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना होती है, जहाँ सबके बारे में सोचा जाता है । घर बनाना हो, खेत जोतना हो, रोपा करना हो, शिकार करना हो, शादी-ब्याह या अन्य कोई भी कार्य जो अकेले व्यक्ति के वश में न हो तब सामूहिक मदद की परंपरा का निर्वहन किया जाता है । इस संदर्भ में प्रो. वीर भारत तलवार कहते हैं कि – “आदिवासी समाज की एक बड़ी विशेषता सामाजिक और सांस्कृतिक कामों में सभी सदस्यों की समान भागीदारी है । मामला चाहे शिकार का हो या पंचायत का, सभी लोग उसमें सक्रिय भाग लेते हैं ।”5 आदिवासियों की न्याय व्यवस्था भी सामूहिक होती है । इसलिए वहाँ कोर्ट-कचहरी जैसे न्यायिक स्थान नहीं होते हैं । गाँव के आपसी झगड़ों या विवादों का निपटारा गाँव के पंच-पटेलों के माध्यम से कर लिया जाता है । जिसमें गाँव के युवक-युवती, बड़े-बुजुर्ग सम्मिलित होते हैं । जब किसी समस्या का हल गाँव स्तर पर नहीं हो पाता है तो कई गाँवों के पंच-पटेल मिलकर सामूहिक पंचायत के माध्यम से उसका समाधान निकाल देते हैं । जो सभी को स्वीकार होता है, अगर कोई व्यक्ति इस पंचायत के फैसले को मानने से इंकार कर देता है तो उसे गाँव और समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है ।

READ  पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

आदिवासी गाँवों में किसी भी प्रकार का पर्व-त्यौहार या जनम-मरण का आयोजन सामूहिक स्तर पर होता है, वहाँ व्यक्तिगत स्तर पर कोई भी आयोजन नहीं किया जाता है । समुदाय में रहकर लोग एक-दूसरे की भावनाओं को महत्व देते हैं । आदिवासी विशेषकर दुःख के समय या किसी परिवार में मृत्यु के समय सभी लोग शोकाकुल परिवार में सम्मिलित होकर सांत्वना व्यक्त करते हैं । आदिवासियों में जन्म-मृत्यु, नामकरण, शादी-विवाह, सुख-दुःख आदि समाज के सामूहिक क्रियाकलापों से नियंत्रित एवं संपन्न होते हैं । भील आदिवासियों में व्याप्त सामूहिक एकता को रेखांकित करते हुए भगवानदास पटेल कहते हैं कि – “इस समाज के सहकार और सहभागिता की नींव से आविर्भूत होने से इसकी प्रत्येक जीवन रीति और क्रियाकलापों में सहभागिता और सहयोग के दर्शन होते हैं तथा इस समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक की प्रत्येक सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियाँ आपसी सहयोग से की जाती हैं ।”6 आदिवासी समुदाय एक बड़े संयुक्त परिवार की भांति होता है, जहाँ प्रत्येक सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार योगदान करता है । यहाँ तक कि अगर किसी परिवार में कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से असक्षम होता है तो सभी लोग मिलकर उसकी मदद करते हैं । श्रम के फलों के सामूहिक उपभोग में ही इनके पारस्परिक लेन-देन का पूरा समायोजन हो जाता है । आदिवासी समुदायों में यह समूह भावना की उदात्त परम्परा आज तक बरकरार है ।

आदिवासी समाज लिंगभेद के आधार पर सहज और खुले विचारों वाला है । इसलिए इस समाज के स्त्री-पुरुषों में विशेष भेद नहीं मिलता है । यहाँ की स्त्रियाँ स्वतंत्र, स्वावलंबी, परिश्रमी एवं साहसी होती हैं जो सामाजिक कार्यों में समान एवं सक्रिय भूमिका निभाती हैं । आदिवासी स्त्रियों की समानता पर जोर देते हुए रोज केरकेट्टा कहती हैं कि – “जब आदिवासी समाज में गोत्र का बंटवारा हुआ, तब परिवार की अवधारणा बन चुकी थी और परिवार में स्त्री पत्नी होने के साथ-साथ सहयोगिनी भी होती थी । वह अपने विचार पारिवारिक मामलों में व्यक्त कर सकती थी । जैसे एक कथा में पति-पत्नी मिलकर तीन रोटियां बनाते हैं । पति दो खाना चाहता है, जिसके लिए तर्क देता है कि उसने चावल लाया है । यह कठिन काम था, जिसे उसने किया । स्त्री भी कहती है कि वह दो रोटी खाने की हकदार है, क्योंकि उसने लकड़ी ढूंढा, चावल पीसा और रोटी पकायी । काम उसने अधिक किए । याने काम के आधार पर उसे बराबरी का हक मिलना चाहिए ।”7 यहाँ आदिवासी स्त्री दूसरों को खुश रखने की अपेक्षा समान अधिकार की मांग करती है । यह समाज न सिर्फ स्त्री-पुरुष समानता की बात करता है, अपितु शिकार में जाने वाले कुत्ते के साथ भी समानता का व्यवहार किया जाता है । इस संदर्भ में रामदयाल मुंडा कहते हैं कि – “यहाँ की स्त्रियाँ अपने व्यवहार में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र हैं और जीवन के अधिकांश क्षेत्रों में पुरुषों के साथ उनकी समान सहभागिता दिखाई देती है । यह समानता कुछ अर्थ में मानवेत्तर दायरे तक चली गई है : किसी शिकार अभियान में किसी कुत्ते ने अगर निर्णायक भूमिका निभायी, तो उसकी हिस्सेदारी भी मनुष्य के बराबर गिनी जाती है । समानता के इसी तकाजे का परिणाम है कि एक प्रतीक रूप का समान अंतर छोड़ कर किसी गाँव के ग्रामप्रधान और एक सामान्य सदस्य में हैसियत का कोई खास अंतर नहीं होता । हर व्यक्ति के मन में श्रम की महत्ता के पीछे यही समानता का भाव कार्य करता है ।”8

यदि पुरुष मनपसंद जीवनसाथी चुनने का अधिकार रखता है तो आदिवासी स्त्री को भी यह अधिकार प्राप्त है । पति या अन्य पारिवारिक सदस्यों द्वारा प्रताड़ित किया जाने पर आदिवासी औरत अपने पति के घर को त्याग देती है, क्योंकि आदिवासी स्त्रियाँ पति को भगवान नहीं मानती है, बल्कि जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करती हैं । इस संदर्भ में वाहरू सोनवणे कहते हैं कि – “पति के सताए जाने और सास-ससुर द्वारा तंग किए जाने पर घुट-घुट कर मर जाने की अपेक्षा उस पति को छोड़कर दूसरा साथी या पति चुनना और अपनी पसंद के पति के साथ जीना, आदिवासी स्त्री को अधिक पसंद है । इस व्यवहार को आदिवासी समाज मान्यता देता है, बहिष्कार नहीं करता ।”9 आदिवासी स्त्रियाँ पति को ईश्वर मान कर या धन के लोभ से सभी संत्रास सहन नहीं करती, बल्कि आर्थिक शोषण का शिकार हुए बिना ही आसानी से संबंध विच्छेद कर लेती हैं या तलाक ले लेती हैं ।

            आदिवासियों में लड़के के घरवालों को लड़की के परिवारजनों को वधू-मूल्य अर्थात् गोनोंग चुकाना पड़ता है जो समाज के लोगों द्वारा तय किया जाता है । आदिवासी समाज में दहेज जैसी कुप्रथा नहीं मिलती है, इसलिए वहाँ आर्थिक आधार पर स्त्री शोषण नहीं मिलता है । अगर किसी लड़की की शादी कम उम्र में कर दी जाती है और उसका पति असामयिक मौत का शिकार हो जाता है तो उसको आजीवन विधवा रहने के बजाय दूसरा पति चुनने का अधिकार दे दिया जाता है । जब विधवा स्त्री को दूसरी जगह न भेजकर परिवार में ही ज्येष्ठ या देवर के साथ ही विवाह करवा दिया जाता है तो उसे ‘नातरा विवाह’ कहा जाता है । हिमाचल प्रदेश की पाँगी जनजाति में इस प्रकार के विवाह को ‘टोपीलाना विवाह’ कहते है । आदिवासी समाज में विधवा विवाह की इस विशेषता को बताते हुए प्रो. हरिशंकर मिश्र कहते हैं कि – “छोटी उम्र में विधवा हो जाने वाली स्त्री का उसी के ज्येष्ठ या देवर के साथ विवाह कर दिया जाता है और लड़का (दूल्हा) प्रमुख लोगों के सामने विधवा स्त्री को ‘जोजी’ (स्त्रियों की टोपी विशेष) के साथ रूपये और आभूषण भी देता है और उसे पति के रूप में स्वीकार कर लेता है ।”10 आदिवासी समाज का मानना है कि बहू परिवार की इज्जत होती है, इसलिए उसे दूसरी जगह न भेजकर घर में ही सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार दिया जाना चाहिए । अतः उसकी शादी मृतक पति के भाइयों के साथ करा दी जाती है, क्योंकि यहाँ समाज में दो विवाहों को सामाजिक मान्यता मिली हुई है । राजस्थान के मीणा समुदाय में इस प्रथा को ‘पिछोड़ा उड़ाना’ कहते है । गोंड आदिवासियों में ‘दूध लौटाना’ विवाह का प्रचलन है । इस प्रथा के अनुसार जिस वंश में लड़की का विवाह किया जाता है, उसी वंश से लड़की लेने का अधिकार ब्याहने वाले वंश को होता है ।

READ  नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019: एक अवलोकन-डॉ. अजय कुमार सिंह

आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से एक विशिष्ट समुदाय माना गया है, लेकिन उसकी कोई स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं है । झारखंड के आदिवासियों के धर्म को सरना, छत्तीसगढ़ के गोंड आदिवासियों के धर्म को गौंडी, राजस्थान-मध्यप्रदेश-गुजरात के भीलों के धर्म को भीली कहा जाता है । इन धर्मों का हिन्दू या अन्य किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है । इसलिए आदिवासी समुदायों के सभी धर्म मिलकर आदिवासी धर्म अर्थात् ‘आदि धरम’ बनते हैं । आदिवासी प्रकृति पर आधारित धर्म को महत्व देते हैं, क्योंकि यह समस्त मानव समुदायों की धार्मिक आस्थाओं का आधार या केन्द्रीय तत्व बनने की क्षमता रखता है । आदिवासियों का मुख्य धर्म ‘आदि धरम’ अर्थात् ‘सरना’ है जो उनके पूर्वजों की आस्थाओं का केंद्र है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है । रामदयाल मुंडा और रतनसिंह मानकी लिखते हैं कि – “आदि धरम से हमारा तात्पर्य भारतीय आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं के उस मूल स्वरूप से है, जिसे प्रकारांतर में एनिमिज्म, एनीमिस्टिक रिलीजन, प्रिमिटिभिज्म, प्रिमिटिभ रिलीजन, एबोरिजिनल रिलीजन, आदिवासी धर्म, जनजाति धर्म, सरनाइज्म, सरना धर्म, सारि धर्म, जाहिरा धर्म, बोंगाइज्म, दोनिपोलो, बाथौ, इत्यादि नामों से विहित किया गया है ।”11 ‘सरना’ मुंडा आदिवासियों का पूजा स्थल होता है जो प्रत्येक गाँव के छोर पर शालवृक्ष के नीचे का खुला स्थान होता है । गाँव की सामाजिक पूजा और अनुष्ठान यहीं संपन्न होते हैं । वस्तुतः सरना गाँव के आसपास जंगल के पुराने अवशेष होते हैं जहाँ आदिवासियों के देवता निवास करते हैं ।

आदि धरम के अनुसार मनुष्य मृत्यु के पश्चात किसी परलोकी स्वर्ग-नरक में न जाकर अपने ही घर में वापस आता है और अमूर्त शक्ति के रूप में अपने परिवारजनों को प्रेरित करता है । अगर वह महान कार्य करने वाला व्यक्ति रहा है तो उसको लोक देवता के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है अर्थात् आदिवासी धर्म ‘आत्मवाद’ या ‘जीववाद’ को अधिक महत्व देता है । मृत्यु प्रतीक रूप में दूसरा विवाह होता है, जिसमें मिट्टी का मिट्टी से, आग का आग से, पानी का पानी से और हवा का हवा से मिलन का अनुष्ठान होता है । इसके बाद मृतक की छाया की घर वापसी का अनुष्ठान किया जाता है । इस संदर्भ में गया पाण्डेय लिखते हैं कि – “भारतीय जनजातियों की विश्वास व्यवस्था के अनुसार सभी स्थान पवित्र एवं धार्मिक होते हैं क्योंकि वहाँ आत्मा का निवास स्थान होता है । पशु-पक्षी, पेड़-पौधा, नदी, समुद्र, झरना, पहाड़, पत्थर सब के सब आत्मा के वास स्थान हैं । मृतक को भी इससे बाहर नहीं रखा गया है क्योंकि मृत्यु के बाद भी वे अस्तित्व में बनी रहती हैं या संतान के रूप में पुनर्जन्म धारण करती हैं ।”12 आदिवासी आत्मा, जीवात्मा और दुष्टात्मा पर विश्वास करते हैं । आत्मा की स्वीकारता के कारण ये पूर्वजन्म में भी आस्था रखते हैं । इस अनुष्ठान के माध्यम से मृतक की आत्मा को परमेश्वर और उसके सहयोगी देवताओं के साक्ष्य में तथा कुटुम्बियों की उपस्थिति में परिवार के पूर्वजों में सम्मानपूर्वक सम्मिलित कर लिया जाता है । जिस अलौकिक शक्ति की उपासना आदिवासी समुदाय करता है, उसे ‘धर्मेश’ कहकर संबोधित किया जाता है ।

आदिवासी प्रकृति तत्व के रूप में उनके गणचिन्हों की पूजा करते हैं या लोक देवी-देवताओं के रूप में अपने महान पूर्वजों की । ये दोनों आकाशीय एवं अमूर्त तत्व न होकर उनके निकटस्थ तत्व रहे हैं । टोटेम वस्तुतः आदिवासियों के गणचिन्ह होते हैं जो काल्पनिक होते हैं । इनको मानने के पीछे आदिवासियों की धारणा है कि संकट की घड़ी में ये उनकी सहायता करेंगे । कोई भी पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु आदि टोटेम हो सकते हैं । इनको किसी भी प्रकार की क्षति पहुँचाना या मारना वर्जित माना जाता है । राजस्थान के मीणा आदिवासी समुदाय की उत्पत्ति मत्स्य या मीन गणचिन्ह से मानी जाती है, लेकिन मीन के गणचिन्ह को बदलकर विष्णु के मत्स्यावतार से जोड़ दिया गया । जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि मीणा समुदाय आर्यों से संबंध रखता है और क्षत्रिय है । किन्तु मीणा आदिवासियों में वर्णाश्रम व्यवस्था नहीं मिलती है, इसलिए उनके रीति-रिवाज, मौखिक परंपरा, संस्कृति, धर्म, पंचायत व्यवस्था आदि सब कुछ आदिवासी हैं । लेकिन ‘मीन’ की गलत व्याख्या करने के कारण सब कुछ बदल गया है । इस संदर्भ में हरिराम मीणा कहते हैं कि – “जहाँ तक मत्स्य या मीन से मीणा आदिवासियों का संबंध है तो इस संबंध में यह स्वीकार करना उचित होगा कि मत्स्य या मीन इन आदिवासियों का गणचिन्ह रहा है जैसा कि वैदिक ग्रंथों में प्राप्त संदर्भों यथा मत्स्य गणराज्य तथा मोहनजोदड़ो में प्राप्त अवशेषों यथा मिट्टी की मुद्राओं पर मछली के चिन्ह । आदिवासियों के गणचिन्हों के बारे में यह सच्चाई है कि जिस आदिवासी घटक का जो गणचिन्ह होगा उसे वह घटक संरक्षित भी करेगा और साथ-साथ उसका उपयोग या उपभोग भी करेगा । जैसे भीलों का गणचिन्ह महुआ, नागों का नाग आदि ।”13 गणचिन्हों को वंश उत्पत्ति का प्रतीक मानकर उसकी आराधना या उपासना की जाती है । इन गणचिन्हों का संबंध पशु-पक्षी, पेड़-पौधों से होता है, इसलिए जो आदिवासी समुदाय जिस गणचिन्ह को मानता है उसका संरक्षण और रक्षा करता है । ये प्रतीक चिन्ह आदिवासियों की पहचान के वाहक होते हैं, अतः वे उनको किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाते हैं ।

READ  नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता-आशुतोष कुमार

आदिवासी समाज सर्वप्रथम पृथ्वी, प्रकृति और जीव-जगत को महत्व देता है अर्थात् आदिवासी धर्म मनुष्यता को महत्व देते हुए प्रकृति के समस्त सजीव और निर्जीव प्राणियों के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान व्यक्त करता है । उसका विश्वास है कि केवल मनुष्य ही इस संसार में विवेकशील प्राणी नहीं है, बल्कि सृष्टि के समस्त जीव-जंतुओं के पास भी विवेक होता है । जबकि अन्य धर्मों में देखा जाय तो वहाँ मनुष्य को ही अधिक प्राथमिकता दी जाती है । इस संदर्भ में वंदना टेटे कहती हैं कि – “गैर-आदिवासी विश्व का धर्म और विश्वास का मनुष्य इस दंभ से भरा है कि वह 84 लाख योनियों में सबसे श्रेष्ठ है । लेकिन आदिवासी विश्वास श्रेष्ठता के इस दंभ से असहमति रखता है । वह मानता है कि इस समूची समष्टि में वह भी महज एक प्राणी है । अन्य प्राणियों एवं समस्त वस्तुजगत से अपने बौद्धिक सामर्थ्य के बावजूद वह कोई विशिष्ट जीव नहीं है ।”14 इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आदिवासी समाज में इंसान और उसकी आत्मिक-भौतिक आवश्यकताएँ कभी भी केंद्र में नहीं रही है । बल्कि पूरी सृष्टि जिसमें प्रकृति भी एक सर्वोच्च नियामक व्यवस्था है, वह आदिवासी जीवन दर्शन का केंद्र रही है ।

            प्रकृति पर आधारित जीवन दर्शन आदिवासी विरासत है । प्रकृति का शोषण और दोहन इनके संस्कार में नहीं है । ये प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितने से वे जीवित और सुरक्षित रहे । पर्यावरण संरक्षण आदिवासी जीवन पद्धति का आदर्श है । आदिवासी संस्कृति एवं प्रकृति का गहरा आत्मीय रिश्ता है, इसलिए आदिवासी प्रकृति प्रदत्त पेड़-पौधों को अपने जीवन से जोड़ते हैं । प्रभु पी. आदिवासियों की इन्हीं विशेषताओं को व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि – “अपने क्षेत्र से खास जुड़ाव और उनके समुदाय का प्रकृति से अंतरंग संबंध । उनके लिए अपने साधन स्रोतों के प्रबंध का अर्थ यह नहीं है कि अलग-अलग परिवारों के बीच भूमि का बँटवारा कर दिया जाए । आदिवासियों की दृष्टि में कोई व्यक्ति या समुदाय तभी भूमि से जुड़ता है, जब वह अपने पूर्वजों से लेकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस जमीन पर बसा हुआ हो । आदिवासी का क्षेत्र उसकी सामूहिक चेतना का विस्तार होता है, जिसका अपना सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनैतिक महत्व है । इसी के बूते पर कबीले के ज्येष्ठ व्यक्ति समुदाय का संचालन करते हैं । आदिवासियों का ज्ञान, अध्यात्म और धर्म व्यवस्था भी प्रकृति से उसके गहरे संबंधों पर ही आधारित है ।”15 आदिवासियों में प्रकृति के दोहन, उच्छेदन, विनाश या अब रक्षण का विचार महज भौतिक उपयोगितावादी स्तर का नहीं है । आदिवासी प्रकृति से जरूरत भर लेते हैं और उतना ही उगा कर वापस कर देते हैं । इसलिए वर्तमान युग में भी प्रकृति से इनका संबंध सिर्फ बाहरी वैज्ञानिक विकास, औद्योगिक और वाणिज्यिक नहीं है । आदिवासियों में वस्तुओं के संग्रहण की प्रवृत्ति नहीं पायी जाती है । आदिवासी समाज मानव और मानवेत्तर प्राणियों के हितों की रक्षा करते हुए प्रकृति के संतुलन को बनाए रखता है । “ये आदिवासी आज तक इसलिए बचे हुए हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी आदतों, रीति-रिवाजों को प्रकृति की लय के साथ एकात्म कर लिया है, उसके प्रति बिना हिंसा किए, उसमें बिना कोई विचलन पैदा किए, उससे जीवित रहने के लिए, जो कम से कम जरूरी है, उतना भर लेकर, ताकि पलटकर वह फिर उन्हें ही नष्ट कर डाले ।”16 आदिवासी प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि या क्षति नहीं पहुंचाते हैं । वे अपनी आवश्यकतानुसार प्रकृति प्रदत्त पदार्थों का उपयोग करते हैं । उनमें चीजों के संग्रहण की प्रवृत्ति नहीं मिलती है । प्रकृति और अपनी मूल संस्कृति को बचाए रखना आदिवासी जीवन शैली की प्रमुख विशेषता है । पलाश, महुआ, गूलर और आंवला आदिवासी समुदाय के जीवन के प्रतीक है । आदिवासियों का जीवन दूसरों की भलाई के लिए समर्पित है अर्थात् उनका जीवन गूलर के फूल की भांति होता है जो नग्न आँखों से दिखाई नहीं पड़ता है, बल्कि उसके लिए गहरी समझ और अनुभूति का होना बेहद जरुरी है ।

संदर्भ सूची :

  1. गुप्ता, रमणिका (सं.), आदिवासी लोक (भाग-1), पृष्ठ सं. 115
  2. गुप्ता, प.ह., रामायण : एक नया दृष्टिकोण, पृष्ठ सं. 110
  3. मीणा, डॉ. श्रवणकुमार, समकालीन विमर्श : विविध परिदृश्य, पृष्ठ सं. 13
  4. पैन्यूली, डॉ. सोना (सं.), समाज विज्ञान शोध पत्रिका, अप्रैल-सितम्बर 2012, पृष्ठ सं. 123
  5. यात्री, से.रे. (सं.), वर्तमान हिन्दी साहित्य, अप्रैल-जून 1997, पृष्ठ सं. 63
  6. पथिक, बी.पी. वर्मा, अरावली उद्घोष, पृष्ठ सं. 44
  7. टेटे, वंदना, आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ सं. 70
  8. मुंडा, रामदयाल, आदिवासी अस्तित्व और झारखंडी अस्मिता के सवाल, पृष्ठ सं. 32
  9. गुप्ता, रमणिका (सं.), आदिवासी कौन, पृष्ठ सं. 21
  10. वर्मा, डॉ. गीता, गोंड, रवि कुमार (सं.), वर्तमान समय में आदिवासी समाज, पृष्ठ सं. 17
  11. मुंडा, रामदयाल, मानकी, रतनसिंह, आदि धरम, पृष्ठ सं. 11
  12. पाण्डेय, गया, भारतीय जनजातीय संस्कृति, पृष्ठ सं. 157
  13. मीणा, हरिराम, आदिवासी दुनिया, पृष्ठ सं. 47-48
  14. वंदना, टेटे, आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन, पृष्ठ सं. 89
  15. गुप्ता, रमणिका (सं.), आदिवासी कौन, पृष्ठ सं. 30
  16.  
 
  • ल्योसा, मारियो वार्गोस, किस्सागो, शंपा शाह (अनु.), पृष्ठ सं. 36-37

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *