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आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ

*पी.जी.टी. हिंदी, विद्याज्ञान स्कूल बुलंदशहर- 203202, उत्तर प्रदेश- भारत, मोबाईल 8171276433, ईमेल- dr.arvind11@yahoo.in

सारांश (Abstract)

आधुनिक जीवन की विसंगतियों को हम भली-भांति तभी समझ पाएंगे जब हम आधुनिकता अथवा आधुनिक जीवन का गहन विश्लेषण करेंगे। आज के इस युग में आधुनिकता या आधुनिक जीवन से अभिप्राय उन भौतिक सुखों से लिया जाता है जिनका हम उपभोग करते हैं। अधिकांशत: देखा गया है कि आधुनिकता को विचारों में कम, बाहरी चमक-दमक में अधिक महत्व दिया गया है। आधुनिक प्रतिमानों को अपनाने के लिए जिस शक्ति, आत्मबल, दृढ़ता, संकल्प और निरंतर श्रम की आवश्यकता है, वह सब आज की मानव पीढ़ी स्वयं में संचित अथवा संगृहीत नहीं कर पायी है। संभवत: इसी कारण यह पीढ़ी स्वयं को आधुनिक परिवेश में बेबस और अकेला पाती है। अनेक प्रकार की समस्याएँ और तनाव पैदा होते जा रहे हैं। अनेक कुंठाएँ, चिंताएँ और संत्रास जैसी विसंगतियाँ आदमी को अपने में समाहित कर रही हैं। वर्तमान समय में विघटन की प्रवृत्ति को प्रश्रय मिल रहा है। राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक सभी क्षेत्रों में विसंगतियाँ पनपी हैं। ‘तनाव’ ने जहाँ अनेक बीमारियों को जन्म दिया है वहीं अपराधों की भी संख्या बढ़ाने में योगदान दिया है। विश्वास जैसे मूल्यों का ह्रास हुआ जो विसंगति की ही देन है। स्वदेशी परिवेश को विदेशी परिवेश से आयातित आधुनिक जीवन की विसंगतियों ने प्रभावित किया है।

बीज शब्द (Keywords)

आधुनिकता, आधुनिक जीवन, आधुनिकीकरण, विसंगति, स्वदेशी – विदेशी परिवेश।

भूमिका (Introduction)

आधुनिकता अथवा आधुनिक जीवन : ‘आधुनिकता’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘अधुना’ शब्द से हुई है। आधुनिक विशेष कालावधि का वाचक है, विशेषण तथा संस्कृत शब्द है। आधुनिक – आजकल का, वर्तमान काल का, नया जमाने का। “आधुनिकीकरण का अंग्रेज़ी पर्यायवाची शब्द – ‘मॉडर्नाइजेशन’ है। यह शब्द अंग्रेज़ी के ही शब्द ‘मॉडर्न’ से बना है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘मोडो’ से हुई है। लैटिन भाषा में मोडो’ शब्द का अर्थ है – ‘प्रचलन’। अर्थात जो कुछ प्रचलन में है वही आधुनिक है।” समाज शास्त्र में आधुनिकीकरण अथवा आधुनिकता की निम्नवत् परिभाषाएँ दी गई हैं-

प्रसिद्ध समाजशास्त्री बेंजामिन स्वार्टज़ का कथन है कि – “आधुनिकीकरण विभिन्न मानवीय प्रयोजनों को सिद्ध करने हेतु मानव की शक्ति, सामर्थ्य व क्षमता के व्यवस्थित व निरंतर युक्तियुक्त कार्यान्वयन के द्वारा मानव के भौतिक व सामाजिक पर्यावरण पर नियंत्रण करने का प्रयास है।” डेविड एप्टर के अनुसार – “आधुनिकीकरण चयन करने की योग्यता व अन्वेषण तथा प्रश्नात्मक धारणाओं से संबद्ध है।” डॉ. मदन मोहन भारद्वाज आधुनिकता को अलग ढंग से परिभाषित करते हैं- “आजकल आधुनिकता से जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, वह है रहन-सहन, खान-पान और बोलचाल में पश्चिम का अनुकरण। कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति जितना अधिक पश्चिमी रंग में रंग गया है वह उतना ही आधुनिक है। अत: हमारे यहाँ आधुनिकता का अर्थ है- ‘पश्चिमी प्रभाव’। डॉ. नगेंद्र ने आधुनिता का प्रश्न निबंध में कहा है- “आधुनिकता को मूल्य के रूप में स्वीकारना समीचीन न होगा, यह एक प्रक्रिया है, इसी रूप में इसका प्रभाव अक्षुण्ण है।” नटरंग के संपादक एवं प्रख्यात साहित्यकार नैमिचन्द जैन ने कहा है- “ हमारे लिए आधुनिकता पश्चिमीकरण में नहीं, अपनी परंपरा को समकालीन जरूरतों के संदर्भ में ढालने, बदलने और जीवंत करने में हो सकती है।”

राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ‘आधुनिक बोध’ में आधुनिकता के बारे में कहा है- “जिसे हम आधुनिकता कहते हैं, वह एक प्रक्रिया है।” हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गिरिराज किशोर ने आधुनिकता के बारे में कहा है- “आधुनिकता वही होती है जो वर्तमान को स्वीकार करे और उसके अनुरूप रूढ़ियों में परिवर्तन लाए।” आधुनिकता को हमें विचारों से जोड़ना चाहिए तभी हम आधुनिक हो सकेंगे अन्यथा हम लोग आधुनिक न होकर उच्छृंखल हो जाएंगे। डॉ. भैरूलाल गर्ग ने ‘आज की हिंदी कहानी’ में आधुनिकता के बारे में कहा है- “आधुनिकता की कसौटी मात्र बाह्य परिवर्तन ही नहीं है अपितु जीवन मूल्य, विचारधाराएँ, दृष्टिकोण और जीवनानुभव हैं जो कि बहुत कुछ आंतरिकता से संबंध रखती है।” डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिकता को गतिशीलता मानते हुए कहते हैं कि बुद्धिमान आदमी एक पैर से खड़ा है दूसरे पैर से चलता है, यह खड़ा पैर परंपरा, चलता पैर आधुनिकता है। डॉ. इंद्रनाथ मदान के अनुसार –“यह एक प्रक्रिया है, जिसे वाद के साँचे में ढाल कर जड़ बनाने की कोशिश नाकाम सिद्ध होती रही है, गति को स्थिति का रूप देने में असफलता का मुँह ताकना पड़ा है, आधुनिकता स्थिति को तोड़कर गति में जारी होती रही है।” विपिन अग्रवाल ने ‘आधुनिकता के पहलू’ में कहा है- “आधुनिकता वास्तव में एक अर्द्ध विकसित प्रक्रिया है जिसकी कोई स्थूल, पूर्वनिश्चित और अपरिवर्तनीय दिशा नहीं है। मनुष्य और उसकी अर्द्ध विकसित अथवा अल्प विकसित क्रियाएँ आधुनिकता को परिभाषित करती हैं, जो जितना आधुनिक है वह उतना ही मनुष्य है।” डॉ. कुमार विमल ‘अत्याधुनिक हिंदी साहित्य’ में लिखते हैं- “आज की स्थिति का यथार्थ परिज्ञान ही आधुनिकता का आधार है।”

आधुनिक मनुष्य के बारे में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक युंग ने ‘मॉडर्न मैन इन सर्च ऑफ ए सोल’ में कहा है- “आधुनिक मनुष्य वह है जो संसार के अंतिम छोर पर एक ऐसी भूमि पर खड़ा है जिसके सामने भविष्य की अस्पष्टता है, ऊपर शून्य और नीचे इतिहास में लिपटी मनुष्यता जो आदिम धुंध में खो चुकी है। इस प्रकार का मनुष्य बिरला ही मिल पाता है जो वर्तमान में ही जी सके। ऐसा मनुष्य पूर्णत: अपने वर्तमान अस्तित्व के बारे में सचेत रहता है, इसके लिए व्यापकतम और गंभीर चेतना अपेक्षित है। इस तरह का मनुष्य हमेशा ही अकेला होता है क्योंकि चेतना की वृद्धि उसे निरंतर आदिम मौलिक समुदाय से काट कर अलग करती है।”

उपर्युक्त विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर ‘आधुनिकता’ के अनेक अर्थ उद्घाटित हुए हैं- आजकल का, वर्तमान में प्रचलन, आज की स्थिति का यथार्थ परिज्ञान, पश्चिमी प्रभाव, वर्तमान को स्वीकार कर रूढ़ियों में परिवर्तन, न अतीत से सरोकार न भविष्य से, चलता पैर आधुनिकता, यह एक प्रक्रिया है, अर्द्ध विकसित प्रक्रिया, परंपरा को समकालीन जरूरतों के संदर्भ में ढालना आदि। आधुनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का ह्रास होने के कारण समाज में अनेक विसंगतियों का उदय हुआ। विसंगतियों के कारण मनुष्य का व्यक्तित्व विघटित हुआ है। ‘विसंगति’ क्या होती है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ‘विसंगति’ शब्द का अर्थ जानना आवश्यक है।

विसंगति (एब्सर्डिटी) : बृह्त पारिभाषिक शब्द संग्रह के अनुसार विसंगति (एब्सर्डिटी) का अर्थ है- “असंगति, अनौचित्य, अयुक्ति, अर्थहीनता, विवेकशून्यता, अपार्थता आदि।” ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘एब्सर्डिटी’ से आशय है-“फुली अनरीजनेबलनैस : एन एब्सर्ड स्टेटमेंट ऑर एक्ट।” पाश्चात्य विद्वान टी. एस. इलियट ने ‘एब्सर्डिटी’ को “समथिंग दैट इज़ एब्सर्ड” कहा है। इसी प्रकार ‘साहित्यिक शब्दावली’ में विसंगति का अर्थ – “असंगति, हास्यास्पदता” से लिया गया है। इंग्लिश और संस्कृत डिक्शनरी में ‘एब्सर्डिटी’ को –“दैट व्हीच इज़ एब्सर्ड, मृषार्थकं, अनर्थकं, शशविषाणम्, शशशृंग, गगन पुष्पम्, गगन कुसुम” कहा गया है। इसी प्रकार ‘किमीरा’ का अर्थ है – “असत्य कल्पना, असत्य पदार्थ, असत्वस्तु, शशशृंग (हॉर्न ऑफ ए रेबिट)।” ‘एब्सर्डिटी’ को शशशृंग कहना उचित ही है क्योंकि खरगोश के सींग लगाना कभी संभव नहीं है। इसी प्रकार अनौचित्य अथवा अयुक्ति पूर्ण कथन विसंगति के परिचायक हैं। किमीरा (असत्य कल्पना), शशशृंग (खरगोश के सींग लगाना) व एब्सर्डिटी (विसंगति), इन तीनों में अर्थ के आधार पर बहुत समानता है।

विसंगत या एब्सर्ड का अर्थ अधिक गहराई से जानने के लिए कुछ विद्वानों के विचारों को समझना आवश्यक है- डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र के अनुसार- “एब्सर्ड नाटक कहीं से भी शुरू होते हैं और अनपेक्षित ढंग से समाप्त हो जाते हैं। इनमें सब कुछ असंबद्ध, असंगत, निरर्थक, उलजलूल, बोरियत पैदा करने वाला, अविश्वसनीय एवं तर्कातीत होता है।” डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र के ही मतानुसार- “एब्सर्ड नाटक मूल्य एवं जीवन की विसंगति को रेखांकित करना चाहता है, इसलिए उसमें नायक-नायिका जैसी कोई चीज़ नहीं होती। वह चाहता है कि दर्शक अपनी पृथक सत्ता को बनाए रखकर मंच पर चल रहे उलजलूल कारनामों को देखें और अपनी कल्पना शक्ति के द्वारा पिरोकर युग की सच्चाई का साक्षात्कार करें।” विसंगत या एब्सर्ड जीवन को डॉ. राम सेवक सिंह ने इस प्रकार माना है- “एब्सर्ड मंच उस विश्वव्यापी स्वत: स्फूर्त आंदोलन का अंग है, जिसमें जीवन की अपरिहार्य विडंबनाओं तथा उसकी निरर्थकता से क्षुब्ध मनुष्य की असहाय स्थिति का चित्रण ही प्रधान उद्देश्य है।” डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र लिखते हैं- “ ‘एब्सर्ड’ शब्द जिस अर्थ में आज प्रचलित है उसे गढ़ने का श्रेय ‘कामू’ को जाता है।” डॉ. केदारनाथ सिंह के अनुसार – “असंगत नाटक व्यक्ति के भीतरी यथार्थ को अधिक व्यक्त करते हैं। इनमें परंपरागत मूल्यों के प्रति आस्था नहीं है। जीवन की विद्रूपताओं और विकृतियों को ये अपना आधार बनाते हैं।” डॉ. भैरूलाल गर्ग विसंगतियों को निर्मित करने वाले कई पहलूओं की चर्चा करते हैं- “इन विसंगतियों के जाल को निर्मित करने वाले कई पहलू हैं, यथा : मानवीय संबंधों में टूटन और अलगाव, परिवेशजन्य त्रासदी, कुंठा, भय, संत्रास, मृत्युबोध आदि।”

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सार्त्र ने कामू के उस विचार की व्याख्या की है, उनका कहना है कि कामू के दर्शन में ‘विसंगति’ का मूल कारण इन्सान और दुनिया का अथवा इन्सान की तार्किक मांगों और दुनिया के अतार्किक स्वरूप का संबंध है। अस्तित्ववादी विचारक कामू ने ‘विसंगति’ का प्रयोग तीन अर्थों में किया है- मानव जीवन की विरोधाभासी त्रासदी के रूप में, बनी रहने वाली परिस्थिति के रूप में और विद्रोह के रूप में। प्रसिद्ध विद्वान कुबेरनाथ राय ने ‘क्रांति, विसंगति और कामू का विद्रोह दर्शन’ में विसंगति की विस्तार से व्याख्या की है- “विसंगतियों (एब्सर्डिटीज़) के संसार में अभिशप्त अकेले मनुष्य की करुण व्यथा ही कामू के चिंतन और साहित्य का विषय है। गत महायुद्धों की विभीषिका ने मनुष्यों के तन-मन और धन को ऐसा पराजित किया कि उसे न तो सनातन मूल्यों में विश्वास रहा और न ही आदर्शों की पवित्रता और ईमानदारी में आज वह अकेला है या अकेला रहने के लिए अभिशप्त है। पुरुषार्थ, लक्ष्य, न्याय, आदर्श, ईश्वर, लोक और राष्ट्र में से कोई भी एक आधार उसके पास नहीं है, जिस पर वह खड़ा हो सके। वह त्रिशंकु है। उसके चारों ओर है- ‘विसंगतियों का जगत’।” कामू के अनुसार जीवन के मामूली से मामूली क्रिया-कलापों में भी पग-पग पर हमें विसंगतियों का सामना करना पड़ता है। युक्ति-युक्त ढंग से सोचने पर हम किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं और उसके अनुसार सारे ज्ञात कार्य कारणों का पालन करते हुए भी हम पाते हैं कि वास्तव में घटित कुछ और ही हुआ है, जो अति ही युक्तिहीन और तर्कहीन है। इस तरह हमारी पूर्व स्थापित युक्तियुक्तता कोई काम नहीं आती। हमार अंतर की विवेकपूर्ण माँग और बाहर की अविवेकपूर्ण घटनाएँ एवं अनुभव इन दो छोरों के बीच कोई तारतम्य नहीं है। इसी युक्तियुक्त का और तारतम्य से हीन स्थिति को ही कामू ‘विसंगति’ कहता है।”

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘नये साहित्य का तर्क शास्त्र’ में कहा है कि – “कामू जीवन में सब कुछ को ‘विसंगत’ (एब्सर्ड) मानता है। ‘विसंगत’ का अर्थ होता है- ‘विरोधाभासों से पूर्ण अथवा अर्थहीन’। अपनी पुस्तक ‘मिथ ऑफ सिसिफ़स’ में उसने अपना विसंगति दर्शन प्रस्तुत किया है। कामू के अनुसार हम चाहते कुछ और हैं, और करते कुछ और हैं तथा उस कर्म का फल कुछ और ही होना चाहिए पर हमें मिलता कुछ और ही है। इन चारों में कोई आपसी संगति नहीं है। ‘विसंगति’ का यह दर्शन किसी चरम मूल्य में विश्वास नहीं करता। इसके अनुसार कुछ भी मूल्यवान और सार्थक नहीं है। सारी स्थितियाँ अर्थहीन हैं।” लाल चंद गुप्त मंगल कहते हैं कि- “ कामू के अनुसार विसंगतियों से बचने का एक मात्र मार्ग है – ‘विद्रोह’। विसंगतियों के परिवेश में नए-नए मूल्यों को रचने का प्रयास किया जाता है। रवींद्र कालिया – कोज़ी कॉर्नर (एक विसंगति) में विसंगतियों को आरोपित न मानकर उन्हें भोगी हुई मानते हैं- “जीवन को खासकर महानगर के भागते हुए जीवन को देखें तो साफ़ लगता है कि हमारी सारी दिनचर्या विसंगतियों के कोष्ठ में कैद है। ये विसंगतियाँ आरोपित नहीं हैं, भोगी हुई हैं, इसलिए विसंगतियों का रूप पाकर भी प्राणवान हैं।” डॉ. इंद्रनाथ मदान ‘आधुनिकता और सृजनात्मक साहित्य’ में ‘विसंगति’ के बारे में लिखते हैं- “विसंगति क्या है का जवाब मानव की नियति और स्थिति क्या है के सवाल से जुड़ा हुआ है। विसंगति के नाटककारों और चिंतकों के अनुसार मानव की नियति उद्देश्यहीन है, उसके व्यक्तित्व की संगति न तो परिवेश से बैठती है और न ही उसकी हस्ती की संगति उसके पैदा होने और मर जाने से बैठती है।

उपर्युक्त विद्वानों ने ‘विसंगति’ की विभिन्न परिभाषाएँ दी हैं, जिनके आधार पर विसंगति के अनेक अर्थ दृष्टिगोचर हुए हैं- असंगत, हास्यास्पदता, निरर्थक, ऊलजलूल, बोरियत पैदा करने वाला, अविश्वासनीय, मनुष्य की असहाय स्थिति का चित्रण, जीवन की विद्रूपताओं और विकृतियों से संबंध, मृत्युबोध, तर्कहीन, विरोधाभास, उद्देश्यहीन व अर्थहीन आदि।

‘आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ’ (स्वदेशी परिवेश) : स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश ने उन्नति की है परंतु धीरे-धीरे स्वतंत्रता की यथार्थता जब सामने आई और सत्य प्रकट हुआ कि प्रशासन में अभी तक कुछ लोग थे जो चले गए। उनका स्थान कुछ नए जेल गए देशभक्तों ने ले लिया जो साम्राज्यवादी तो नहीं हैं परंतु अपने जेल -जीवन में व्यतीत बहुमूल्य दिनों का मूल्य अपनी स्वार्थपूर्ति एवं भाई-भतीजावाद को पोषित कर करना चाहते हैं। वर्तमान में जाति और प्रजातंत्र की साँसें टूटती प्रतीत हो रही हैं। विभाजन ने व्यक्ति को व्यक्ति से अलग किया है, उसे सभी संबंध बेमानी लगने लगे। कमलेश्वर ने विभाजन से उत्पन्न मोहभंग को ‘नई कहानी की भूमिका’ में इस प्रकार दर्शाया है- “ विभाजन, मोहभंग, यांत्रिकता, विसंगतियाँ,परिवारों का विघटन, राजनैतिक भ्रष्टाचार और व्यापक असंतोष के बीच जो व्यक्ति साँसें ले रहा था, जिसका समकालीन साहित्य जवाबदेही से कतरा रहा था। ……….या जिसके आंतरिक- बाह्य संकट को अभिव्यक्ति नहीं दे पा रहा था, वह मनुष्य इतिहास के क्रम में अपने पूरी परिवेश को लिए एक अवरूद्ध राह पर संभ्रमित और चकित खड़ा था।”

वस्तुस्थिति यह रही कि स्वतंत्र भारत जितनी तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए था उतना तो क्या उससे बहुत कम अंश में भी आगे न बढ़ सका। चुनाव के समय नेता वर्ग बड़े-बड़े प्रलोभन एवं वादें करते हैं। चुनाव पश्चात सब वादें भुला दिए जाते हैं। आधुनिक सत्ता संपन्न विधायक एवं मंत्री मूल रूप में तो जनसेवक होते हैं परंतु अपनी सत्ता का दुरुपयोग करके बड़े-बड़े अपराधियों, उद्योगपतियों और पूँजीपतियों को संरक्षण देते हैं। मंत्री तक अपने नातेदारों को परमिट, लाइसेंस व अन्य लाभकारी पद उन्मुक्त हृदय से प्रदान करते हैं। वर्तमान में ऐसा कोई भी लोकनायक नहीं रहा जो चारित्रिक और नैतिक दृष्टि से नागरिकों, अफ़सरों व कर्मचारियों को ऊपर उठने की प्रेरणा प्रदान करता। आधुनिक नेता वर्ग वर्तमान राजनीति का पूर्ण स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया, खद्दर व गाँधी टोपी का महत्व पहचान कर अपने स्वार्थ साधन के रूप में इनका प्रयोग किया। वर्तमान में अनेक योजनाएँ या तो फाइलों में ही दबकर रह गई अथवा जिन निर्धन व्यक्तियों के लिए योजनाएँ बनी थी वहाँ तक पहुँचने ही नहीं दी गई। इस प्रकार राजनैतिक भ्रष्टाचार ने राजनीति को ‘विसंगत’ बना दिया।

भारतीय समाज में धर्म महत्वपूर्ण रहा है। यद्यपि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है किंतु धर्म के नाम पर यहाँ इतनी कट्टरपंथी और अंधविश्वासी भावनाएँ प्रचलित हैं कि आज के आधुनिक समाज में उनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। हिंदू-मुस्लिम झगड़े, देवी – देवताओं के नाम पर शिशुओं की बलियाँ, छुआछूत और अस्पृश्यता की भावना तथा देव मंदिरों में आत्म-बलिदान आदि ने धार्मिक विसंगतियाँ उत्पन्न की। धर्म के नाम पर भोली-भाली जनता को गुमराह किया जाता है। दिन के उजाले में पंडित और मौलवी का जो रूप होता है, वह रात के अँधेरे में इन से अलग ही प्रकार का होता है मंदिरों में देवदासी प्रथा वर्तमान में भी प्रचलित है जो वेश्यावृत्ति का ही दूसरा रूप है। धर्म के नाम पर बनाए गए ये शरणालय आज व्यभिचार के केंद्र बनकर रह गए हैं। पश्चिमी प्रभाव ने किसी सीमा तक ‘धर्म’ की रूढ़ियों को तोड़ा है। नयी पीढ़ी की दृष्टि में ‘धर्म’ एक विनाशकारी शक्ति है जो उसे समाज से पृथक ‘संप्रदाय विशेष’ तक ही सीमित रखती है। धार्मिक कट्टरता व अंधविश्वास व्यक्ति में अज्ञानता तथा प्रगति की राह में बाधा उत्पन्न करते हैं। आधुनिकता ने धर्मनिरपेक्षीकरण को प्रश्रय दिया। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जहाँ धर्म का महत्व था और यहाँ तक कि धर्म और राजनीति भी जुड़े हुए थे वहाँ अब लौकिक या धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण पनपने लगा।

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स्वदेशी परिवेश में अनेक विसंगतियाँ पहले से ही विद्यमान थी। आधुनिक युग समाज-सुधार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार ने रूढ़िवादी समाज के आधार को नष्ट कर दिया। देश के प्रबुद्ध लोगों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। राजा राम मोहन राय , ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद आदि ने सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों से समाज को मुक्त कराया। भारतीय समाज एक परंपरावादी समाज रहा है जिसमें परिवर्तन शीघ्रता से ग्राह्य नहीं होता। यही कारण है कि अनेक अधिनियमों के पारित होने के उपरांत भी दहेज प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह आदि कुरीतियों ने अनेक सामाजिक विसंगति उत्पन्न की। श्री गोपाल शरण सिंह ‘दहेज की कुप्रथा से हानियाँ’ शीर्षक में दहेज प्रथा पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- “लोग अपनी भावी पुत्रवधू के पिता से जितना द्रव्य ऐंठ सकते हैं उतना ऐंठना आवश्यक समझते हैं, चाहे वह बेचारा तबाह ही हो जाए, चाहे उसे कर्ज़ ही लेना पड़े, चाहे घर गिरवी रखना पड़े। परंतु उसको अपने भावी समधी साहब की आज्ञा का पालन करना ही पड़ता है। जिन लोगों का घर रुपयों से भरा पड़ा है उन्हें भी दहेज के रूप में मनमाना धन लिए बिना संतोष नहीं होता, मानो ऐसा करने का धर्मशास्त्र में विधान हो।” वैवाहिक असंगतियाँ समाज में अनेक कुरीतियों को जन्म और पनपने का अवसर देती है। सामाजिक स्वास्थ्य की दृष्टि से स्त्री- पुरुष के यौन संबंधों में असंगति नहीं होनी चाहिए। औद्योगीकरण ने समाज में वेश्यावृत्ति, बलात्कार, भिक्षावृत्ति, चोरी आदि अनेक समस्याएँ उत्पन्न की। जिनके कारण मानसिक रोग, अनेक बीमारियाँ, पारिवारिक विघटन तथा व्यक्तित्व विघटन जैसी विसंगतियों को प्रश्रय मिला। समाज में विधवा प्रथा, दहेज, बहुपत्नी विवाह आदि अनेक सामाजिक कुरीतियों ने नारी को ‘वेश्यालय’ में शरण के लिए मज़बूर किया।

बदलती हुई परिस्थितियों और नए परिप्रेक्ष्य में संबंधी और परिवार के सदस्यों के संबंधों में एक दरार पड़ गई है, उनके रूढ़ अर्थ परिवर्तित हो गए। संबंधों में परिवर्तन की प्रक्रिया ने ‘संयुक्त परिवार’ के स्थान पर ‘एकाकी’ या ‘केंद्रक परिवार’ को प्रश्रय दिया। पारिवारिक संबंधों में परिवर्तन की प्रक्रिया ने तनाव, कलह, कुंठा, अकेलापन, अपरिचय आदि विसंगतियाँ उत्पन्न की। पिता-पुत्र अपने संबंधों को नकारकर दोस्तों जैसा व्यवहार करने लगे हैं। एक साथ बैठकर मद्यपान कराते हैं, भाई-बहन आपस में हर विषय पर बात करते हैं, पति-पत्नी एक साथ रहते हुए अलग-अलग कार्य कराते हैं, आपस में दोस्तों जैसा व्यवहार करते हैं, दोनों अपने अलग-अलग दोस्त रखते हैं व अपने पुराने प्रेम-प्रसंगों की चर्चा निस्संकोच करते हैं। पति-पत्नी दोनों आपस में अलग होने के लिए स्वतंत्र हैं।

वर्तमान में व्यक्ति समाज व परिवार दोनों से स्वयं को कटा हुआ पाता है। उसके किसी भी कार्य में निश्चिंतता न होने के कारण उसे अपना व्यक्तित्व अधूरा लगने लगता है, थोड़ा सा सुख व दु:ख उसके लिए असहनीय है। वर्तमान में व्यक्ति एक समय में अनेक भूमिकाओं का निर्वाह करते हुए ‘भूमिका द्वंद्व’ में उलझ कर रह जाता है। संशय, अनिश्चय, कुंठा, अजनबीपन आदि विसंगतियाँ उसके व्यक्तित्व को विघटित करती हैं। जनसंख्या वृद्धि ने आधुनिक जीवन को जटिल बनाया। बेकारी, गरीबी, भूख ने व्यक्ति को आर्थिक व मानसिक स्तर पर विघटित किया। जिसके कारण नैतिकता और आदर्श उसे बेमानी लगने लगे। बेमानी आदर्शों और दिखावटी नैतिकता ने मनुष्य को ‘अकेलापन’ का बोध कराया। ‘अकेलापन’ के इस संत्रास ने व्यक्ति के अंदर मृत्युबोध का भय उत्पन्न किया। वर्तमान परिवेश में वह अपने अस्तित्व के प्रति सचेत हुआ, जिसकी परिणति ‘व्यक्तिवादी’ रूप में हुई।

उपर्युक्त विवेचन के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्वदेशी परिवेश में आधुनिक जीवन की विसंगतियों को प्रश्रय देने में विघटनकारी अनेक विद्रूपताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

(ख) – विदेशी परिवेश : उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से प्रस्फुटित वैज्ञानिक उपलब्धियों ने आस्थाशील विचार प्रणाली एवं चिंतन की स्थापनाओं को गलत प्रमाणित करके मनुष्य को अपने भविष्य के अभियान में निहायत अकेला बना दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के फलस्वरूप अनेक समस्याएँ उभर कर सामने आई हैं। नैराश्य, घुटन, दारिद्रय, संत्रास, अनैतिकता तथा दिन-प्रतिदिन घटते जीवन मूल्यों ने समस्त मनुष्य जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिह्न लगा दिया है। जिसकी परिणति व्यक्ति के अपने अस्तित्व के प्रति सजग होने में हुई है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने विदेशी परिवेश को बहुत प्रभावित किया है तथा पश्चिमी संस्कृति के धार्मिक दृष्टिकोण को एक नयी दिशा दी। पश्चिमी संस्कृति में पुनर्जन्म तथा कर्मवाद पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता व जाति व्यवस्था का अभाव पाया जाता है। विदेशी परिवेश या पश्चिमी संस्कृति में विवाह को धार्मिक संस्कार न मानकर एक समझौता मात्र मानते हैं, यही कारण है कि विवाह के स्थायित्व में कमी पाई जाती है। स्त्री-पुरुष के विवाह पूर्व यौन संबंधों को बुरा नहीं माना जाता, जिसके कारण यौन उन्मुक्तता होती है।

विदेशी संस्कृति ने हमारी संस्कृति को प्रभावित किया है। पश्चिमीकरण की प्रक्रिया ने औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया को प्रश्रय दिया। औद्योगीकरण ने नगरों को तीव्र गति से और ग्रामों को धीमी गति से प्रभावित किया है। कृषि के क्षेत्र में नए-नए यंत्रों का उपयोग हुआ जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन में वृद्धि और आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। आधुनिक युग संकट के दौर से गुजर रहा है। धर्म, विज्ञान, नीति, दर्शन आदि सभी क्षेत्रों में नए-नए संकट उपस्थित हो गए हैं। औद्योगीकरण ने भौतिकवाद व व्यक्तिवाद को प्रश्रय दिया। जाति व्यवस्था को शिथिल कर दिया है। औद्योगीकरण की लहर ने विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान के महत्व को स्पष्ट कर दिया है। औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने जहाँ हमें आर्थिक रूप से समृद्ध किया वहीं समाज में ऐसे कारकों को जन्म दिया, जिनसे विघटन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। औद्योगीकरण के कारण वायुमंडल पूर्णत: दूषित हो गया है जिससे अनेक बीमारियाँ फैलती हैं। औद्योगीकरण ने ‘संयुक्त परिवार’ को विघटित किया जिससे अलगाव की भावना का विकास हुआ। औद्योगीकरण ने अनेक गंदी बस्तियों को जन्म दिया जिनमें अपराध पलते हैं। औद्योगीकरण ने व्यक्ति को पूर्णत: भौतिकवादी बना दिया।

औद्योगीकरण की प्रक्रिया की तरह नगरीकरण की प्रक्रिया ने भी व्यक्ति को आधुनिक व भौतिकवादी बनाया। ‘संयुक्त परिवार’ जाति प्रथा तथा धार्मिक संस्कारों पर आधारित था, नगरीकरण ने इन मान्यताओं को परिवर्तित कर दिया। आधुनिक फैशन तथा प्रचालन नगरों में ही सर्वप्रथम अपनाए जाते हैं। होटल,रेस्तरां, क्लब, सिनेमा आदि मनोरंजन तथा भौतिक साधनों का सुख प्राप्त करने की लालसा ने व्यक्ति को ग्रामों से नगरों की ओर आकर्षित किया है। नगरीकरण की प्रक्रिया ने स्त्रियों को समाज में उचित सम्मान दिलाने में महती भूमिका निभाई है। नगरीय परिवेश में शिक्षा का महत्व अधिक समझा जाता है। नगरों में अधिकांश व्यवसाय नौकरी होता है, नौकरी के लिए शिक्षा तथा प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। नगरीय परिवार में पति-पत्नी का स्थान लगभग समान होता है तथा आपस में सहयोग और सामंजस्य पाया जाता है। परंतु कभी-कभी पति-पत्नी में आपसी तनाव और मनमुटाव के अवसर भी आते हैं। नगरों में ही विवाह-विच्छेद के कानूनों तथा तलाक के नियमों का ज्ञान अधिक होता है। भौतिकवादी संस्कृति ने व्यक्ति को तनाव से ग्रसित कर दिया है।

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डॉ. शिवप्रसाद सिंह के अनुसार –“आज हमारे नगरों में सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष जितना तीव्र है, उतना अभी गाँवों में नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति के भीतर नए पुराने के प्रति सैंकड़ों संस्कार युद्धरत हैं। जीवन बहुत व्यस्त और मशीनी होता जा रहा है। बाहर और मन में कई तरह के प्रभाव एक दूसरे से टकरा रहे हैं।” नगरीय परिवेश में संबंध औपचारिकता मात्र रह गए हैं। सभी अपनी तनावयुक्त ज़िंदगी जी रहे हैं। इससे बड़ी सामाजिक विसंगति क्या हो सकती है कि पड़ोसी के यहाँ मृत्यु होने पर भी व्यक्ति को कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

विदेशी परिवेश या पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत यातायात के आधुनिक तीव्रगामी साधन भी विकसित हुए। इन तीव्रगामी साधनों के कारण व्यक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना सहज हो गया। सुविधा के कारण भारत की सभी जातियों ने इन साधनों का इस्तेमाल करना आरंभ किया। यातायात के इन साधनों (विमान, रेल, बस, टैक्सी आदि।) ने जाति प्रथा को शिथिल बना दिया है। यातायात के इन साधनों ने जहाँ व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जोड़ा, वहीं इन साधनों के शोर व दूषित धुएँ के कारण ‘वायु प्रदूषण’ बढ़ता ही जा रहा है। इस शोर में व्यक्ति की आवाज़ दबाकर रह गई है, वह सड़कों पर एक चींटी की भाँति दम तोड़ रहा है।

संचार के साधनों जैसे रेडियो, टेलीविज़न, टेलीफोन तथा समाचार पत्रों आदि ने भी नगरीय आकर्षण को बढ़ाया। संचार के साधनों ने औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया। इन साधनों के विकास ने ग्रामों में आधुनिकता को प्रोत्साहित किय। संचार- साधनों ने सामाजिक विघटन को भी बढ़ावा दिया। दूरदर्शन पर अनेक देश-विदेश के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं, जिनका मानव-मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ना आवश्यक है। विदेशी कार्यक्रमों में खुलापन होता है, अश्लीलता चरमोत्कर्ष पर होती है। संचार माध्यमों से व्यक्ति को संपूर्ण विश्व की जानकारी रहती है। साहित्य भी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण तत्व है। आज का भारतीय साहित्य भी विदेशी साहित्य से अछूता नहीं है। साहित्य में रोमांसवाद, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषणवाद जैसी नयी प्रवृत्तियाँ पश्चिम की देन है। अतुकांत काव्य, अकहानी, अकविता भी पश्चिम का प्रभाव है। डॉ. दंगल झाल्टे पश्चिमी साहित्य के बारे में कहते हैं- “ आधुनिक पाश्चात्य उपन्यासों में सैक्स संबंधी बातों की एकदम खुली चर्चा की जाती है और लैंगिक जीवन के प्राय: सभी पहलुओं को वैज्ञानिक विश्लेषण के ढंग से उद्घाटित किया जाता है। स्त्री-पुरुष के सामान्य स्वाभाविक आकर्षण के बावजूद कमवासना के अनेक रूप जैसे –समलिंग सैक्स (होमोसैक्स), अतृप्ति की कुंठा (फ्रस्टेशन), अनुचित काम-प्रवृत्ति आदि को भी पाश्चात्य उपन्यासकारों ने फ्रायड आदि के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांतों का आधार लेकर कलात्मक प्रस्तुतीकरण में ढाल दिया है।” विदेशी साहित्य से हमने बहुत कुछ सीखा। यथार्थवाद के नाम पर अश्लील साहित्य लिखा जाने लगा। भारतीय कलाएँ भी पश्चिम के रंग में रंगी प्रतीत हो रही हैं। भारतीय संगीत और नृत्य में आज पश्चिमी विधाओं का ही अनुसरण हो रहा है। पॉप म्यूज़िक तथा तीव्र संगीत भारत में खूब लोकप्रिय हो रहा है, नृत्य के क्षेत्र में ‘बाल रूप डांस’ तथा ‘रोक एण्ड रोल’ जैसी विधाएँ पसंद की जा रही हैं। वादन के क्षेत्र में पश्चिमी वाद्य यंत्रों – गिटार, प्यानो, मैडोलीन, बैंजो, माउथ ऑर्गन का प्रभाव कौन नकार सकता है। सिनेमा पर भी विदेशी परिवेश का प्रभाव पड़ा। आज अनेक विदेशी फ़िल्मों की नकल कर हिंदी फ़िल्में बनाई जा रही हैं या उन्हें डब किय जा रहा है। ब्लू फ़िल्में विदेशी संस्कृति की देन है।

पश्चिमी सभ्यता ने हमारी जीवन-शैली को परिवर्तित कर दिया है। हमार रीति-रिवाजों, रहन-सहन, खान-पान तथा वेषभूषा आदि पर पश्चिम का व्यापक प्रभाव पड़ा। हम लोग केवल तन से भारतीय हैं, अन्य सभी गतिविधियाँ पाश्चात्य रूप ग्रहण कर रही हैं। वस्तुस्थिति यह है कि सामान्य व्यक्ति भी आज कोट-पैंट पहनता है, टाई लगाता है तथा जूता-मौज़ा पहनकर स्वयं को आधुनिक बनाने का प्रयास करता है। जीवन में ‘प्रदर्शन’ की भावना पश्चिमी सभ्यता का परिणाम है, गृह साज-सज्जा पूर्ण रूप से प्रदर्शन का माध्यम है।

निष्कर्ष

वस्तुत: आधुनिकता का प्रमुख गुण है- ‘ऊर्ध्वमुखी चेतना’। आधुनिकता में प्रगतिशीलता के तत्व अनिवार्य रूप से होते हैं। आधुनिक युग में मनुष्य का जीवन और सामाजिक संबंध जटिल होते जा रहे हैं। इसलिए आधुनिकता का अभिप्राय गलत अथवा सही कार्य से नहीं है, वह तो एक प्रक्रिया है जो दोनों रूपों में होती है। आधुनिकता मनुष्य को अतीत से अलग कर वर्तमान में रह कर प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है। आधुनिकता को पश्चिमीकरण अथवा नगरीकरण समझना तर्कसंगत नहीं है। आधुनिकता परंपरा की विरोधी नहीं अपितु उससे आधार लेकर विकसित होने वाली प्रगतिशील विचारधारा है। विसंगति से अभिप्राय – जीवन की वह स्थिति जहाँ प्रत्येक धारणा का उल्टा रूप दिखाई देता है। विसंगति को देखा जाए तो वह मानव मस्तिष्क की दुर्बलताओं की उपज है। जीवन में व्यक्ति को संघर्षों का सामना करते हुए जीना पड़ता है यही उसकी सबसे बड़ी विरोधाभास की स्थिति है की न तो वह अपने दायित्वों का निर्वाह ठीक प्रकार से कर पा रहा है और न ही दायित्वों से स्वयं को अलग कर पाया। उसकी त्रिशंकु के समान स्थिति ने उसे हास्यास्पद बना दिया। यह मानव जीवन की विडंबना ही है कि न तो आज वह अपने परिवेश से अलग हो सकता है और न साथ रह सकता है। मानव जीवन की इसी विरोधाभासी स्थित के कारण विसंगतियों का पादुर्भाव हुआ। आज व्यक्ति अपने परिवेश में स्वयं को असहाय व फालतू समझने लगा है तथा वह अपने अस्तित्व की रक्षा करने में लगा हुआ है। स्वदेशी परिवेश को आधुनिक जीवन की विसंगतियों ने प्रभावित किया है। धार्मिक अंधविश्वासी भावनाओं ने मनुष्य को अज्ञानता के गहरे कूप में धकेला, सामाजिक विषमताओं, आर्थिक समस्याओं तथा पारिवारिक कलह के कारण व्यक्ति का जीवन विसंगत हो गया। व्यक्तिवादी और अस्तित्ववादी सोच के कारण आधुनिक युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है और विसंगत जीवन- जीने के लिए अभिशप्त है। पश्चिमी संस्कृति ने हमें एक ओर विकास के पथ पर अग्रसर किया तो दूसरी ओर मनुष्य ग्लैमर की चकाचौंध में खोकर तनाव, अवसाद, अपरिचय, अकेलापन, अजनबीपन, अतृप्ति, कुंठा आदि विसंगतियों से ग्रसित है।

संदर्भ

  1. डॉ. बी. बी. सिंह व बी. के. शर्मा : आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन – पृष्ठ- 145 , 146
  2. डॉ. मदन मोहन भारद्वाज : आधुनिक मराठी नाटकों में युगबोध – पृष्ठ – 14
  3. डॉ. नगेंद्र : आलोचक की आस्था {आधुनिकता प्रश्न निबंध से } – पृष्ठ – 34
  4. साप्ताहिक हिंदुस्तान: 12 अप्रैल 1981
  5. नटरंग: जुलाई-दिसंबर 1990
  6. रामधारी सिंह दिनकर: आधुनिक बोध – पृष्ठ 36
  7. डॉ. भैरूलाल गर्ग: आज की हिंदी कहानी – पृष्ठ – 36, 23
  8. डॉ. इंद्रनाथ मदान: आधुनिकता और सृजनात्मक साहित्य – पृष्ठ – 89
  9. विपिन अग्रवाल: आधुनिकता के पहलू – पृष्ठ – 23
  10. सं. डॉ. कुमार विमल: अत्याधुनिक हिंदी साहित्य – पृष्ठ- 207
  11. बृह्त पारिभाषिक शब्द संग्रह (मानविकी) : पृष्ठ-6
  12. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑफ करंट (इंग्लिश एडिसन-1964)- पृष्ठ- 6
  13. ‘साहित्यिक शब्दावली’ : सं. डॉ. प्रेमानारायणटंडन – पृष्ठ-11
  14. इंग्लिश और संस्कृत डिक्शनरी (अखिल भारतीय संस्कृत परिषद लखनऊ -1957) – पृष्ठ- 3, 854
  15. डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र: नाटककार लक्ष्मी नारायण लाल – पृष्ठ – 126, 127
  16. डॉ. राम सेवक सिंह: एब्सर्ड नाट्य परंपरा- पृष्ठ- 11
  17. डॉ. केदारनाथ सिंह: हिंदी के प्रतीक नाटक और रंगमंच – पृष्ठ – 59
  18. ज्ञानोदय (कुबेरनाथ राय – क्रांति, विसंगति और कामू का विद्रोह दर्शन ) : अप्रैल 1965 – पृष्ठ – 28
  19. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी: नए साहित्य का तर्क शास्त्र – पृष्ठ- 116
  20. लाल चंद गुप्त मंगल: अस्तित्वाद और नयी कहानी – पृष्ठ – 38
  21. ज्ञानोदय (रवींद्र कालिया – कोज़ी कॉर्नर (एक विसंगति) : जुलाई 1965 – पृष्ठ – 103
  22. कमलेश्वर: नई कहानी की भूमिका – पृष्ठ- 15
  23. कृष्ण बिहारी मिश्र: आधुनिक सामाजिक आंदोलन और आधुनिक हिन्दी साहित्य – पृष्ठ – 130
  24. (श्री गोपाल शरण सिंह ‘दहेज की कुप्रथा से हानियाँ’ शीर्षक)
  25. डॉ. दंगल झाल्टे: नए उपन्यासों में नए प्रयोग : {नए उपन्यास नयी प्रणालियाँ }-पृष्ठ- 5

 

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