उषा गांगुली से साक्षात्कार

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उषा गांगुली से साक्षात्कार

उषा गांगुली, जन्म- 1945, जोधपुर आप कोलकाता में रहकर हिंदी रंगकर्म करती हैं। आपने 1976 में ‘रंगकर्मी’नामक अपनी नाट्य –संस्था की स्थापना की। उषा गांगुली द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में महाभोज, लोककथा, होली,खोज, वामा, बेटी आई, मय्यत, रुदाली, मुक्ति और काशीनामा इसके अलावा आपने ब्रेख्त के नाटक ‘मदर करेज’ को ‘हिम्मतमाई’ के नाम से निर्देशित एवं स्वयं माँ की भूमिका को निभाया। ‘माँ’ की सजीव भूमिका के लिए 1982 -83 में सरकार द्वारा आपको ‘लेबदेब’ पुरस्कार से नवाजा गया। आपको 1998 में आपको संगीत नाटक अकादमी ने श्रेष्ठ निर्देशक के रूप में पुरस्कृत किया साथ ही उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी ने सफ़दर हाशमी पुरस्कार से नवाजा।         

सुरभि: आप ब्रेख्तीय थियेटर की तकनीक और वैचारिकी के  विशेषज्ञ रहीं हैं, उनपर काम करते समय आपकी खुद की अंतःप्रक्रिया के अनुभवों को साझा कीजिये।

उषा गांगुली: मैं करीबन 45 वर्षों से थियेटर से जुड़ी हुई हूँ हर दौर से कुछ सीखा है, आज भी मैंकितना परिपक्व हुई हूँ पता नहीं। ये जो आप ब्रेख्त की तकनीक की बात कर रहीं हैं तो मैंने ब्रेख्त को खूब पढ़ा है, उनके नाटक देखें हैं और मैंने खुद भी किया है। ब्रेख्त का जो सबसे बड़ा थियेटर करने का तरीका था वह था लोगो से जुड़ने का, वह मानवीय राजनीति और human roots पर बहुत विश्वास करते थे। लेकिन जब हम थियेटर की बात करते हैं तो सामूहिकता एवं जन माध्यम की बात करते हैं कि नाटक जन माध्यम का सबसे सशक्त साधन है। लेकिन आज हम इस जन माध्यम से जन को छोड़ते जा रहें हैं। ब्रेख्त ने पहली       बार उस जगह को पकड़ने की कोशिश की है। ब्रेख्त को किसी भी वैचारिकी से बांध नहीं सकते वह खुले हुये हैं। कभी -कभी दिक्कत तब होती है जब ब्रेख्त को करते समय उनकी शैली को हम भूल जाते हैं। जैसे ढेर सारा साज–सज्जा, आलीशान सेट इत्यादि के बीच कहानी घुट कर रह जाती है। सही मायने में ब्रेख्त ने सब कुछ जन को केंद्र में रखकर किया है। मैंने शुरू से तो नहीं लेकिन बाद में जब ब्रेख्त के नाटक को देखा और पढ़ा तब से कहीं न कहीं उन्हें अपने नाटकों का हिस्सा मानने लगी।मैंने लगभग 50 लोगों को लेकर पहला नाटक ‘महभोज’ किया था, उसकी साज-सज्जा में इतनी सादगी थी मैं खुद भी कभी-कभी सोचने की कोशिश करती हूँ कि मेरे अंदर ये कला कहाँ से आ गई। चूंकि मैं नृत्य सीखी हूँ इसलिए मैं स्पेस का इस्तेमाल समझती हूँ, मैं चित्र समझती हूँ,इसलिए आप मेरे अधिकतर नाटकों में देखेंगी कि संगीत, नृत्य, लय आपको दिखेगा साथ ही साथ अभिनेता के शरीर का प्रयोग भी अभिव्यक्त होगा। जिससे वे सीधे-सीधे दर्शक से जुड़े।‘रंगकर्मी’ नाट्य दल अब तक जितने भी नाटक किए सभी अलग-अलग रहें उनमें से किसी भी नाटक को दोहराया नहीं है। हर नाटक नया मुद्दा कभी युवा की समस्या है तो कभी रुदाली जैसे नाटक जो बिल्कुल भिन्न हैं। मैं सच बोलू तो ब्रेख्त को करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं अपने नाटकों में अंदर ही अंदर ब्रेख्त की शैली को अपना रही थी। लेकिन सीधे तौर पर उनकी स्क्रिप्ट को नहीं कर पा रही थी। एम.के. रैना ने जब ‘माँ’ नामक नाटक किया तो मैंने उसमें माँ का चरित्र निभाया, उस चरित्र ने मुझे अंदर से आंदोलित कर दिया था, जिसका प्रभाव आगे चलकर दिखता है। फिर मैंने ‘Mother Courage’ ‘हिम्मतमाई’ जिसे नीलाभ जी ने अनुवाद किया है, उसे करने की ठानी और एक बेहतर प्रोडक्शन तैयार हुआ। जिसकी प्रस्तुति ढाका से लेकर कई देशों में हुई। उसमें भी ब्रेख्त की सादगी को बरकरार रखा।

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सुरभि: आपने जब ‘हिम्मतमाई’ को मंचित किया तो उसमें ब्रेख्तीय शैली को कितना लागू किया?

उषा गांगुली: मैं ऐसा नहीं  सोचती हूँ कि ये ब्रेख्त की तकनीक है या ब्रेख्त की शैली है या मुझे इसी ढांचे में बंध कर करना चाहिए। मेरे ख्याल से ब्रेख्त भी ऐसा नहीं चाहते थे। मेरे नाटक को फ्रिट्ज़ बेनेविच ने देखा। मैंने उनसे कहा कि ब्रेख्त को पढ़ा है, उनकी तकनीक को जाना है, जो मेरे नाटक की सहजता में दिखाई देता है। मैं अपने नाटकों से समाज में एक      प्रश्न खड़ा करती हूँ और दर्शकों को धक्का देती हूँ। अपने नाटकों  के विषय से, उद्देश्य से उन्हे डिस्टर्ब करती हूँ कि वे भी सोचें।

 

 सुरभि: आपके अनुसार ब्रेख्त का वैश्विक रंगमंच पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उषा गांगुली:मुझे ऐसा लगता है कि प्रगतिशील खेमे के व्यक्ति जो ब्रेख्त थे, उन्होने व्यवस्था के खिलाफ धक्का देने की कोशिश की।इस सच को कोई भी झुठला नहीं सकता। सारी दुनिया के मनुष्य में प्रगतिशीलता का चिंतन नहीं रह सकता तब तक ब्रेख्त को नहीं समझा जा सकता है। इसीलिए आप सारी दुनिया में देखिये जहां-जहां ब्रेख्त के नाटक गंभीरता से हुए हैं, वहाँ-वहाँ तीर की तरह प्रभाव डाला है और जहां सिर्फ संगीत पक्ष को लिया गया है वहाँ सिर्फ मनोरंजन बनकर रहा गया है। दर्शकों का सिर्फ मनोरंजन करना ब्रेख्त नहीं है, मैं बहुत ही खरी और सच बात कहती हूँ। ट्रीटमेंट में बहुत कुछ निर्भर करता है। ब्रेख्त के नाटक दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। कई लोग ये भी कहते है कि ब्रेख्त का जमाना गया, मैं कहती हूँ नहीं थियेटर की यात्रा सागर की तरह होता है जो लहर की तरह आती और जाती है इसी तरह आज जिस तरह बजारवाद सारी दुनिया पर हावी है इस पर कौन प्रहार कर सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है? सिर्फ ब्रेख्त के नाटकों में छिपे हुये तथ्य ही है जो इन सब पर प्रहार कर सकते हैं। वही अस्त्र की तरह लड़ सकते हैं। बशर्ते यदि कोई उन्हे अच्छे तरीके से प्रस्तुत कर सके। ब्रेख्त का एलियनेशन क्या है? जो द्वन्द्वात्मक सत्ता हमारे भीतर है, उस भीतरी मुखौटे को वे निकालने की कोशिश करते हैं।     जिससे समाज का सत्य है और मैं भी ऐसी ही हूँ मुझे हेपोक्रेसी पसंद नहीं है। मैं दो रूप नहीं     देख सकती। मेरे साथ ब्रेख्त के चिंतन में कहीं न कहीं बहुत मेल है जो मेरे हर नाटक में उभर कर आया है।

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                                     विगत 40 सालों से थियेटर करते हुये मुझे लगा है कि थियेटर की भाषा क्या होती है? क्या वह जर्मन होती है, या हिन्दी, गुजरती, मराठी, या बंगला होती है? मुझे लगता है थियेटर की अपनी भाषा होती है। मैं जब जर्मनी में ‘काशीनामा’ नाटक लेकर गई थी कुछ देर बाद दर्शकों ने subtitle देखना छोड़ दिया था और सिर्फ नाटक को ही देख रहें थे जबकि जर्मनी में लोग हिन्दी नहीं समझते हैं। फिर भी सभी ने बहुत सराहा। जहां तक बंगाल की बात है मेरे नाटकों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा बंगाली हैं इसलिए मुझे लगता है की भाषा की रुकावट नहीं होती।

सुरभि: ब्रेख्त का प्रभाव पूरे भारत में पड़ा, आप इसे बांग्ला रंगमंच के संदर्भ में कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली:बंगाल में तो 60,70,80 में भयानक रूप से ब्रेख्त हो रहे थे, ब्रेख्त की लहर थी। उस समय ‘गुड वुमेन ऑफ सेत्जुवन’ के तीन तरह की प्रस्तुति देखी है। बंगाल में रुद्र बाबू, विभाष दा, अजितेश बंधोपाध्याय एवं सोहाग सेन ने भी ब्रेख्त को खूब किया।

 

सुरभि: ब्रेख्त को विचार और शैली के रूप में आप कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: ब्रेख्त के नाटक कथ्य,वैचारिक और शैलीगत रूप से मानवीय अनुप्रेरणा के लायक हैं। ब्रेख्त जिस तरह उधेड़ देते थे वैसे ही उधेड़ना आना चाहिए।

 

सुरभि: ब्रेख्त से  प्रभावित भारतीय नाटककार,निर्देशक कौन हैं /

उषा गांगुली:भारत में बहुत सारे निर्देशक हैं जैसे एम. के. रैना, बंसी कौल, हबीब तनवीर, विजया मेहता, जब्बार पटेल, रुद्र दा, विभाष दा आदि सभी ने ब्रेख्त को किया है। और आज भी कर रहे हैं।

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सुरभि:वर्तमान भारतीय सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में ब्रेख्त की उपयोगिता के विषय में बताएं।        

उषा गांगुली:भारत वर्ष का वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ढांचा जब तक रहेगा  लोग ब्रेख्त के नाटक करते रहेंगे और कामयाब होते रहेंगे। क्यों कि यह सीधे-सीधे इस पर प्रहार करता है। कहानी की तरह सहजता से  ब्रेख्त ने जब एशिया के लोक से सब कुछ लिया चाहे वह चीन हो,वर्मा हो तो जहां से उन्होने लोक तत्व लिया वहाँ तो ब्रेख्त को तो सफल होना ही था। और सबसे ज्यादा सफल जर्मनी के बाहर हुये। पूरे विश्व ने ब्रेख्त को स्वीकारा और अपनी-अपनी भाषा में किया।

 

सुरभि:आप मेरा शोध विषय-‘ब्रेख्त का भारतीय रंगमंच पर प्रभाव, विशेष संदर्भ हिन्दी, बांग्ला और मराठी’ को कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: आप इस विषय पर शोध कर रही हैं, यह बहुत ही बड़ा काम है, नहीं तो थियेटर पर लिखा कहाँ जाता है, कौन थियेटर की बात करता है, प्रकाश की बात करता है? क्योंकि कई बच्चे नाटक अच्छा करते हैं लेकिन सैद्धांतिकी उन्हें पता नहीं होती है। यह जानकारी यदि आप से मिले तो बहुत ही अच्छी बात है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो अपने इस विषय को लिया।अब तक मेरे पास बहुत सारे लोग साक्षात्कार लेने आए लेकिन यह पहला विषय है जो ब्रेख्त से संबन्धित है। आप इतना गहन विषय पर शोध कर रहीं है मुझे बहुत अच्छा लगा।यह काम नयी पीढ़ी के लिए लाभकारी होगा। आपको बहुत-बहुत बधाई।

सुरभि:1976 से लेकर अब तक आपने जितने भी नाटक किए, किसी न किसी छोर पर ब्रेख्त से मिलती हैं? 

उषा गांगुली:मैं यह कहना चाहती हूँ कि मैं सामाजिक हूँ। मैं जितना ज्यादा ब्रेख्त से अनुप्रेरित हुई हूँ किसी से नहीं हुई।मैं ब्रेख्त के टेक्स्ट का बहुत ही सम्मान और पसंद करती हूँ। यही कारण है कि मैंने उनके विचारों को अपनाया है।

 

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