खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं औरसोनमउपन्यास

डॉक्टर स्नेह लता नेगी,
                                       हिंदी विभाग,
                                   दिल्ली विश्वविद्यालय
                                             दिल्ली।

शोध सार

आलोच्य उपन्याससोनमभूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्दगिर्द घूमती है। जिन की सामाजिकसांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है।

बीज शब्द: उपन्यास, सोनम, भूटान, आदिवासी, समाज, संस्कृति,

शोध विस्तार

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित अरुणाचल प्रदेश के छोटे से गांव ‘जिगांव’ में येशे दोरजी थोंगछी का जन्म हुआ। थोंगछी जी अरुणाचल की शेरदुकपेन आदिवासी समुदाय से आते हैं। थोंगछी जी बहुभाषाविद हैं। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत असमिया भाषा से की। कविता कहानी और उपन्यास लेखन में वह बहुत सक्रिय रहे हैं। उनकी महत्वपूर्ण कृतियां ‘सोनम’, ‘पापोर  पुखुरी'( पाप का पोखर), ‘बा फूलोर गोंधो’ (बांस फूल की गंद), ‘विष कोन्यार देशोत’ (विष कन्या के देश में), ‘ शो काटा मानुह’ ( शव काटने वाला आदमी), ‘ मौन ओंठ मुखौर हृदोय’ (मौन होंठ मुखर हृदय) आदि महत्वपूर्ण हैं। सन 2005 में ‘ मौन होंठ मुखर हृदय’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया । अब तक उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला और रूसी भाषा में अनुवाद हुआ है।  ‘शव काटने वाला आदमी’, ‘सोनम’, ‘मौन होंठ मुखर हृदय’ का अनुवाद हिंदी में हुआ है । थोंगछी जी की रचनाओं में अरुणाचल की प्राकृतिक सौंदर्य और वहां की अनेक जनजातियों की संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराएं, आचार विचार और उनके आपसी संबंधों का  सुंदर चित्रण देखने को मिलता है। प्रस्तुत आलेख में उनकी अनुदित उपन्यास ‘सोनम’ पर मुख्य रूप से विचार होगा। राष्ट्रपति के रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है। जिसे अनेक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में सराही गई है।आलोच्य उपन्यास ‘सोनम’ भूटान के साकतेंग और मिरोक क्षेत्र में तथा अरुणाचल के पश्चिमी श्रेत्र कामेंग और तवांग के आसपास बसने वाले ब्रोक्पा (पशुपालक) आदिवासी समाज की अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति पर आधारित है।  इस उपन्यास की कथा याक, चंवरी गाय, भेड़- बकरी और घोड़ा आदि का पालन करने वाले ब्रोक्पा समुदाय जो बहुपति प्रथा का पालन करते हैं के इर्द-गिर्द घूमती है। जिन की सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और प्रथाओं की समाजशास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने की भी जरूरत है। उपन्यास में ब्रोक्पा समुदाय के खोरदेकपा परंपरा और उससे प्रभावित नायिका सोनम और उसके दो पतियों लबजांग और पेमा वांगछू के बीच  संबंधों के बनते बिगड़ते समीकरणों का गहन आंकलन किया है।

     ब्रोक्पा यानी पशुपालक समुदाय जो साल के छः महीने दुर्गम पहाड़ियों के चरागाहओं में अपनी जीविका का एकमात्र स्रोत संग प्रवास करता है और जाड़े में अपने गांव लौट आता हैं। युवा लबजांग  का खानदानी व्यवसाय भी यही है। आरंभ में लबजांग और सोनाम दोनों बहुत ही सुखी वैवाहिक जीवन जीते हैं। चुंकि लबजांग के परिवार में अन्य कोई सदस्य नहीं है तो लबजांग को ही छ:  महीने के लिए चरागाहों में पशुओं के साथ पहाड़ियों पर रहना पड़ता है और  सोनाम गांव में अकेली पड़ जाती है। ऐसे में पेमा वांगछू मौके का फायदा उठाकर प्रेम याचना लेकर हमेशा ही सोनम के पीछे लगा रहता है। और एकांकी जीवन व्यतीत करती सोनम के मन में भी पेमा के लिए प्रेम का भाव जागृत होता है और यहीं से  उपन्यास प्रेम त्रिकोण की जटिलताओं के साथ आगे बढ़ता है। सामान्यता एक पुरुष की अनेक पत्नियां तो हम मुख्यधारा के समाजों में देखने के आदी हैं और हम उसे स्वीकार भी करते हैं क्यों कि अनेक स्त्रियों के साथ पुरुष रह रहा है, पुरुष तो पुरुष है उसे अधिकारी है वह जो चाहे कर सकता है। लेकिन एक स्त्री की एक से अधिक पति देखने की आदत बहुसंख्यक समाज को नहीं है। ऐसे में स्वीकार करने की बात तो सोच ही नहीं सकते हैं। परन्तु ब्रोक्पा समुदायों में एक अनूठी परंपरा है जिसे यहां की भाषा में खोरदेकपा  कहा जाता है। जहां दो तीन भाइयों की  एक ही स्त्री के साथ विवाह कर दिया जाता। जिसे समाजिक मान्यता प्राप्त है। जो लंबे समय से चली आ रही है ।

उपन्यास का मुख्य पात्र लबजांग की मां भी उसी खोरदेकपा परंपरा का पालन करते हुए अपने दोनों पतियों के साथ सुखद जीवन व्यतीत कर चुकी थी । इस संदर्भ में यह पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं: “बर्फीली पहाड़ियों के इस अंचल के ब्रोक्पा समाज में मान्य प्रथा के अनुरूप लबजांग की मां ने उसके पिताजी से विवाह के साथ साथ ही उसके चाचा जी के साथ भी खोरदेकपा अर्थात समानाधिकारिक विवाह किया था। दोनों को अपने पति के रूप में ग्रहण किया था। उन तीनों का जीवन बिना किसी झगड़ा झंझट, बिना किसी प्रकार के मन-मुटावे के बड़े सहज सुंदर ढंग से बीता था”1 इसी तरह योनतन, टिकरा और दवा आदि गांव के सभी ब्रोक्पा परिवार इसी तरह के संबंधों का निर्वाह करते हैं। ब्रोक्पाओं में प्रचलित खोरदेकपा प्रथा अरुणाचल के अलावा पश्चिमोत्तर हिमालय के किन्नौर, लाहौल- स्पीति, और लद्दाख आदि क्षेत्रों में भी रही है। इन क्षेत्रों के कबीलाई समुदाय भी ब्रोक्पाओं की तरह ही पशुपालक रहे हैं। यहां भी साल के कुछ महीने घर का पुरुष चरागाहों  में अपने पशुधन के साथ रहता और सर्दियों में गर्म इलाकों की ओर प्रस्थान करता। यह सभी कबीलाई पशुपालक हिमालय क्षेत्र में एक स्थान से दूसरे स्थान पर चरागाहों की तलाश में घूमते रहे हैं और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बस भी गए। अरुणाचल के ब्रोक्पा कबीला लद्दाख में भी ब्रोक्पा के नाम से भी जाना जाता है।इन सभी समुदायों की धार्मिक आस्था, सामाजिक- सांस्कृतिक व्यवहार आदि बहुत कुछ मिलता जुलता है। इन समुदायों में प्रचलित परंपरा की सामाजिक संरचना को यहां समझने की जरूरत है। चुंकि ब्रोक्पा समुदाय पशुपालक समाज है जिसके पास आय का एकमात्र स्रोत यही है। तो दूसरी और अन्य हिमालयी क्षेत्र की स्थिति भी कमोबेश वैसी ही रही है। पशुपालन के साथ इनके पास कृषि योग्य भूमि बहुत ही सीमित है। सीमित संपत्ति का बंटवारा ना हो और परिवार के बीच एकता बनी रहे इसी दृष्टिकोण से यहां खोरदेकपा परंपरा को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। चुंकि उपन्यास का नायक लबजांग को ऐसी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है। क्योंकि अपने माता-पिता का वह एकमात्र संतान है। जबकि खोरदेक्पा एक ही माता-पिता के संतानों में ही होता है ।

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‘ सोनाम’  उपन्यास में खोरदेकपा के कारण तीनों ही पात्रों के संबंधों में जटिलता आती है। क्योंकि पेमा वांगछू लबजांग के जाति बिरादरी का नहीं है। जाति बिरादरी का ना होते हुए भी पेमा वांगछू को सोनम के साथ खोरदेकपा कर  लाने के लिए गांव के सरपंच के साथ लबजांग पेमा वांगछू के घर उस के माता- पिता को मनाने जाता है जिसमें वह   सफल होता है और पेमा वांगछू, लबजांग और सोनम खोरदेकपा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

“निर्णय के दो दिन बाद एक सादे समारोह में संक्षिप्त सा वैवाहिक संस्कार आयोजन करके सोनम का दूसरा विवाह पेमा वांगछू के साथ संपन्न हो गया। उसी दिन दुपहरियो से ही एक-एक कर गांव के स्त्री पुरुष लबजांग के घर आ -आ कर इकट्ठे होते गये। अपनी ओर से उपहार के रूप में लाई गई खाटा उन्होंने सोनम और पेमा वांगछू को तो पहनाई ही लबजांग को भी खाटा पहनायी….. स्त्रियां बोलने लगीं ….अरे आज ही वह सचमुच की ब्रोक्पा पत्नी लग रही है”2 हर समाज अपनी भौगोलिक पृष्ठभूमि उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक  गठन और आर्थिक व्यवस्थाओं के आधार पर जीवन को सुगम बनाने की कोशिश करता है और उसी सामाजिक प्रक्रिया के तहत जीवन यापन करता है। ब्रोक्पा समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। इसीलिए यहां खोरदेकपा जैसी परंपराएं प्रचलित हैं। जो उसकी भौगोलिक, सामाजिक – सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें लगता है।

जिस तरह बहुपत्नी प्रथा में पत्नियों के बीच आपसी ईर्ष्या, द्वेष के कारण गृह कलह आम बात   है। ठीक उसी तरह की समस्या इस उपन्यास में दृष्टिगोचर होता है और यहीं से संबंध बिगड़ कर द्वद्वं पूर्ण आकार लेने लगता है। एक तरफ पेमा सोनम के मन में लबजांग के खिलाफ उसके अन्य स्त्री के साथ संबंध आदि को लेकर भड़काता रहता है तो वही आलसी पेमा चरागाह में जाने से जी चुराने लगता है। जब भी उसकी बारी चरागाह जाने आती थी तो वह वहां लापरवाही से काम करता और पशुओं का ध्यान नहीं रखता। हमेशा ही कुछ न कुछ नुकसान करता जिसके कारण लबजांग की आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है। “आगे चलकर लबजांग और सोनाम का वैवाहिक जीवन, उनकी अपनी घर- गृहस्थी, सुखी और स्वस्थ नहीं रह पायी, अनुकूल परिस्थिति और अवसर की तलाश में लगा रहने वाला पेमा वांगछू सोनाम के कान में लबजांग की ऐसी ढेर सारी मनगढ़ंत बातें घुसेडता रहता।….इन्हीं सब कारणों से वह लबजांग की अपेक्षा पेमा वांगछू के अधिक करीब हो गयी। हालात यहां तक बढ़ गई कि दोनों पतियों को जो एक समान रूप में प्यार करने, दोनों के प्रति समान रूप से आदर भाव रखने का जो उसका पवित्र उत्तरदायित्व था, धीरे-धीरे वह उस में असफल होने लगी”3 अगर यहां पेमा वांगछू की जगह खोरदेकपा में लबजांग का अपना सगा भाई होता तो शायद समस्या इस रूप में नहीं उभरती। पेमा किसी दूसरे जाति बिरादरी का व्यक्ति है। जिसे ना तो लबजांग के घर-गृहस्थी, चरागाह और पशुओं से कोई लगाव है। इसीलिए वह इतनी लापरवाही से काम करता है। क्योंकि नुकसान उसका नहीं बल्कि लबजांग का हो रहा है इसलिए पेमा के मन में अपनत्व का भाव कभी भी नहीं आता है। जबकि खोरदेकपा के नियमानुसार लबजांग पेमा को अपनी संपत्ति, घर-द्वार और पशु संपत्ति में बराबरी का हिस्सा देता है। “जिस दिन से तुमने मेरे साथ खोरदेकपा किया तुम मेरे द्वारा पाले गए इन सभी पशुओं के मालिक हो गए हो”4 इसके बावजूद भी पेमा वांगछू के व्यवहार में किसी भी प्रकार का बदलाव दिखाई नही देता। संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलने पर भी पेमा में घर – गृहस्थी के प्रति किसी भी तरह का लगाव लबजांग के परिवार के साथ स्थापित करता हुआ  दिखाई नहीं देता। यहां रचनाकार पेमा के आलसी और अवसरवादी व्यक्तित्व के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि पेमा जैसा व्यक्ति किस तरह समाज की मान्य परंपराओं का दुरुपयोग अपने फायदे के लिए करता है। जिस भाव के साथ सोनाम और लबजांग पेमा के साथ खोरदेकपा करते हैं और उसे अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। लेकिन पेमा का व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देता है। वक्त गुजरने के साथ-साथ पेमा सोनाम से भी ऊब चुका था और उससे छुटकारा पाने की सोचने लगा। इसीलिए सोनाम जब बीमार रहने लगी और लबजांग चरागाह में पेमा के भरोसे सोनाम और बच्चों  को छोडकर जाता है तब भी वह अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से वह दूर भागता है। बीमारी में भी सोनाम दिन रात काम करती और परिवार का भरण-पोषण करती जिसके चलते सोनाम ने एक दिन खटिया पकड़ लिया तो उसके बाद अंतिम यात्रा तक उस खटिया से उठ नहीं पाई। उपन्यास अंत तक आते-आते सोनाम की मृत्यु के साथ खोरदेकपा परंपरा की खामियों की तरफ भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जहां उपन्यास अंत में आकर ट्रेजिक  हो जाता है।

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ब्रोक्पा समुदाय मूलता बौद्ध धर्मावलंबी हैं। सोनाम कई वर्षों से संतान सुख से वंचित रहती है तो पति-पत्नी विचार करते हैं कि उन्हें तवांग गोंफा  में जाकर पलदेन लामो (आराध्य देवी) और शाक्य टोबा (गौतम बुद्ध )की शरण में संतान प्राप्ति के लिए यात्रा पर निकलना चाहिए और दोनों तवांग की यात्रा के लिए निकलते हैं। उन्हें विश्वास है कि पलदेन लामो  उनकी मनोकामना पूर्ण करेंगी । जब सोनाम गर्भ धारण करती है तो पलदेन लामो  के प्रति  उनकी आस्था और गहरी हो जाती है। सोनाम लबजांग से कहती है “हमारे परम पूज्य पलदेन लामो और टोम्बा  शाक्या दावा देवताओं ने हमारी प्रार्थना सुन ली है, क्या इस बात को तुम जान पाए हो, उन्होंने हमारी प्रार्थना स्वीकार कर ली है। और हमारी इच्छा के अनुरूप हमें इच्छित वरदान भी दे दिया है।”5 उपन्यास में तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार)  के बनने के पीछे का संक्षिप्त इतिहास भी हमें मिलता है। जिससे हमें ज्ञात होता है कि तवांग गोम्पा तिब्बत देश की राजधानी ल्हासा के पोतला गोम्पा ( पोतला पैलेस) के बाद संसार में द्वितीय स्थान पर इस की ख्याती है। सन 1681 में अरुणाचल के मनपा जनजाति के विद्वान मेरा लामा धार्मिक शिक्षा ग्रहण कर तिब्बत से लौटने के बाद तवांग गोम्पा के निर्माण कार्य में जुट गए थे । तवांग नाम के पड़ने के पीछे भी यहां कई तरह की दंत कथाएं प्रचलित हैं। मेरा लामा गोम्पा निर्माण के लिए उचित स्थान की तलाश में पहाड़ियों पर अपने घोड़े पर चढ़कर विभिन्न स्थानों का निरीक्षण करने जाते थे। एक दिन असावधानी के चलते घोड़ा गायब हो गया तो उसे खोजते हुए वह पहाड़ी पर पहुंचे तो वह देखते हैं कि घोड़ा अपने दोनों खुरों से उस पहाड़ी को खोदकर गड्ढा बना रहा है। तो मेरा लामा के अंतर्मन में आभास हुआ कि घोड़ा उसी पवित्र स्थान को चिन्हित कर दिखा रहा है। और वहीं तवांग गोम्पा (बौद्ध विहार) का निर्माण हुआ। “चुंकि वह स्थान घोड़े के आशीर्वाद से धन्य हुआ था। इसी से उसका नाम रखा गया। तवांग, इस संयुक्त शब्द में पहले अंश- ‘त’ का अर्थ है घोड़ा और ‘वांग’ का अर्थ है –आशीर्वाद”6 समय बीतने के साथ-साथ जनसाधारण में यह गोम्पा तवांग के नाम से विख्यात हुआ। उस समय इस क्षेत्र में तिब्बत का शासन चलता था। तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मेरा लामा इस गोम्पा का प्रशासन देखते थे और यहां के लोग राजस्व कर, मालगुजारी, धर्म का दान-दक्षिणा तवांग गोम्पा में जमा करते थे।

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ब्रोक्पा समुदाय पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। वह मानते हैं कि सभी प्राणी पुनः जन्म लेते हैं। उपन्यास में एक प्रसंग आता है जब लबजांग का   वफादार कुत्ता डब्बू हिमबाघ का शिकार होता है और मर जाता है। गांव में सभी लोग मानते हैं कि लबजांग की बेटी रिनचिन जांमू के रूप में डब्बू ने पुनर्जन्म  लिया है । रिनचिन जांमू चार-पांच साल की उम्र में पूर्व जन्म में अपने साथ घटित घटना को अपने पिता लबजांग को वैसा ही सुनाती है जैसे वास्तव में डब्बू के साथ घटित हुआ था। “फिर उसी भय की अवस्था में लड़खड़ाती आवाज में कहने लगती है-“समझ रहे हैं ना पिताजी। उस बाघ ने मुझे अपने पंजों में जकड़ लिया था । मेरी गर्दन पर अपने दांतो से काट खाया था। फिर मुझे उस बर्फिली घाटी में घसीटते-घसीटते बहुत दूर तक लिए चला गया था। उस समय मुझे जो असहनीय कष्ट हुआ था उसके बारे में अब आपको कैसे बतलाऊं।” 7 यह पंक्तियां ब्रोक्पाओं की पुर्नजन्म के प्रति उनके विशवास को और प्रबल करती है।  आदिवासी समाज किसी भी क्षेत्र का क्यों ना हो उसकी अपनी विशिष्ट पारंपरिक विश्वास और आस्था उन्हें दुसरे समाजों से अलग करती है जिनका अनुपालन हर आदिवासी समुदाय करता है।

जहां तक आदिवासी स्त्रियों का सवाल है वह अपने समाज में अधिकांश मामलों में पुरुष के समान अधिकार रखतीं हैं। यहां स्त्रियां भी पुरुषों के समान अपनी शारीरिक क्षमता के अनुरूप श्रम करती हैं। इसलिए उसे घर गृहस्थी से लेकर अपने लिए निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार है। दूसरे समाजों की अपेक्षा आदिवासी स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक है। आलोच्य उपन्यास की बात करें तो हम पाते हैं कि खोरदेकपा में रहना है या नहीं इसका अंतिम निर्णय स्त्री के हाथ में है। इसलिए अगर चाहे तो वह मना भी कर सकती है। सोनाम पेमा वांगछू के साथ खोरदेकपा करना चाहती है तभी लबजांग पेमा के घर खोरदेकपा का प्रस्ताव लेकर जाता है। दूसरी ओर खोरदेकपा में रहते हुए संतान पैदा होने पर किस पति का संतान है इसका निर्णय लेने का अधिकार भी स्त्री को ही प्राप्त है। अन्य आदिवासी समाजों की तरह ब्रोक्पा समुदाय में भी स्त्री-पुरुष दोनों के लिए पुनर्विवाह बहुत ही आसान है । कोई भी स्त्री पुरुष पति-पत्नी में से एक के ना रहने पर एक वर्ष के बाद दूसरे साथी का चयन कर घर गृहस्थी बसाने का अधिकार रखता है। ब्रोक्पा समुदाय की यह खासियत है कि वह जीवन की सतत गतिशीलता में विश्वास रखता है। इसलिए जीवन को संबंधों के साथ खुशहाल और सुखी संपन्न बनाने का हर संभव कोशिश करता है । यहां इस संदर्भ में उल्लेखनीय है “किसी भी एक दंपत्ति में से पति या पत्नी किसी एक की मृत्यु हो जाने पर जीवित बचा हुआ दूसरा साथी एक वर्ष काल की अवधि तक प्रतीक्षा करता है, इस समय के अंदर कोई दूसरा विवाह नहीं करता, किंतु साल बीतते ही कोई दूसरा जीवन संगी चुनकर विवाह कर नयी गृहस्थी बसा लेता है।”8 यह समाज जीवन में परंपराओं से ऊपर मनुष्य की संवेदनाओं को महत्व देने में विश्वास रखता है। यह उसका जीवन अमूल्य है इसलिए हर दुख के बाद जीवन को नई ऊर्जा के साथ संचालित करने में विश्वास रखता है।

रचनाकार ने इस उपन्यास के माध्यम से ब्रोक्पा समुदाय के पर्व त्योहार और उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ प्रेम की एकनिष्ठता तथा स्त्री की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों को अपने सधे हुए कलम से उकेरा है। मनुष्य सुलभ कमजोरियों को सहजता के साथ प्रस्तुत करने में तथा जिस रूप में आदिवासी जीवन उस अंचल में है उसी रूप में उसे प्रस्तुत करने में थोंगछी जी सफल हुए हैं। उपन्यास की कथा संरचना सुगठित और व्यवस्थित है। कथा पाठक को अंत तक बांधे रखती है कहीं किसी तरह का बिखराव कथावस्तु में हमें नहीं मिलता है। आंचलिक शब्द ब्रोक्पा समाज की परंपराओं की वास्तविकता को जानने समझने में सहायक सिद्ध होता है।  यहां कहा जा सकता है कि आदिवासी साहित्य अभी भी अपने शैशवावस्था में है।  ऐसे में थोंगछी जी जैसे रचनाकारों से भविष्य में आदिवासी साहित्य लेखन समृद्ध होगा ऐसी मेरी परिकल्पना है।

संदर्भ:

1 सोनाम, येसे दर्जे थोंगछी, अनुवादक: डॉ.   महेंद्रनाथ दुबे, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2009, पृष्ठ 8-9.

2 वही, पृष्ठ  64.

3 वही, पृष्ठ 151.

4 वहीं, पृष्ठ 76.

5 वहीं, पृष्ठ 141.

6 वहीं, पृष्ठ 107.

7 वहीं, पृष्ठ 153.

8 वहीं, पृष्ठ 238.

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