गर्मियों में

                                                                                 सुदर्शन वशिष्ठ

कमजोर और बीमार बीमार से लगते हैं शिमला के लोग गर्मियों में. जोर शब्द भी कमाल है अपने में अलग. इसके पीछे लाजवाब भाव भरे हैं . यह भाव ‘ताकत’ या ‘बल’ जैसे शब्दों में नहीं है l

        जब नीचे से आए लंबे तगड़े सेहतमंद लोग माल रोड पर घूमते हैं तो शिमला के लोग मरियल ट्टूओं की तरह इधर-उधर छिपते फिरते हैं. पड़ोसी राज्य लंबे तगड़े लोगों से भरे पड़े हैं. हालांकि यहां भी कहीं कहीं गांव में तगड़े लोग जा पाए जाते होंगे जैसे सिरमौर में ग्रेट खली अवतरित हुआ है. मगर वह एक अपवाद है.

   शिमला में अमृतसर का दूध पीपों में आता है जो यहां पहुंचते पहुंचते सड़ जाता है. गर्मियों में तो दुर्गंध देने लगता है. घी तो डिब्बाबंद ही भेजते हैं पड़ोसी राज्य इसलिए दुर्गंध नहीं आती. ऊपर से शिमला की परंपरा ने टाई सूट पहनाया बाबुओं को. चाय में दूध और चीनी तक छुड्वा दी. चीनी कम लेना या बिल्कुल ना लेना ऊंचे तबके के संभ्रांत समाज की निशानी हो गई. शूगर हो या ना हो, पहले ही कह देंगे….. चाय में चीनी कम डालना भाई ! अरे तो आप चाए का पाउडर ही खा लीजिए तंबाकू की तरह इतना झंझट क्यों करते हैं ! देश की सारी की सारी संभ्रांतियत  शिमला आ बसी. बात करो तो नकली आवाज में और नकली लहजे में. ‘एक्स्क्यूज मी’ बोलो, ‘प्लीज’ लगाओ ‘सॉरी’ लगाओ ‘थैंक यू’ कहो. कोई भी खुल कर, जोर से नहीं चिल्लाताः ‘ओए! कित्थे जा रिया सॉरी दिया !’ कपड़ा पहने तो बढ़िया, बिना सलवटों के. टाई तो यहां जरूर चाहिए, पाजामा !….. राम-राम ! कुर्ता पजामा तो नाइट सूट होता है, बेड रूम से बाहर तो पेंट चाहिए. नाइट ड्रेस दिन में नहीं चलेगा….. अंग्रेज कह गए हैं l

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         शिमला एक सेहतआफ्जा सा जगह है, स्कूल की किताब में पढ़ा था. तब शिमला पंजाब में था. कई बार किताबों में बहुत कुछ झूठ लिखा होता है जैसे ‘दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का’, ‘भारत एक महान देश है’, या ‘हमें हमारी संस्कृति पर गर्व है’, जिन्ना ना होते तो देश का विभाजन नहीं होता’, आदि-आदि. पंजाब का यह हिस्सा हिमाचल में आते ही हिमाचल की राजधानी बना पहाड़ों का दिल बना l यह गाना गाया जाने लगा, “ म्हारे देशो रा दिल है दिल्लिया, म्हारे पहाडो रा दिल शीमला.

          शिमला को गर्मियों की राजधानी बनाया अंग्रेजों ने. कभी घूमने आ गए, कभी चले गए. बीमार और घर की याद सताए अंग्रेजों को शिमला में अपने घर-सा वातावरण मिला. कुछ ने घर भी बनाए और बसाए. क्लब और थियेटर बनाए. सेना के लिए भवन बनाए. घूमने के लिए माल रोड जैसी स्वच्छ सडक बनाई जहां भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित रखा. भारतीयों ने उस परंपरा को सिर माथे पर लगाया ही, उससे भी आगे, पूरी राजधानी बना डाला. प्रदेश का बड़ा अस्पताल, विश्वविद्यालय, ऊंचे दफ्तर यहां बना डाले, बेशक सर्दियों में शिमला और अस्पताल पहुंचना हिमालय विजय के समान क्यों न हो जाए ! अंग्रेजों द्वारा रखी नींव पर स्नोड्न अस्पताल ऐसी जगह बना दिया जहां बीमार तो क्या भला चंगा आदमी भी पहुंच न पाए. किसी भी अस्पताल के लिए बस सुविधा नहीं. अंग्रेज तो जाते होंगे भारतीयों के के कंधों पर, भारतीय बीमार तो इस ठंडे एरिए को दूर से ही देख पाता है. अंग्रेज की बात रखते रखते शिमला के पहाड़ पर असह्य बोझा रख दिया.

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       अंग्रेज माल रोड पर घूमता था शान से क्या. मजाल एक तिनका भी सड़क पर गिर जाए. भारतीय लोअर बाजार की सीढियों से झांकते थे या रिक्शा चलाने के बहाने किसी अंग्रेज को बिठाकर माल रोड दौड़ते थे. अंग्रेज गए तो भारतीयों ने माल रोड पर कदम रखा. कुछ समय तो ठीक-ठाक चलता रहा. आखिर भारतीय थूके बिना नहीं रह सकता. पेशाब ही सामूहिक क्रिया के रूप में इकट्ठे दीवार के साथ किया जाता है. अतः माल रोड के किनारे  बोर्ड लगे, ‘थूकना मना है’ l थूकना मना है तो जाहिर है पेशाब करना भी मना ही होगा. सन साठ सत्तर तक माल रोड पर थूकने वाले पर जुर्माना होता रहा. नालियां रोज सुबह मश्क में पानी डाल धुलती रहीं. फिर धीरे-धीरे थूकने की मनाही की जगह शिमला को स्वच्छ रखने की पट्टियां लगीं. स्वच्छ तो वही रखता है जो स्वयं से स्वंय स्वच्छ रहे l

 

     एक शान अभी कायम है माल रोड की. राज्यपाल के वाहन के सिवा कोई भी वाहन यहां नहीं आता. लोग चौड़े होकर माल रोड पर घूमते हैं. एक अनुशासन यह भी कि बस बाईं ओर चलो. दूसरे के दाएं हिस्से में जाकर बस अपनी तरफ बाईं ओर चले रहो. बीच में खड़े होकर बातें न करो. बस चलते रहो, इधर से उधर, उधर से इधर. बाहर से आने वाले व्यस्त लोग यह देख बहुत हैरान होते हैं कि बेहले पहाडिए इधर से उधर, उधर से इधर बेमतलब क्यों चक्कर काटते रहते हैं !

      शिमला आकर अपने को सेहत वाला समझने लगा था सुरजीत. जैसे झुनझुनवाला, पालकी वाला, दारूवाला वैसे ही सुरजीत सेहतवाला. पहले वह चंडीगढ़ था. अब शिमला आकर बहुत खुश है. कहता है ;

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     चंडीगढ़ में लंबे ऊंचे, कद्दावर लोग आते तो मुझे लगता मैं बीमार हो गया हूं. दाढ़ी तो मैंने भी रख ली थी जो पिचके गालो को भरती थी. फिर भी हमेशा बीमार होने का एहसास खाए जाता. कई बार पीजीआई चेकअप भी कराया. कई टेस्ट हुए, कोई बीमारी न निकली l

……..तुम्हें डर घर कर गया है, बीमारी कोई नहीं है, डाक्टरों ने कहा.

      मुझे लगता मैं चूहा हूं. हाथी के सामने मुझे कहना पड़ता— ‘हूं तो मैं भी हाथी, कई दिनों से खाना नहीं खाया और पिछले दिनों बीमार भी रहा.’

        अब यहां आकर लगता है, मैं तंदुरुस्त हूं. यहां सभी मेरे जैसे हैं बल्कि ज्यादातर मुझ से भी गए गुजरे हैं. धर्मचंद और प्रकाश को देखकर मुझे तसल्ली होती है. बस जरा सी हवा लगे तो दोनों धरती की धूल चाटें.

       अब मैं बड़े इत्मीनान से अपना नाम सुरजीत ‘सिंह’ लिखता हूं.

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