डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में विविध सामाजिक पक्ष:राहुल श्रीवास्तव

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डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में विविध सामाजिक पक्ष

राहुल श्रीवास्तव, 
शोधार्थी (हिन्दी)
यूजीसी नेट, जे.आर.एफ.,
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.)
ई-मेल- rahul.shrivastava93@gmail.com
+91-9617425975

शोधसार

            हिन्दी साहित्य के विकास की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसमें विविध विधाओं का विकास समयानुसार होता रहा है और उन साहित्यिक विधाओं में विभिन्न सामाजिक पक्षों का वर्णन किया गया है, जो साहित्यकार की लेखनी को सामाजिक दृष्टि से समृद्ध करता है। इसी क्रम में पत्र विधा भी हिन्दी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखती है, जिसमें लेखक और उसके मित्रों के मध्य हुऐ सम्वाद जो विभिन्न विषयों से सम्बन्धित होते हैं, समाहित रहते हैं। हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत डॉ. रामविलास शर्मा का पत्रसाहित्य अपना एक विशेष स्थान रखता है। उनके पत्रों में वे अपने मित्रों के साथ विभिन्न साहित्यिक विषयों के साथसाथ सामाजिक और समसामयिक विषयों पर भी मंत्रणाएँ करते नजर आते हैं और इस आलेख के माध्यम से उन सामाजिक विषयों पर डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि को समझने और उस विषय के सम्बन्ध में उनके सरोकार को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर डॉ. रामविलास शर्मा की बेबाक राय उनके पत्रसाहित्य में देखने को मिलती है।

बीज शब्द पत्र, सामाजिक, मुद्दे, साहित्य, पक्ष।

शोध विस्तार

                        हिन्दी साहित्य विभिन्न विधाओं के माध्यम से समृद्ध हुआ है। हिन्दी के साहित्यकारों ने विविध विधाओं के माध्यम से साहित्य सृजन के क्रम में अपनी लेखनी चलाकर हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध किया है। विविध विधाओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक पक्षों और मूल्यों को उजागर करने का प्रयास हिन्दी साहित्यकारों द्वारा किया  गया है। साहित्य समाज का दर्पण हैं यह बात अक्षरशः सत्य है, किन्तु जब हम पत्र-साहित्य की चर्चा करते हैं तो यह बात और भी पुष्ट हो जाती है क्योंकि साहित्य की अन्य विधाओं में साहित्यकार समाज के पक्षों पर अकेले ही दृष्टि डालता है और उसे समझ पाता है एवम् उसे लेखनीबद्ध कर देता है, किन्तु पत्र-साहित्य में इसका दूसरा स्वरूप उभरकर सामने आता है, क्योंकि पत्रों में विविध सामाजिक पक्षों पर, दो मित्रों के मध्य सहज सम्वाद होता है, जिसमें शब्दों का तालमेल और भावों की बनावट जैसा कोई पक्ष नहीं होता है वह तो सहज सम्वाद होता है, जिससे सामाजिक पक्ष स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है। इस दृष्टि से सामाजिक पक्षों के क्रम में पत्र-साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में सामने आता है।

                        डॉ. रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य की अगर बात की जाए तो इन सब दृष्टियों से उनका पत्र-साहित्य हिन्दी साहित्य जगत में अपना एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि वे जितने उच्च कोटि के विद्वान साहित्यकार थे, अपने सामाजिक जीवन में वे उतने ही सरल, सहज प्रकृति के थे और जब उनके पत्रों पर दृष्टि जाती है तो उनकी सामाजिक विषयों से सम्बन्धित उसी सरल सहज समझ जो हर व्यक्ति से सरोकार रखती है, दिखाई देती है। आज के समय में सामाजिक समरसता और सामाजिक विषयों के सम्बन्ध में मूल्यों का जो ह्रास हुआ है वह बहुत विचारणीय है। चूँकि साहित्य समाज में घटित होने वाली घटनाओं को तो दिखाता ही है, इसके साथ ही समाज को राह दिखाने का कार्य भी करता है। साहित्य की अन्य विधाओं में यह कल्पना के सहारे दिखाया जाता है, जबकि पत्र-साहित्य में यह सब सामाजिक समरसता और पारिवारिक मूल्य स्वयं लेखन और मित्रों के व्यक्तित्व और किसी पारिवारिक या मित्र के सम्बन्ध में उनके व्यवहार से दिखाई देता है और प्रेरणा देने का कार्य करता है। इसी तरह का सामाजिक समरसता और मित्रों के दुःख-दर्द बांटने वाला पक्ष डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में देखने को मिलता है। वे केदारनाथ अग्रवाल को लिखे एक पत्र में इस विषय में लिखते है-

                        ‘‘यहाँ एक बहुत दुःखद घटना हो गई। 8 जनवरी की रात को स्वर्गीय बलभद्र दीक्षित जी के लड़के बुद्धिभद्र का भी देहान्त हो गया। खेतों में सर्दी लग जाने से निमोनिया हो गया था। केवल पांच दिन बीमार रहे। बीमारी की खबर पाकर में गया, लेकिन विलम्ब से पहुँचा भेंट न हो सकी। मौखिक सहानुभूति के बदले में चाहता हूँ कि उनके मित्र उनके परिवार के लिए कुछ मासिक बचाया करें, परन्तु इसका विज्ञापन न होना चाहिए। यह अपने मित्रों तक ही रहे।’’1

                        इस तरह के सामाजिक सहयोग के उदाहरण रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में अनेक स्थान पर मिलते हैं। इस तरह की सामाजिक समरसता और सद्भाव की भावना जिसका कि आज के समय में मिलना दुर्लभ हो गया है। वह डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में दिखती है। सामाजिक ताने-बाने के विविध पहलू होते हैं, जो समाज को जोड़कर रखते हैं। परिवार उनमें से सबसे महत्वपूर्ण पहलू के रूप में होता है। पारिवारिक सम्बन्ध ही वह आवश्यक अंग होते हैं। जो समाज को जोड़े रखने का कार्य करते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा अपने पत्र-साहित्य में इस तरह के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो पारिवारिक सम्बन्धों की सुदृढ़ता के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। परिवार में होने वाले हर प्रसंग से अपने मित्रों को अवगत कराना और उनमें उनकी सहभागिता सुनिश्चित करना जैसे सुकृत्य सामाजिक और पारिवारिक समरसता के श्रेष्ठ उदाहरण के रूप में हमारे सामने आते हैं, जो वर्तमान समाज को एक स्वस्थ समाज के रूप में विकसित होने की ओर ले जाने का कार्य करते हैं। इसी तारतम्य में एक सन्दर्भ डॉ. रामवलिास शर्मा के पत्रों से उल्लेखनीय है, जिसमें डॉ. रामविलास शर्मा अपने मित्र केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं-

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                        ‘‘13/5 को सेवा का ब्याह है, सबसे पहले तुम्हें इस पत्र द्वारा सपरिवार आने के लिए निमंत्रण दे रहे हैं’’2

                        इस तरह का पारिवारिक सौहार्द विरले ही देखने को मिलता है। इसी तरह का एक और पारिवारिक प्रसंग देखने को मिलता है, जो रामविलास शर्मा के द्वारा सामाजिक और पारिवारिक सौहार्द और आपसी प्रेम के सम्बन्ध में दिखाने का कार्य करता हे। आज जहाँ समाज में सम्बन्धों में औपचारिकता का भाव आ गया है वहीं डॉ. रामविलास शर्मा जी अपने पत्रों के माध्यम से सम्बन्धों में औपचारिकता के भाव को समाप्त कर उसे नई ऊँचाईयाँ देने का कार्य करते हें, वे इस प्रसंग में केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं ‘‘तुम्हारी बहन के विवाह में आने की कोशिश करूँगा। यद्यपि उस समय तुम्हें फुर्सत तो क्या होगी।’’3

                        इस तरह के सामाजिक और पारिवारिक सुदृढ़ता के सम्बन्ध डॉ. रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में देखने को मिलते हैं।

                        राजनीति भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है और दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। या कहा जाए कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं, तो ठीक ही होगा। डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में कई जगहों पर राजनीतिक परिचर्चाएँ देखने को मिलती हैं, जो समाज में राजनीति के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव के सम्बन्ध में उनकी समझ को बताने का कार्य करते हैं। साहित्य जो कि समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। समाज के इसी अंग और दूसरे अंग राजनीति के सम्बन्ध में वे इस प्रकार लिखते हैं।

                        ‘‘मैंने सोचा है ‘हिन्दी साहित्य और राजनीति’ पर बोला जाए- ‘हिन्दुस्तानी राजनीति की कमजोरियाँ, क्या साहित्य उससे सहानुभूति रख सकता है ? और हिन्दी राजनीति के घातक प्रभाव से अपनी रक्षा कर साहित्य ने राजनीतिज्ञों के चलने के लिए एक स्वतंत्र और आत्म-सम्मान युक्त मार्ग छोड़ दिया है।’’4

                        राजनीति के सम्बन्ध में उसके अनेक पहलुओं के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश उनके पत्रों में डाला गया है। वे इस समय के राजनीतिक परिदृश्य को अपने पत्रों में चर्चाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं और अगर उस समय राजनीतिक परिदृश्य और आज के परिदृश्य को समझने का प्रयास किया जाए तो बहुत हद तक सफलता मिलती दिखाई देगी। रामविलास शर्मा के मित्र केदारनाथ अग्रवाल अपने पत्र में इन्दिरा गांधी के सम्बन्ध में लिखते हैं जो उनके राजनीतिक चिन्तन को व्यक्त करता है।

                        ‘‘इन्दिरा गांधी को अभी जनता से पूरी वाकफियत नहीं है। वरना वह भी अपना विचार बदलतीं। देश की राजनीति और अर्थ नीति दोनों ही साधारण जन के लिए संकटमय हैं। भविष्य भयंकर लग रहा है।’’5

                        समाज में राजनीति के प्रभाव और सामाजिक तथा न्याय व्यवस्था पर उसके गलत प्रभाव के सम्बन्ध में भी डॉ. रामविलास शर्मा अपने मित्रों से विचार विमर्श करते नजर आते हैं। भृष्टाचार जो कि किसी भी समाज के लिए दीमक का कार्य करता है और वह उसकी जड़ों को खोखला कर देता है। इस विषय के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाला गया है केदारनाथ अग्रवाल जो कि एक साहित्यकार के साथ ही बान्दा में वकील थे, वे राजनीति के दुष्प्रभाव के सम्बन्ध में लिखते हैं-

                        ‘‘मुकदमें में जैसी दृष्टि से तहकीकात करनी चाहिए वैसी तहकीकात दारोगा नहीं करते। इससे सफलता नहीं मिलती और अधिकतर अभियुक्त छूट जाते हैं, जो दोषी भी होते हैं। गवाहान् भी वैसे होते हैं, और झूठ का अम्बार लगा देते हैं। यहाँ भी कातिल आल्हा-ऊदल की परम्परा में अब भी काम करते हैं। अदालत में न्याय न पाकर लोग बाहर स्वयं न्याय कर लेते हैं। हत्याएँ होती रहती हैं। अदालत तो एक विशिष्ट प्रणाली और सिद्धान्त से काम करती है। इससे वह विवश होकर छोड़ती है।’’6

                        राजनीति के सम्बन्ध में इस तरह की धारणाएँ और विचार रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में देखने को मिलती है, आर्थिक विषय भी समाज का एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है और समाज के लिए इसकी भी अन्य विषयों के समान उतनी ही प्रासंगिता होती है। आर्थिक गतिविधियाँ समाज को ठीक उसी प्रकार प्रभावित करती हैं, जिस प्रकार अन्य। समाज लोगों से मिलकर बनता है और लोगों के जीविकोपार्जन के लिए आर्थिक पक्ष का मजबूत होना आवश्यक हो जाता है। डॉ. रामविलास शर्मा और उनके मित्रों के मध्य इस सम्बन्ध में कई तरह के विचार देखने को मिलते हैं। रोटी जीवन का एक आवश्यक अंग है और बिना रोटी के जीवन सम्भव नहीं है। अगर देखा जाए तो सारी आर्थिक गतिविधियाँ रोटी के लिए ही की जाती हैं। रामविलास शर्म के मित्र केदारनाथ अग्रवाल रोटी के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखते हैं-

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                        ‘‘रोटी के पैदा होते ही

                        बुझी आँख में जुगनू चमके

                        और थका दिल फिर से हुलसा

                        जी हाथों में आया

                        और होंठ मुसकाये

                        घर में मेरा वीरान वीरान पड़ा

                        आबाद हो गया।’’7

                        महँगाई भी आर्थिक पक्ष को उजागर करने का ही एक माध्यम है। महँगाई ही आम जन को सर्वाधिक प्रभावित करती है। अगर महँगाई के अनुपात में आय के स्त्रोतों में वृद्धि न हो तो आम जन किस तरह संघर्ष करता है, उसकी वानगी भी उनके पत्रों में देखने को मिलती है। राजनीति और अर्थनीति जब सुचारू रूप से नहीं चलती है तब ऐसी स्थिति में देश की हालत किस तरह की होती है इस सम्बन्ध में उनके पत्रों का यह सन्दर्भ अवश्य विचारणीय है, जिसमें डॉ. रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल को लिखते हैं-

                        ‘‘बाँदा में भी लोग गेहूँ, दाल-चावल के भाव की बातें करते होंगे। गल्ले की कमी हो सकती है, लेकिन माल होते हुए भी मिलता नहीं है, चोरी छिपे भले ही लोग ले आएँ दिन पर दिन हालत खराब होती जाती है। लड़ाई के जमाने से हमारा अर्थ तंत्र हर झटके के बाद कुछ सम्भलता है और उसके बाद दूसरा झटका पहले से तगड़ा लगता है। श्रीमती इन्दिरा गांधी लोगों को समझा रही हैं कि देश की उन्नति करने में ऐसा होता ही है। काँग्रेस से गाड़ी सम्भल नहीं रही है। राजनीतिक और आर्थिक संकट दोनों हैं। क्रान्तिकारी परिस्थिति में जब क्रान्ति नहीं होती तब क्रान्ति होती है। भविष्य कुछ ऐसा ही है।’’8

                        जिस प्रकार उस समय में भी महँगाई समाज का एक मुख्य आर्थिक विषय था उसी तरह आज भी बना हुआ है और उस समय भी इस विषय पर उसी प्रकार चर्चाएँ देखने को मिलती हैं, जिस प्रकार आज। रामविलास शर्मा के एक और अभिन्न मित्र अमृतलाल नागर के एक पत्र में भी इस गम्भीर आर्थिक पक्ष पर प्रकाश डालने का सार्थक प्रयास किया गया है।

                        ‘‘बड़ी महँगाई है रामविलास, हमें महाकाल याद आ रहा है। उसके चित्र चारों ओर डोल रहे हैं। महँगाई एक प्रश्न बन गई है।’’9

                        आर्थिक पक्ष समाज को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है और उसके प्रभाव के नकारात्मक प्रभाव हमें समाज में सहज ही देखने में सुलभ हो जाते हैं। जहाँ समाज का एक वर्ग आर्थिक रूप से बहुत ही सम्पन्न और सक्षम है वहीं दूसरा वर्ग आर्थिक रूप से बहुत ही विपन्न है और दो वक्त का खाना भी नहीं जुटा पाता है। ऐसी स्थिति में सम्पन्न वर्ग किस तरह से अपने आयोजनों में भोजन का अपव्यय करता है, जिससे रामविलास शर्मा और उनके मित्रों को जो पीड़ा होती है उसकी स्पष्ट झलक उनके पत्रों में देखने को मिलती है, जो उनके पत्रों के आर्थिक पक्ष को बहुत ही सुस्पष्ट रूप से हमारे सम्मुख रख देता है। वे इस तरह के फिजूलखर्ची के सम्बन्ध में एक पत्र में अपनी पीड़ा को दर्शाते हुए लिखते हैं-

                        ‘‘ब्याज बारात में जाने पर सभ्यता की नुमाईश देखने को मिलती हे। जी घिनाता है, हम पैसे वाले हैं, हमारे ठाठ देखो, महिलाओं की चमकदार साड़ियाँ देखो, दाल्दा में सना पकवान चखो, भीतर से सब खोखले।‘‘10

                        जिस प्रकार कहा गया है कि दरिद्रता सबसे बड़ा दुःख है। यह सर्वथा उचित है। अर्थ के अभाव में समाज की स्थिति बड़ी ही गम्भीर हो जाती है। इसी सन्दर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रो में पर्याप्त उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनमें वे आर्थिक विपन्नता के दुष्प्रभावों से अवगत कराते प्रतीत होते हैं, जो आर्थिक पक्ष को समाज के प्रमुख पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए नजर आते हैं। अर्थ के अभाव में एक व्यक्ति की स्थिति किस तरह की हो जाती है, जिसकी झलक हमें निराला जी के सम्बन्ध में उनके एक पत्र में की गई चर्चा से पता चलता है।

                        ‘‘निराला जी की हालत पहले से बहुत खराब है, राशन वगैरह का प्रबन्ध करते नहीं हैं, साग उबालकर जब तब खा लेते हैं। बिना एक आदमी के उनके पास रहे उनका प्रबन्ध ठीक से नहीं हो सकता। मैंने रामकृष्ण को लिखा है कि वहीं रहें और उनकी देखभाल वही करें। रामकृष्ण अपने संगीत से कुछ कमा लेंगे लेकिन आरम्भ में उन्हें हमीं लोगों पर निर्भर रहना होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम इस मद में मदद करो। पैसा यहीं भेजना।’’11

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                        इस तरह की आर्थिक परिस्थितियों के सम्बन्ध में अनेक चर्चाएँ रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में मिलती हैं, जो आर्थिक विषमता या परेशानी के समय में अपने लोगों की मदद के लिए प्रेरित करने हेतु प्रोत्साहित करते हैं।

                        लोक कलाएँ वर्तमान समाज को अपने समृद्ध अतीत से परिचित कराने का एक श्रेष्ठ माध्यम है जो विविध वर्गों को आपस में जोड़े रखती हैं और युवा पीढ़ी को अपने पूर्वजों द्वारा संग्रहित और संरक्षित श्रेष्ठ परम्परा से परिचित कराने का कार्य करती हैं। इसी श्रेष्ठ परम्परा के समाज के साथ जुड़ाव की व्याख्या रामविलास शर्मा के पत्र-साहित्य में कई स्थानों पर देखने को मिलती है, जो समाज को अपने अतीत पर गर्व महसूस कराने के पल प्रदान करती है और सामाजिक सद्भाव के ताने-बाने को बुनकर एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण करते हैं। इसी सन्दर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं को लोक कला का स्वरूप मानते हुए लिखते हैं।

                        ‘‘तुम्हारी कविताओं में सबसे बड़ा गुण यह है कि वह लोक कला के इतने नजदीक है कि उसका एक अंग सा बन गई है। वह जनता द्वारा तुरन्त अपनाई जा सकती हैं और उसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है। इसलिए तुम बाबू लोगों की राय की चिन्ता न करके उन्हीं भूमिसुतों के लिए लिखो जिनके तुमने गीत गाए हैं।’’12

                        प्रकृति जिसकी गोद में समाज विकसित होता है और उससे सिर्फ लेता ही लेता है, भी समाज का एक प्रमुख पक्ष है, जिसकी रक्षा करना हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है ताकि एक स्वस्थ प्रकृति की गोद में एक स्वस्थ समाज निर्मित हो सके। सुन्दर प्रकृति हमेशा से ही समाज को हर्षित करने वाली रही है। इसी सम्बन्ध में प्रकृति की सुन्दरता को व्यक्त करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है-

                        ‘‘तुम यह भूल गए हो कि इस समय जमुना और जलधर दोनों ही आपा खोए एक तीसरे ही आनन्द में मग्न हैं। यह वही आनन्द है, जिसने धेनु, गोपी, ग्वाल, अंकुरित पुष्प, मदन और मनोज सभी को एक डोर में बांध दिया है। उसी डोर में जमुना और जलधर भी बन्धे हैं। फिर जलधरों को क्या पड़ी है, जो जमुना पर झुके वहां तो जमुना ही रात्रि की लैम्प बुझाती हुई कवि पत्नी की तरह उमंग रही है। जमुना और जलधरों की श्यामता के साथ पुंजों की हरीतिमा कैसी मिल गई है।’’13

                        डॉ. रामविलास शर्मा के मित्रों साथ सम्बन्ध अपने जीवन के अन्तिम वर्षों तक रहे और उन अन्तिम वर्षों तक हुए सम्वाद में अनेक सामाजिक सन्दर्भ से जुड़े परिवर्तनों को उन्होंने नजदीक से देखा। उसी की चर्चाएँ उनके पत्रों में विस्तृत रूप से अपने मित्रों के साथ साझा की गई है।ं समाज से सम्बन्धित हर पहलू पर चाहे वह आर्थिक हो, पारिवारिक हो, राजनीतिक हो, सभी पर नजदीक से दृष्टिपात किया गया है, उन्होंने समाज से सम्बन्धित हर विषय को छुआ और उस विषय पर अपने मित्रों के साथ विचारों का आदान-प्रदान किया। जो एक अमूल्य निधि के रूप में साहित्य में स्थापित हुआ और समाज के विविध पक्षों से अवगत कराया।

सन्दर्भ

1-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 58, पत्र दि. 11.01.1943

2-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 137, पत्र दि. 17.04.1975

3-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 53, पत्र दि. 21.02.1940

4-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. सितम्बर 1939

5-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. 19.10.1964

6-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 49, पत्र दि. 22.07.1964

7-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 202, पत्र दि. 11.04.1958

8-        सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 52, पत्र दि. 07.10.1964

9-        सं.डॉ. विजय मोहन शर्मा, डॉ. शरद नागर, सन् 2013, अत्र कुशलं तत्रास्तु, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 110-111, पत्र दि. 09.09.1958

10-      सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-2, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 262, पत्र दि. 12.12.1988

11-      सं.डॉ. विजय मोहन शर्मा, डॉ. शरद नागर, सन् 2013, अत्र कुशलं तत्रास्तु, किताब घर प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 63, पत्र दि. 13.03.1946

12-      सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 128, पत्र दि. 17.01.1955

13-       सं. रामविलास शर्मा, सन् 2010, मित्र संवाद, भाग-1, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद, पृ.सं. 191, पत्र दि. 12.09.1957

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