नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019: एक अवलोकन-डॉ. अजय कुमार सिंह

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019: एक अवलोकन

डॉ. अजय कुमार सिंह 
सीनियर एकेडेमिक फेलो,
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली

सारांश

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिये वर्ष 2015 में पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समिति की ओर से तैयार नई शिक्षा नीति का मसौदा सरकार को सौंप दिया गया। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षाओं को इसके दायरे में लाया गया है।

यह नीति इन चार नींवों पर रखी गई है उपलब्धता, समानता, गुणवत्ता, सुलभता और उत्तरदायित्व।

बीज शब्द

शिक्षा, नीति, समानता, भाषा, नीति, भविष्य

 

आमुख

शिक्षा का मतलब होता है ज्ञान, यह ज्ञान हम सभी को न सिर्फ सम्पूर्ण मानव बनाने में सहायक होता है बल्कि एक सभ्य समाज का निर्माण करने और मानव को उसका सही अर्थ बताने में पूरी तरह से सक्षम होता है। शिक्षा एक ऐसा साधन है जो देश के बच्चों से लेकर युवाओं तक के भविष्य का निर्माण करता है। यही कारण है कि मानव सभ्यता के आरंभ से ही शिक्षा को अधिक से अधिक व्यक्तियों में आत्मसात करने के लिए कार्य किया गया। इस संदर्भ में भारत प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है तथा शिक्षा के केन्द्र के रूप में जाना जाता रहा है। वर्तमान समय में भारत दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में जाना जाता है जहाँ तकरीबन 1.53 मिलियन स्कूल, 864 से अधिक विश्वविद्यालय, 45 केन्द्रीय विश्वविद्यालय सहित 51 राष्ट्रीय महत्त्व की संस्थाएँ हैं, जिनमें लगभग 23 आईआईटी और 30 एनआईटी (NIT) शामिल हैं। वहीं 300 मिलियन से अधिक छात्र हैं। इसके बावजूद अभी भी शिक्षा की सुलभता और गुणवत्ता में विस्तार की आवश्यकता है।

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति: ऐतिहासिक सन्दर्भ

शिक्षा में सुधार का दौर देश में आजादी के पहले से ही चला आ रहा है लेकिन यह सुधार औपनिवेशिक हितों के अनुकूल था। उदाहरण के लिए मैकाले का घोषणा-पत्र 1835, वुड का घोषणा पत्र 1854, हण्टर आयोग 1882 आदि। इसके साथ ही उस वक्त के सीमित संसाधनों में हर व्यक्ति तक शिक्षा पहुँचाना मुश्किल होता था। स्वतंत्रता के पश्चात् सभी तक शिक्षा की पहुँच सुलभ कराने के उद्देश्य से सर्वप्रथम 1948-49 में राधाकृष्ण आयोग तथा 1953 का माध्यमिक शिक्षा आयोग या मुदालियर आयोग को स्थापित किया गया और शिक्षा के गुणवत्ता पर ध्यान देने के उद्देश्य से साल 1961 में एनसीईआरटी की स्थापना हुई। उच्च शिक्षा में सुधार के लिए 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गई। इसके बाद कोठारी शिक्षा आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसरण में प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपनाई गई जिसमें 6 वर्ष तक के बच्चों के उचित विकास के लिए समेकित बाल विकास सेवा योजना की शुरूआत हुई। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से केन्द्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी को समझते हुए शिक्षा को समवर्ती सूची में शामिल किया गया। वहीं 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अपनाया गया जिसे 1992 में आचार्य राममूर्ति समिति द्वारा समीक्षा के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछ बदलाव कर भारतीय शिक्षा व्यवस्था को सही दिशा देने की गंभीर कोशिश की गई। लेकिन इसके बावजूद अनिवार्य शिक्षा की माँग चलती रही और समय-समय पर इसके लिए आन्दोलन होते रहे।

शिक्षा का अधिकार देश के हर बच्चे को मिले इसके लिए शिक्षा को संवैधानिक दर्जा देने की माँग कई दशकों तक की गई। सरकार ने 2002 में संविधान में नई धारा जोड़ी जिसके बाद RTE यानी शिक्षा के अधिकार की राह खुल गई। हालाँकि संविधान में पहले भी शिक्षा का जिक्र था लेकिन यह अनिवार्य नहीं था। अनुच्छेद 45 के मुताबिक बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं रखा गया था। इस संदर्भ में 1966 में कोठारी आयोग ने शिक्षा की बेहतरी और दायरा बढ़ाने की सिफारिश की थी। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए 2002 में संविधान में अनुच्छेद 21जोड़ा गया, जिसके पश्चात् 1 अप्रैल 2010 में जाकर शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ। इसके तहत 6-14 साल तक के बच्चों को शिक्षा का संवैधानिक अधिकार दिया गया ताकि वह मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा हासिल कर सकें। उल्लेखनीय है कि शिक्षा के अधिकार के मौलिक अधिकार बन जाने के बाद हालात में काफी सुधार हुआ है लेकिन यह योजना लक्ष्य से अभी-भी काफी पीछे है और सरकार तेजी से लक्ष्य की ओर बढ़ रही है।

सर्व शिक्षा अभियान से पहले 1993-94 में जिला प्राथमिक शिक्षा अभियान की शुरूआत हुई थी जिसमें देश भर के 18 राज्यों के 272 जिलों में हर बच्चों को शिक्षा देने की योजना थी, लेकिन बाद में इसे भी सर्व शिक्षा अभियान में ही मिला दिया गया। हालाँकि बदलते दौर में देश की शिक्षा नीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। मौजूदा सरकार बच्चों को स्कूलों से जोड़ने के अलावा कौशल आधारित शिक्षा पर भी जोर दे रही है। वर्ष 2000 में बच्चों के हाथों में किताब और कलम थमाने की महत्वाकांक्षी योजना के तौर पर सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत की गई। सर्व शिक्षा अभियान में लड़कियों और विशेष रूप से बच्चों के शिक्षा पर जोर देने की बात कही गई है। यही नहीं कम्प्यूटर एजुकेशन के जरिए बदलते जमाने में बच्चों को तकनीकी रूप से दक्ष करना भी लक्ष्य है। सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढाँचे में विकास के साथ ही छात्र-शिक्षक अनुपात को अंतर्राष्ट्रीय मानकों तक लाना आज की नई शिक्षा नीति की अहम प्राथमिकताएँ हैं। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा में बड़े लक्ष्य को पाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्धारण हेतु 2018 में डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में समिति का गठन किया।

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा: प्रमुख सिफारिशें

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिये वर्ष 2015 में पूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समिति की ओर से तैयार नई शिक्षा नीति का मसौदा सरकार को सौंप दिया गया। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षाओं को इसके दायरे में लाया गया है।

यह नीति इन चार नींवों पर रखी गई है – उपलब्धता, समानता, गुणवत्ता, सुलभता और उत्तरदायित्व। नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के दायरे को विस्तृत करने का प्रयास किया गया है, साथ ही स्नातक पाठ्यक्रमों को भी संशोधित किया गया है। इसमें आर्ट्स साइंस एजुकेशन के चार वर्षीय कार्यक्रम को फिर से शुरू करने तथा कई कार्यक्रमों को हटाने के विकल्प के साथ एम. फिल प्रोग्राम को रद्द करने का भी प्रस्ताव किया गया है। नई शिक्षा नीति के अनुसार, पी-एच-डी- करने के लिए अब या तो मास्टर डिग्री या चार साल की स्नातक डिग्री अनिवार्य होगी। नए पाठ्यक्रम में 3 से 18 वर्ष तक के बच्चों को कवर करने के लिये 5+3+3+3+4 डिजाइन (आयु वर्ग 3-8 वर्ष, 8-11 वर्ष, 11-14 वर्ष और 14-18 वर्ष) तैयार किया गया है। जिसमें प्रारंभिक शिक्षा से लेकर स्कूली पाठ्यक्रम तक शिक्षण शास्त्र के पुनर्गठन के भाग के रूप में समावेशन के लिये नीति तैयार की गई है। यह मसौदा धारा 12(1)(सी) (निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिये अनिवार्य 25 प्रतिशत आरक्षण का दुरुपयोग किया जाना) की भी समीक्षा करती है।

उच्च शिक्षा के क्षेत्रों के लिए तीन प्रकार के उच्च शिक्षण संस्थानों के पुनर्गठन की योजना भी प्रस्तावित है जिसके तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को तीन श्रेणियों में पुनर्गठित किया जायेगा।

टाइप 1: इसमें विश्व स्तरीय अनुसंधान और उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षण पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

टाइप 2: इसके तहत अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के साथ ही विषयों में उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षण पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

टाइप 3: उच्च गुणवत्ता वाला शिक्षण स्नातक शिक्षा पर केन्द्रित होगा। उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम दो मिशनों द्वारा संचालित होगा- मिशन नालंदा और मिशन तक्षशिला।

स्कूली शिक्षा के लिये एक स्वतंत्र नियामक ‘राज्य विद्यालय नियामक प्राधिकरण’ (SSRA) और उच्च शिक्षा के लिये राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण स्थापित किया जाएगा। निजी स्कूल अपनी फीस निर्धारित करने के लिये स्वतंत्र होंगे, लेकिन वे मनमाने तरीके से स्कूल की फीस में वृद्धि नहीं करेंगे। ‘राज्य विद्यालय नियामक प्राधिकरण’ द्वारा प्रत्येक तीन साल की अवधि के लिए इसका निर्धारण किया जाएगा। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक नए शीर्ष निकाय ‘राष्ट्रीय शिक्षा आयोग’ की स्थापना की जाएगी जो सतत् आधार पर शिक्षा के विकास, कार्यान्वयन, मूल्यांकन और शिक्षा के उपयुक्त दृष्टिकोण को लागू करने के लिये उत्तरदायी होगा। विदेशों में भारतीय संस्थानों की संख्या में वृद्धि करने के साथ-साथ दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखाएँ स्थापित करने की अनुमति दी जाएगी। इस प्रकार उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर बल दिया गया है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य

0-6 साल के बच्चों तक उच्च गुणवत्ता वाले ईसीसीई (ECCE – Early Childhood Care and Education) प्रोग्राम जिनमें बच्चों को भाषा संबंधित गतिविधियाँ करवाई जाती हैं की पहुँच निःशुल्क और सरल बने। प्रारंभिक बाल अवस्था शिक्षा से संबंधित सभी पहलू मानव संसाधन विकास मंत्रलय के दायरे में आयेंगे। नई शिक्षा नीति द्वारा ड्रॉप आउट बच्चों को शिक्षा से दोबारा जोड़ने और सभी तक शिक्षा की पहुँच को सुनिश्चित करवाने का भी लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत 2030 तक 3-18 साल के उम्र के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच और भागीदारी को सुनिश्चित किया गया है। माध्यमिक शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम को विस्तारित किया गया है जिसके तहत साल 2030 तक कक्षा 12 तक मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने की व्यवस्था की गई है।

2022 तक शिक्षा और शिक्षा शास्त्र में आमूल-चूल बदलाव करना भी एक लक्ष्य है ताकि रटने के चलन को खत्म किया जा सके और हुनर एवं कौशल जैसे तार्किक चिंतन, सृजनात्मकता, वैज्ञानिक सोच, संवाद और सहयोग की क्षमता, बहुभाषिकता, सामाजिक जिम्मेदारी और सरोकार के साथ ही डिजिटल विकास साक्षरता को समग्र रूप में बढ़ावा दिया जा सके।

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आवश्यकता क्यों?

भारत में नई शिक्षा नीति की जरूरत को निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है-

  • मौजूदा शिक्षा नीति उन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकी जिसकी उम्मीद की गई थी। उदाहरण के तौर पर उद्योग-व्यापार जगत द्वारा लगातार इस बात को लेकर चिंता व्यक्त की गई कि स्कूलों और कॉलेजों से ऐसे युवा नहीं निकल पा रहे हैं जो उसकी आवश्यकताओं के हिसाब से उपयुक्त हों।
  • मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की एक खामी यह भी है कि देश में जिस तरह के नैतिक आचार-व्यवहार का परिचय दिया जाना चाहिए उसको यह प्राप्त करने में असफल रही है।
  • वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान से ज्यादा महत्त्व अच्छे अंकों को दिया जाने लगा है, नतीजतन विद्यार्थियों में ज्ञान की जगह अच्छे अंकों को प्राप्त करने की प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी है जबकि कुछ वर्षों पहले ही इस बात की अनुभूति हो गई थी कि किताबी ज्ञान का एक सीमा तक ही महत्त्व होता है इसके बावजूद नए तौर-तरीके अपनाने को प्राथमिकता नहीं प्रदान की गई।
  • यह बात सही है कि स्कूलों-कॉलेजों से निकले कई युवाओं ने देश-दुनिया में भारत को एक नई पहचान दिलाई है, लेकिन यह भी एक यथार्थ है कि ऐसा अवसर मुट्ठीभर छात्रों को ही मिल पाया है जिसके लिए कहीं न कहीं मौजूदा व्यवस्था उत्तरदायी है।
  • शिक्षा राष्ट्र निर्माण का प्रभावी माध्यम होता है। ऐसे में शिक्षा में असमानता राष्टीय एकता के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है जिसको एक समान पाठयक्रम अपनाकर दूर किया जा सकता है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नतीजतन नई शिक्षा नीति का महत्त्व बढ़ जाता है।
  • समान पाठयक्रम के अलावा नई शिक्षा नीति में इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि शिक्षा केवल डिग्री-डिप्लोमा पाने का जरिया और नौकरी पाने भर तक ही सीमित न रहे बल्कि इससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होने के साथ उनके सोचने-समझने की क्षमता भी बढ़े।
  • नई शिक्षा नीति राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को अपने उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से अपनी प्राथमिकता तय करने और योजना के प्रावधान लागू करने का अवसर देता है जिसका अभाव वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में देखा गया।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चुनौतियाँ

नई शिक्षा नीति के माध्यम से सरकार द्वारा शैक्षणिक ढाँचे को बेहतर बनाने का प्रयास अपने-आप में एक सराहनीय कार्य है, लेकिन इसके समक्ष कई चुनौतियाँ मौजूद हैं जिनका वर्णन निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-

  • भारत में लगभग एक तिहाई बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। उल्लेखनीय है कि जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं उनमें से अधिकतर बच्चे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा धार्मिक अल्पसंख्यक व दिव्यांग समूह के होते हैं।
  • एक महत्वपूर्ण चुनौती बुनियादी ढाँचे के अभाव से संबंधित है। सामान्यतः देखा गया है कि विद्यालयों व विश्वविद्यालयों में बिजली, पानी, शौचालय, बाउंड्री दीवार, लाइब्रेरी, कम्प्यूटर आदि की कमी होती है, नतीजतन इससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है। विश्व बैंक की वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2018 ‘लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रॉमिस’ के अनुसार भारत की शिक्षा व्यवस्था बदतर स्थिति में है।
  • सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिये जो प्रयास किए जाते हैं उसके असफल होने का जोखिम रहता है। दरअसल इसकी वजह शिक्षा नीति में परिवर्तन करते समय रोडमैप का अनुसरण नहीं करना व नीतियाँ बनाते समय सभी हितधारकों को ध्यान में नहीं रखना है।
  • असर (ASER) के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार ने शिक्षा क्षेत्र के बुनियादी ढाँचे में भले ही निवेश किया है लेकिन उसे अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली है। नई शिक्षा व्यवस्था के समक्ष एक चुनौती शिक्षकों की कमी दूर करने की भी है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 2017 के रिपोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में ज्यादातर स्कूल एक शिक्षक के ही भरोसे चल रहे हैं जिसका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। यूजीसी (UGC) के हालिया सर्वे के मुताबिक कुल स्वीकृत शिक्षण पदों में से 35% प्रोफेसर के पद, 46% एसोसिएट प्रोफेसर के पद और 26% सहायक प्रोफेसर के पद रिक्त हैं।
  • एक अन्य चुनौती उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की भी है। उल्लेखनीय है कि टॉप-200 विश्व रैंकिंग में बहुत कम भारतीय शिक्षण संस्थानों को ही जगह मिल पाती है।
  • शिक्षा नीति के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की जवाबदेही और प्रदर्शन सुनिश्चित करने संबंधित फार्मूला लागू करने को लेकर भी है। आज विश्व के कई विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के प्रदर्शन का मूल्यांकन उनके साथियों और छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर किया जाता है।
  • मसौदे में मौजूद त्रिभाषा नीति भी नई शिक्षा नीति के समक्ष चुनौती पेश कर रही है दरअसल इसमें गैर हिन्दी भाषा क्षेत्र में मातृभाषा, संपर्क भाषा, अंग्रेजी भाषा के अलावा तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी को को अनिवार्य किए जाने की सिफारिश की गई है।
  • नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर खर्च होने वाली धनराशि को दुगुना कर GDP का 6% करने तथा शिक्षा पर समग्र सार्वजनिक व्यय को वर्तमान 10% से बढ़ाकर 20% करने की बात कही गई है। यह वांछनीय तो है पर निकट भविष्य में यह संभव नहीं दिखता क्योंकि अधिकांश अतिरिक्त धनराशि राज्यों से आनी है।
  • प्रारूप में पालि, प्राकृत और फारसी के लिए नए संस्थान बनाने की बात कही गई है। यह एक नवीन विचार है, परन्तु क्या अच्छा नहीं होता कि इसके बदले मैसूरू में स्थित केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान को ही एक विश्वविद्यालय बनाते हुए इन भाषाओं के अध्ययन के लिए सुदृढ़ किया जाता।
  • शिक्षा अधिकार अधिनियम को विस्तारित करते हुए उसमें स्कूल-पूर्व बच्चों को शामिल करना एक अच्छा प्रस्ताव है। परन्तु यह काम धीरे-धीरे होना चाहिए क्योंकि वर्तमान शैक्षणिक अवसंरचना और शिक्षक पदों में रिक्तियों को देखते हुए यह काम तेजी से नहीं हो सकता है। पुनः शिक्षा अधिकार अधिनियम में इस आशय का सुधार करने में भी समय लग सकता है।
  • नई नीति के अनुसार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित होना है। परन्तु इस आयोग की राह कई प्रशासनिक कारणों से काँटों भरी हो सकती है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2017 का क्या होगा? चिकित्सा, कृषि और विधि से सम्बंधित संस्थानों को एक ही छतरी के अन्दर लाना सरल नहीं होगा।
  • प्रस्तावित नीति में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामक प्राधिकरण (National Higher Education Regulatory Authority) की अभिकल्पना है। पर यह प्राधिकरण नियमन करने में कहाँ तक सफल होगा कहा नहीं जा सकता।
  • नई शिक्षा नीति के प्रारूप में उच्चतर शिक्षा निधि एजेंसी (Higher Education Funding Agency) जैसी एजेंसियों और उत्कृष्ट संस्थानों के विषय में मौन है।
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निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नई शिक्षा नीति 2019 सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन को इंगित करती है लेकिन इसके समक्ष कई चुनौतियाँ भी हैं। उल्लेखनीय है कि इन चुनौतियों से निपटने का कार्य पूर्व में होते रहे हैं लेकिन उपलब्धियाँ सराहनीय नहीं रहीं हैं। इस संदर्भ में यहाँ कुछ सुझावों को अमल में लाये जाने की आवश्यकता है-

  • इस नीति के तहत शिक्षा अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार, नागरिक, सामाजिक संस्थाएँ, विशेषज्ञों, माता-पिता, सामुदायिक सदस्यों को अपने स्तर पर कार्य करना चाहिए।
  • शिक्षा जगत और उद्योग जगत के बीच एक सहजीवी रिश्ता स्थापित किया जाना चाहिए ताकि नवाचारों का एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बन सके जिसमें रोजगार के व्यापक अवसर पैदा हों। इसके लिए जरूरी है कि उद्योग जगत शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े।
  • इसके अतिरिक्त कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों को चाहिए कि विशेष महत्त्व के क्षेत्रों की पहचान कर उससे जुड़े डॉक्टरेट और पोस्ट डॉक्टरेट अनुसंधानों को वित्त मुहैया करवाएं।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों, प्रतिष्ठित उद्योग संगठनों, मीडिया घरानों और पेशेवर निकायों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों को रेटिंग दे सकें। एक सुदृढ़ रेटिंग प्रणाली से विश्वविद्यालयों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और उनके प्रदर्शन में सुधार होगा।
  • भारतीय विश्वविद्यालय आज भी विश्व के 100 शीर्ष रैंकिंग वाले विश्वविद्यालयों में शामिल नहीं हो सका है। इस सिलसिले में विश्वविद्यालयों और शिक्षाविदों को आत्मअवलोकन कर संबंधित मानकों में सुधार करना चाहिए।
  • इसके अलावा स्कूली शिक्षा में सुधार के लिये शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण की विधियों में भी सुधार किया जाना चाहिए।

अभी शिक्षा नीति का जो प्रारूप हमारे सामने है उसे तैयार करने की प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो गई थी ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नवाचार और अनुसंधान के संबंध में जनसंख्या की बदलती हुई आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। ऐसी शिक्षा नीति तैयार करने पर ज़ोर दिया गया जो विद्यार्थियों को आवश्यक कौशल और ज्ञान से युक्त कर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षाविदों और उद्योग में जनशक्ति की कमी को पूरा कर सके। यह नीति अभिगम्यता, निष्पक्षता, गुणवत्ता, वहनीयता और जवाबदेही आधारभूत संरचना के आधार पर तैयार की गई है। वर्ष 1986 में तैयार शिक्षा नीति में वर्ष 1992 में व्यापक संशोधन किया गया और यही नीति अभी तक प्रचलन में है। लेकिन बीते 28 सालों में दुनिया कहाँ-से-कहाँ पहुँच गई है और इसी के मद्देनज़र देश की विशाल युवा आबादी की समकालीन ज़रूरतों और भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये यह शिक्षा नीति बनाई गई है। अब समय की कसौटी पर यह कितना खरा उतरती है, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।

सन्दर्भ :

  • प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019, भारत सरकार
  • जेएस राजपूत, (पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली) बोर्ड परीक्षाओं का दबाव कम करना क्रान्तिकारी कदम
  • जेएस राजपूत, (पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली) कम होना ही चाहिए पढाई का बोझ, दैनिक जागरण, (राष्ट्रीय संस्करण) 21 जुलाई 2020
  • जेएस राजपूत, (पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली) अच्छे दिनों का भरोसा, दैनिक जागरण, (राष्ट्रीय संस्करण) 16 जुलाई 2020
  • S. Rajput, On to a new path, Millenium Post, July17, 2020
  • जेएस राजपूत, (पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली) स्कूलों से ही निकलेगी आत्मनिर्भरता की राह, दैनिक जागरण, (राष्ट्रीय संस्करण)17 जून 2020
  • जेएस राजपूत, (पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली) शिक्षा में निरंतरता के सन्दर्भ, be/5F6z7zb4hvE

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