नारी-विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास में नारी संघर्ष: प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश,

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नारी-विमर्श की दृष्टि से 'कौन नहीं अपराधी' उपन्यास में नारी संघर्ष

प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश                                                                                       अनुराधा कुमारी

हिंदी विभाग                                                                                                                        शोधार्थी

स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय                                                                              पंजाब विश्वविद्यालय

सेक्टर 42, चंडीगढ                                                                                                                    चंडीगढ़                                                         

शोध सार:

नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि कौन नही अपराधीउपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा।

बीज शब्द: नारी, संघर्ष, उपन्यास, चिंतन, मुक्ति, सशक्तिकरण

शोध विस्तार

विमर्श को चिंतन मनन की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है और जब इस चिंतन, मनन के केंद्र में नारी व् उसकी स्थिति आ गई तो यह नारी-विमर्श में परिवर्तित हो गया| वास्तव में नारी विमर्श किसी प्रकार की बहस का मुद्दा नहीं है | यह तो नारी जाग्रति और उसके अधिकारों के लिए है| नारी-विमर्श शब्द की उत्पत्ति इन दोनों शब्दों के योग से हुई है| अत: यह सपष्ट ही है की इसमें नारी चिंतन, उत्पीड़न, शोषण, संघर्ष, मुक्ति की चाह, सशक्तिकरण शामिल है |  नारी की स्थिति चिंता का विषय रही है जब उस पर गहन चिंतन आरम्भ हुआ तो नारी विमर्श उभर कर सामने आया | रथ के दो पहियों की भांति नर-नारी का जीवन समान महत्वपूर्ण है परन्तु जब नारी को हिन् दृष्टि से देख सम्मानजनक महत्वपूर्ण स्थान न मिला तो नारी को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने का कार्य नारी-विमर्श ने किया |   

            हिन्दी साहित्य में एक सुपरिचित और प्रतिष्ठित नाम है ’कृष्णा अग्निहोत्री’ जिन्होंने अपने साहित्य में समाज के चिरशोषित वर्ग नारी को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की है। उन्होंने कहानियों और उपन्यासों दोनों पर ही अपनी कलम चलाई और हर रचना के केन्द्र में नारी को ही चुना है। कृष्णा अग्निहोत्री अपने उपन्यासों के माध्यम से न केवल पाठकों और आलोचकों को,  स्थितियों की,  विद्रूपता दिखा कर चौंका  देती हैं बल्कि, उन्हें सोचने और विचारने के लिए भी मजबूर कर देती है। यदि इन्हें शोषित महिलाओं की बेबाक प्रवक्ता कहा जाए तो ये बिल्कुल भी असंगत नहीं होगा। दिनेश द्विवेदी आपके सम्बन्ध में लिखते हैं-’’पुरूष के सामन्ती और भोगवादी केक्टसी नज़रिये से चुभी और बिंधी हुई समर्पित नारी की मूक चीत्कार को यदि किसी ने अपने सशक्त कथानकों और तिलमिला देने वाली समस्याओं से व्यक्त किया है तो वह है-कृष्णा अग्निहोत्री।’’¹यह पूर्णतः सत्य भी है क्योंकि कृष्णा अग्निहोत्री की रचनाओं के केन्द्र में नारी ही है।

नारी चाहे किसी भी वर्ग की हो अमीर-गरीब, चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी हो या अनपढ़, चाहे घरेलू हो या फिर कामकाजी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका प्रत्येक स्तर पर शोषण ही होता रहा है। इसी कटु सत्य को आधार बनाकर कृष्णा अग्निहोत्री बार-बार पाठकों के सामने पेश करती हैं तभी उनकी रचना की कथावस्तु के केन्द्र में नारी ही रहती है। उनका ऐसा ही एक उपन्यास है ’कौन नहीं अपराधी’ जिसके केन्द्र में फिर से नारी को रखा गया है। इस उपन्यास की भूमिका में कृष्णा अग्निहोत्री स्वीकार करती हुई कहती है-’’जी हां, पुनः मैनें ’नारी’ को इस उपन्यास का प्रमुख पात्र बनाने की हिम्मत जुटायी है, क्योंकि सच्चाई यह है कि जितनी सूक्ष्मता से मैं उनके अन्दर प्रवेश कर सकती हूँ उतनी

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 सहजता से अन्यत्र नहीं।’’² वास्तव में नारी जीवन से जुड़ी हुई समस्याएँ अनन्त हैं जिनका अन्त होता नज़र नहीं आता और उन्हें समाज के समक्ष रखना भी अत्यन्त आवश्यक है।

            ’कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास अपने आप को सार्थक करता हुआ समाज के अपराधीपन को उद्घाटित करता है तथा समाज के प्रत्येक तबके से यह प्रश्न करता है कि आखिर नारी की ऐसी स्थिति के लिए अपराधी कौन नहीं है ? अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति इस अपराध में शामिल है चाहे वो नारी ही क्यों न हो, जो ऐसी नियति को स्वीकार करती है। परन्तु इसके बावजूद भी समाज में ऐसी नारियाँ मौजूद है जो संघर्ष करती हैं और अपनी स्थिति को बदलने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस उपन्यास में एक ऐसे ही पात्र को लिया गया है जिसमें अनेक गुण विद्यमान हैं, बावजूद इसके उसे समाज का चौतरफा शोषण सहना पड़ता है। कृष्णा अग्निहोत्री ने इस पात्र के चरित्र के सभी पहलू पाठकों के सम्मुख रखकर सचमुच में एक जीवंत पात्र की संकल्पना की है। यह पात्र कहीं न कहीं समाज की नग्न सच्चाई को भी पाठकों के समक्ष पेश करता है कि समाज एक पति परित्यक्ता स्त्री के साथ कैसे पेश आता है। इस उपन्यास की नायिका का नाम सीमा है। सीमा की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ’डाॅ. बालाजी श्रीपती भुरे’ अपनी पुस्तक ’कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी’ के अन्तर्गत लिखते हैं-’’पुरूष वर्चस्व ने जब चाहा नारी को बाँधा, जब चाहा छोड़ दिया। जीवनसंगिनी बनाया और कुछ क्षणों के बाद परित्यक्ता का खिताब दे डाला। झोली में एक बच्ची का उत्तरदायित्व डाला और विदेश भाग गये।’’ङ इस अचानक से आई स्थिति के कारण सीमा का सारा जीवन संघर्षों से घिर जाता है।

सीमा जो कि इस उपन्यास की नायिका है लेखिका ने उसके अन्दर अनेक गुण दिखाए हैं। वह एक सम्माननीय व्यक्तित्व की स्वामिनी है तो साथ ही अनेक मानवीय गुणों से भरपूर है। उसके हृदय में सभी के लिए स्नेह और दयाभाव है, परन्तु उसके जीवन की कटुता तो देखो कि बचपन से ही उसकी माँ और बहन रीमा उसके साथ बस सौतेला व्यवहार ही करते रहे । कभी-कभी तो उसे लगता भी है कि यह शायद उसकी सगी माँ नहीं अपितु सौतेली है। परन्तु फिर भी उसने ऐसे ख्याल को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने दिया। सीमा का विवाह जल्दी हो गया और कुछ समय पश्चात् ही उसने बेटी को जन्म दिया। जिसका नाम उम्मी रखा गया। बेटी के जन्म के पश्चात् बिना किसी कारण के सीमा का पति उसे छोड़ कर विदेश चला जाता है । इस पर भी उसकी बहन रीमा ताना कसती हुई कहती है-’’भाई सबको अपनी समस्याएँ सुलझानी पड़ती है। आप जानो, मैं तो इतना जानती हूँ कि पत्नी में दमखम हो तो पति हाथ से बाहर नहीं जा सकता है।’’4इतना सुनते ही सीमा सकते में आ जाती है कि- क्या यह उसकी सगी बहन है जिसे उसकी हल्की सी भी चिंता नहीं। सीमा अपनी नन्हीं सी बेटी को लेकर किराए का कमरा लेकर रहने लगती है और  उसका जीवन संघर्षों से भर जाता है। सीमा डेकोरेटर का काम आरम्भ करती हुई अपनी बेटी को एम. ए. करवाने के बाद एक शिक्षिका बनाती है। सीमा के माध्यम से कामकाज़ी महिलाओं की समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।

            नारी को समाज में अपना स्थान बनाने के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ रहा है। मुख्यतः समाज में उसका शोषण करने वाले लोग ही अधिक मिलते है। चाहे यह शोषण शारीरिक स्तर पर हो या मानसिक धरातल पर। उम्मी जोकि अपने नंपुसक पति द्वारा छली जाती है वह उसे प्रत्येक कदम पर मानसिक और शारीरिक पीड़ा पहुँचा कर संतोष प्राप्त पाता है। लेखिका पति द्वारा छली गई उम्मी की पीड़ा को व्यक्त करती हुई कहती है-’’क्या आज बिस्तर पर घटित उसके इस आहत तन व मन की कोई साक्षी समाज को सौंपी जा सकती है ? उसके इस घाव से रिसते रक्त को कोई देख सकता है ? एक बन्द कमरे में बीते ऐसे कलुषित नकारें क्षणों का किसे निर्णायक होना चाहिए, भोक्ता या श्रोता को ?’’5उम्मी जो घर से बाहर नौकरी करे और वहाँ भी अनेक समस्याओं से संघर्ष करे उसे ही घर आकर पति की मार सहनी पड़ती है। उम्मी बिना वजह अपने पति की मार सहन करती है परन्तु लेखिका ने उसमें परिवर्तन दिखाया और उम्मी अपने पति का विरोध करती हुई कहती है-’’तुमने मेरे हाथों में अदृश्य बेडि़याँ डाल रखी है, अब मैं इन्हें सह नहीं सकुंगी। अच्छी तरह समझ रही हूँ कि इन्हें मुझे ही काटना पड़ेगा। मैं कोई चाभी का खिलौना नहीं जिसे तुम जब चाहो चलाओ, फेंको और तोड़ डालो समझे।’’6उम्मी के भीतर यहीं से विद्रोह की चेतना का उन्मेष होता हुआ दिखाई देता है।

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इस उपन्यास के माध्यम से कृष्णा अग्निहोत्री ने समाज की ऐसी स्त्रियों को संघर्ष के मैदान में उतारा है जो पति परित्यक्ता हैं, समाज द्वारा शोषित हैं या पति द्वारा प्रताडि़त हैं अथवा जिनके पति नपुंसक हैं। मध्यवर्ग की उम्मी हो या फिर उच्च वर्ग की सरिता, हिन्दु समाज की शुभाहो या मुस्लिम धर्म की आसफा या ईसाई महिला कमला। सभी किसी न किसी तरह की त्रासदी को भोगने के लिए विवश है। उपन्यास की एक पात्र है -विमला। जिसका बॉस उसका शारीरिक शोषण करता है और विद्रोह करने पर धमकी देता हुआ कहता है-’’यदि विमला मेरे साथ खुशी से रहो तो तुम्हें धन भी मिलेगा और प्रमोशन भी। यदि मुँह खोलोगी तो तुम्हारे मुँह पर तेजाब फिंकवा दूँगा।’’7विमला उसकी धमकी से डरती नहीं है बल्कि जीवन में उससे कभी न मिलने का निर्णय लेते हुए नौकरी छोड़ कर विवाह कर लेती है।

            यह उपन्यास मात्र सीमा की ही गाथा नहीं है अपितु चार पीढि़यों की गाथा है जिसमें सबसे पहली पीढ़ी सीमा की माँ है। दूसरी पीढ़ी सीमा और उसकी बहन रीमा। तीसरी पीढ़ी के अन्तर्गत सीमा की बेटी उम्मी और रीमा की बेटी रवीना। चैथी पीढ़ी में उम्मी की बेटी अंशु शामिल है। ये पीढि़याँ किसी भी आयुवर्ग की हो पर जीवनयापन के लिए संघर्ष प्रत्येक पीढ़ी को करना पड़ता है । इनके संघर्षों के कारण यह उपन्यास केवल नारी मुक्ति तक ही सीमित नहीं अपितु इसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार, व्यवस्था की कुरूपता का भी चित्रण किया गया है। ईसाई धर्म की कमला की बेटी महिमा का उसके मौसेरे भाई द्वारा बलात्कार किया गया, यही नहीं इस के बाद वो अपने चार दोस्तों से भी उसका बलात्कार करवाता है कि कहीं वो अपना मुँह न खोल दे। इस जघन्य हत्याकाण्ड को भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से भुला दिया गया। लेखिका कहती है-’’पचासी लाख रूपयों के मोह में प्रांत की पुलिस ’महिमा कांड’ भूल गयी। धीरे से वह चैकीदार भी गायब हो गया और गुड्डू के अपराध की फाइल न जाने थाने के किस शैल्फ में ऐसे चिपकी की ढूँढने पर भी नहीं मिली।’’8ऐसे भ्रष्ट तन्त्र से न्याय के लिए एक अकेली महिला कब तक अपना संघर्ष जारी रख सकती है? 

उपन्यास में एक विशिष्ट पात्र रीमा है जो कि सीमा की छोटी बहन है। सीमा से वह बचपन से ही ईष्र्या करती है। कहीं न कहीं उसमें अपने आपको अधिक श्रेष्ठ दिखाने की चाह है। परिवार वालों के विरोध करने के बावजूद भी वो असगर नाम के मुस्लिम युवक से विवाह कर विदेश चली जाती है। जब भी भारत आती है तो अपनी अमीरी का रौब सबके ऊपर झाड़ती है। ऊपर से दिखने में सीमा जितनी संयत और सफल वैवाहिक जीवन वाली लगती है भीतर से वो उतनी ही उलझी और परेशान है। परन्तु वह फिर भी समस्याओं से निपटती हुई उन्हें सुलझाती है। रीमा के पति का पहला विवाह हो चुका है और पहली पत्नी से बच्चे भी है। रीमा को यह बात बहुत बाद में पता चलती है और वो साफ शब्दों में असगर से कह देती है कि मैं यह बिल्कुल सहन नहीं कर सकती। जब असगर अपनी पहली पत्नी और उसकी बेटी की वजह से भारत आकर बसना चाहता है तो रीमा तीव्र विरोध करती हुई अपनी माँ से कहती है-’’मैं कैसे एकाएक सब छोड़कर यहाँ रोने आ जाऊँ। प्लान करना पड़ता है, अपनी जड़ें उखाड़ने के लिए जब तक इनका यह सिलसिला जारी रहेगा, मैं वापस नहीं आ सकूँगी।’’9रीमा के अंदर संघर्षों से लड़ने की जुझारू प्रवृत्ति नजर आती है।

               उपन्यास के अन्य पात्रों के माध्यम से नारी स्वावलम्बन को भी उजागर किया गया है। एक ऐसा ही पात्र है –शांति, जोकि सीमा की कामवाली बाई है और एक निम्न परिवार से है। उसका पति शराबी है और रोज रात को शराब पीकर उसे मारता है। शांति अनपढ़ है परन्तु कर्मठ है। वो जो भी मेहनत करके कमा के लाती है उसे उसका पति छीन कर शराब पी जाता है। सीमा शांति का साथ देती है और उसे समझाती है कि उसे हार नहीं माननी चाहिए बल्कि अपने पति का डटकर मुकाबला करना चाहिए। सीमा की बातों से ही प्रभावित होकर शांति, संघर्ष करती हुई अपने पति को लच्छन सुधारने के लिए कहती है। वह सीमा को इस बारे में बताती है-’’कह दिया है लच्छन सुधार ले, वरना घर में भी ताला डाल दूँगी। दे किराया और खोल ताला।’’10नारी को संघर्ष से यदि मुक्ति चाहिए तो उसका मुख्य आधार नारी का आर्थिक स्वालंबन ही है।    

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सरिता एक समाज सेविका है जो कि उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखती है। अपने पति के पैसे और प्रेमी की पहुँच के कारण वो नगरपालिका चुनाव जीत जाती है। परन्तु नगर की भलाई के लिए वो कोई भी उचित निर्णय नहीं ले सकती क्योंकि एक तरफ उसका पति कुछ कहता है और दूसरी तरफ उसका प्रेमी सूरजभान कुछ और करवाना चाहता है। उसका जीवन इन दोनों के कारण अनेक संघर्षों में फंस कर रह जाता है। जब वह नगर सुधार के लिए कार्य करना चाहती तो उसका विरोधी ’पालीवाल’ सरिता और सुरजभान के बेहूदा चित्र अखबार में प्रकाशित करवा देता है। यदि किसी औरत को कमजोर करना हो तो सबसे पहला हथियार उसका चरित्र हनन करना है और यही कार्य पालीवाल करता है। इस पर टिप्पणी करते हुए सरिता सीमा से कहती है - ’’मै मानती हूँ कि सूरजभान मुझे पसन्द करते हैं लेकिन मै वेश्या नही हूं कि सारे नेताओं का बिस्तर गरम करूंगी।’’11 जब सरिता अधिक विद्रोह करती है तो संदिग्ध अवस्था में अधजली हुई लाश उसी के घर में मिलती है । कुछ लोग कहते है कि सरिता ने आत्महत्या कर ली तो कुछ लोग दबी हुई आवाज में कहते है कि सरिता की हत्या कर दी गई।

निष्कर्ष -  नारी विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट है कि ’कौन नही अपराधी’ उपन्यास नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति है । नारी बचपन से ही संघर्ष करना आरम्भ करती है और इस समाज में उसे आयुपर्यन्त संघर्ष ही करना पड़ता है । इस तथ्य को लेखिका ने अनेक पात्रों के संघर्षमयी जीवन से दर्शाया है चाहे नायिका सीमा हो, रीमा, उम्मी, अंशु, प्रमिला, कमला, विमला, महिमा, आसफा, सरिता इत्यादि कोई भी प्राप्त हो वह कहीं न कहीं, किसी ना किसी प्रकार के शोषण से ग्रस्त है। शोषण होने के पश्चात भी उसमें संघर्ष की हिम्मत और असंगत के प्रति रोष है। स्त्री को स्वयं सक्षम बनना होगा। इस संदर्भ में रमणिका गुप्ता लिखती हैं- ’’स्त्रियां स्वयं सक्षम बने और कानूनों का उपयोग करें। झूठी इज्जत, बर्बर और गैर जिम्मेवार परिवार व जड़ समाज की प्रतिष्ठा की भावना को अपने मन से निकाले बिना या इन संस्थाओं को ध्वस्त किए बिना, एक ऐसा नया समाज नहीं बन सकता, जहां स्त्री भी एक मनुष्य समझी जाए।’’ यह सत्य भी है कि नारी को अपनी स्थिति सुधारने के लिए स्वयं ही प्रयास करना होगा। समाज में प्रचलित रूढ़ मानसिकता, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, अंधविश्वासों. गल चुके रीति -रिवाजों के द्वारा नारी शोषण की जो प्रिक्रिया चलती आ रही है उससे भी नारी को स्वतंत्रता दिला कर स्वयं का अस्तित्व कायम करने में सहायता करना नारी विमर्श का लक्ष्य है| 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

  1. 1. गीते, नीहार, कृष्णा अग्निहोत्री सम्पूर्ण साहित्य का मूल्यांकन, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-45
  2. 2. अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नहीं अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-7
  3. 3. भुरे, बालाजी श्रीपति, कृष्णा अग्निहोत्री के उपन्यासों में नारी, कानपुर: शैलजा प्रकाशन, पृष्ठ-118
  4. 4. अग्निहोत्री, कृष्णा, कौन नही अपराधी, कानपुर: अमन प्रकाशन, पृष्ठ-29
  5. 5. वही, पृष्ठ-51
  6. 6. वही, पृष्ठ-65
  7. 7. वही, पृष्ठ-251
  8. 8. वही, पृष्ठ-237
  9. 9. वही, पृष्ठ-211
  10. 10. वही, पृष्ठ-240
  11. 11. वही, पृष्ठ-291
  12. 12. गुप्ता, रमणिका, स्त्री मुक्ति संघर्ष और इतिहास, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन पृष्ठ-1
 
 

 

 

 

 

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