पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास-विकास पराशर,डॉ विनोद कुमार

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पहाड़िया साम्राज्य के आदि विद्रोह एवं बलिदान की समरगाथा: हुल पहाड़िया उपन्यास

विकास पराशर1 (पी.एच.डी शोधार्थी),
डॉ विनोद कुमार(निर्देशक)
हिंदी विभाग,
लवली प्रोफैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, पंजाब

शोध सार

भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है।

बीज शब्द: आदिवासी, नायक, संघर्ष, आजादी, विद्रोह, उपन्यास

शोध विस्तार

बाहरी शक्तियों द्वारा किसी समाज या समुदाय विशेष की पहचान और अस्मिता के अतिक्रमण तथा उसके विरोध की कड़ियों के दस्तावेजीकरण से इतिहास की श्रंखला का एक बड़ा हिस्सा तैयार होता रहा है। इसके समानांतर एक सच यह भी है कि घुसपैठ और विद्रोह की ना जाने कितनी द्वंद्वात्मक संघर्ष गाथाएँ इतिहास का हिस्सा बनने से रह जाती हैं या फिर जानबूझकर उन्हें इतिहास से बेदखल कर दिया जाता है। भारत के आदि-निवासियों की प्रमुख जनजाति पहाड़िया का स्वतंत्र संघर्ष इतिहास में दर्ज होने से छूट गया या छोड़ दिया गया। भारत को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने में यदि किसी ने योगदान दिया तो वह पहाड़ियां समाज के वीर नायक बाबा तिलकामांझी थे। जिन्होंने अपने अदम्य साहस और शौर्य से ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे को ललकारा और अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों से कंपनी की दमनकारी योजनाओं का विनाश किया।  इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भारत को स्वतंत्र कराने में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन और विद्रोह हुए। जिन्होंने ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया लेकिन इन सभी आंदोलनों के नायक तो आदि नायक अर्थात् आदिवासी ही थे। जिनमें तिलका मांझी (जबरा) का नाम सर्वोपरि है। जो काम सभ्य लोगों ने किया। वही काम इतिहासकारों ने किया। पहाड़िया साम्राज्य के इतिहास को अस्तित्वहीन कर दिया। आदि नायकों की वीर गाथाओं का चित्रण शून्य स्तर पर किया। जिसके कारण लोगों तक उनके शौर्य की गाथाएँ पहुँच नहीं पाई। राकेश कुमार जी इसी बात को उद्घाटित करते हुए। अपने उपन्यास हुल पहाड़िया में लिखते हैं “गुलामों को महिमामंडित कैसे कर सकते थे गोरे? हमारे भारतीय इतिहासकार भी अंग्रेजी की मानसिक दासता से कहां मुक्त हो सके। इनकी आधार सामग्री भी तो वहीं थी। अंग्रेज अफसरों के संस्मरण, डायरियां अंग्रेजों द्वारा तैयार गजेटियर्स।”1 भारत में ऐसे बहुत वीर नायक हुए। जिनकी शौर्य गाथाएं सिर्फ मौखिक रूप में ही रह गई। उन्हें ठोस रूप देने में सदैव इतिहासकारों ने हिचकिचाहट की। जब किसी भी समाज के अस्तित्व, अस्मिता और उनकी स्वतंत्रता में बाहरी हस्तक्षेप होता है तो विद्रोह का नगाड़ा स्वयं ही बजे उठता है। जिसके कारण संघर्ष की उत्पत्ति होती है और जब संघर्ष अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ता है तो विद्रोह को जन्म देता है। जो आगे चलकर भीष्म युद्ध की उत्पत्ति करता है। यही हालात पहाड़ियां समाज के थे। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जबरदस्ती उनकी जमीनों को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। उनकी स्वतंत्रता को परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ना आरम्भ कर। जिसके फलस्वरूप उन्हें तीरों के स्थान पर हथियार उठाने उड़े। “तिलका बाबा को विवश किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों ने। कैप्टन ब्रूक, ब्राउन और क्लीवलैंड की अंग्रेज तिकड़ी ने।" 2 साल 1784 में उन्होंने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया। कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी।  उन्होंने सपने में कभी सोचा न था कि जंगलों रहने वाला कोई आम आदिवासी ऐसी हिमाकत कर सकता है। जंगल के बेटे ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया और न ही कभी समपर्ण किया और न ही वह अंग्रेजों के प्रहारों से डरे। स्थानीय सूदखोर और ज़मीदारों, अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी चैन की नींद सोने नहीं दिया। तिलका मांझी आदिवासियों की स्मृतियों और उनके गीतों में हमेशा जिंदा रहेंगे ना जाने कितने ही आदिवासी लड़ाके के तिलका के गीत गाते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। गीतों तथा कविताओं में तिलकामांझी का विभिन्न रूपों में याद किया जाता है।

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“तुम पर कोड़ों की बरसात हुई

 तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए

 फिर भी तुम्हे मारा नहीं जा सका

 तिलका मांझी, मंगल पाण्डेय नहीं

 तुम आधुनिक भारत के पहले विद्रोही थे।” 3

पहाड़िया आदिवासी मुगल अफगान और मराठे तीन-तीन आक्रमणकारियों से लड़े थे। उन्होंने अपने पुरखों द्वारा स्थापित राज्यों पर दीकूओं का वर्चस्व कभी स्वीकार नहीं किया। रक्तबीज के वंशधर थे। राजमहल की पहाड़ियां। बार बार हारते थे। पर टूटते नहीं थे। गिर-गिर कर खड़े होने वाले हटी पहाड़िया लोगों का लड़ाका मनोबल अक्षुण्ण रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रत्येक षड्यंत्रकारी योजनाओं को मिट्टी में धूमिल कर दिया था तिलका मांझी पहाड़िया साम्राज्य के नायक ने। जो उपन्यास के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है। “ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी सन्न थे। अजब घटित हुआ था। कंपनी का खजाना लूट गया था। दिन-दहाड़े जंगलतराई के क्षेत्र में पहली बार कंपनी के खजाने की लूट हुई थी।” 4 ऐसा नहीं है कि आदिवासियों के राजनीतिक चेतना प्रखर नहीं है। वे विरोध करना जानते ही नहीं, सत्ता पक्ष की हर भाषा को जानते हैं। समझते हैं। उनके हर वास्तविक इरादों का मुकम्मल जवाब भी दे सकते हैं। वे राजनीति में उथल-पुथल भी मचा सकते है। वे अपने क्षेत्र में ही सही लेकिन अंग्रेजों को करारी टक्कर दे रहे थे। औपनिवेशिक युग में जितने विद्रोह आदिवासियों ने किए। उतने भारत की किसी भी जाति ने नहीं किए। इसका कारण था कि औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासियों के जंगल जमीन का वास्तविक आधार ही छीन लिया था।  सबसे ज्यादा विद्रोह झारखंड में हुए और इसमें मुंडा, संथाल, हो तथा भूमिज आदिवासियों ने निर्णयकारी भूमिका अदा की। इनके आंदोलनों में निरंतरता है। जोड़ने वाली कड़ी है। जो समाज सुधार से लेकर राजनीतिक स्वायत्तता तक जाती है। रवि कुमार ने अपनी कविता पुस्तक आदिवासी अभिव्यक्ति में तिलका मांझी और इतिहास के वीर नायकों की गाथा को समाज के समक्ष प्रकट किया है। जिसे सदैव साहित्यकारों ने हाशिये की सीमा से पार नहीं किया।  

“दहक उठी थी सन 1774 में

 अंग्रेज विरोधी थी वह क्रांति  

 1824 में तिलका मांझी ने

 मार गिराया अंग्रेज कमिश्नर।” 5

हुल पहाड़िया उपन्यास यथार्थ के धरातल को व्यक्त करने वाला एक ऐसा उपन्यास है। जिसमें इतिहास को यथार्थ के धरातल पर पाठकों के समक्ष लेखक ने बड़ी मेहनत के साथ प्रकट किया है।  इतिहास के वीर नायकों को आधुनिक पीढ़ी से रूबरू कराने में कुल पहाड़िया उपन्यास सर्वदा सार्थक सिद्ध हुआ है। ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। धीरे-धीरे व्यापार के साथ-साथ उन्होंने पूरे भारत को अपने साम्राज्य में मिला लिया और पूरे भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य काल में प्रत्येक व्यक्ति को दुख और दरिद्रता के इलावा कुछ हासिल नहीं हुआ। कंपनी ने आदिवासी समाज की रीढ़ की हड्डी को तोड़ डाला। अनेक प्रकार के उन पर प्रतिबंध लगा दिए। जल, ज़मीन, जंगल को उनसे छीन लिया गया और कर, लगान व्यवस्था को लागू कर दिया गया। जिसके कारण स्वतंत्र अस्तित्व वाले पहाड़िया आक्रोशित थे उन्होनें विद्रोही रूपी स्वर में कहाँ, “जंगलतराई में पठान आए। मुगल आए और वह भी गए। किसी बादशाह, राजा, पेशवा या सूबेदार ने कभी भी स्वतंत्र पहाड़िया लोगों से कर नहीं मांगा था।”6 पहाड़िया आदिवासी अब तक स्वतंत्र रहते आए थे। उन्हें अपने ऊपर किसी भी प्रकार का अधिकार स्वीकार्य नहीं था। अपने स्वतंत्र को किसी के सामने गिरवी रखना उन्हें मंजूर नहीं था। स्वच्छंद एवं स्वतंत्र जीवन जीने वाले पहाड़िया को मजबूरी में भी किसानी सीखना मंजूर नहीं था। उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों से विद्रोह करने की ठान पकड़ ली थी। सारे पहाड़िया समाज एक ही सपना था। कंपनी से आजादी। तिलका ने हमेशा से ही अपने जंगलों को लूटते और अपने लोगों पर अत्याचार होते देखा था। गरीब आदिवासियों की भूमि खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेजी शासकों ने कब्जा कर रखा था।  आदिवासी और पर्वती सरदारों की लड़ाई अक्सर अंग्रेजी सत्ता से रहती थी। लेकिन पर्वतीय जमीदार अंग्रेजी सत्ता का साथ देते थे। तिलका मांझी राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर में स्थानीय लोगों को सभा में संबोधित करते थे। जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने को ज्ञात था कि एकता ही स्वतंत्रता की चाबी है। उपन्यास के एक पात्र दीना ने अपनी एकजुटता को परिचय देते हुए कहा, “बाघ, भालू, हाथी अजगर सबसे लड़े हम। जंगल काटने में कितने पहाड़िया बीत गए। तब जाकर हमने गांव बसाए हैं।  अब अपने दम पर थोड़ी जमीन बनाई तो दूसरों को लगान क्यों दे? खेती किसानी नहीं करते फिर लगान कैसा?7 शोषण उत्पीड़न और विस्थापन जैसी समस्याओं को निरंतर झेलने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति बड़ी बदतर है। पहले तो वे प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों जड़ी बूटियों, लकड़ियों को बेचकर कुछ न कुछ पैसे अर्जित कर लिया करते थे। लेकिन जब से पूंजीपतियों ने अपने अतिक्षमतावान यंत्रों के द्वारा उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना शुरू कर दिया।  तब से यह बेचारे आदिवासी भूमिहीन तथा उत्तरोत्तर कंगाल होते गए। अब उन्हें अपनी रोजमर्रा के जीवन को चलाने के लिए पूर्णतया बाज़ार पर ही निर्भर होना पड़ रहा है। स्वतंत्रता से पहले भी उनकी स्थिति ऐसी थी और आज भी वैसी ही है। आदिवासी साहित्य में हमें विद्रोह की चेतना सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिलती है। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष को अपनी अस्मिता का संघर्ष बना दिया है। आज वे उन ताकतों का मुखर विरोध करती है। जिसने उसकी आत्मा को अपमानित किया है। दिल पर गहरे जख्म दिया है। उनके हर चीजों को छीना है। उनके सपनों को रौंद कर रख दिया है। “उसे अपनी पहचान के संघर्ष को अपने स्वाभिमान से जोड़कर संघर्ष और मूल्यों का पर्याय बना दिया है। उसका साहित्य अपनी कोई या कहीं छीनी गई इज्जत या मर्यादा को अपने मूल्यों में तोल कर अपने शब्दों, प्रतीकों, मिथकों में बाँधने लगा है।”8 आज आदिवासी साहित्य जो केवल लोकसाहित्य तक ही सीमित था आगे निकल गया है और समकालीन साहित्य का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। आदिवासियों के जीवन में मुगलों के आक्रमण और अन्य   बाहरी आक्रमणों से बदलाव शुरू हुआ। किंतु यह बदला बहुत प्रभावशाली नहीं रहे। मुगलों के पश्चात जब अंग्रेजी सत्ता भारत में काबिज हुई तो उन्होंने देखा कि असली धन का भंडार तो आदिवासियों के पास जंगलों में हैं। उन्होंने वन कानून में अपनी मर्जी से संशोधन किया और जंगलों में मार्ग का निर्माण किया और आदिवासियों के जीवन में सड़क मार्ग ने विष घोलने शुरू कर दिया। विद्रोह की ज्वाला भी धीरे-धीरे भड़कने लगी थी आदिवासी भले ही जंगलों में निवास करते है।  लेकिन अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए मर मिटने को तैयार हो जाते हैं। ब्रिटिश फौजों ने जब पहाड़िया राज्य की सीमा को लांघना शुरू कर दिया तो विद्रोह की ज्वाला ने भी उनकी सहनशीलता की सीमा को पार कर दिया। प्रत्येक पहाड़िया अपने साम्राज्य की अस्मिता के लिए संघर्ष रूपी मशालें  लेकर खड़ा हो गया और सभी ने एकजुट होकर तीर ध्वनि के साथ विजय गीत गाया। “विजयी मशालें जल उठी थीं। रणक्षेत्र बने नाले की रेत पर नाचने लगे थे पहाड़िया। पलटन काटेंगे हम। जैसे हमारे पुरखों ने बाघ काटा था। कम्पनी को काटेंगे हम।” 9 विद्रोह की आग जब जलती है तो दुश्मनों की सीनों को छलनी कर देती है। स्वत्रंता का अहसास उनके अंदर विजय का शंखनाद कर देता है। यह शंखनाद समस्त जन-जीवन को सकारात्मक से भर देता है। असत्य पर सत्य की जीत को प्रकट करता है। तीर और कमान आदिवासी की पहचान रहे हैं। आज यह कलम की शक्ति के रूप में उद्घाटित हो रही है। जैसे-जैसे जागृत और चेतना बढ़ रही है। ज्ञान की रोशनी से जंगलवासी परिचित हो रहे हैं। वैसे-वैसे उन्हें अपने स्तत्व बोध और अस्मिता का ज्ञान होता जा रहा है। जीवन के बुनियादी हकों के लिए वह संगठित हो रहे हैं। भारतीय इतिहास ने प्राचीनकाल से आज तक उनकी पहचान, उनकी अस्मिता को सामने नहीं लाया, अपितु उन्हें राक्षस, दास, दस्यु, किरात, चपटी नाकवाले, कलूटे, चोर, डकैत, जंगली, वनवासी, शराबी, आलसी, अंधविश्वासी आदि हीनत्व बोधक उपाधियाँ देकर उनका उपहास ही किया “अश्वेत लेखिका टोनी माँरिसन कहती है इतिहास जहां मौन होता है। वही साहित्य मुखर होता है। मैं जो कुछ लिखती हूँ। वह साहित्य भी है और इतिहास भी। हम ऐसे देश में रहते हैं। जहाँ अतीत मिटाया जाता है और भविष्य निर्दोष हुआ करता है। 10

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निष्कर्ष: देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले क्रांति के अग्रदूत तिलका मांझी की सशक्त संघर्ष गाथा है पहाड़िया उपन्यास। इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार बाबा तिलका मांझी की समर गाथा को संवेदनशील रचनाकार राकेश कुमार सिंह ने अत्यंत लगन से सरल प्रभावमयी  शैली में ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर नियुक्त किया है। इतिहासकारों में नया मौलिक अधिकार निर्मित करनी की इच्छा जगनी चाहिए। तभी भारत के महान क्रांतिकारियों को इतिहास में अपेक्षाकृत स्थान मिलेगा। महान लेखक राकेश कुमार सिंह ने शौर्य और वीरता की मूर्ति तिलका मांझी की स्मृति को ‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास के माध्यम एक मूर्त रूप प्रदान किया जिसे वह जन-जन तक पहुँच पाया । 

 

 

 

 

सन्दर्भ सूची

  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 94
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 95
  • https://hindi.thebetterindia.com/11842/tilka-manjhi-was-the-first-indian-freedom-fighter/
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 51
  • रविकुमार गोंड़, ‘आदिवासी अभिव्यक्ति’, दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2015 पृ 29
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 101
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 124
  • डॉ धीरेन्द्र सिंह, ‘प्रतिरोध की संस्कृति और आदिवासी कविता’, नई दिल्ली: अनंग प्रकाशन, 2017 पृ 74
  • राकेश कुमार सिंह, ‘हुल पहाड़िया’, नई दिल्ली: सामयिक बुक्स, 2014 पृ 130
  • विशाल शर्मा, ‘आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति’, नई दिल्ली: स्वराज प्रकाशन, 2014 पृ 74

 

 

विकास पराशर

शोधार्थी

स्थान: लवली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा (पंजाब)

पता: मकान संख्या 180 अशोक नगर,

बाज़ार वकीला, होशियारपुर, पंजाब

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संपर्क सूत्र: 7986100904

विकास पराशर, पी.एच.डी शोधार्थी

 
 

Vikasnk98prashar@gmail.com

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