पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

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पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प

डॉ. रवि रंजन
संप्रति प्रखण्ड विकास पदाधिकारी
टनकुप्पा, गया, बिहार
7543083888

सारांश

दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिकआर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपाझुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं।

बीज शब्द

आक्रोश, संवेदना, समाज, दलित, मुखर

आमुख

विषमता अन्याय की जननी है और अन्याय से वेदना पैदा होती है। तिरस्कार और अभाव की वेदना से संतप्त आदमी पीड़ा की ही अनुभूति करता है। गरीब और दलित दोनों विषमता के शिकार हैं, दोनों पीड़ित हैं। दलित की जाति ही उसके उत्पीड़न का उनके उपहास कारण रही है। मुकेश मानस ने ‘मनुवादी’ में उनकी पीड़ा कुछ यों व्यक्त की है- ‘‘उसने मेरा नाम नहीं पूछा/मेरा काम नहीं पूछा/पूछी एक बात/क्या है मेरी जात/मैंने कहा इंसान/उसके चेहरे पर उभर आई/एक कुटिल मुकन/उसने तेजी से किया अट्टहास/इस अट्टहास में था/मेरे उपहास का/एक लंबा इतिहास।’’[1]  जाति आधरित उत्पीड़न के लंबे इतिहास को एक अट्टहास में समेटती यह कविता ‘मानसिक अस्पृश्यता’ के वर्तमान सच की तरफ भी इशारा करती है। उत्पीड़न का इतिहास, स्मृति का हिस्सा बनकर किस कदर दलितों को कचोटता है इसे मोहनदास नैमिशराय की निम्न पंक्तियों में देखा जाना चाहिए- ‘‘रामराज्य चला गया/पर शंबूक की चीख अभी बाकी है/जैसे दलितों की पीठ पर चोट के निशान।’’ [2] आजीवन कठोर परिश्रम के बावजूद दलितों को वंचना, उपहास व निकृष्ट जिंदगी ही मिली। सब कुछ करने वाले ने बदले में दासत्व ही पाया। ओमप्रकाश बाल्मीकि ने लिखा-‘‘काटे जंगल/खोदे पहाड़/बोये खेत/पिफर भी रहे भूखे। बनाई नहरें/खोदे कुएँ/लगाए नल/फिर भी रहे प्यासे। लड़े युद्ध/जीते भूखंड/बदले राज!फिर भी रहे दास।’’[3]  पुरुषार्थ के तमाम प्रदर्शनों के बावजूद दलितों को बदतर जिंदगी ही बसर करनी पड़ी, यह पीड़ा इस कविता का मुख्य स्वर है। वर्ण व्यवस्था को शास्त्रा एवं ईश्वर सम्मत व्यवस्था बताकर इसके तहत सदियों से दलितों का शोषण होता रहा। तमाम अन्यायों को दलित भी पूर्वजन्म का फल व ईश्वरीय इच्छा मानकर सहते रहे। इस स्थिति पर व्यंग्य करते हुए पुरुषोत्तम प्रतीक लिखते हैं- ‘‘चार दिन की जिंदगी में दुख हजारों साल के/और यह भी देखिए एहसान है भगवान का।’’ [4]   अस्पृश्यता की यातना, उनकी पीड़ा भी दलित कविता में उपस्थित है। जो इस समाज व्यवस्था की पाश्विकता को बेनकाब करती है। मसलन-

‘‘चाहो तो मुझे भी मार डालो

वैसे ही जैसे मार डाला था एक प्यासे को

जिसने कोशिश की थी एक अंजुलि जल पीने की

उस तालाब का पानी जिसे पी सकते हैं कुत्ते, बिल्ली, गाय, भैंस

मगर नहीं पी सकता एक दलित।’’ [5]

यह अस्पृश्यता की इंतहा है कि अन्य जीव-जंतु तालाब के पानी से अपनी प्यास बुझा सकते हैं पर एक दलित को इसकी इजाजत नहीं। इसे पढ़ते हुए हीरा डोम की कविता अछूत की शिकायत बरबस ध्यान आ जाती है। बहरहाल अब हमारे संविधन के अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत प्रतिबंधित कर दिया गया है किंतु अब भी सामाजिक व्यवहार में मानसिक स्तर पर भेदभाव जारी है। जिसे खत्म होना चाहिए।

यातनाओं की प्रायः घटनाएँ गाँवों में घटती हैं। इसलिए जहाँ गाँव के प्रति अनेक कवियों में एक नास्टॉलजिक भाव दिखता है वहीं दलित कविता में गाँव के प्रति भरपूर गुस्सा बल्कि नफरत के भाव हैं। अपनी कविता ‘एक पूरी उम्र में’ मलखान सिंह लिखते हैं- ‘‘यकीन मानिए/इस आदमखोर गाँव में/मुझे डर लगता है बहुत डर लगता है/लगता है कि अभी बस अभी/ठकुरइसी मेड़ चीखेगी मैं अधशौच ही/खेत में उठ जाऊँगा/कि अभी बस अभी/हवेली घुड़केगी/मैं बेगार में पकड़ा जाऊँगा/कि अभी बस अभी/महाजन आयेगा मेरी गाड़ी से भैंस/उधरी में खोल ले जाएगा/कि अभी बस अभी बुलावा आएगा खुलकर खाँसने के/अपराध में प्रधन/मुश्क बाँध मारेगा लदवाएगा डकैती में/सीखचों के भीतर/उम्र भर सड़ाएगा। [6]

यहाँ गाँव एक ऐसे परिवेश के तौर पर चित्रित है जहाँ मनुष्य अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं से नहीं बल्कि दूसरे की जरूरतों और आदेशों से संचालित होने को विवश हैं, कमजोर होने के कारण सबका नरम चारा है। इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर अंबेडकर ने गाँव को ‘अछूतों को यातना देने के लिए बना हिंदुओं का उपनिवेश’ कहा है। आजादी के 65 वर्षों के बाद भी हमारे गाँवों में सामंतवाद की जड़ें बनी हुई हैं, सवर्णवादी वर्चस्व व दलितों का उत्पीड़न समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए दलित कवियों की निगाह में गाँव ‘हिंदुस्तान की गंदगी’ है। अनिल कुडिया नगरी ने लिखा है-

‘‘….कुएँ का पानी छू लिया उसने

तो पूरे गाँव ने मिलकर उसे मारा

….यहाँ मेहनत करने वाला हरामखोर

ऊँची जात वाला ज्ञानी महान विद्वान

गाँव झूठफरेबअत्याचार की दुकान

इसका आधर भेदइस संस्कृति में हजार छेद

बुराइयाँ बसती यहाँ सारे जहान की

गाँव गंदगी हिंदुस्तान की।’’ [7]

दलित अब गाँव में होते आ रहे अन्याय को खुलकर सामने ला रहे हैं, उसका विरोध कर रहे हैं और कविता को इस विरोध का माध्यम बना रहे हैं। गाँव, दलितों को यदि हिंदुस्तान की गंदगी लगती है तो शहर भी उनके लिए बहुत अनुकूल साबित नहीं हो रहे हैं। यहाँ भी उनकी हैसियत में कोई मूलभूत अंतर नहीं आया है। वस्तुतः गाँव हो या शहर वे मनुष्य-बिरादरी से बाहर पशुओं जैसा बल्कि कहीं-कहीं उनसे भी बदतर जीवन जीने को अभिशप्त रहे हैं। बात-बात पर घुड़की, गालियाँ। इस पीड़ा को मलखान सिंह स्वर देते हुए लिखते हैं- ‘‘मैं आदमी नहीं हूँ स्साब/जानवर हूँ/दोपाया जानवर/जिसे बातबात पर/मनुपुत्र माँ चोबहन चो/कमीन कोम कहता है।’’ [8] दलितों के उत्पीड़न के बने रहने के कई कारणों में उस समाज का आर्थिक पिछड़ापन, अशिक्षा और अंधविश्वास आदि तो हैं ही संपन्नों का अंधविश्वास और कुलीनों का अज्ञान भी अंततः उन्हीं को पीड़ित करता है। राजेंद्र बड़गुजर की कविता ‘सपने में गाय’ का मुख्य स्वर यही है। रेल से कटकर मरी गाय की मृत्यु की तहकीकात किए बगैर दलितों, मुस्लिमों की लाशें बिछा दी गईं। सार्वजनिक रिपोर्ट में रेल से कटकर गाय के मरने की बात सामने आई तो दलितों की हत्या पर अपफसोस जाहिर करने की बजाय भीड़ में से एक व्यक्ति ने कहा- ‘‘फिर क्या हुआ/दलित मर गए तो?/गाय के लिए मरना/तो स्वर्ग का सीधा प्रमाणपत्र है।’’ [9] क्या दलितों को ऐसे प्रमाणपत्र बाँटने वाले कभी स्वयं इसे पाने को तैयार होंगे?

समय के साथ दलित समाज में शिक्षा और जागृति आई है। उनका आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सशक्तीकरण भी हुआ है। इन परिस्थितियों में उनमें वर्ग-वैषम्य की समझदारी बढ़ी है। ओमप्रकाश बाल्मीकि ने लिखा है-

‘‘एक दिन भी पानी न मिले यदि तुम्हें

उठा लेते हो

जमीन आसमान सिर पर

…..एक मैं हूँ

जिसकी न जाने कितनी पीढ़ियाँ

रही प्यासी बिना पानी

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युगों युगों तक।’’ [10]

अब वह यह समझ चुके हैं कि जैविक समानता को दरकिनार कर कुछ लोगों ने वर्णव्यवस्था का षड्यंत्रा खड़ा किया है। इसलिए अब वे ऐसी मान्यताओं पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- ‘‘तेरी आँखे दुनिया देखें/मेरी आँखे घूरा नापे/…तेरी आँखे पुन्य जमीन/मेरी आँखे नीच कमीन/…तेरी आँखे पुन्य प्रसूत/मेरी आँखे बड़ी अछूत।’’[11]

दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिक-आर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपा-झुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं। चिरंजी कटारिया ने लिखा है-

‘‘आओ

तुम्हारे कानों में सीसा पिघलाकर डालूँ

और कहूँ वेद शास्त्रा पढ़ना मना है

तुम्हें एक बार

बैल की जोड़ी की जगह जोतकर

दिखाऊँ पसीने का स्वाभिमानी रंग

आओ तुम्हारे मजबूत कंधे पर मरे जानवर उठवाऊँ

तुम्हें कईकई दिनों तक

भूखा रखूँ

दाने दाने को तरसाऊँ

हो सकता है

तुम्हें शायद

पुरखों की गलती का एहसास हो जाए।’’ [12]

अतीत की यातनाओं की टीस यहाँ प्रतिशोधत्मक तेवर के रूप में व्यक्त हुई है। पहले दलित दब्बू थे। बोल नहीं पाते थे। अब स्थितियाँ बदली हैं तो पूर्वजों की यातनाओं की स्मृति उनके विरोध के स्वर को अधिक तीखा और पैना बना रही है। असंग घोष के यहाँ इस प्रतिशोध की तीव्रता देखी जा सकती है- ‘‘ठीक तेरे पाँवों के नीचे/जहाँ तू सदियों से/मुझे रौंदता आया/मेरा जन्म अपने पाँवों से बता/मैं अब समझ गया हूँ/तेरी करतूत/अब तू तैयार रह/मैं तुझे रौदूँगा/अपने पैरों तले।’’ [13]

ध्यातव्य है कि मनुस्मृति में दलितों पर अत्याचार व उनके दमन सरीखे अमानवीय कृत्यों का पुरजोर समर्थन है। अतः यह पुस्तक दलित आंदोलन के निशाने पर आरंभ से ही रही है। इस पुस्तक में दलितों के निमित्त कई क्रूर व्यवस्थाएँ वर्णित हैं-मसलन अगर शूद्र अन्य वर्णों को गाली दे तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए दूसरी तरफ यदि उसकी हत्या हो जाए तो हत्यारा उस सजा का ही भागी हो जो कौवा, मेढ़क या कुत्ते-बिल्ली की हत्या पर दिया जाता है। गैर बराबरी और अमानवीय कृत्यों को प्रश्रय देने वाली ऐसी कृति और इसके रचयिता के खिलापफ जयंत परमार ‘मनु कविता’ में लिखते हैं- ‘‘एक न एक दिन/घर के आगे/नीम की शाख पे नंगा करके/लटका दूँगा तुझको मनु।/तेरी रगों को चीरफाड़कर देखूँगा/तूने पिया है कितना लहू/मेरे बुजुर्गों का।’’ [14]  हिंदी कविता में विषमता और अन्याय पर इतना प्रबल प्रहार शायद ही पहले कभी हुआ हो। यह दलित जागृति का परिणाम भी है और प्रदेय भी।

प्रश्नाकुलता आधुनिक भाव बोध् का लक्षण है। प्रश्न प्रहार का माध्यम है। इस संदर्भ में प्रश्नाकुलता आज की दलित कविता की एक विशेषता कही जा सकती है। पौराणिक स्थापनाएँ और ईश्वर भी अब सवालों के घेरे से बाहर नहीं है। ब्रह्मा के विभिन्न अंगों से चारों वर्णों के उत्पन्न होने की पौराणिक मान्यता के संदर्भ में रामजी यादव ने सीधे ब्रह्मा जी से पूछा‘‘क्या आपका मुँह/और छाती, पेट तथा पैर योनि हैं/और यह भी कि जब/मुखयोनि से प्रसव कर रहे थे आप/तो तकलीपफ ज्यादा थी/बनिस्बत छातीयोनि से प्रसव के/क्या पैरयोनि से प्रसव करते समय/पेटयोनि से कम पीर उठी थी?’’ [15]  इसी तरह दलितों, अवर्णों पर हो रहे अत्याचारों, उनकी हत्याओं पर ईश्वर के उदासीन रवैये के कारण कवियों ने ईश्वर को भी दोषी माना है। जयप्रकाश कर्दम लिखते हैं-

‘‘ईश्वर! तेरे सत्य और शक्ति को/मैं अब जान गया हूँ/तेरे दलालों की कुटिलता/और कमीनेपन को भी/पहचान गया हूँ/शुक्र है तू कहीं नहीं है/केवल धर्म के ध्ंधे का/एक ट्रेड नेम है/और सचमुच तू कहीं होता/तो सदियों की/अपनी यातना का हिसाब/मैं तुझसे जरूर चुकाता।’’ [16]

दलित तपस्वी की हत्या पर ओम प्रकाश बाल्मीकि पूछते हैं-

‘‘क्यों नहीं आई बाढ़ गंगा में?

क्यों नहीं उठकर बैठ गया अधजला मुर्दा

काशी के मणिकर्णिका घाट पर?

क्यों नहीं उमड़ा चक्रवात

महासागर की विस्तृत लहरों पर?

जब पुष्प वर्षा की थी देवताओं ने

तपस्वी की हत्या पर।’’ [17]

वस्तुतः ये प्रश्न भर नहीं हैं, ये विषमताजनक और अन्यायपालक मिथकों पर प्रहार हैं। सदियों से दारूण यातना सहनेवाले वर्ग के द्वारा किए गए प्रहार।

मर्मांतक यातना दलित-जीवन के अतीत का सच है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अतीत और आज के दलित जीवन को पूरी तरह एक माना जाए? पहले उनके साथ किए जाने वाले भेदभाव पूर्ण व्यवहार आज कानूनन अपराध है। परिवर्तन और किया जाना अभी बाकी है लेकिन परिवर्तन हुए हैं यह भी सच है। दलित जागृति से भरे मानस को अतीत केंद्रित ही नहीं रहना चाहिए बल्कि वर्तमान का भी तर्कसंगत मूल्यांकन करना चाहिए ताकि विषमता के खिलापफ इस संघर्ष में उन्हें दलितों के वास्तविक सहचर भी मिल सकें और संषर्ष का आधार व्यापक बने।

यहाँ ध्यातव्य है कि दमन से मुक्ति की लड़ाई में कोई भी शामिल हो सकता है लेकिन मुख्य भूमिका दमितों की ही होगी। परिवर्तन का यही संकल्प वेद प्रकाश वेद के यहाँ इन शब्दों में व्यक्त हुआ है-

‘‘तुम्हारा भय वाजिब है

समझ सही है

सबसे पहले मेरी ही मुट्ठी कसेगी

क्योंकि मेरी हथेली में कुछ नहीं है।’’ [18]

कुछ इसी आशय की बात निर्मला पुतुल भी करती हैं जब वह लिखती हैं-

‘‘बटोर पृथ्वी की पूरी ऊर्जा/उठेगा धीरेधीरे जमीन से/जमीन पे गिरा आदमी।’’ [19]  समकालीन दलित कविताओं में विषमतामूलक परंपराओं के प्रति यदि नकार का भाव है तो साथ ही मुक्ति का स्वप्न, परिवर्तन का संकल्प भी यहाँ द्रष्टव्य है- ‘‘मेरे परदादा मर गए जूठन खाते/उतरे चिथड़े पहनते/खेत बोते जोतते इसे पूर्वजन्मों का फल मानतेमानते/और जमींदार/फूलता गया, फलता गया जमींदार का वंश/बढ़ता गया/आकाश वेल की तरह इनका खून चूसतेचूसते/धर्म का भय दिखाकर/नीच कर्मों का फल बताकर पर अब मैं पूर्वजन्म नहीं वर्तमान देखता हूँ।’’ [20]  वर्तमान को देखने की यह दृष्टि ही दलित चिंतन को अपेक्षित गति और विस्तार देगी। संघर्ष की जमीन व्यापक बनाएगी। ये पंक्तियाँ दलित स्वर में आ रहे आत्मविश्वास का परिचायक है।

समानता एक गतिशील संकल्पना है जिसके कई पहलू तथा आयाम हैं। आरक्षण, समता के सिद्धांत का अपवाद है एक जरूरी अपवाद। सदियों से जिस वर्ग को समाज, अर्थव्यवस्था व राजनीति में हाशिए पर रखा गया उन शोषित, उपेक्षित और पिछड़े तबके को आम जनता के समकक्ष लाने के लिए राज्य द्वारा अपनाई गई विभेदकारी नीति है-आरक्षण। लेकिन योग्यता, कार्यकुशलता, दक्षता आदि के संदर्भ में आरक्षण के औचित्य-अनौचित्य पर बहस होते रहे हैं। समतामूलक समाज के स्वप्न को साकार करने हेतु लाई गई इस विभेदकारी संकल्पना का आज एक राजनीतिक स्टंट बन जाना दुखद है। एकाध दलों के विरोध के बीच दिसंबर 2012 में संसद के शीतकालीन सत्र में, राज्यसभा पदोन्नति में अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव पारित हो चुका है। समूचे दलित चिंतन में और दलित साहित्य में आरक्षण की पुरजोर वकालत दिखती है। आरक्षण लागू होने के बावजूद संस्थाओं की सवर्ण मानसिकता के कारण और कुछ हद तक योग्यता, जागरूकता आदि के अभाव के कारण शीर्ष पदों पर अनुसूचित जातियों की पर्याप्त भागीदारी नहीं है। आरक्षण की वकालत करते हुए सत्ता व संस्थानों पर काबिज सवर्णवादी मानसिकता वालों को चुनौती देते हुए जयप्रकाश कर्दम लिखते हैं- ‘‘तुम्हें खटकता है/सरकारी नौकरियों में मेरा आरक्षण/मेडिकल या इंजीनियरिंग कालेजों में/मेरा एडमिशन आग लगती है तुम्हें/मेरी उपलब्ध्यिों से और/अनुचित लगता है तुम्हें मेरा प्रोमोशन/क्या कैपिटेशन पफीस/ यानि रिश्वत देकर एडमिशन लेना उचित है?/क्या मंदिरों की मोटी कमाई पर ब्राह्मणों का एकाधिकार उचित है?/…क्या यह सब आरक्षण नहीं है? फिर मेरे आरक्षण का विरोध क्यों?’’ [21]  तुलनात्मक ब्यौरा प्रस्तुत करती उपरोक्त पंक्तियाँ आरक्षण की बहस को एक खुली दिशा में ले जाने की माँग करती हैं। चंद्रभान की कविता कालू की प्रभात पफेरी, सीवर की सफाई करने वाले दलित पात्र कालू के बारे में है। इस कविता में ही चंद्रभान दलितों की विडंबना की ओर संकेत करते हुए कहते हैं- ‘‘धन्ना सेठ की कुतिया को आइसक्रीम/और मेहनतकश इंसान को मिले/सीवर में सौ फीसदी आरक्षण।’’ [22]

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हिंदी में दलित अस्मिता का उभार और भारत में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया कमोबेश साथ-साथ हुई है। कुछ दलित चिंतकों को इस भूमंडलीकरण में मुक्ति की आहटें सुनाई पड़ती हैं तो कुछ विद्वानों का ख्याल है कि विदेशी पूँजी, तकनीक और बाजारवाद का अतिरेक दलितों के लिए घातक होगा। गेल ऑम्‍बेट, नरेंद्र जाधव जैसे विद्वानों के मुताबिक अपने सार में विदेशी पूँजी ब्राह्मणवाद विरोधी है जो जातिगत जड़ता पर प्रहार कर दलितों को अंगे्रजी शिक्षा व कार्य कुशलता की तरफ ले जाएगी। वहीं एस.के. थोराट, के.एस. चलम राज्य के जनकल्याणकारी भूमिका के सीमित होने से चिंतित नजर आते हैं। निजी क्षेत्रा, दक्षता और कार्यकुशलता आधारित श्रम की अपेक्षा करते हैं जबकि स्वास्थ्य, बुनियादी शिक्षा व अवसंरचना जैसे क्षेत्राकों में निवेश से बचते हैं। ऐसे में अकुशल श्रमिक बने रहने की भारी कीमत दलितों को चुकानी पड़ सकती है क्योंकि नित्य नई तकनीकें श्रम बल की जरूरतें घटा रही है। समकालीन दलित कविता भूमंडलीकरण की इस प्रकृति को पहचान रही है। ‘समय की आदमखोर धुन’ में जयप्रकाश लीलवान लिखते हैं-  ‘‘पूंजीवादी पाश्विकता की पाठशाला में/पढ़कर आए ये भेड़िए/अब पूरे भमंडल पर/अपनी वीभत्स कामुकता का प्रदर्शन/करने निकल चले/तकनीक उनकी रखैल है/और विज्ञान के उपकरण/इस रखैल के/अलंकार श्रृंगार  बना दिए गए हैं।’’ [23]

अपने तमाम दावों के बावजूद भूमंडलीकरण अंततः विषमता का अर्थशास्त्रा साबित हो रहा है। विगत दो दशकों में अन्य देशों की तरह भारत में भी अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चैड़ी होती गई है। भारत में जाति का गहरा रिश्ता वर्ग से है। निम्न वर्ग में अधिकांशतः अनुसूचित जातियाँ ही हैं। अंबेडकर ने सही कहा था-‘‘समस्या संपत्ति के कारण नहीं बल्कि उसके असमान वितरण के कारण है।’’[24] भूमंडलीकरण अंततः अनुसूचित जातियों को, वंचितों को और विपन्न कर रहा है। दलित कविता में विषमता के इस अर्थशास्त्रा और उसके शोषक चरित्रा की पहचान की गई है। मुकेश मानस लिखते हैं-  ‘‘हत्यारा झोपड़ियों में नहीं/आलीशान इमारतों में रहता है/बी.एम.डब्ल्यू. से चलता है/इंटरनेट पर बातें करता है/और मोबाइल पर खिलखिलाता है।/हत्यारे के चेहरे पर/सलमान खान सी मासूमियत है।/बिग बी की पकी दाढ़ी सा अनुभव लिए/हत्यारा एक साथ बच्चों के स्कूलों/जागरण मंचों और नए हथियारों के जखीरों का/उद्घाटन करता है।’’ [25]

भूमंडलीकरण के बदले हुए परिवेश में दलितों ने अपने लिए कुछ सकारात्मक भी ढूंढ लिया है। आज पृथक अस्मिता की मांग करते हुए दलित समुदाय अपनी समानांतर संस्कृति भी निर्मित कर रहा है। आज इंटरनेट और सूचना क्रांति के माध्यम से दलित समुदाय ने विभिन्न देशों में बसे ‘दलित डायस्पोरा’ को ढूढ़ निकाला है। विदेशों में कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन कर अप्रवासी दलितों में एकता स्थापित की है। इस प्रकार तकनीक का सुनियोजित प्रयोग कर दलित आंदोलन भारतीय समाज के द्विजवादी मान्यताओं पर प्रहार के साथ ही प्रति-संस्कृति की स्थापना कर रहा है जो ग्राम्शी के ‘वैकल्पिक वर्चस्वता’ की अवधरणा के बेहद करीब है।

इस नवउदारवादी समय में ‘‘दलित समाज जहाँ एक ओर अपने अंदर एक मध्यवर्ग के उदय से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है वहीं उसे दलित आंदोलन के भीतर एक और आंदोलन की आहटें भी सुननी पड़ रही है। यह है दलित महिलाओं का आंदोलन जो समग्र महिला समुदाय के मुक्ति आंदोलन का हिस्सा होने के साथ-साथ दलित समाज में पितृसत्ता का प्रश्न उठाता है।’’[26] दलित स्त्रियों को तिहरे शोषण का सामना करना पड़ता है। जाति के आधार पर महिला होने के आधार पर और गरीब होने के आधार पर। लेकिन हिंदी दलित साहित्य में महिलाओं के इस तिहरे शोषण पर पर्याप्त लेखन नहीं हुआ है। कई कारण है। मसलन-उनमें निम्न साक्षरता दर, विचारशीलता का अभाव और पुरुष सत्ता का दबाव आदि। इस संदर्भ में आधुनिक विमर्शकार प्रो॰ सुधीश पचैरी का मानना है कि ‘‘दो अस्मितामूलक विमर्श साथ-साथ नहीं चल सकते। अस्मिताविमर्श एक्सक्लूसिव होता है।’’ [27] वर्तमान में यह बात कुछ हद तक सच लगती है लेकिन बहुत संभव है आगे चलकर इन दोनों विमर्शों का समाहार हो।

समकालीन दलित साहित्य में दलित महिलाओं ने दस्तक दे दी है। ‘‘दलित महिला लेखन में हमें दोनों तरह के चित्र मिलते हैं। पहले तो उसने अपने पिता, भाई या बहिन और अन्य साथी के अनुभव के साथ-साथ स्वयं के अनुभव से जो सीखा, दूसरा केवल अपने अनुभव से जो संत्रास पाया, कुंठा और आक्रोश मिला एक पत्नी के रूप में।’’ [28]  दलित समाज के ताने-बाने के बीच अपना वजूद तलाश रही स्त्री के लेखन में दोहरा आक्रोश व्यक्त हुआ है। एक ब्राह्मणवादी व्यवस्था और दूसरा परिवार के पितृसत्तात्मक चरित्र पर।

हिंदी में दलित साहित्य की रचना के साथ-साथ दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्रा की चिंता भी दिखाई देती है। दरअसल आलोचना एक स्तर पर विचारधारात्मक पसंद-नापसंद पर निर्भर होती है। इसलिए अगर दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रा बनाना है तो उसे पुराने सौंदर्यशास्त्रा में निहित विचारधारा से मुक्त रखना आवश्यक है। दलित रचनाशीलता में कटु सत्य कहने की अधिक चिंता रहती है और सुंदरता से अधिक जीवन में व्याप्त कुरूपता की अभिव्यक्ति का आग्रह मिलता है। इसलिए दलित साहित्य का जो सौंदर्यशास्त्रा होगा उसमें प्रिय और सुंदर की जगह कटु और विरूप को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। श्याम लाल शमी ने दलित सौंदर्यशास्त्रा शीर्षक कविता में लिखा है‘‘अपनी बानीकह रैदासा/अपनी साखी बोल कबीरा/….उनको निर्धारित/करने दे/भाषा शैली/मूर्धन्य ये लोग/चदरिया/जिनकी मैली।’’ [29]

समकालीन दलित रचनाशीलता पर नकारवादी होने, अतीत का प्रलाप करने और एक तरह से साहित्यिक वर्णवाद शुरू करने का आरोप लगता रहा है। यहाँ समझने की बात यह है कि अस्मिताओं की राजनीति में समाज को बदलने की बजाय अपनी दशा या दुर्दशा के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार मानने और उससे बदला लेने की प्रवृत्ति दिखायी पड़ती है। अपने प्रति हुए अन्यायों को याद करते हुए वे अतीत की ओर देखते हैं और उनकी याद दिलाकर ‘अन्यों’ से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने आप को बदलकर हमारी अस्मिता को स्वीकार कर लेगा। देश में ज्यों-ज्यों सामाजिक न्याय की जड़ें गहरी होंगी ये शिकायतें कम होती जाएगी। आत्मकथात्मक और अतीत रूदन से आगे बढ़कर दलित रचनाशीलता वर्तमान संदर्भों और चुनौतियों को स्वर देंगी ऐसी उम्मीद है।

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दलित साहित्य के संदर्भ में स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का विवाद काफी चर्चित रहा है। अनुभूति की प्रमाणिकता के तर्क पर दलित साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है। दलित साहित्य की रचना केवल दलितों को ही करनी चाहिए। भोगे हुए यथार्थ पर बल देते हुए वे किसी सहानुभूतिपूर्ण लेखन की जरूरत को दरकिनार करते हैं। दूसरी तरफ रचनाकारों, विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इसे एक किस्म का ‘साहित्यिक वर्णवाद’ मानता है। उनका मानना है कि चूँकि साहित्यकार के पास अतिरिक्त संवेदनात्मक अंतर्दृष्टि होती है। अतः ‘परकाया प्रवेश’ के आधार पर वह गैर-दलित होते हुए भी उनकी पीड़ा को उसी शिद्दत से महसूस और अभिव्यक्त कर सकते हैं जैसे कोई दलित रचनाकार। प्रेमचंद, निराला और नागार्जुन जैसे गैर दलित रचनाकार इसके प्रमाण हैं। दलित ही दलितों के लिए लिखें इससे असहमत होते हुए प्रो॰ निर्मला जैन कहती हैं- ‘‘सवर्ण सवर्णों के बारे में स्त्रियाँ स्त्रियों के बारे में बच्चे बच्चों के बारे में लिखने के अधिकारी होंगे तब पशु-पक्षी, जगत प्रकृति जैसे विषयों का क्या होगा?’’ [30] दलित होना भर ही लेखन की कसौटी नहीं हो सकती। लेकिन इस आधर पर लेखन को स्वीकृत करवाने की चल रही कोशिशों के विरोध में प्रो॰ निर्मला जैन का कहना है- ‘‘मेरे रिजर्वेशंस किसी आंदोलन के बारे में नहीं, आंदोलन के नाम पर लेखन को मान्यता दिलाने के कौशल या घुसपैठ के बारे में है।’’ [31]  इसलिए यह विचारणीय प्रश्न है समाज में वर्ण व्यवस्था का विरोध कर रहे दलितों के लिए दलित साहित्य-दलित ही लिखे क्या साहित्यिक वर्णवाद की शुरुआत नहीं है ?

दलित लेखन के लिए लेखक की जाति (दलित) को विषय बनाने के दो नुकसान हैं एक तो विषय क्षेत्रा सीमित (आत्मकथात्मक) हो जाता है दूसरे उनका परिप्रेक्ष्य भी सीमित हो जाता है। उनका सरोकार केवल हिंदू समाज तक सिमट कर रह जाता है। विडंबना यह है कि आज के दलित आंदोलन में व्यवस्था को बदलने की इच्छा कम और अपनी विशिष्ट पहचान के सहारे व्यवस्था में अपनी जगह बना लेने की आतुरता अधिक दिखायी पड़ती है। गौरतलब है कि ये लोग खुद को अंबेडकरवादी कहते हैं और जातियाँ बनाकर राजनीति करना चाहते हैं जबकि ‘‘अंबेडकर की सबसे बड़ी चिंता जाति व्यवस्था और उसे समाप्त करने की थी।’’ [32]

दलित साहित्य में स्वानुभूति के पक्षधरों को ज्ञात होगा कि स्वानुभूति समय सापेक्ष होती है और कालखंड उसका निमित्त। बतौर उदाहरण मोची का एक पढ़ा लिखा मेधावी लड़का गरीबी और अपनी बेरोजगारी के कारण चैराहे पर बैठकर जूतियाँ सीने का अपना पैतृक धंधा करता है। यह काम उसकी मजबूरी है प्रारब्ध नहीं। निरंतर प्रयासरत वह लड़का बैंक की प्रतियोगिता परीक्षा में सफल हो जाता है। जैसे ही वह क्लर्क की कुर्सी पर बैठता है उसकी नई स्वानुभूति उसकी दिनचर्या का अंग बन जाती है और पुरानी स्वानुभूति इतिहास। बैठकी पर बैठा कोई मोची अब इसके लिए सहानुभूत है स्वानुभूत नहीं। ‘‘समूचे दलित साहित्य जगत में एक भी लेखक नजर नहीं आता जो कबीर या रैदास की तरह अपनी स्वानुभूतियों को जीता साहित्य सृजन करता हो। गैर दलित होते हुए भी शैलेश मटियानी के पास अछूत धंधे करने, बदबू भरी जगहों पर रहने और ताजिंदगी पैसे-पैसे को मोहताज बने रहने की जो स्वानुभूतियाँ है, उनसे अधिकांश दलित साहित्यकार विपन्न है।’’ [33]

इस संदर्भ में देखें तो दलित साहित्य के लिए ‘स्वानुभूति’ पर अतिरिक्त बल दिया जाना गैर जरूरी सा लगता है। इसमें इतनी सी बात अवश्य जोड़नी है कि दलितों के संदर्भ में जो गैर दलितों का चिंतन है। वह इरादतन या अनजाने में दलित समस्या को वस्तुनिष्ठ नजरिए से देखने लगते हैं जिससे पूरे समुदाय का पदार्थीकरण होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। वही दलितों में अपनी समस्या को आत्मगत दृष्टिकोण से विश्लेषित करने की प्रवृत्ति पाई जाती है अतः वहाँ भावनाएँ प्रधान हो जाती है।

निष्कर्षतः दलित साहित्य का आंदोलन महज एक साहित्यिक आंदोलन नहीं वरन् एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा है जो भारतीय समाज को दलितों के नजरिए से देखने व व्याख्यित करने के आग्रह के साथ भारतीय समाज की पारंपरिक वर्णवादी मानसिकता में परिवर्तन का आकांक्षी है। भूमंण्डलीकरण के साथ अपने द्वंद्वात्मक रिश्ते में एक तरपफ यह उपभोक्तावाद और सर्वग्रासी संस्कृति के प्रति क्रिटिकल है वही तकनीक की मदद से ‘दलित डायस्पोरा’ ढूढ़ने और वैकल्पिक वर्चस्व की अवधारणा को साकार करने के लिए इस परिघटना का आभार भी मानती है।

संदर्भ

  • आधुनिकता के आईने में दलित – संपादक अभय कुमार दूबे
  • हंस- अगस्त 2004, सत्ता विमर्श और दलित अतिथि संपादक श्योराज सिंह बेचैन,
  • पाखी – मई 2010, संपादक प्रेम भारद्वाज,
  • समय की आदमखोर धुन – जयप्रकाश लीलवान
  • अपने घर की तलाश में – निर्मला पुतुल, संथाली से अनुवाद अशोक सिंह
  • समय की आदमखोर धुन – जयप्रकाश लीलवान, पृष्ठ 32-33
  • अंबेडकर वाघमय – खण्ड: 1,
  • [1] दलित निर्वाचित कविताएँ – संपादक मुकेश मानस

[1] पतंग और चरखड़ी – मुकेश मानस, पृष्ठ 19

[2] दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रा – ओम प्रकाश बाल्मीकि द्वारा उद्धत, पृष्ठ 82

[3] बस्स! बहुत हो चुका- ओम प्रकाश बाल्मीकि, पृष्ठ 53-54

[4] पेड़ नहीं तो साया होता – पुरूषोत्तम प्रतीक, पृष्ठ 32

[5] वसुध- जुलाई सितंबर 2003, संपादक ओम प्रकाश बाल्मीकि, पृष्ठ 133

[6] दलित निर्वाचित कविताएँ – संपादक कंवल भारती, पृष्ठ 35

[7] अपेक्षा: 12, जुलाई – सितंबर 2005, अंबेडकरवादी युवा कविता विशेषांक, पृष्ठ – 84

[8] वही, पृष्ठ 17

[9]  वही, पृष्ठ 70-71

 

[10] बस्स! बहुत हो चुका – ओम प्रकाश बाल्मीकि, पृष्ठ 56

[11] पतंग और चरखड़ी – मुकेश मानस, पृष्ठ 16

[12] अपेक्षा: 12, अंबेडकरवादी युवा कविता विशेषांक, जुलाई-सितंबर 2005, पृष्ठ 95

[13] दलित साहित्य वार्षिकी – 2004, संपादक जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ 181

[14] वसुध: 53, जनवरी से मार्च 2002, पृष्ठ 221

[15] अलाव: अंक 8, मार्च 2000, पृष्ठ 164

[16] गूंगा नहीं था मैं – जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ 36

[17] बस्स! बहुत हो चुका – ओम प्रकाश बाल्मीकि, पृष्ठ 41

 

[18] आज की कविता – विनय विश्वास, पृष्ठ 250

[19] अपने घर की तलाश में – निर्मला पुतुल, संथाली से अनुवाद अशोक सिंह, पृष्ठ 58

[20] उत्तर प्रदेश पत्रिका ;त्रौमासिकद्ध सितंबर से अक्टूबर, 2002, पृष्ठ 46

[21] गूंगा नहीं था मैं – जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ 17

[22] इरादे तभी करवट लेते हैं – चंद्रभान, पृष्ठ 59-61

[23] समय की आदमखोर धुन – जयप्रकाश लीलवान, पृष्ठ 32-33

[24] अंबेडकर वाघमय – खण्ड: 1, पृष्ठ 49

[25] दलित निर्वाचित कविताएँ – संपादक मुकेश मानस, पृष्ठ 185-186

[26] आधुनिकता के आईने में दलित – संपादक अभय कुमार दुबे, पृष्ठ 230

[27] हंस – अगस्त 2004, अतिथि संपादक, श्योराज सिंह बेचैन, पृष्ठ 207

[28] आधुनिकता के आईने में दलित – संपादक अभय कुमार दूबे, पृष्ठ 237

[29] हंस – अगस्त 2004, सत्ता विमर्श और दलित, अतिथि संपादक, श्योराज सिंह बेचैन, पृष्ठ 190

[30] हंस- अगस्त 2004, सत्ता विमर्श और दलित अतिथि संपादक श्योराज सिंह बेचैन, पृष्ठ 213

[31] वही, पृष्ठ 214

[32] वही, पृष्ठ 201

[33] पाखी – मई 2010, संपादक प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ 16-17

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