मार्गदर्शक बनें आलोचक नहीं

        हम सब का जीवन में कई बार आलोचकों से सामना जरूर हुआ होगा। बहुत से सोशल मीडिया पर भी पोस्ट डाले जाते हैं जिनकी तारीफ और आलोचना भी होती है। कुछ तारीफों के पुल भी ऐसे बांधे जाते हैं जो हाजमोला खाकर भी ना पचे और कुछ आलोचना ऐसे की जाती है जैसे उन्हें आज भोजन नहीं मिला तो भूख से बौखला गए हैं। मेरा मानना है कि जिस प्रकार चाय अगर अधिक मीठी हो तो अच्छी नहीं लगती उसी प्रकार अधिक चायपत्ती वाली चाय भी कड़वी लगती है। बहुत से लोगों को आलोचक बनने में बहुत मज़ा आता है। आलोचना करनी उनकी आदत हो जाती है।  वो किसी चीज को बस इसलिए देखते या पढ़ते हैं ताकि उसमें कमी निकाल सकें।वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बुराई में भी अच्छाई को ढूंढते हैं।

ऐसे लोगों में सकारात्मकता हमेशा बनी रहती है और सफल होने के लिए सकारात्मक सोच बहुत जरूरी है। जो आपको हारने पर भी टूटने नहीं देती । नई उम्मीद जगाकर पुन: जोड़ देती है।

    मेरा कहने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आलोचना नहीं होनी चाहिए। बिल्कुल कीजिए  लेकिन आलोचना जो किसी को मार्ग दिखाए। आलोचना का मतलब ये नहीं आप किसी का मनोबल ही तोड़ दें।  अब लोग ज्ञान बांटते हैं कि ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं। सही बात है लेकिन ठोकरें न! कोई भयंकर ऐक्सिडेंट नहीं कि पैर ही गंवाना पड़ जाए।
          आप एक उदाहरण ले लो । अगर किसी बच्चे ने पहली बार आम की तस्वीर बनाई हो और उसकी आम केले की तरह दिख रही है तो आप क्या करोगे? एक आलोचक उसके आम का मजाक बनाएगा या उसे डांटेगा कि तुम्हें एक आम बनाने नहीं आता। शायद इससे बच्चे का मनोबल टूट जाए और हो सकता है वो बच्चा  डर से (उत्साह से नहीं जैसे उसने पहले बनाने की कोशिश की होगी) आम बनाए या फिर ये भी हो सकता है कि वो दोबारा आम बनाने की कोशिश भी ना करे। उसका इंटरेस्ट ही पेंटिंग की तरफ से हट जाए क्योंकि आम बनाने पर तो उसकी इतनी आलोचना हुई केला ,अंगूर बनाएगा तो कितनी होगी? वहीं अगर आप एक मार्गदर्शक के रूप में उसे ये बोलो की बेटा आपका आम तो बढ़िया है लेकिन थोड़ा सा इसमें सुधार कर दो तो ये बहुत बढ़िया बन सकता है। मुझे यकीन है कि बच्चा जरूर कोशिश करेगा उसे सुधारने की।
            ऐसा सभी के साथ है सिर्फ बच्चों के साथ नहीं। जब आप कोई काम करते हो और उसकी आलोचना होने लगती है तो आपका मनोबल डाउन हो जाता है वहीं थोड़ी सी सराहना आपको अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है। इसलिए अगर हम आलोचक की जगह मार्गदर्शन बनें तो अपने लिए भी बेहतर होगा और दूसरों के लिए भी। आलोचक आलोचना करते करते केवल दूसरों में कमियां ढूंढते रह जाते हैं और नकारात्मक विचार के हो जाते हैं।हम आलोचक बन किसी को दुखी कर सकते हैं, किसी को डिमोटिवेट करते हैं लेकिन एक मार्गदर्शक बन उसे राह दिखा सकते हैं, उसमें उम्मीद और जोश पैदा करते हैं और अपने मन में भी सकारात्मक विचार आते हैं। इसलिए मैं मानती हूं कि हमें मार्गदर्शक बनना चाहिए आलोचक नहीं। मैं यह कहना चाहती हूं कि
        "हमें दूसरों में कमियां ढूंढ उनकी आलोचना करने के बजाए अपने अंदर की कमी  पहचान उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए"।

स्वाति सौरभ
शिक्षिका
भोजपुर, बिहार

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