लोक जीवन की पहचान दिखाती नव – वामपंथी कविता : राजेश जोशी की जुबानी: षैजू के

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लोक जीवन की पहचान दिखाती नव – वामपंथी कविता : राजेश जोशी की जुबानी

षैजू के
शोध छात्र
हिन्दी विभाग
कोच्चिन विश्वविद्यालय
कोच्चि
केरल 682 022
shyjukas@gmail.com
9656398746

सारांश

राजेश जोशी स्वभाव से बड़े शरीफ किस्म के आदमी है। लेकिन कविता के माध्यम से वह आज के बाजारीकरण के युग में ऐसी व्यंग्य बात कह देते हैं कि समाज की खोखली व्यवस्था का पर्दाफाश हो जाता है। आज का समय भूमंडलीकरण, उपयोगितावादी और विज्ञापन का युग है, जिसमें मानव जीवन के मूलभूत गुणों का हनन हो रहा है। चाहे वह आपसी सदभावना हो, प्रेम हो, अपनापन हो, रिश्ते - नाते हो, समाज या परिवार हो।

बीज शब्द

वामपंथ, राजेश जोशी, समाज, मनुष्य, जीवन

आमुख

         राजेश जोशी नव वामपंथी हिन्दी साहित्य के सबसे सशक्त और सफल साहित्यकारों में से एक है। कवि होना समय और समाज की मांग है। जिससे वह अपने बहुमुखी और बेजोड़ रचना शिल्प से समाज को एक नयी दिशा एवं नयी सोच देता है। राजेश जोशी भी इसी नयी दिशा और सोच के कवि हैं। नव वामपंथी हिन्दी साहित्य में उनका नाम अग्रगण्य है। गजानन माधव मुक्तिबोध, नागार्जुन और केदारनाथ सिंह की परम्परा का पालन करते हुए राजेश जोशी ने अपने लिए एक अलग तरह का साहित्य रचा है। जिसमें मुक्तिबोध की मनुष्य जीवन की पहचान और तलाश भी है। नागार्जुन के देहाती और राजनीतिक जीवन के दृश्य-परिदृश्य भी है तो केदारनाथ सिंह के कृषक जीवन का भी समर्थन है। सभी बड़े कवियों की प्रवृतियों का अपने साहित्य में समावेश करना ही साहित्यकार की बड़ी विशेषता होती है।

        राजेश जोशी स्वभाव से बड़े शरीफ किस्म के आदमी है। लेकिन कविता के माध्यम से वह आज के बाजारीकरण के युग में ऐसी व्यंग्य बात कह देते हैं कि समाज की खोखली व्यवस्था का पर्दाफाश हो जाता है। आज का समय भूमंडलीकरण, उपयोगितावादी और विज्ञापन का युग है, जिसमें मानव जीवन के मूलभूत गुणों का हनन हो रहा है। चाहे वह आपसी सदभावना हो, प्रेम हो, अपनापन हो, रिश्ते - नाते हो, समाज या परिवार हो।

 

           समकालीन समाज अथवा नव वामपंथी साहित्य में मध्यवर्गीय जीवन की आशा - अभिलाषाओं का चित्रण, आधुनिक बोध, अकेलापन और उदासी, समाज और समय से मोहभंग की स्थिति, राजनीति और विचारों का टकराव, आम आदमी और उसके आम परिवेश का यथार्थ वर्णन, समाज और परिवार के सम्बंधों में बिखराव, काम कुण्ठा से ग्रसित और ऊब, बेचैनी, निराशा, तनाव, जीवन के प्रति आसक्ति, ईश्वर से विमुखता, आस्था-अनास्था का द्वंद, मन की आंतरिक जिज्ञासाओं का उद्दीपन और भविष्य के लिए असमंजस की स्थिति के साथ साथ जीवन का यथार्थवादी और नग्न रूप आदि का चित्रण हुए हैं। यह तमाम समस्याएं और कारण समकालीन समाज और नव वामपंथी साहित्य में बराबर देखने को मिलते हैं। इन समस्याओं के उतपन्न होने का सबसे बड़ा कारण है हमारा सामाजिक ढांचा और राजनीतिक व्यवस्था। जिसमें पिसकर आम आदमी इन सभी भयानक समस्याओं के साथ जूझता रहता है। राजेश जोशी का कविता - कर्म और रचना - धर्म भी इसके ही साथ जुड़ा है। जोकि अपने समय और समाज के अत्यधिक निकट है।

           सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसी भी कवि, लेखक या साहित्यकार के साहित्य में आम जनता की पहचान करना अथवा लोक जीवन की पहचान कराना कहां तक समीचीन है? आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने भी उस कवि को ही बड़ा कवि माना है जिसके साहित्य में लोक तत्व या लोक चेतना हो, जीवन का बहुमुखी परिवेश वर्णित हो। लोक तत्व समाज के लगभग सभी पक्षों को आगे लाने का काम करता है। यही लोक तत्व या लोक जीवन की पहचान राजेश जोशी के काव्य में मिलती है। चाहे उनकी  बच्चे काम पर जा रहे हैं , कविता हो या मारे जाएगें  कविता हो। दोनों ही कविताओं में एक तरफा आनेवाले कल का भविष्य अपनी छोटी सी ही उम्र में कल- कारखानों में काम करने के लिए बाध्य है। क्योंकि उनके सपने छोटी उम्र में ही बिखर चुके हैं। दुनियादारी के मसलों का जिन्हें अभी तक कोई अंदाजा भी नहीं है ।वह भी रूढ़िवादी सोच और समाज में घुट - घुटकर जीने के लिए मजबूर है। लेकिन उनके सपनों को, इच्छाओं को और आशाओं - अभिलाषाओं को किसी हद तक साकार और सफल करना राजेश जोशी के काव्य का प्रतिपाद्य है। जैसे-

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"बच्चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?"1

 

           दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी कोई खैर नहीं है जो निरपराधी है। क्योंकि - जो अपराधी नहीं है, मारे जाएगें । आज का समय इतना यांत्रिक और खतरनाक हो गया है कि उसमें अपराध - निरपराध का कोई भी ना तो ठीक ठिकाने का कानून है ना ही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था अब निष्पक्ष और तटस्थ है। वह भ्रष्ट होने लगी है। इसीलिए राजेश जोशी कहते हैं कि -

 

"कठघरे में खड़े कर दिये जाएंगे

जो विरोध में बोलेंगे

जो सच सच बोलेंगे, मारे जाएंगे

सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी

होना

जो अपराधी नहीं होगें, मारे जाएगें!"2

 

           समाज को अपनी पूरी ताकत से छूना और उसकी अभिव्यक्ति आम जन - संवेदना के माध्यम से करना ही लोक तत्व को खोजने का सबसे अधिक सरल तरीका है । लोगों की इसी जन - संवेदना से लोक जीवन का स्वरूप कैसा है? उसका ढंग और ढांचा क्या है? इसके बारे में लोगों की संवेदनाएं और भावनाएं ही साहित्य के लिए कारगर साबित होती है। लोगों की इन्हीं संवेदनाओं और भावनाओं को नव वामपंथी काव्य में अच्छे तरीके से उभारा है।

            राजेश जोशी की कविताओं का जितना मजबूत पक्ष उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना है उतना ही मजबूत मानवीय और प्राकृतिक प्रेम भी है। लेकिन यह भी उतना ही रेखांकित करने योग्य है कि सामाजिक अंतर्विरोध और विडंबनाओं का घटाटोप ज्यों-त्यों गहराता गया है त्यों-त्यों दूसरा पक्ष छीजता गया है। यह अकारण नहीं है कि जहाँ उनके प्रारंभिक दो संग्रहों 'एक दिन बोलेंगे पेड़' और 'मिटमिट्टी का चेहरा' में प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति सम्मोहन का भाव काफी प्रमुखता से अभिव्यक्त हुआ है। पेड़-पौधे, पक्षी, पहाड़, नदियाँ, तालाब और पत्थर - इनके बहुत सारे बिंब अपने सौंदर्यात्मक स्वरूप में व्यक्त हुए हैं वही बाद के संग्रहों में इन बिंबों के आते ही कवि का मन आहत सा हो गया दिखता है। 'चाँद की वर्तनी' नामक संग्रह की किस्सा उस तालाब का शीर्षक कविता में प्राकृतिक सौंदर्य के नष्ट होने से आहत एक कवि मन की बेचैनी साफ देखी जा सकती है। प्लेटफार्म पर बैठकर अखबार में बने तालाब के सूखते चित्र को देखकर कवि तमाम ख्यालों के अंत में अपने बेचैन मन की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह करता है।

 

मैं दहशत से भरा एक सूखे तालाब में चल रहा था

मेरे जूतों के नीचे चिंदी-चिंदी होता

कराह रहा था अखबार

मेरे अंदर कोई पूछ रहा था लगातार

कब, कब वह पानी देखूँगा

जिसे पानी कहने की तसल्ली हो

और जल कहने से मन भीग जाए।3

          राजेश जोशी का रचना - संसार अपनी प्रौढ़ता में समाज के स्वरूप को उद्घाटित करने का सशक्त ढांचा खड़ा करता है। उनकी लिखी कविताएं या काव्य - संग्रह आज के दौर को अपनी पूरी जानकारी और ताकत से खोजता - खंगालता है। 'समरगाथा', 'एक दिन बोलेंगे पेड', 'मिट्टी का चेहरा', 'नेपथ्य में हंसी', 'दो पंक्तियों के बीच' और 'चांद की वर्तनी' इनकी कविताएं और काव्य - संग्रह हैं। राजेश जोशी का तमाम साहित्य अपने समय और समाज को अभिव्यक्ति देने वाला साहित्य है। उसमें समाज, राजनीति, संस्कृति और लोक - चेतना के साथ साथ आज के यथार्थ ढांचे को बड़ी तरकीब से उजागर किया गया है।

          नव वामपंथी कवि राजेश जोशी लोक जीवन के अत्यंत निकट है। अपने आस पास होने वाली घटनाओं पर पैनी नज़र गडाये रखना इनकी बड़ी विशेषता है। चाहे वह कृषक - वर्ग हो, मजदूर - वर्ग हो, राजनीतिक दलों की दलाली हो, लोक संस्कृति हो, सामाजिक स्थिति एवं परिस्थिति हो, बाल शोषण हो या समय और समाज की किसी भी प्रकार की समसामयिक घटना या समस्या हो ; उस पर राजेश जोशी ने बहुत ही सूझबूझ के साथ कलम चलाई है। सभी विकासात्मक विषयों को अपने साहित्य का माध्यम ही नहीं बल्कि मूल रूप व अंग बनाया है। ताकि लोक जीवन की लोक - संस्कृति और लोक संस्कार को अक्षुण्ण रखा जा सके ।काव्य को लोक संस्कार और लोक संस्कति के हाशिये पर ढूंढना राजेश जोशी के काव्य की सबसे बड़ी प्रवृत्ति है। यही पैमाना इनके पूर्ववर्ती कवि - लेखकों ने इन्हें दिया है, जिसका पालन वह अब भी साहित्य के साथ कर रहे हैं। साहित्य को उसकी जड़ में जाकर ढूंढना और वहीं से अपने कविता - कर्म का रास्ता निकालना, जिसमें लोक परिवेश अपने जीवंत रूप में उजागर हो, साहित्य को लोक जीवन के आधार पर परखने के लिए सबसे बड़ी भूमिका निभाता है

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            नव वामपंथी काव्य में परम्पराओं और संस्कृति का रूढ़िवादी रूप नहीं मिलता है, बल्कि उसे एक सीमा के अंदर रखा गया है । ताकि वह समाज को भी अभिव्यक्ति दे सके और पूर्वाग्रहों से भी ग्रसित न रहे। क्योंकि जब कोई भी समाज परम्पराओं, रूढियों व मर्यादाओं से अत्यधिक जकड जाता है, तो उसकी प्रतिक्रियास्वरूप स्वच्छंदता व उच्छंखलता का उन्मीलित होना स्वाभाविक है।

            नव वामपंथी काव्य में परम्पराओं और मर्यादाओं का साफ़ सुथरा रूप ही देखने को मिलता है। कहीं भी साहित्यिक तत्वों और संस्कृति व संस्कार का अतिरिक्त और अतिशय वर्णन नहीं है। क्योंकि किसी भी रचना का उसकी अपनी सीमाओं और दायरे के अन्दर रहना ही उसे कालजयी साबित करता है। उसी नाते कवि राजेश जोशी कालजयी हुए भी  है।हमेशा हमेशा केलिए लोगों के दिल और दिमाग में अपनी जगह बना ली है। राजेश जोशी कविता में अपनी मान्यता या विचार को थोपते नहीं है बल्कि उसे सबसे पहले अपने आप जीते हैं। फिर कहीं उसे समाज के कठघरे में खड़ा करते हैं। तब जाकर कहीं कविता अपने समय और समाज का दर्पण बनती है। समाज के यथार्थ को तब कहीं जाकर वह लोक- संवेदना के साथ व्यक्त करने में सक्षम होता है। यही लोक - चेतना और लोक - संग्रह - मत राजेश जोशी के रचना - कर्म का मुख्य ध्येय है।

        राजेश जोशी ने अपने समय और समाज से टकराते हुए हर संवेदनशील मुद्दे को बेहद मजबूती के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी रचनात्मकता के केंद्र में सांप्रदायिक विद्वेष के भीतर परास्त हो रही मानवता का चेहरा सामने आता दिखेगा। आधुनिकता के अर्थ केंद्रित विकास ने पूरे वैश्विक संरचना की इस कदर असंतुलित किया है कि हर तरफ मारकाट और त्राहि-त्राहि ही मची हुई दिखती है। सांप्रदायिक शक्तियों का उन्माद अपने चरम पर है। पूरे विश्व को सीरिया में तब्दील कर देने की जुगत चल रही है। तब कुछ अच्छे लोग असहाय से नजर आते दिखते हैं। सांप्रदायिक दंगे आदमी को किस हद तक बौखलाहट में डाल देता हैं, सांप्रदायिकता के नाम पर दर्ज हुई एक छोटी घटना किस कदर अखिल भारतीय रूप ले लेती है, वह कितना जल्दी फैल जाती है और इनसान के बीच कौमी दीवार खड़ी कर देती हैं यह सारी स्थिति कवि को ठीक से पता है। कविता के भीतर इन्हें देखना हो तो 'मैं और सलीम और उनसठ का साल', 'मेरठ 87', 'जब तक मैं एक अपील लिखता हूँ' और 'बर्बर सिर्फ बर्बर थे' जैसी कविताएँ देखी जा सकती हैं। इसी तरह राजेश जोशी जब अपने समय की विडंबनाओं की ओर इशारा करते हैं तो 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' जैसी कविता बनती है। किसी भी स्वस्थ समाज की इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि उस समाज का भविष्य बाल मजदूरी करने को विवश हो जिस उम्र में एक बच्चे को अपने भविष्य के सपने बुनने चाहिए उस उम्र में वह परिवार का बोझ ढोने को विवश है। यह एक ऐसा चित्र हैं जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को गहरे तक मथ देता है। इसी तरह के हजारों चित्रों और जन तंत्र से जन की भागीदारी को हाशियें पर जाते देखकर कवि लिखता है –

सड़क बनवाने का श्रेय लेती हैं जब कोई सरकार

मेरे हलक में अटक जाता है कौर

मेरे मुँह से निकलती है गाली-कामचोर।4

 

         इस परिवर्तित हो रहे समय में मानवीय मूल्यों का क्षरण भी उतनी ही तेजी से हो रहा है। राजेश जोशी ने ही इंदिरा गांधी के एक वक्तव्य को कोट किया है जिसमें वे कहती हैं कि नेहरू राजनीतिक चिंतक थे और मैं मात्र राजनीतिज्ञ हूँ। मैं अपनी तरफ से जोड़कर कहूँ तो आज सिर्फ जुमलेबाज बचे हैं? चिंतक और राजनीतिज्ञ गायब हो गए हैं। तो ये जो समय का सच है उससे एक सर्जक की मुक्ति कठिन है। आज कोई बात वैसे नहीं कही जा सकती जैसे पचास-साठ साल पहले कही जा सकती थी क्योंकि पचास साल पहले जो डोमाजी उस्ताद अँधेरे में चल रहे किसी जुलूस का हिस्सा था वह आज दिन में सड़कों पर तांडव मचा रहा है। इस घोषणा के साथ कि जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे और दशा तो देखिए हमारा सत्ताधीश भी उसके सम्मान की पूरी रक्षा कर रहा है। ऐसे समय में लड़ाई सीधे-सीधे लड़कर नहीं जीती जा सकती उसके लिए राजेश जोशी जैसा रचनाकार कई नए हथियार और नुस्खे ईजाद करता है प्रतिरोध के लिए, और कहता है - 'हँसो कि विरोध करने की ताकत कम हो रही है, हमारे समाज में'। वह हँसते हुए अँधेरे की गीत गाता है और दुनिया के सभी अच्छे लोगों को एक साथ आगे आने की बात करता है। यह सब कुछ इतने सामान्य ढंग से होता है कि इसकी विशिष्टता का पता तब तक नहीं चलता जब तक उसके भीतर की हलचल को न थहाया जाए। लेकिन ज्यों ही आप उसी गहराई में जाते हैं उसके ताप का अहसास होता है वह अहसास इतना तीव्र और तीखा होता है कि वहाँ जाने के बाद मनुष्य एक गहरे असंतोष और बेचैनी से भर उठता है।यह असंतोष और बेचैनी समाज में बढ़ रही नकारात्मक भंगिमाओं से मुक्ति का आख्यान रचने के क्रम में व्यक्त यथार्थ बोध से टकराने के कारण होती है। राजेश जोशी समाज के संपूर्ण अंतरविरोधों को अपने भीतर इस तरह पचा जाते हैं कि ऊपर से देखने पर उनकी अभिव्यक्ति का आख्यान पाठक को आकर्षित करता है उस आकर्षण में वह सहज ही राजेश के मनोजगत का सहचर बन जाता है। जब वह राजेश जोशी का सहचर होता है तब उसे उनके भीतर का असंतोष और गुस्सा समझ आता है। बाहर से शांतचित दिखने वाले राजेश जोशी का कविमन कितना बेचैन है इसका अंदाज 'बच्चे काम पर जा रहे हैं', 'मेरठ 87', 'इत्यादि', 'जब तक मैं एक अपील लिखता हूँ', 'दादा खैरियत', 'यह धर्म के विरूद्ध है', 'नसरगट्टे', 'मेरा नया फोन नंबर' जैसी तमाम कविताओं में देखा जा सकता है।

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        राजेश जोशी में अभी भी साहित्य सृजन की अपार संभावनाएं है ।अनेक विविध पक्ष और नवीन आयाम है जिनमें वह अभी भी उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं, और नव वामपंथी साहित्य को एक नयी ऊर्जा और ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं। इसी बात को केन्द्र में रखकर समकालीन साहित्य के आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी राजेश जोशी के बारे में कहा है कि  - “ राजेश जोशी कविता विधा पर ही अधिक लिखते हैं लेकिन अगर वह आलोचना या अन्य विधा पर भी अपनी काबिलियत आजमाना चाहते हैं तो उनका वह साहित्य भी उनकी कविताओं की तरह ही सार्थक होगा। क्योंकि राजेश जोशी जो भी लिखेंगे वह साहित्यिक ही होगा। ”5

निष्कर्ष

       राजेश जोशी आज की पीढ़ी के लेखकों और कवियों के लिए इस बात से प्रेरणा का स्त्रोत है, कि राजनीति और समाज के भूमंडलीकरण, बाजारीकरण, उपयोगितावादी और प्रतिस्पर्धा के दौर में किस तरह से कविता में साहित्यिक तत्व, मानवीय गुण, आधुनिक भाव - बोध, संस्कार, परम्परा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एवं परिवेश आदि को जीवित रखा जा सकता है। साहित्य समाज सापेक्ष होता है, समाज और समय से विमुखता होना साहित्य का लक्ष्य और लक्षण दोनों नहीं है। वस्तुत - आज के परिप्रेक्ष्य के विविध पक्षों और आयामों के संदर्भ में राजेश जोशी जी का नव वामपंथी साहित्य समाज को नयी दिशा और सोच देने वाला साहित्य है।आज के युग की तमाम चुनौतियों और परिस्थितियों के बावजूद भी समाज और लोक - चेतना को प्रासंगिकता और प्राथमिकता देना राजेश जोशी के नव वामपंथी साहित्य की मुख्य कसौटी है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. राजेश जोशी – नेपथ्य में हंसी – राजकमल प्रकाशन -नई दिल्ली -1994-पृ 89
  2. राजेश जोशी – नेपथ्य में हंसी – राजकमल प्रकाशन -नई दिल्ली -1994-पृ 93
  3. राजेश जोशी – चाँद की वर्तिनी - राजकमल प्रकाशन -नई दिल्ली-2006- 56
  4. राजेश जोशी – नेपथ्य में हंसी – राजकमल प्रकाशन -नई दिल्ली -1994-पृ – 102
  5. आचार्य रामचंद्र शुक्ल - हिन्दी साहित्य का इतिहास – नागरी प्रचारिणी सभा प्रकाशन – काशी -1929 – पृ 146

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