वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका-सारिका ठाकुर

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वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका

सारिका ठाकुर शोधार्थी,
विनोबा भावे विश्वविद्यालय
हजारीबाग,झारखंड
Sarikathakur406@gmail.com
मो.नं.-9403758576
स्थायी पता - आदर्श नगर, हीरापुर,
धनबाद, झारखण्ड 826001

शोध सार

वर्तमान समय में फैली वैश्विक महामारी(कोरोना) ने केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित किया हैइसके प्रभाव का ही परिणाम है कि आज देशविदेश की आर्थिकसामाजिकराजनीतिकधार्मिकपारिवारिक शैक्षिक स्थिति चरमरा गई है| दो कदम आगे बढ़ने की बजाय दो सौ कदम पीछे जा चुके हैं हम| ऐसे में जब हर वर्ग, हर समुदाय अपने स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे में साहित्य भी  प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है।

बीज शब्द: कोरोना, महामारी, भविष्य, साहित्य

शोध विस्तार:

         “शक्ति के विद्युत्तकण  जो व्यस्त

           विकल बिखरे  हैं, हो निरूपाय,

           समन्वय उसका करें समस्त

           विजयिनी मानवता हो जाए “

                           (कामायनी – जयशंकर प्रसाद)

इस प्रकार सदैव ही मानवता के,  मानक समूह के विजय व विकास हेतु साहित्य ने अग्रिम भूमिका निभाई हैं| मानव की संवेदना को बचाए रखने का कार्य साहित्य ही  करती आई है| वह साहित्यकार ही है जो दूसरों के दु:ख से दु:खी और दूसरों की प्रसन्नता से पुलकित हो उठता है| यथा; “इन दिनों हिंदी साहित्य में ‘हा हा हा हा’ की आवाजें खूब सुनाई देती है,  जैसे कोई हंसने की कोशिश कर रहा हो और पूरी तरह हंस ना पाकर आधे मन से हंस रहा हो”

              सुधीर पचौरी, हिंदुस्तान दैनिक अखबार| आम व्यक्ति की पीड़ा और विषमता को अपना मान उसकी वेदनामय अभिव्यक्ति करता है, समाज में व्याप्त विद्रूपताओं, अंधविश्वासो व विषमताओं पर प्रहार करता है, समाज में नूतन परिवर्तन हेतु अपना समस्त जीवन होम कर देता है और मैं शैली को अपनाता हैं| जो काम तोप और तलवार नहीं कर सकती वह साहित्य द्वारा संभव है और इसके लिए एक साहित्यकार कलम  को अपना हथियार बनाते हैं| समाजोचित दिशा एवं दशा हेतु सदैव प्रयासरत रहते हैं| साहित्य मानव,  समाज और संस्कृति को न केवल जिलाये रखती है अपितु उसका संरक्षण एवं संवर्धन भी करती है और गढ़ती  है एक नई संस्कृति जो मानवकल्याण के लिए हो|

                          वर्तमान समय में फैली वैश्विक महामारी(कोरोना) ने न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित किया है,  इसके प्रभाव का ही परिणाम है कि आज देश-विदेश की आर्थिक,  सामाजिक,  राजनीतिक,  धार्मिक,  पारिवारिक व शैक्षिक स्थिति चरमरा गई है| दो कदम आगे बढ़ने की बजाय दो सौ कदम पीछे जा चुके हैं हम| ऐसे में जब हर वर्ग, हर समुदाय अपने स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे में साहित्य भी  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है उदाहरणस्वरूप:-

                 फंसी हुई दुनिया कैसे

                 अपने ही पांसो में

                 एक वायरस टहल रहा

                आदम की सांसों में

                अवरोध लग गए

                पांव में आवाजाही के

               कितने खौफनाक मंजर है यह तबाही के

                                     ( अज्ञात कवि )

हिंदी साहित्य के कई साहित्यकार प्रकृति के अनुरागी रहे हैं, जिसका प्रमाण हम हिन्दी साहित्य विशेषकर छायावाद में देख सकते हैं, कि प्रकृति उनके लिए सर्वस्व है|  हमारी परंपरा में भी प्रकृति पूजनीय  रही है, किंतु उसका दोहन व दुरुपयोग भी आज इस महामारी के प्रमुख कारणों में संभवत सम्मिलित है| ऐसे में एक साहित्यकार अपनी रचना के किसी भी विधा द्वारा प्रकृति के साथ किए अन्याय के लिए न केवल चेताते हैं, अपितु मनुष्य को प्रकृति के प्रति प्रेम और अनुराग का भाव जगाकर  नतमस्तक होने को भी अभिप्रेरित करते हैं| आज रचनाकार को पुनः मानव और प्रकृति के अटूट संबंध को नवीन रूप में व्यख्यायित करने की आवश्यकता है|

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      यह सत्य है कि हम आज बहुत आगे बढ़ चुके हैं|  हमारा रहन-सहन, बात-व्यवहार व जीवन शैली आदि  सब कुछ आधुनिकता के रंग में रंग चुकी है और बाह्य वातावरण इंद्रधनुष के रंग की भांति सतरंगी हो चुका  है| किंतु हमारा मानवतावादी दृष्टिकोण बहुत पीछे छूट चुका है, जो अंतःकरण के अंधेरे में उसे टटोल रहा है| आम जन की पीड़ा, त्रासदी से पूर्व हम अपनी  आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के पीछे अविराम दौड़ लगा रहे हैं| ऐसे में आमजन, मजदूर वर्ग, कृषक वर्ग के प्रति हमारा व्यवहार व हमारा विचार बिल्कुल संकुचित सा है| उनकी वेदना,  उनकी करुणा,  उनकी टीस, उनकी बेबसी,  उनकी लाचारी, उनके जीवन की भयावहता को प्रकट करने में साहित्य विशेष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकता है| सबके हृदय में प्रेम का, सहयोग का,  अपनत्व का,  मानवता का आलोक साहित्य ही जगा सकता है| एक रचनाकार मात्र रचनाकार नहीं अपितु दूरद्रष्टा भी होता है| इसका प्रमाण हम मुक्तिबोध के रूप में देख सकते हैं,  जो अंधेरे में लंबी कविता के माध्यम से प्रकट होती है| लगभग 50 वर्ष पूर्व की दूरदर्शिता सत्य में परिवर्तित होती नजर आती है, ऐसे में दूरदर्शितापूर्ण  दृष्टिकोण द्वारा वह आगामी समय की ओर जनसमुदाय को जागरुक कर साहित्य में योगदान दे सकते हैं|

              अपनी साहित्यिक कृतियों के माध्यम से महामारी की भयावहता का चित्रण, समाज की परिस्थितियों का रेखांकन,  के साथ व्याप्त विसंगतियों गड़बड़ियों और सामाजिक संघर्षों का चित्रण कर समाज की विद्रुपताओं को समाप्त भी कर सकते हैं साथ ही पर्दे की आड़ में चल रही षडयंत्रों का पर्दाफाश करते हुए जन को जागरूक करने का प्रयास भी कर सकते  है| यही रचनाएं साहस,  उत्साह और स्फूर्ति  का स्रोत बन इस महामारी से लड़ने की आत्मबल प्रदान कर सकती है|

          आज बहुत ही रचनाएं देखने को मिल रही है विशेषकर, सोशल मीडिया में अधिकांश कविताएं लिखी  लिखी जा रही है जो कि कृषकों की दशा,  मजदूरों की स्थिति, सामान्य जन की आर्थिक व पारिवारिक संघर्ष,  वैश्विक संबंधों व आगामी भविष्य से संबंधित है;

इस प्रकार एक रचनाकार कवि, लेखक, नाटककार व उपन्यासकार समय-समय पर लेखन कार्य करते हैं| इनमें से कुछ रचनाएं तत्काल हमारे समक्ष आ जाती है और कुछ बाद में,  क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया या विचार को कृति में लिखना संभव नहीं,  उसके लिए विचारों को संजोना  पड़ता है, उन्हें तर्क के आधार पर पुष्ट  करना पड़ता है,  पात्रों व भूमिकाओं का निर्धारण करना पड़ता है, कथानक की निर्मिति करनी पड़ती है और एक विधा के रूप में अभिव्यक्ति देनी पड़ती है और यह कार्य आज साहित्य के क्षेत्र में चल रही है और इसके लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है| इस प्रकार नवीन परिस्थितियां, नवीन समस्याएं समाज के साथ साहित्य में भी परिवर्तन की ओर बढ़ता है और एक सशक्त रचनाकार का दायित्व है कि वह इस परिवर्तन के लिए समाज को, व्यक्ति को तैयार करें|

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                 आज “सोशल डिस्टेंस”  की बात जोरों से चल रही  हैं और उसका पालन किया जा रहा हैं या प्रशासन द्वारा करवाया जा रहा है,  जो अत्यंत ही आवश्यक है इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए| जिस प्रतिस्पर्धा के दौर में हम जी रहे हैं, जहां ज्ञान नहीं अपितु सूचनाओं का जंजाल फैला है| उसने बहुत पहले संबंधों को प्रभावित कर दिया है| जिसे हम मोहन राकेश के आधे अधूरे या उपेंद्र नाथ अश्क रचित अंजों  दीदी आदि तमाम कृतियों के माध्यम से देख व समझ सकते हैं| संबंधों का विच्छेद, पारिवारिक बिखरन,  संयुक्त परिवार का टूटन आदि ने भारतीय समाज और संस्कृति को एक अरसे से प्रभावित किया है जिसकी मार हम अब भी झेल रहे हैं,  जो एक गंभीर समस्या बन चुकी है परिवार से, पास पड़ोस से, मित्र-सहयोगी से,  कार्यस्थल के कर्मियों से,  अपने गांव से, अपने देश से वह आत्मीयता  समाप्त हो चुकी है| ऐसे में साहित्य इन दु:ख-दर्दों को पहले से कृतिमय अभिव्यक्ति द्वारा आगामी भविष्य की ओर संकेत करता आया है| ऐसे में संक्रमण के भय  ने और भी अग्रिम भूमिका निभाई है| लोगों का  मेल-मिलाप,  सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियां बंद हो चुकी है| सबकुछ ठहर सा गया है और यह ठहरना क्षणिक नहीं अपितु लंबे समय का है,  ऐसे में आवश्यक है कि साहित्य द्वारा संवेदना के तार को पुनः झकझोरी जाए और संवेदनात्मक दूरी को पाटने का कार्य किया जाए| यह उदाहरण प्रस्तुत किया जाए कि नियमों का पालन करते हुए,  सावधानियों को बरतते हुए भी अपनत्व और सहयोगात्मक दृष्टिकोण को अपनाकर हम एक हो इस संघर्ष में,  इस युद्ध में विजय का पताका लहरा सकते हैं| यही वह वक्त है जो हमारे लिए  जब हम वैश्विक रूप से एक दूसरे का सहयोग कर,  एक दूसरे से साझा कर पृथ्वी को कोरोना के मार  से मुक्त कर सकते हैं और अगर ऐसा करने में हम  असफल रहे तो, अंततः सब समाप्त हो जाएगा| बचेगी तो केवल हाड़,  संवेदनाओं की भांति मांस और प्राण भी समाप्त हो जाएंगे| इसलिए उसे पुनः जगाने की आवश्यकता है|

                साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत साहित्यकारों व साहित्य प्रेमियों का एक दायित्व यह भी रहा है कि वह साहित्य के अध्येताओं ,  साहित्य के पुरोधाओं  को साहित्य क्षेत्रों हेतु तैयार करें,  उन्हें निपुण बनाएं, उनका मार्गदर्शन करें उन्हें साहित्य की विभिन्न विधाओं,  विभिन्न रचनाओं तथा  विभिन्न रचनाकारों के  विभिन्न दृष्टिकोणों,  विभिन्न वादों को जानने समझने,  उनका विवेचन -विश्लेषण करने व अनुसंधान हेतु सहयोग करें| विभिन्न संस्थाओं द्वारा इसके लिए समय-समय पर कार्यक्रम जैसे कवि सम्मेलन,  गोष्ठी और सेमिनार का आयोजन करती आई हैं| व्यवस्थित रूप से  संस्थाओं में विधिवत सेमिनार ओर कार्यशाला न संचालित होने पर वेबीनार, ऑनलाइन कार्यशाला आदि एक विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाना सराहनीय कार्य है| तमाम साहित्यिक व सामाजिक विषयों पर प्रसिद्ध साहित्यकारों का वेबीआर द्वारा विद्यार्थियों से जुड़ना,  एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मूल्यों  के हस्तांतरण  द्वारा भी साहित्यकार  साहित्य की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, ताकि साहित्यकर्म  बाधित ना हो| इसे और भी व्यापक फलक पर देखने और नित्य नूतन रूप से देकर साहित्यकर्म  को फलीभूत किये  जाने की आवश्यकता हैं| साथ ही यह भी प्रयास करने की आवश्यकता हैं की  हिंदी का स्वरूप इससे पहले जो था वह स्वरूप आने वाले समय में भी बना रहे, क्योंकि खतरा यह भी बनता है कि तकनीकी संदर्भों को व्यक्ति जैसे ही जोड़ता है किसी विषय के साथ तो,  कहीं ना कहीं तकनीकी अपनी भाषा विकसित करती चली जाती है,  तो उस विषय विशेष में, जैसे:- हम हिंदी साहित्य की बात करें तो बहुत बार शब्दों के अपभ्रष्ट हो जाने का खतरा बना रहता है| बहुत बार अंग्रेजी शब्दों के  अधिक युक्त हो जाने से  हम पाश्चात्य विचारधारा की ओर चले जाते हैं और पाश्चात्य विचार धारा हमारी भारतीय विचारधारा पर हावी हो जाती है| ऐसे में इस पर भी कार्य करने की आवश्यकता है भारतीकारण  भी साहित्य का ध्येय था,  है और आने वाले समय में भी पूर्णरूपेण उसको साहित्य के केंद्र में रखने की आवश्यकता है|

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                  साहित्य का दायित्व स्वस्थ समाज के साथ-साथ मनुष्य को भी स्वस्थ बनाना है| इस महामारी में शारीरिक उपचार  जितना आवश्यक है,  उससे कहीं ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य| अपनी रचनात्मक कृतियों  एवं आलेखों  द्वारा वर्तमान परिस्थितियों का चित्रण व  विश्लेषण करने के साथ-ही-साथ आज व्यक्ति के मस्तिष्क को स्वस्थ रखना,  चिंता-अवसाद मुक्त करना भी साहित्य का कार्य होना चाहिए| निश्चित दिनचर्या,  मनोरंजन,  परिवार के साथ व्यतीत क्षणों की सुखद अनुभूति के साथ-साथ सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास हेतु भी साहित्य को पहल करने की आवश्यकता है| इसके लिए साहित्यकार प्रयासरत हैं और निरंतर प्रयासरत रहने की आवश्यकता है| जनमत को  नवीन संदर्भों को जोड़ने की आवश्यकता है,  नवीन संभावनाओं की ओर उन्मुख करने की आवश्यकता है,  शोध में नवाचारों को जोड़ने की आवश्यकता है और शोध जनमानस को आधार मानकर अर्थात सामाजिक संदर्भों को आधार मानकर शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता है| इस महामारी के दौर में जीवन यापन कैसे करें इस पर भी अपनी व्यापक और गहरी दृष्टि का परिचय देने की आवश्यकता है,  गहराई से इस पर मनन और विश्लेषण की आवश्यकता है| आज के समसामयिक समस्याओं को फलीभूत और चरितार्थ करने में, स्वयं को पुनः  प्रतिस्थापित करने हेतु सफलतापूर्वक साहित्य को अपना योगदान करना होगा ताकि एक नवीन युग का सूत्रपात हो सके|

 

सन्दर्भ ग्रन्थ :-

  1. अशोक वाजपेयी -साहित्य आज तक
  2. https://youtu.be/QLeyrt56NZ4
  3. प्रसून जोशी – साहित्य आज तक
  4. https://youtu.be/MocfOYnJHes
  5. असगर वजाहत-साहित्य आज tak
  6. https://youtu.be/nyY8_9hsnaM
  7. महामारी में साहित्य – डॉयचे वेले में शिवप्रसाद जोशी
  8. हिंदुस्तान दैनिक अख़बार, पृष्ठ सं.-8/23/05/2020
  9. हंसी ही काट हैं – सुधीर पचौरी
  10. हिंदुस्तान दैनिक अख़बार, पृष्ठ सं.-8/24/05/2020

 

          सारिका ठाकुर, मनीष सिंह

         आकांशा धर्म कांटा, पटना रोड, पटेल नगर

         दाउदनगर, औरंगाबाद, बिहार 824143

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