संस्मरण

बहादुर

उर्मिला शर्मा,
सहायक प्राध्यापक,
अन्नदा महाविद्यालय,
हजारीबाग (झारखंड)

             जब से ब्याहकर आई, तब से इस परिवार में मैनें बहादुर को एक सेवक के रूप में काम करते देखा । लंबा कद, मध्यम रंग, मध्यम तीखी नाक , अपेक्षाकृत छोटी आँखें व सपाट चेहरा। उम्र कोई पैंतीस के आसपास । अत्यंत सरलमना। यानि कि कुल मिलाकर वह प्रथम दृष्टया नेपाली तो कहीं से भी नहीं लगता था। आमतौर पर अपने देश से बाहर नेपालियों को प्रायः गार्ड की ड्यूटी पर ही देखी थी। किंतु बहादुर, उसका मूल नाम रामबहादुर थापा था, कई कामों में पारंगत था। इस प्रकार नेपालियों के लिए ‘बहादुर ‘ नाम रूढ़ सा हो गया है ।

        मैंने सुना था कि अपने युवावस्था के दिनों से ही वह बिहार रोजी-रोटी के लिए आया । विवाहोपरांत पत्नी को भी साथ लाया था, लेकिन उसका मन यहाँ न रमा। अतः उसे पुनः नेपाल छोड़ आया । वह चार-पांच सालों पर अपने मुल्क अपने घर जाता था । किसी भी काम को वह बड़े मनोयोग से किया करता था । स्वामी भक्ति भी खूब थी उसमें । साधु प्रकृति का व्यक्ति था वह। ईमानदार तथा लालच तो जैसे छूकर भी नहीं गया था उसको।

               एक बात जिसे लेकर सब उसका परिहास उडाया करते थे ।वह यह था कि बीच-बीच में वह एक-दो बार बडी प्रसन्नता से अपने संतानोत्पत्ति की खबर

 

सुनाया करता था। उसी के समवयस्क मेरे पति या उनके भाई मजाक में पूछते-‘बहादुर ये तो बताओ, तुम तो यहाँ हो तो तुम्हें संतान प्राप्ति कैसे हुई ?’ इस बात नर बहादुर निश्छल रूप से मुस्कुराकर रह जाता था। और इनलोगों का कुतुहल मन में ही धरा रह जाता । घर में बहादुर सबका कुछ न कुछ काम करता रहता था। किंतु मुख्यतः माताजी के निर्देशों का पालन करता था। चूंकि घर संयुक्त था इसलिए सभी जेठानियों और देवरानियों में उससे अपने निजी  काम करवाने के लिए होड़ मची रहती थी। वह भी मौन रूप से बिना किसी आपत्ति के सबके काम करता रहता था। इन सारे भाग-दौड़ को देखते हुए मै उससे कम से कम अपने निजी कामों से मुक्त रखने की कोशिश करती । मेरा तो उसके साथ सदा संवेदनशील व्यवहार होता था। लेकिन परिवार में सबके अलग-अलग मिजाज हुआ करते हैं । पति के बड़े भाई व उनकी पत्नी जो सख्त मिजाज तथा श्रेष्ठताबोध से ग्रसित थे, उनका व्यवहार न केवल हम सबके साथ बल्कि बहादुर को भी भारग्रस्त रखता था। बड़े भाई की पत्नी के मुख से निकला हुआ काम वह सब छोड़ कर पहले करता था ।

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       अच्छा! इतने सालों के अंतराल में वह कभी-कभी बेहतर वेतन के उम्मीद में कहीं किसी अन्य स्थान पर काम करने लगता था । लेकिन घुमा फिर कर वह हमारे घर ही टिकता। शायद उसे भी हमारे यहाँ की आदत लग चुकी थी या अपनापन भा गया था ।

               वह सुबह 7-8 बजे घर आ जाता था तथा रात को हमारे होटल में गार्ड की ड्यूटी करता था । मेरा बेटा जब एक-देढ़ साल का था तब वह सुबह बहादुर को देखते ही मेरी गोद से उसके पास जाने के लिए मचलने लगता था । जब बहादुर उसे लेकर थोड़ी देर सड़क पर

घुमा देता था,  तभी वह खुश होता था। मै  कभी-कभार उससे उसकी पत्नी और बच्चों के बारे में और तस्वीरें देखना चाहती थी जो कि उसके पास अनुपलब्ध हुआ करता था। फोनपर भी वो अपने परिवार से कम ही बात कर पाता था क्योंकि काल दर तब बहुत ज्यादा हुआ करता था । मैं उसे लेकर सोचती थी कि इंसान पेट के लिए कहाँ से कहाँ तक का सफर करता है । उसमें भी तो आम मनुष्य की तरह ही अपने परिवार को लेकर संवेदनाएं होंगी लेकिन आर्थिक विवशता …। सुबह आने के बाद वह ज्वाला के यहाँ से दून लाने के बाद दून उबालता और सबके लिए चाय बनाता।  फिर सब्जी काटना व अन्य काम निपटाकर वह सौदा-सुलह के लिए बाजार जाता । उसके बाद खर्च का ब्यौरा माताजी को देता। तत्पश्चात प्रतिद्वंदिता की भावना से ग्रस्त देवरानी-जापानियों की ओर से वह इधर से उधर लुढ़काया जाता । इन दोनों में से कोई जब अपने मायके जाती तब वह कभी-कभी रसोई का भी काम महीनों संभालता। बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन भी वह बनाता था । इसके अलावा वह शहर के किसी सर्राफ की दुकान में कारीगर का भी काम कर लिया करता था जो कि उसका खानदानी पेशा था। यानि कि बेहतर आय के लिए वह दिनरात बिना किसी शिकायत के अथक परिश्रम करता रहता ।

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                    हमारे पति के पत्नी भक्त बड़े भाई जब-तब उसे डाँटा करते थे,  जब उनकी पत्नी बहादुर के खिलाफ कान भरा करती थी। कारण वही उनकी हुक्म बजाने में जरा देर हो जाना । मुझे यह सब अमानवीय लगता था । परन्तु मैं बेबस थी। मेरी भी स्थिति उस घर में बहुत बेहतर नहीं थी। इसके लिए स्वयं पर क्षोभ भी होता था। एक दिन दोपहर को जब मैं अपने कमरे में थी, तभी पति के बड़े भाई के गरजने की आवाज सुनाई पडी । बाहर निकलने पर देखती हूँ कि वो आंगन में बहादुर

 

को पीट रहे हैं,  पत्नी की हुक्म बजाने में देरी की वजह से । मैं स्वयं जाकर दखलंदाजी कर बीच-बचाव करने में असमर्थ थी। इसलिए इधर-उधर भागकर पति को ढूंढने लगी कि उन्हें भेज इस कुकृत्य को रोका जा सके,  किंतु वो नहीं दिखे। इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया । पति के आते ही मैंने उन्हें सारी बात बताई । इसपर वे मात्र अफसोस जताकर खामोश रह गये। उस दिन के बाद से महीनों बहादुर घर नहीं आता था। वह रात में ड्यूटी कर वही  होटल में ही सोता था। मुझे उसके लिए बड़े बुरा लगता था । बीच-बीच में पति से बहादुर के विषय में पूछती रहती थी। कुछ महीनों बाद शायद पति के कहने पर बहादुर घर आने लगा   लेकिन इस बार मुझे बहादुर कुछ बदला,  कुछ अलग सा लगा। फिर कुछ ही समय बाद वह नेपाल अपने घर चला गया । जाते समय उसे मैंने कुछ वस्तुएं व कुछ रूपये दिए तथा उसे पुनः वापस आने के लिए कहा। उसने आने का वादा भी किया । विगत वर्षों में वह जब भी नेपाल जाता था तब वह कहता था -” ओ साब जी! अब नहीं आएगा इंडिया,  वहीं काम करेगा। ” लेकिन फिर वापस आ ही जाता था । किंतु इस बार उसके गये लगभग पंद्रह साल तो हो ही गये हैं,  पर वह नहीं आया   आखिर गरीब का भी आत्मसम्मान तो होता ही है न। इस बीच नेपाल का महाप्रलय भी मेरे मन को अनहोनी आशंकित करता है । हृदय से यही निकलता है कि, वो जहाँ भी हो, सुखी रहे। उसकी स्मृति जब-तब जुड़ आती है । यदा-कदा पति से बहादुर के विषय में पता लगाने को कहती रहती हूँ । किंतु मेरे सिवा उसके प्रति संवेदनशील होकर कौन सोचता है जो उसे याद रखेगा ?

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