स्वंत्रता से पूर्ण स्वतंत्रता की ओर : विमर्श

आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर आप सभी भारत वासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। आज जब हमलोग आजाद भारत के 75 वें स्वतंत्रता दिवस के जश्न में सराबोर हैं। वहीं इसका इतिहास प्रेरणा का स्त्रोत है, जो वर्तमान में हम सबों को गौरान्वित महसूस करना का मौका दे रहा है। यहां से हम सब एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर उस के लिए हर संभव प्रयास एवं उचित प्रणाली का प्रबंधन कर सार्थक रूप प्रदान कर लक्ष्य तय करने की चेष्टा करेंगे। 

हमें इस अवसर पर आवश्यकतौर से स्वतंत्रा के वास्तविक मायने पर विचार करना चाहिए। क्या राष्ट्र का स्वतंत्र होना ही उसे पूर्ण बनाता है? आज दुनिया में बहुत देश ऐसे है जो कहने को स्वतंत्र हैं, पर वताविक्ता से आप भी अनभिज्ञ नहीं हैं। हां स्वतंत्रा राष्ट्र के पूर्णता में मुख्य हिस्सेदार होती हैं। 
 
मैं आप को राष्ट्र के पूर्णता में अपनी हिस्सदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करना चाहते हूं। जिससे हम भविष्य के भारत का निर्माण कर आने वाली पीढ़ियों को भी गौरवांवित महसूस करने का मौक़ा प्रदान कर सकें। 
 
आइए विचार करते हैं वास्तविक स्वतंत्रता पर, आख़िर क्या रास्ते अख़्तियार किए जाए, जिससे हम लक्ष्य तक बिना किसी अवरोध के तय कर सकें। सब से आसान तरीका यह हो सकता है कि हम व्यक्तिगत तौर पर अपने कार्यक्षेत्र में उचित प्रणाली विकसित करने में सुगम बनाएं। जिसका केन्द्र बिंदु राष्ट्र हित हो। 
 
एक नागरिक के रूप में हम हमेशा यह सुनिश्चित करें कि सभ्यता, संस्कृति, शांति एवं अखंता को बनाए रखें। दुनिया भर में हम यह बात पहुंचने में कामयाब हुए हैं कि विविध्ता में एकता का समायोजन कैसे किया जा सकता है। एक जिममेदार नागरिक होने के हर संभव पैयमाने को हम सब भारतीय परिभाषित करें।
 
शिक्षा से जुड़े लोग इस बात को ध्यान में रखे की विश्व के मानचित्र पर भारत का अमिष्ट योगदान रहा है; विज्ञान, गणित, भाषा, योग, आयुर्वेद आदि के जनक के रूप में देखा जाता रहा है। शिक्षक शिक्षा के गुणवत्ता के साथ शिक्षा के अन्य आयाम से भी विद्यार्थियों को अवगत कराएं। विद्यार्थी, शोधार्थी अनुसरण कर शिक्षा के क्षेत्र में अपने योगदान को निश्चित करें।
 
भारत का लोकतंत्र खुद में इतना व्यापक है कि इसे किसी अन्य उदाहरण कि आवश्यकता नहीं। यह लोकतंत्र को परिभाषित करने में सक्षम है। इसलिए सभी पालिका से जुड़े लोगों की जिममेदारियां बनती है कि इस पर लोगो का विश्वास कायम रखें और दृढ़ता से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें।
 
इसी तरह स्वस्थ, कृषि, व्यपार आदि से संबंधित लोग अपना अपना व्यक्तिगत योगदान सुनिश्चित कर राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदार बने। संक्षेप में बस इतना ही कहना योग्य होगा कि हमें देश को स्वंत्रता से पूर्ण स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली एक समग्र नेतृव का धुरी बना है।
 
वंदे मातरम्।
जय हिन्द।
 
– रीत कुमार रीत, (प्रबंधन स्कॉलर)
महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्विद्यालय, बिहार।
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