हास्य व्यंग्य लेख-तुम कब जाओगी कोरोना !: नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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हास्य व्यंग्य लेख

तुम कब जाओगी कोरोना !

  -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

कल मैं अपने गाँव के एक मित्र से फोन पर बात कर रहा था तभी उसने मुझे सुझाव दिया कि'मित्र आप केवल कविता लिखते हो कभी गद्य की विधा लेख आदि क्यों नहीं लिखते ? उनकी बातों से मैं जोश में आ गया और 'कोरोना' जो कि ज्वलंत मुद्दा बनी हुई है को बिषय बनाकर लिखना शुरू किया।

           अभी देश में परदेश में यानी हर जगह कोरोना काल चल रहा है।कोरोना होम मेड नहीं है बल्कि शुद्ध रूप से आयातित बीमारी है।जैसे इम्पोर्टेड मॉल का अलग क्रेज़ होता वैसे ही इस बीमारी का क्रेज़ भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।जैसे ही हम विदेशी वस्तुओं को इम्पोर्टेड मॉल कहकर भाव देना शुरू करते हैं वैसे ही वह शीघ्रता से पूरे देश में ये फैल जाता है।विदेशी चीजों का प्रयोग उच्च वर्ग से शुरू होकर मध्यम वर्ग होते हुए निम्न वर्ग तक धड़ल्ले से पहुँच जाता है।इम्पोर्टेड माल सोचकर इसके प्रयोग को हम अपने गर्व (प्राइड) की भावना से जोड़ लेते हैं और जब हम इन्हीं विदेशी चीजों की आदि हो जाते हैं फिर "विदेशी भगाओ, स्वदेशी अपनाओ" का नारा लगाते हुए बहिष्कार करते हैं।जैसा की इतिहास रहा है कि विरोध का स्वर हमेशा मध्यम वर्ग से उठता है।उच्च वर्ग तो हमेशा जिसका विरोध करना है उसमें खुद भी शामिल होता है सो विरोध करने का सवाल ही नहीं उठता।जहां तक निम्न वर्ग की बात है ये बड़े संतोषी जीव होते हैं।इन्हें न तो उधौ का लेना है न माधव का देना है।इस वर्ग के लोग जितना 'प्राप्तियों' में संतुष्ट होते हैं उतना ही 'अभावों' में भी संतुष्ट नज़र आते हैं।लगता है कि इनके जीन्स में विरोध के गुण ही नहीं

 

होते।हाँ, यह वर्ग भीड़ बढ़ाने में ज़रूर काम आते हैं चाहे इनका उपयोग मध्यम वर्ग वाले आंदोलन के लिए करे या फिर उच्च वर्ग वाले इनका प्रयोग अपने काम साधने के लिए करे। इन्हें तो बस पीना-खाना मिल जाए और एक दिन की रोज़ी फिर जिधर चाहे जोत लो इन्हें भीड़ या भीड़ का हिस्सा बनने में कोई परहेज़ नहीं होता।

            ख़ैर,मैं अपनी बात निगोड़ी कोरोना से स्टार्ट किया था और वर्गभेद वर्णन के चक्कर में उलझ गया।सबसे अहम सवाल तो ये है कि देश में कोरोना को हवाई रास्ते से ससम्मान लाने वाले'भद्रजन' आख़िर कौन थे? उन मेज़बानों का आखिर क्या हुआ जो मेहमान कोरोना को इतने बड़े देश में लाकर रास्ते पर छोड़ दिया है?कोरोना को लाने वाले चालाक लोग तो बच निकले और चंगुल में फंस गई है देश की भोली-भाली जनता।ये कोरोना भी ऐसी ढीठ मेहमान है कि एक बार आने के बाद जाने का नाम नहीं ले रही है।आदरणीय शरद जोशी जी ने शायद कोरोना जैसे निपट चिपकू मेहमान के लिए ही अपना लेख "तुम कब जाओगे अतिथि ! लिखा रहा होगा। कोरोना दुष्टा ने तो हमारे अपनों में ही बड़ी चतुराई से फूट डालने का काम कर रही है। कोई अपने घर का सदस्य ही क्यों न हो यदि एक बार छींक मार दे तो हम उसे बड़ी संदेह भरी नज़रों से देखने लग जाते हैं।भले ही वह बेचारा नाक में मच्छर घुस जाने के कारण छींक मारा हो।हम इस चिपकू मेहमान के डर से दरवाज़े पर कुंडी लगाकर घर में ऐसे घुसे रहते हैं कि कहीं कोरोना हमारे घर में दस्तक़ न दे जाए। दूधवाला भी घर की घंटी बजाता है तो यह शंका होने लगती है कि कहीं यह हरक़त कोरोना का तो नहीं है।कुलमिलाकर हम अपने ही घर में कैदियों की तरह डरे-सहमे जैसे-तैसे दिन काट रहे हैं।इस समय लोग डर के मारे न्यूज़ चैनलों को लगभग

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देखना ही बंद कर दिया है।जो व्यक्ति रोज़ शाम में न्यूज़ चैनल पर डिबेट सुनने का आदी था अब वह उस समय में भी सीरियलों और फिल्मों के चैनल देखकर ही दिन बिता रहा है।मनोरंजन चैनल भी अपने ब्रेक को 'कोरोना ब्रेक' कहकर डराने लगे हैं।इसी बीच दूरदर्शन चैनल ने मौका देख ज़ोरदार चौका मारा है।जहाँ एक ओर रामायण-महाभारत दिखाकर डरे -सहमे लोगों में धार्मिकता और आत्मविश्वास को ज़िंदा रखने का काम किया है वहीं दूसरी ओर अपनी लूटी-पीटी टी आर पी को भी पटरी पर ले आया है।

           कवियों और लेखकों को जैसे अचानक नया विषय मिल गया है।वे कोरोना पर कविता ,कहानी, लेख आदि लिखकर खूब कलम चला रहे हैं।पूरा साहित्कार बिरादरी वही पुराने विषयों कश्मीर,अनुच्छेद-370 ,एन आर सी और शाहीन बाग़ पर लिख-लिखकर बड़े बोर हो चुके थे।अभी हालात ऐसे हो गए हैं कि राजनीति में भी नए मुद्दों का टोटा लग गया है।राजनेताओं का मुंह खुजला रहा होगा कि उन्हें आख़िर पैर खींचने और कीचड़ उछालने जैसे शुभ अवसर कब मिलेंगे।वे मन ही मन कोरोना बैरी को यह सोचकर कोस रहे होंगे कि उसने सारे मुद्दों को दबाकर ख़ुद अकेले अहम मुद्दा बने बैठी है।

          कोरोना का दुःसाहस तो इतना बढ़ गया है कि अपने प्रताप से देशव्यापी लॉकडाउन तक करवा दी है फिर भी मानने को तैयार नहीं है।देश में सभी जगह ताले लग चुके हैं।कोर्ट बंद है,दफ़्तर बंद है,दुकानें बंद है,मोटर-गाड़ी बंद है,आना-जाना बंद है यहाँ तक लोगों की बोलती भी बंद हो गई है।रोड पर पुलिस वाले भी बात नहीं कर रहे हैं ज़रूरत के मुताबिक बस डण्डा चमका रहे हैं।अस्पताल में डॉक्टर केवल इशारों से काम चला

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रहे हैं।अब तो ज़बान की कोई क़ीमत ही नहीं बची है उसकी क़ीमत लगभग माइनस पर जा चुकी है।अब सड़कें भी बिलकुल बेआवाज़-सूनी हो गई हैं जिसके किनारे-किनारे कभी रेहड़ी, गुमटी, खोमचे और ठेलावालों के पास गरमी की शाम में गुपचुप, पिज़्ज़ा, बर्गर, चाउमीन और मंचूरियन का लुफ़्त उठाते लोगों की भीड़ वाली रौनक बनी होती थी वह गायब हो चुकी है।

           कोरोना ने दिल्ली जैसे महानगरों में रोज़ की कमाई कर रोज़ खाने वाले मज़दूरों का जीना हराम कर रखा है।फैक्टरियों के बंद हो जाने पर काम से हकाले गए मजदूर रातोंरात सड़क पर आ गए हैं।दरबदर भटकते इन मजदूरों को जैसे कोरोना से कोई भय ही नहीं है।ये खुलेआम बड़े आराम से सड़कों पर 'सोशल डिस्टेंसिंग' जैसे आयातित शब्द से अंजान और 'लॉकडाउन' का मख़ौल उड़ाते हजारों की झुण्ड में दिखाई पड़ते हैं। सच तो यही है कि इन मज़दूरों के लिए पापी पेट के सवाल और भूख रूपी वायरस से लड़ना ही सबसे बड़ी चुनौती है जिसके सामने कोरोना की चुनौती छोटी नज़र आती है।

            दिल्ली के मुख्यमंत्री को एक चीज़ के लिए कोरोना को जरूर धन्यवाद कहना चाहिए वो ये कि दिल्ली के प्रदूषण को दूर करने एवं आसमान पर छाए धूएं के ग़ुबार को कम करने के लिए गाड़ियों को ऑड-इवन चलाने जैसे जतन ख़ूब किए पर पसीने छूट गए लेक़िन धुएं कम नहीं हुए। वहीं कोरोना के आशीर्वाद से मात्र इक्कीस दिन का लॉकडाउन करना पड़ा  और देखते ही देखते बीमार पर्यावरण का स्वास्थ्य एकदम से चंगा हो गया है।गंगा और यमुना को अपना साफ पानी देखकर यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि यह उसका ही पानी है।दोनों

 

 

को यह याद नहीं कि आखिरी बार इतना साफ़ पानी कब देखा था।

              जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की विविधता वाले इस देश को कोरोना से यह तो जरूर सीखना चाहिए कि आदमी सब एक समान होता है।हम बेवज़ह भेदभाव और अलगाव की बेकार बातों में पड़े होते हैं। कोरोना को देखो वह कैसे सभी जाति और धरम वालों को बिलकुल समान भाव से निपटा रही है।हम मान गए कोरोना तुमने साबित कर दिया है कि तुम्ही सच्ची समदर्शी हो"समदर्शी नाम तिहारो।"

              हमारे देश का बाज़ार चीन से बनी हुई चीज़ों से भरी पड़ी है।चायनीज मोबाईल, चायनीज खिलौने, चायनीज इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़, चायनीज लाइट्स-झालरें, चायनीज फटाके-फुलझड़ियां आदि आदि बड़े धड़ल्ले से बेचे और ख़रीदे जाते रहे हैं।इतना ही नहीं चायनीज फूड और चायनीज मसालों के इतने दीवाने हो गए हैं कि हम अपने देशी खानों को भूलते जा रहें हैं।हमें हर चीज में चायनीज माल प्रयोग करते देख वक़्त ने उपहार स्वरूप बीमारी भी चायनीज दे दिया है। यह बताने की जरूरत नहीं कि चीन कितना दगाबाज़ मुल्क़ है जो पूरी दुनियां को कोरोना में झोंक दिया है और खुद स्वान्तः सुखाय में लिप्त हो गया है।

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           यूं तो कोरोना ने  सारे महाद्वीपों पर अपने पांव जमा लिए हैं फिर भी अमेरिकी और योरोपीय उन देशों के नाक पर दम कर रखी है जिन्होंने विकसित राष्ट्र होने का तमगा पहन रखा था।कोरोना के वार से अमेरिका,इटली, स्पेन, ब्रिटेन जैसे दंभी देशों की हेठी निकलकर बाहर आ गई है।अपने ज्ञान-विज्ञान और आर्थिक विकास पर इतराने वाले सारे शक्तिशाली देश

 

छोटी-सी कोरोना जो ढंग से दिखाई भी नहीं देती के सामने असहाय दिखाई पड़ रहे हैं।

            धार्मिकों ने भी अपने सारे धार्मिक क्रियाकलापों पर कुछ दिन के लिए विराम लगा दिया है।पुजारियों, मालवियों और पादरियों की दुकानें चल नहीं रही है।हालात देखकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है उन्हें लग रहा है कि कहीं लोगों के मन से धार्मिकता ही न उठ जाए । कहीं ऐसा हुआ तो उनका तो व्यवसाय ही बंद हो जाएगा।मन ही मन सोच रहे होंगे कि "हम हैं तो निठल्ले कोई काम करने की आदी भी नहीं हैं फिर करेंगे क्या ?

                  ऐसे डरे-सहमे,हताश-निराश और उदासी के इस आलम में प्रधानमंत्री जी देश की जनता को बार-बार संदेश का कैप्सूल दे रहें हैं।उन्हें यह विश्वास है कि उनका यह संदेश जनता में एनर्जी सोर्स की तरह 'सप्लीमेंट्री फ़ूड' का काम करेगी।जनता बड़ी कृतज्ञता से घंटी-थाली बजाकर और दीये-मोमबत्ती जलाकर अपने एनर्जी लेबल का सबूत भी दे रही है।इस बीच फेसबुकी और वाटसेपी ज्ञानियों द्वारा ख़ूब ज्ञान और उपदेश बांटा जा रहा है।वही-वही मैसेज घूम फिरकर बार-बार पढ़ने और सुनने को मिल रहा है कि "घर में रहिये, सुरक्षित रहिये।" इतने बार याद दिलाने से कभी-कभी ख़ुद पर भी भ्रम हो जाता है कि कहीं मैं सचमुच घर से बाहर तो नहीं आ गया हूँ।

                    बहरहाल यह बड़ी कठिन परीक्षा की घड़ी है। इस घड़ी में हमारे संकल्प और संयम दोनों को खरा उतरना होगा। वैसे तो हम भारतीय विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी हास्य निकाल लेने की कला में माहिर होते हैं।बस कुछ दिन और कमरों में रहे ताकि घरवाली की यह शिकायत भी दूर हो जाए कि "आप तो

 

जी हमेशा बाहर रहते हो,घर में रहते ही नहीं।" इस भौतिक संसार में हर चीज़ क्षणभंगुर है,अस्थाई है,परिवर्तनशील है,आनी-जानी है अतः यह तय मानिए जो कोरोना संकट बनकर आई है वह एक दिन जरूर जाएगी भी..। तब तक बस यही दोहराते रहिए--"तुम कब जाओगी कोरोना !?"

                          नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

                                सहायक प्राध्यापक

                            शास. स्नात. महाविद्यालय,

                                 कवर्धा(छत्तीसगढ़)

                              

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