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बहुभाषी शिक्षा: समता और सामाजिक न्याय की ओर एक कदम

‘बहुभाषी शिक्षा: समता और सामाजिक न्याय की ओर एक कदम’

करन,
स्वतंत्र शोधकर्ता,
अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली से शिक्षा में स्नातकोत्तर,
8527726450,
karankvs.109@gmail.com,

सारांश

बच्चे जिस भाषा में अपनी रोज़मर्रा के जीवन का अनुभव करते हैं वह भाषा अक्सर कक्षा की भाषा बन ही नहीं पाती। कक्षा के भीतर बच्चों की भाषा न लाकर स्कूल तमाम भाषायें कक्षा के बाहर धकेल देते हैं। बच्चों को कक्षा में भाग न लेने देना इस स्पष्टीकरण के साथ कि वह अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं अपने आप में बच्चों का तो अनादर हैं ही बल्कि उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी अनादर हैं। चूँकि भाषा और ज्ञान के बीच एक गहरा संबंध हैं इसीलिए भाषा से की जाने वाली हिंसा को ज्ञान से की जाने वाली हिंसा से हटकर नहीं देखा जा सकता। स्कूल में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अक्सर प्रभुत्व वर्ग से आए बच्चे ही समझ पाते हैं और अल्पसंख्यक व हाशिये के तबके से आने वाले विद्यार्थी स्कूल के परिवेश में अलग-थलग महसूस करते हैं। इस दिशा में बहुभाषी शिक्षा एक ऐसा लोकतान्त्रिक रास्ता हैं जिससे सभी बच्चों की भाषा को कक्षा के भीतर लाकर समता और सामाजिक न्याय स्थापित किया जा सकता हैं।

बीज शब्द – मातृभाषा, बहुभाषी शिक्षा, भाषाई सशक्तिकरण, हिंसा, ज्ञान प्रणाली।

आमुख –

विश्व मे 7,117 भाषाएँ बोली जाती हैं। भारत चौथा ऐसा भाषाई विवध राष्ट्र हैं जिसकी सीमाओं के भीतर 453 भाषाएँ बोली जाती हैं (एथ्नोलॉग, 2019)। इतनी सारी भाषाएँ होने के बावजूद भी स्कूलों में मुश्किल से 30 से 40 प्रतिशत भाषाएँ ही शिक्षा का माध्यम बन पाती हैं (यूनेसको, 2003)। भारत में बहुभाषी शिक्षा अधिकांश आदिवासी बच्चों पर केन्द्रित हैं परंतु इस पर्चे के माध्यम से हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार बहुभाषी शिक्षा सभी बच्चों के लिए महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले हमें यह समझने की ज़रूरत हैं कि बहुभाषी शिक्षा होती क्या हैं। स्कूल में दो या दो से ज्यादा भाषाओं को शिक्षा का माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना बहुभाषी शिक्षा कहलाता हैं। इसको मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा भी कहा जाता हैं जिसमें बच्चों को सबसे पहले उनकी मातृभाषा में पढ़ाई-लिखाई करवाई जाती हैं और इसके माध्यम से बच्चों को दूसरी भाषायें सिखायी जाती हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कम से कम छह से आंठ वर्षो तक विद्यार्थियों को मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए (पांडा और मोहंती, 2009)।

इस पर्चे को तीन खण्डों में बाँटा गया हैं। पहले खंड में यह बताया गया हैं कि बच्चों में ज्ञानात्मक अकादमिक शैक्षिक भाषिक निपुणता विकसित करने में मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका हैं और साथ ही अगर बच्चों को शुरुवाती वर्षों में मातृभाषा में पढ़ना-लिखना सिखाया जाए तो बच्चे दूसरी भाषा भी जल्दी सीखते हैं। दूसरे खंड में यह बताया गया हैं कि भाषाई सशक्तिकरण के माध्यम से समता और सामाजिक न्याय जैसे सिद्धांतों को प्राप्त किया जा सकता हैं ताकि कक्षा एक लोकतान्त्रिक जगह बन सकें जिसमें हर एक विद्यार्थी को बरबरी महसूस हो। पर्चे के आखिरी खंड में यह बताया गया हैं कि किस प्रकार मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा बच्चों के सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों को महत्व देते हुए कक्षा में विभिन्न ज्ञान प्रणालियों को मजबूत करती हैं।

ज्ञानात्मक अकादमिक शैक्षिक भाषिक निपुणता का विकास –

स्कूल में प्रवेश करने से पहले ही बच्चे अपनी मातृभाषा के माध्यम से अर्थ बनाने की प्रक्रिया में भाग ले चुके होते हैं। अर्थात स्कूल पहुँचने से पहले ही बच्चे अपनी मातृभाषा में बहुत सारे शब्दों को सीख चुके होते हैं जिसका प्रयोग वे अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन को समझने और सरल बनाने के लिए करते हैं। लगभग पाँच से छह वर्षों तक बच्चों में सामाजिक संप्रेषण की क्षमता का विकास हो जाता हैं (पांडा और मोहंती, 2009)। कमिन्स (1981) बच्चों में सामाजिक संप्रेषण की इस क्षमता को ‘बनियादी पारस्परिक संप्रेषण कौशल’ कहते हैं (नाग, 2019)। यह क्षमता बच्चों को आमतौर पर पहली कक्षा में पढ़ाई-लिखाई समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि पहली कक्षा में बच्चों को उन चीजों से परिचित करवाया जाता हैं जिसे वे रोज़मर्रा के जीवन में अनुभव करते हैं (पांडा और मोहंती, 2009)। परंतु जैसे-जैसे पढ़ाई-लिखाई का स्तर बढ़ता जाता हैं वैसे-वैसे बच्चों को ऐसे शब्दों, तथ्यों, विचारों और सिद्धांतों को समझने की जरूरत पड़ती हैं जो उनके लिए एकदम नए हैं और जिनका आभास उन्होंने पहले शायद ही किया हो। कमिन्स (1981) का मानना हैं कि जटिल सिद्धांतों को सीखने के लिए बच्चों को ज्ञानात्मक अकादमिक शैक्षिक भाषिक निपुणता की आवश्यकता पड़ती हैं (नाग, 2019) । बच्चों में ज्ञानात्मक अकादमिक शैक्षिक भाषिक निपुणता की क्षमता को विकसित करने के लिए मातृभाषा में हुई बनियादी पारस्परिक संप्रेषण कौशल को आधार बनाया जाता हैं। कहने का तात्पर्य यह हैं कि ज्ञानात्मक अकादमिक शैक्षिक भाषिक निपुणता को विकसित करने में मातृभाषा की जरूरत पड़ती हैं। बहुत से शिक्षाविदों का मानना हैं कि स्कूल नए शब्दों, तथ्यों, विचारों और सिद्धांतों को एकदम नयी और अपरिचित भाषा के माध्यम से सिखाते हैं जिसके कारण बच्चों के संज्ञानात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं (स्कूटनब्ब-कांगस, फिल्लीप्सन, पांडा और मोहंती, 2009; कुमार, 1996)। मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा बच्चों में ज्ञानात्मिक अकादमिक भाषिक निपुणता विकसित करने में सहयता करती हैं। इसके साथ ही मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा दूसरी भाषाओं को सीखने में सुविधा प्रदान करती हैं। बच्चे मातृभाषा में आसानी से सीखते हैं और जब एक बारी वे मातृभाषा में तमाम तरह के सिद्धांत सीख जाते हैं तो उन्हें दूसरी भाषा में विचारों व सिद्धांतों को सीखने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती बल्कि कुछ नए शब्द ही सीखने पड़ते हैं। अगर एक बार जटिल विचारों, समस्याओं व सिद्धांतों को मातृभाषा में समझ लिया जाए तो उसको किसी भी विषय में लागू किया जा सकता हैं फिर चाहे वह विषय आगे चलकर किसी दूसरी भाषा जैसे अँग्रेजी में ही क्यों न पढ़ना पड़े। शोध बताते हैं कि अगर बच्चों को लंबी अवधि तक उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाए तो बच्चों की अन्य भाषाओं को सीखने में निपुणता बढ़ जाती हैं और इससे उनका संज्ञानात्मक विकास भी तेज़ी से होता हैं(पांडा और मोहंती, 2009)।

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भाषाई सशक्तिकरण के माध्यम से समता और सामाजिक न्याय –

पिछले कुछ वर्षों से स्कूलों में शिक्षा के माध्यम और विषयों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषाओं में गिरावट हुई हैं, मुश्किल से 30 प्रतिशत भाषायें ही प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम बन पाती हैं (मोहंती, 2008)। कक्षा में केवल कुछ ही भाषाएँ जगह ले पाती हैं और बहुत-सी भाषाओं को कक्षा के बाहर रखा जाता हैं। स्कूलों ने समय के साथ-साथ भाषाओं को कक्षा के भीतर न लाकर बहुत-सी भाषाओं का तो मारा ही हैं परंतु बच्चों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को भी नज़रअंदाज़ करने का प्रयास किया हैं। कक्षा में केवल शक्तिशाली तबके की भाषा लाकर स्कूल उन तमाम बच्चों पर हिंसा करते हैं जिनकी भाषा कभी स्कूल में आ ही नहीं पाती। बच्चों को कक्षा में भाग न लेने देना इस स्पष्टीकरण के साथ कि वह अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं अपने आप में बच्चों का तो अनादर हैं ही बल्कि उनकी संस्कृति का भी अनादर हैं। चूँकि भाषा और ज्ञान के बीच एक गहरा संबंध हैं इसीलिए भाषा से की जाने वाली हिंसा को ज्ञान से की जाने वाली हिंसा से हटकर नहीं देखा जा सकता। बहुत सारे अंग्रेज़ी माध्यम निजी विद्यालयों में ‘मातृभाषा’ जैसे शब्द अकादमिक चर्चाओं में अपना अर्थ खो बैठते हैं (कुमार, 1996)। कक्षा में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अक्सर प्रभुत्व वर्ग की भाषा होती जिसे वे विद्यार्थी ही समझ पाते हैं जो प्रभुत्व वर्ग से आते हैं और जिनके पास एक खास तरह की सांस्कृतिक पूंजी होती है, जो विद्यार्थी इस भाषा को नहीं जानते उनको कक्षा में ज़बरदस्ती चुप होकर बैठना पड़ता। कक्षा में भाषा और ज्ञान दोनों ही स्तर पर असमानता देखने को मिलती हैं। मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा एक ऐसा लोकतान्त्रिक रास्ता हैं जिसके माध्यम से इस असमानता को खत्म किया जा सकता हैं। कक्षा में बहुत बार असमानता, सामाजिक बहिष्करण जैसे मुद्दों को स्कूल पाठ्यचर्या में लाया तो जाता हैं परंतु कक्षा में इनकी चर्चाएँ उस भाषा में की जाती हैं जो कुछ ही समझ पाते हैं। यह हो सकता हैं कि जिस कक्षा में असमानता व सामाजिक बहिष्करण पर बात हो रही हो वहाँ एक ऐसी छात्रा भी बैठी हो जिसने यह सब अनुभव किया हो परंतु उसकी आवाज़ हमें शायद ही देखने को मिले क्योंकि हो सकता हैं कि असमानता पर चर्चा ऐसी भाषा में हो रही हो जिस भाषा में उस छात्रा ने असमानता का अनुभव ही न किया हो। कक्षा में बच्चों की मातृभाषा को लेकर आना इस नज़रिये से कि हर किसी के अनुभवों को समझा जा सकें अपने आप में समता और सामाजिक न्याय की तरफ कदम होगा।

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विभिन्न ज्ञान प्रणालियों को मजबूत बनाना –

पांडा और मोहंती (2009) के अनुसार आलोचनात्मक चेतना के विकास और सामूहिक पहचान से घर और स्कूल के ज्ञान प्रणालियों के बीच निरंतर द्वंद्वात्मक तनाव का निर्माण होने की उम्मीद हैं। यह तभी संभव हैं जब बच्चों की खुद की संस्कृति और कक्षा के बीच अधिक नियमित रूप से देना-लेना होगा। यदि हम शैक्षिक प्रक्रियाओं को बच्चों में आलोचनात्मक सोच का विकास में मदद करने के रूप में देखते हैं तो कक्षा की लेनदेन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती हैं (नाग, 2019)। परंतु बच्चों में आलोचनात्मक चेतना विकसित होने के लिए कक्षा में हर स्तर पर संवाद होना आवश्यक हैं। स्कूल के शुरुवाती वर्षो में बच्चों के रोज़मर्रा के ज्ञान को आधार बनाकर विभिन्न ज्ञान प्रणालियों के बीच कक्षा में निरंतर संवाद शिक्षार्थयों के बीच आलोचनात्मक चेतना को जगाने का कार्य करता हैं (स्कूटनब्ब-कांगस, फिल्लीप्सन, पांडा और मोहंती, 2009)। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) के अनुसार “दिन-प्रतिदिन बच्चे स्कूल में अपने आसपास के अनुभव लेकर आते हैं – वे पेड़ जिन पर वे चढ़े, फल जो उन्होंने खाएं, चिड़िया उन्होंने जो पसंद किया। हर बच्चा बहुत ही सक्रिय होकर दिन और रात के प्राकृतिक चक्र को देखता हैं, मौसम, पानी, अपने आसपास के जानवरों और पौधों को भी देखता हैं” (पृ. 35)। परंतु हमें यह भी समझना होगा कि किन बच्चों के अनुभव पाठ्यपुस्तक में लाये जाते हैं और यह अनुभव किस भाषा में “क्लासरूम डिसकोर्स” का हिस्सा बन पाते हैं? किसका ज्ञान ज्ञान बन पाता हैं और किसका ज्ञान ज्ञान नहीं बन पाता? किसके अनुभव कक्षा में जगह ले पाते हैं और किसके अनुभवों को कक्षा में कभी आने ही नहीं दिया जाता? इस दिशा में बहुभाषी शिक्षा कक्षा को ‘डेमोक्रेटिक स्पेस’ बनाने में मदद कर सकती हैं जिसमें बच्चों की भाषाएँ लाकर उनकी परम्पराओं, रहन-सहन के तरीके आदि के माध्यम से कक्षा में भिन्न-भिन्न प्रकार की ज्ञान प्रणालियाँ लायी जा सकती हैं और उन्हें और भी ज्यादा मज़बूत किया जा सकता हैं। भट्टाचार्य (2017) के अनुसार, भाषा के माध्यम से बच्चों की संस्कृति, उनका खान-पान व रहन-सहन कक्षा के अनुभावों से जोड़े जा सकते हैं। बहुभाषी शिक्षा कक्षा में विभिन्न भाषाओं को लाने के साथ-साथ बच्चों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को भी महत्व देती हैं जिसके कारण विभिन्न ज्ञान प्रणालियों को कक्षा में लाया जा सकता हैं। अत: बहुभाषी शिक्षा को कक्षा में एक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए।

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निष्कर्ष –

गरीब, दलित, शोषित तबकों से आएं विद्यार्थी शैक्षिक संस्थानों में काफ़ी संघर्षों के बाद पहुँच पाते हैं, ऐसे में किसी विशेष भाषा का वर्चस्व कायम करना ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षा-व्यवस्था से बहिष्कृत करने का एक उपकरण हैं। भाषा का संबंध न केवल संचार की प्रक्रिया में भाग लेकर किसी से बात करना हैं बल्कि इसका संबंध सोचने की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ हैं। स्कूल बगैर विद्यार्थियों की सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी भाषा को विद्यार्थियों पर थोप देते हैं जिसमें न केवल उस भाषा में लिखना, पढ़ना व बोलना शामिल हैं बल्कि उस भाषा में सहजता से सोच पाना भी शामिल हैं। चूंकि स्कूलों को ज्ञान ग्रहण करने की संस्था माना जाता हैं और ऐसे में एक ऐसी भाषा को थोप देना जो बहुत से विद्यार्थियों की रोज़मर्रा की भाषा तक नही हैं शिक्षा के लोकतंत्रीकरण पर गहरा प्रभाव डालती हैं। ऐसे में भाषा विद्यार्थियों के लिए केवल और केवल एक बहिष्करण का उपकरण ही बनकर रह जाती हैं जिसका प्रभाव खासतौर पर उन विद्यार्थियों पर पड़ता हैं जो समाज के हाशिए से आते हैं। भाषाओं के बीच सत्ता-संबंधों को तोड़ने के लिए यह ज़रूरी हैं कि कक्षा में ज्यादा से ज्यादा भाषाओं को लाया जाएँ और। अत: ऐसे में बहुभाषी शिक्षा एक ऐसा रास्ता हैं जो विद्यार्थियों के सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को महत्व देकर स्कूलों को समावेशी बनने में मदद करेगा।

संदर्भ (Reference)

  1. एन.सी.ई.आर.टी (2005). राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005
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  10. UNESCO (2013). UNESDOC Digital Library. Retrieved from https://en.unesco.org/

 

JANKRITI । जनकृति

Multidisciplinary International Magazine

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