जनकृति- बहुविषयी एवं बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका/ Multidisciplinary and Multilingual International Monthly Monthly

जनकृति एक बहुविषयी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका है। यह पूर्ण रूप से विमर्श केन्द्रित पत्रिका है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के विविध विषयों को एकसाथ पढ़ सकते हैं। पत्रिका में एक ओर जहां साहित्य की विविध विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित की जाती है वहीं विविध क्षेत्रों के नवीन विषयों पर लेख, शोध आलेख प्रकाशित किए जाते हैं। अकादमिक क्षेत्र में शोध की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनृरूप शोध आलेख प्रकाशित किए जाते हैं। शोध आलेखों का चयन विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है, जो विषय की नवीनता, मौलिकता, तथ्य इत्यादि के आधार पर चयन करते हैं।

​जनकृति के माध्यम से हम सृजनात्मक, वैचारिक वातावरण के निर्माण हेतु प्रतिबद्ध है।

शोध आलेख/रचनाएँ मेल करें- jankritipatrika@gmail.com

UGC – CARE CRITERIA LIST – JANKRITI UGC – CARE CRITERIA WISE DETAILS WITH INFORMATION LINK

JANKRITI has followed all required UGC – CARE journals listing criteria and methodology of score/point.  Anyone can check link wise details as per UGC  – CARE requirements.

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भारत में किन्नरों की सामाजिक स्थिति और मान्यता-गौरव कुमार

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कुछ विद्वान इसका अर्थ अश्वमुखी पुरुष से करते हुए किन्नरों को पुरुष और ऐसी स्त्रियों को किन्नरी कहते हैं। वर्तमान समय में किन्नर का आशय हिजड़ों से ही लिया जाता है। सृष्टि की वृद्धि में स्त्री और पुरुष की एक समान भूमिका होती है।

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भोजपुरी लोकगीतों में पलायन-डॉ. जितेंद्र कुमार यादव

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प्रवास को भोजपुरी समाज ने जीवन जीने की तकनीक के रूप मे विकसित किया था। जाहिर है कि आज भी भोजपुरी प्रदेश में व्यापक पैमाने पर श्रम-प्रवसन जारी है। इस इलाके की निम्नवर्गीय जातियां जीने के लिए आज भी दौड़ रही हैं और जब तक दौड़ रही हैं तभी तक जी भी रही हैं। यह दौड़ उनके जीवन का पर्याय बनी हुई है।

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हिंदी दलित कहानियाँ और भारतीय समाज-विजय कुमार

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आज़ादी के बाद दलितों को शिक्षा का अधिकार मिला। मूक लोगों को वाणी मिली और चेतना आई जिससे उन्होंने रुढ़ियों और अमानवीय परंपराओं को नकार दिया। आठवें दशक में हिंदी दलित कहानी ऐसे ही समय में तेज़ी से उभरती है और अपनी उपस्थिति दर्ज करती है। तब से तक दलित कथाकर अपनी कहानियों के माध्यम से स्वयं को तलाशने के साथ-साथ सामाजिक परिवेश की गंभीर चुनौतियों से भी टकराते है

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हिंदी शोध सूची (पी-एच.डी. एवं एम.फिल.)

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अकादमिक क्षेत्र के लिए हिंदी भाषा में हुए शोध कार्यों की सूची तैयार की जा रही है। इसमें पीएच.डी. एवं एम.फिल. शोध कार्य शामिल है।

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विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता-ऋषिकेश सिंह

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आधुनिक काल में भारतेंदु, द्विवेद्वी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, तथा समकालीन कविता जैसे काव्यान्दोलनों का उभार हुआ जिसे स्वतंत्रता पूर्व और पश्यात दो भागों में भी बाँट सकते हैं। इन काव्यान्दोलनों के उद्भव में सबसे प्रमुख भूमिका नवजागरण एवं आधुनिकता के विचारधारा की उत्पत्ति का है।

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हिंदी की आरम्भिक आलोचना का विकास (तुलनात्मक आलोचना के विशेष संदर्भ में )-रवि कुमार

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स लेख में हिंदी की इसी आरम्भिक तुलनात्मक आलोचना के स्वरूप, बहसों, एक-दूसरे रचनाकार को बड़ा दिखने की प्रतिस्पर्धा और तुलनात्मक आलोचना के विकसित होने के कारण हिंदी आलोचना में आयी गिरावट को दिखाया गया है।

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धूमिल की कविताओं का ध्वनि स्तरीय शैलीचिह्नक विश्लेषण-सुशील कुमार

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सन् 1960 के बाद की कविता में धूमिल भाषिक शब्दावली एवं कविता मुहावरे के कारण विशेष स्थान रखते हैं। अधिकतर आलोचक इनकी कविताओं को सपाटबयानी कहकर आलोच्य कर्म से इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन ध्वनि स्तर पर कविताओं के भीतर की लय, सूत्रबद्धता एवं लेखिमिक स्तरीय प्रयोगों को अनदेखा कर देते हैं। जिन पर धूमिल कविताओं का सौंदर्य आधारित हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र कविताओं के इसी सौंदर्य-बोध, भाव-बोध के विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। कविताओं की भीतरी लय, स्थिति-बोध को प्रस्तुत किया गया है।

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फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का रिपोर्ताज ‘नेपाली क्रांति-कथा’ : स्पर्श-चाक्षुष-दृश्य बिंब की लय का बखान- अमरेन्द्र कुमार शर्मा

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फनीश्वरनाथ ‘रेणु’ के रिपोर्ताज लेखन में ‘नेपाली क्रांति-कथा’ एक विशिष्ट रिपोर्ताज इस अर्थ में है कि नेपाली लोकतंत्र के एक ऐतिहासिक मोड़ को न केवल यह व्यक्त करता है बल्कि भारत के साथ उसके संबंध के सूत्र को भी विश्लेषित करता है. यह क्रांति-कथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए अक्तूबर 1950 से मार्च 1951 के बीच छः महत्वपूर्ण तारीखों के बीच हिमालय की तराई में घटित होने वाली परिघटना का एक आख्यान रचती है.

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क्रांति की अवधारणा और संबंधित साहित्य-सच्चिदानंद सिंह

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प्रस्तुत शोध आलेख में क्रांति की अवधारण को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि क्रांति एक ऐसा परिवर्तन है जो कई रूपों में परिलक्षित होता है। एक तो यह चिंतन परंपरा में परिवर्तन के रूप में दिखता है (नवजागरण, ज्ञानोदय आदि), दूसरा सत्ता परिवर्तन जैसे फ्रांसीसी क्रांति, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, तीसरे प्रकार का परिवर्तन उत्पादन में तेजी से परिवर्तन (प्रक्रियागत परिवर्तन) के रूप में दिखाई पड़ता है जैसे औद्योगिक क्रांति।

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वरिष्ठ आलोचक, सर्जक विश्वनाथ त्रिपाठी से प्रियंका कुमारी की बातचीत

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मकालीन आलोचना जगत् में वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। एक आलोचक के साथ-साथ आप एक सफल सर्जक, इतिहासकार, गद्यकार एक कुशल अध्यापक और एक अच्छे शिष्य भी रहे हैं । आमतौर पर माना जाता है कि एक सफल आलोचक का सफल सर्जनात्मक लेखक होना या सफल सर्जनात्मक लेखक का सफल आलोचक होना प्रायः संभव नहीं होता लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने साहित्य के माध्यम से इस मान्यता को  गलत साबित किया है ।

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