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person sitting on bench in dark room

बंसी कौल : विविधता और अन्विति का अनोखा रंग-संसार-डॉ. प्रोमिला

बंसी कौल की लगभग चार दशक लंबी रंगयात्रा में एक विविधता बनी रहती है। सत्य है कि विविधता का होना अपने आप में उत्कृष्ट होने का मानक नहीं हो सकता पर यदि विविधता रंगकर्मी के निरंतर विकास और अपने आपको, अपने रंगलोक को लगातार सार्थक रूप से पुनः परिभाषित करते चलने से आती है तो यह प्रस्तुतियों को संपन्नता देती है।

people watching concert during nighttime

भारतीय रंगमंच में स्त्रियों का प्रवेश-स्वाति मौर्या

रंगमंच के इतिहास को देखने पर यही मिलता है कि प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के शुरुआती कुछ वर्षों तक स्त्रियों की भूमिका भी स्वयं पुरुष ही करते थे। जबकि भारत देश में हमेशा से ही विदुषी महिलाएं होती रही हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही थी। लेकिन यह विचारणीय प्रश्न है कि इतनी उन्नति परम्परा के रहते हुए भी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही क्यों करते थे ? वैदिक काल से ही प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली स्त्रियों को मंचन के क्षेत्र में प्रवेश मिलने में इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा ?

grayscale photo of persons left palm

बुजुर्गों का अकेलापन और हिन्दी सिनेमा

प्रस्तुत आलेख में बुजुर्गों के अकेलेपन पर केन्द्रित दो फिल्मों – ‘रूई का बोझ’ (1997) और ‘102 नॉट आउट’ (2018) में उक्त समस्या के स्वरूप और ‘ट्रीटमेंट’ का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है.

person in facial paint and costume

भक्तिकालीन हिन्दी रंगमंच में परंपराशील नाट्य शैलियों का योगदान

लोकधर्मी नाटक जोकि नाट्यधर्मी परंपरा के समानांतर साधारण जनता द्वारा पोषित परंपरा जो प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं से गुजरती हुई विभिन्न देशी भाषाओं में अनेक लोक पारंपरिक शैलियों के रूप में प्रकट होती हैं ।

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भोजपुरी लोकगीतों में पलायन-डॉ. जितेंद्र कुमार यादव

प्रवास को भोजपुरी समाज ने जीवन जीने की तकनीक के रूप मे विकसित किया था। जाहिर है कि आज भी भोजपुरी प्रदेश में व्यापक पैमाने पर श्रम-प्रवसन जारी है। इस इलाके की निम्नवर्गीय जातियां जीने के लिए आज भी दौड़ रही हैं और जब तक दौड़ रही हैं तभी तक जी भी रही हैं। यह दौड़ उनके जीवन का पर्याय बनी हुई है।

नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता-आशुतोष कुमार

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।

The Scattered (Dalit) Spectacles; the Narrative of Indian (Hindi) Films since 1940s to Contemporary Time-Saddam Hossain, Saddam Hossain

The ancient caste system of the Hindu society is still prevalent in India as well as different parts of South Asian countries.  The people belonging to the lowest level of this inhuman and unjust caste system are known as the ‘Dalits’ meaning oppressed or broken. It is very unfortunate to know that even in today’s twenty first century this unconstitutional practice is still very much prevalent in different parts of India. This paper focuses on how Indian cinema particularly the Hindi film industry starting from Achyut Kanya in the 1940’s to Article 15(a) in 2019, have used the same discriminative casteist narratives again and again. The typical Brahmanical gaze of this ancient caste system has again and again found itself a place in the narratives of the Hindi films. The films like Achyut Kanya, Ankur by Shabana Azmi, Nagraj Manjule’s Sairat to Dhadak all have shown the inter-caste love stories between two people on numerous occasions, and the view have been always from a Brahmanical hierarchy upper-caste structure, from where this system itself started. It has been very few times when the narrative of the films has initiated from the view of the lower caste Dalit people, and their views have been sidelined.

हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर: चंदन कुमार

कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

वेब श्रृंखला और नैतिकता की राजनीति में ’’स्त्री’’- एक आलोचनात्मक विश्लेषण- रजनी

वेब श्रृंखला और नैतिकता की राजनीति में ’’स्त्री’’- एक आलोचनात्मक विश्लेषण  रजनी, Ph.D शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालयईमेल  riya7116@gmail.com,संपर्क  9716452972 सार नैतिकता की राजनीति से आषय आपके लिए एक पैमाना तय कर देने से है, जहां आपको बताया जाता है कि आपको कैसे जीवन व्यतीत करना है, आपका व्यक्तित्व राज्य के नियमो पर निर्भर करता …

9/11 and the Shifting Contours of Xenophobia: Studying Karan Johar’s My Name is Khan- Dr. Hari Pratap Tripathi

9/11 and the Shifting Contours of Xenophobia: Studying Karan Johar’s My Name is Khan Dr. Hari Pratap Tripathi                                                  Asst. Professor,Dept. Of English,St. Joseph’s College for Women,Civil Lines, Gorakhpur, UP.Email: prataphari661@gmail.comMobile: 9695705820 The 9/11 attacks on the giant twin towers of World Trade Centre, the citadel of American economy and on the Pentagon (the headquarters of …

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