Home Art Discourse कला –विमर्श

Art Discourse कला –विमर्श

तेय्यम:अनुष्ठानिक कला रूप

तेय्यम:अनुष्ठानिक कला रूप रोहित जैन (शोधार्थी) हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय कासरगोड, केरल मो.8448509399, मेल-rohitjainsep22@gmail.com दक्षिण भारत के केरल राज्य को विभिन्न कला-सांस्कृतिक...
theater interior

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में राष्ट्रीय एकता

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में राष्ट्रीय एकता किसी भी देश में वर्ण-जाति,धर्म-संस्कृति और भाषा-क्षेत्र जैसी विविधता का होना असामान्य बात नहीं...
movie theater interior

इक्कीसवीं सदी का लोक और भोजपुरी सिनेमा-डा. अमरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव,डा. अर्पिता...

आज के समय में भोजपुरी भाषा और सिनेमा अपनी वैश्विक पहचान बना चुकी है। बीसवीं सदी के साठ के दशक में जिस तरह से भोजपुरी सिनेमा निर्माण के लिए डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने प्रेरित किया, वह निरन्तर विकास के पथ पर अग्रसर है।
woman running on hallway

Idea of form in tat aḍavu of Bharatanāṭyam dance style-Sonal Nimbkar*

The motion of mind is sequential, consecutive in nature and is not simultaneous. Taking this as a cue it is applied to the tatta aḍavu group of Bharatanāṭyam and see what emerges.
person sitting on bench in dark room

बंसी कौल : विविधता और अन्विति का अनोखा रंग-संसार-डॉ. प्रोमिला

बंसी कौल की लगभग चार दशक लंबी रंगयात्रा में एक विविधता बनी रहती है। सत्य है कि विविधता का होना अपने आप में उत्कृष्ट होने का मानक नहीं हो सकता पर यदि विविधता रंगकर्मी के निरंतर विकास और अपने आपको, अपने रंगलोक को लगातार सार्थक रूप से पुनः परिभाषित करते चलने से आती है तो यह प्रस्तुतियों को संपन्नता देती है।
people watching concert during nighttime

भारतीय रंगमंच में स्त्रियों का प्रवेश-स्वाति मौर्या

रंगमंच के इतिहास को देखने पर यही मिलता है कि प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के शुरुआती कुछ वर्षों तक स्त्रियों की भूमिका भी स्वयं पुरुष ही करते थे। जबकि भारत देश में हमेशा से ही विदुषी महिलाएं होती रही हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही थी। लेकिन यह विचारणीय प्रश्न है कि इतनी उन्नति परम्परा के रहते हुए भी रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पुरुष ही क्यों करते थे ? वैदिक काल से ही प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली स्त्रियों को मंचन के क्षेत्र में प्रवेश मिलने में इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा ?
grayscale photo of persons left palm

बुजुर्गों का अकेलापन और हिन्दी सिनेमा

प्रस्तुत आलेख में बुजुर्गों के अकेलेपन पर केन्द्रित दो फिल्मों - ‘रूई का बोझ’ (1997) और ‘102 नॉट आउट’ (2018) में उक्त समस्या के स्वरूप और ‘ट्रीटमेंट’ का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है.
person in facial paint and costume

भक्तिकालीन हिन्दी रंगमंच में परंपराशील नाट्य शैलियों का योगदान

लोकधर्मी नाटक जोकि नाट्यधर्मी परंपरा के समानांतर साधारण जनता द्वारा पोषित परंपरा जो प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं से गुजरती हुई विभिन्न देशी भाषाओं में अनेक लोक पारंपरिक शैलियों के रूप में प्रकट होती हैं ।
D:\laptop Data\jankriti patrika august\extra\पूर्व अंक\depositphotos_89589586-stock-illustration-immigration-crowd-of-people.jpg

भोजपुरी लोकगीतों में पलायन-डॉ. जितेंद्र कुमार यादव

प्रवास को भोजपुरी समाज ने जीवन जीने की तकनीक के रूप मे विकसित किया था। जाहिर है कि आज भी भोजपुरी प्रदेश में व्यापक पैमाने पर श्रम-प्रवसन जारी है। इस इलाके की निम्नवर्गीय जातियां जीने के लिए आज भी दौड़ रही हैं और जब तक दौड़ रही हैं तभी तक जी भी रही हैं। यह दौड़ उनके जीवन का पर्याय बनी हुई है।

नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता-आशुतोष कुमार

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।