आदिवासी सांस्कृतिक बोध और जीवन दर्शन-रविन्द्र कुमार मीना 

Please share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

किसी भी समाज के पास जीवन जीने की विशेष पद्धति होती है, जो उसे अन्य मानव समुदायों से अलग करती है । उसी संस्कृति और परंपरा का अनुसरण करते हुए वह समुदाय अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है । यह विशेष जीवन शैली उसे अपने पूर्वजों से पारंपरिक रूप में प्राप्त होती है । जिसमें समय के साथ थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता रहता है । आदिवासी जीवन शैली मानवीय संवेदनाओं एवं प्रकृति के सामंजस्य पर निर्भर रही है । इसलिए उसके दर्शन में समस्त संसार के उत्थान एवं प्रगति की भूमिका निहित है । वहां आत्म से अधिक महत्व सामुदायिकता को दिया जाता है । इसे आदिवासी दर्शन का सार तत्व भी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी । क्योंकि आदिवासी दर्शन मनुष्य के श्रेष्ठ होने को अहं (घमंड) को खारिज करते हुए समस्त सृष्टि एवं प्रकृति के सहअस्तित्व को स्वीकार करता है ।

Read more

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ-डॉ. सुधांशु शर्मा

Please share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Please share           ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ                     डॉ. सुधांशु शर्मा                                कुम्हारिया, कांके             रांची, झारखंड                            8877541225    Sudhbharti@gmail.com शोध सारांश ओमप्रकाश

Read more

आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ-शिलाची कुमारी

Please share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Please share           आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ शिलाची कुमारी पीएच.ड़ी. शोधार्थीहिंदी विभागझारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालयShilachikandhway11@gmail.comMob: 8335878688 सारांश आदिवासी शब्द से ही पता चलता है

Read more

मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता-डॉ. अमित कुमार साह

Please share
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Please share           मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता डॉ. अमित कुमार साह,महद्दीपुर, खगड़िया, बिहारईमेल: amitsmith555@gmail.com शोध सारांश समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर देखा

Read more