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Dalit and Tribal Discourse दलित एवं आदिवासी –विमर्श

Traditional Samburu Women

GLOBALISATION, DEVELOPMENT AND THE ADIVASI IDENTITY

Adivasis are the children of nature. They do not only depend on natural resources for their livelihood, but their culture, identity and autonomy are also based on it.
black and white abstract painting

दलित लोकजीवन का सौंदर्य प्रतीक ‘मुर्दहिया’

दलित साहित्य का आरंभ ही दलित आत्मकथाओं से हुआ है। तुलसीराम ने ‘मुर्दहिया’ में अपने वैयक्तिक जीवन की पीड़ा, दुख, दर्द के साथ-साथ लोकजीवन में व्याप्त अंधश्रद्धा, अपशकुन, देवी देवता, भूत-प्रेत का जीवंत वर्णन किया है। दलित लोकजीवन का सौंदर्य ‘मुर्दहिया’ में साकार हो उठा है। इसलिए दलित आत्मकथाओं में तुलसीराम कृत ‘मुर्दहिया’ विशिष्ट स्थान रखती है।
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सुशीला टाकभौरे कृत “नीला आकाश” उपन्यास में दलित जीवन का परिपेक्ष्य

भारतीय समाज में वर्ण भेद और जाति भेद की भावना वर्षो से चली आ रही है! नीला आकाश उपन्यास की कथा वस्तु दलित जीवन का यथार्थ हैं! यहाँ सवर्णों के षडयंत्रो के साथ दलितों के शोषण उत्पीड़न और आभाव पूर्ण जीवन का चित्रण किया गया हैं !
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गोंड आदिवासी लोक कथाओं में अभिव्यक्त संदेश-डॉ. सी.एच. नंद कुमार

लोककथाएँ गोंड आदिवासी समुदाय के लोगों के अभिव्यक्ति का महत्त्वपूर्ण अंग बन गए हैं । जिनता इतिहास पुराना है उतना ही उनकी कहानियाँ भी पुरानी नजर आती हैं । इनमें गोंड आदिवासियों के जीवन का हर पहलु झलकता हुआ नजर आता है इसके साथ-साथ उनकी मनोरम कल्पना का दर्शन भी हो जाता है। उनकी लोक कथाओं में संस्कृति का संरक्षण ही नहीं हुआ है बल्कि यह लोक संस्कृति का संवाहक के रूप में भी काम करते आ रही हैं ।
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समकालीन साहित्य में आदिवासी समाज और संस्कृति का स्वरूप-चंदा

आदिवासी संस्कृति की प्राचीनता की बात करें तो यह आर्यों से पुरानी हैं जब आर्य भारत आए तो उन्होंने यहाँ के मूलनिवासी को खदेड़ दिया, आदिवासियों ने भी इसका प्रतिरोध किया, किन्तु पराजित होने के उपरांत भी उन्होंने आर्यों की अधीनता न स्वीकारते हुए घने जंगलों में शरण ली और वहीं अपनी सभ्यता और संस्कृति को जीवित रखा, बचाए रखा।

हिंदी दलित कहानियाँ और भारतीय समाज-विजय कुमार

आज़ादी के बाद दलितों को शिक्षा का अधिकार मिला। मूक लोगों को वाणी मिली और चेतना आई जिससे उन्होंने रुढ़ियों और अमानवीय परंपराओं को नकार दिया। आठवें दशक में हिंदी दलित कहानी ऐसे ही समय में तेज़ी से उभरती है और अपनी उपस्थिति दर्ज करती है। तब से तक दलित कथाकर अपनी कहानियों के माध्यम से स्वयं को तलाशने के साथ-साथ सामाजिक परिवेश की गंभीर चुनौतियों से भी टकराते है

आदिवासी सांस्कृतिक बोध और जीवन दर्शन-रविन्द्र कुमार मीना 

किसी भी समाज के पास जीवन जीने की विशेष पद्धति होती है, जो उसे अन्य मानव समुदायों से अलग करती है । उसी संस्कृति और परंपरा का अनुसरण करते हुए वह समुदाय अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है । यह विशेष जीवन शैली उसे अपने पूर्वजों से पारंपरिक रूप में प्राप्त होती है । जिसमें समय के साथ थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता रहता है । आदिवासी जीवन शैली मानवीय संवेदनाओं एवं प्रकृति के सामंजस्य पर निर्भर रही है । इसलिए उसके दर्शन में समस्त संसार के उत्थान एवं प्रगति की भूमिका निहित है । वहां आत्म से अधिक महत्व सामुदायिकता को दिया जाता है । इसे आदिवासी दर्शन का सार तत्व भी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी । क्योंकि आदिवासी दर्शन मनुष्य के श्रेष्ठ होने को अहं (घमंड) को खारिज करते हुए समस्त सृष्टि एवं प्रकृति के सहअस्तित्व को स्वीकार करता है ।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ-डॉ. सुधांशु शर्मा

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ                     डॉ. सुधांशु शर्मा                                कुम्हारिया, कांके             रांची, झारखंड                           ...

आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ-शिलाची कुमारी

आदिवासी समाज, साहित्य एवं संस्कृति: वर्तमान चुनौतियाँ शिलाची कुमारी पीएच.ड़ी. शोधार्थीहिंदी विभागझारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालयShilachikandhway11@gmail.comMob: 8335878688 सारांश आदिवासी शब्द से ही...

मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता-डॉ. अमित कुमार साह

मुख्यधारा का साहित्य और आदिवासी साहित्य की वैचारिकता डॉ. अमित कुमार साह,महद्दीपुर, खगड़िया, बिहारईमेल: amitsmith555@gmail.com शोध सारांश समकालीन हिन्दी साहित्य को अगर...