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Feminist Discourse स्त्री –विमर्श

silhouette of persons hand

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कहानियों में स्त्री की बदलती सामाजिक छवि

वर्तमान हिंदी कहानी स्त्री के सशक्त होते तमाम रूपों को उद्घाटित करती है जिनका अध्ययन करने से स्वतः सिद्ध हो जाता है कि- स्त्री अब स्वयं को अबला नहीं सबला के रूप में स्थापित करती है। वे अपनी अन्तः-बाह्य स्थितियों पर चिंतन-मनन करती हुई अपने लिए एक नयी राह के अन्वेषण में लगी है।
3 women standing on brown brick floor

महिलाओं की सुन्नत : एक कुप्रथा

महिलाओं की सुन्नत पितृसत्तात्मक शक्ति, सांस्कृतिक पिछड़ापन, सार्वभौमिक मानवाधिकार के प्रति हिंसा को प्रदर्शित करती है. सुधा अरोड़ा (2009) के मुताबिक “जिन समुदायों में यह प्रथा प्रचलित है, उनमें अक्सर पुरुष उन लड़कियों से शादी करने से इनकार कर देता हैं जिनका सुन्नत नहीं करवाया गया होता.
white and black typewriter on green grass during daytime

“Women” in Liberal Feminism

I intent to incorporate her theory of the “women” as a subject of feminist theory for comprehending the “women” in liberal feminism.
grey elephant statue on green grass field during daytime

बौद्ध धर्म और थेरी गाथाएँ –स्त्री मुक्ति का युगांतकारी दस्तावेज़

यह आलेख थेरी कही जाने वाली स्त्रियों द्वारा गाए गए गीतों (जिनकी भाषा मूलत: पालि है) के भीतर छिपे उनके साहस और उनकी अन्तर-वेदना की खोज प्रस्तावित करता है. प्राय: प्राचीन भारत के सन्दर्भ में गार्गी, अहल्या और लोमशा के जिक्र के पश्चात स्त्रियों के स्वर विशेषकर साहसी स्वर की चर्चा नहीं मिलती|
woman wearing green and red sari dress walking on road

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते है. उन्होंने परतंत्र भारत से आह्वाहन किया था कि देश को आज़ाद कराने के लिए माताएं, बहिने सामने आये.
half-body mannequin on red leather chair

भूमंडलीकरण और स्त्रीविमर्श

नारीवाद या स्त्री विमर्श किसी एक देश विशेष की पूँजी नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व की स्त्रियों की मुक्ति का दस्तावेज है. यह मुक्ति है पितृसत्तात्मक सोच से मुक्ति, परम्परा से मुक्ति और उस बने-बनाये ढांचे से मुक्ति जिसमें स्त्रियों को सदैव पुरुषों की दासी के रूप में देखा गया है.
five running women wearing different dresses holding torch statue

स्त्री मुक्ति का भारतीय और पाश्चात्य संदर्भ

1946 में फ्रांसीसी भाषा में छपी सिमोन द बउवार की पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में लेखिका ने यह स्पष्ट किया कि समाज में स्त्री की स्थिति मबवदक (दोयम) है थ्पतेज नहीं। इसके उत्पीड़न का कारण जेंडर है; सेक्स को जेंडर से अलग समझना चाहिए।
man in white button up shirt

‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत

बाज़ार ने जो स्त्री को उसके आवरणों से मुक्त किया है वह स्त्री स्वतंत्रता की कामना से नहीं अपितु उसकी देह के अबाध इस्तेमाल के लिए। यह बाज़ारवाद का ही प्रभाव है कि आज स्त्री की चरित्रहीनता को उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा रूप ही मान लिया गया है।
woman in dress holding sword figurine

‘आर्थिक दुर्बलता के कारण सामंती व्यवस्था का शिकार होती दलित स्त्रियाँ’

हमारे धर्म और शास्त्रों ने स्त्रियों का शोषण योजनाबद्ध रूप से किया है। जब-जब स्त्रियों का दमन करना होता ऐसे ही ग्रंथों का हवाला देकर उसकी अस्मिता को कुचल ने का प्रयास किया जाता रहा है।
woman in black long sleeve dress

साहित्य लेखन के सन्दर्भ में स्त्री अस्मिता : एक चिंतन

इतिहास में पहली बार घट रहा है कि स्त्री पितृसत्ता को नकार रही है, उस सत्ता द्वारा आरोपित भूमिकाओं के प्रति सवाल उठा रही है । वह वस्तु से व्यक्ति बनने की प्रक्रिया में है । उसका जीवन अनंत संभावनाओं से भरपूर है ।