विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता-ऋषिकेश सिंह

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आधुनिक काल में भारतेंदु, द्विवेद्वी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, तथा समकालीन कविता जैसे काव्यान्दोलनों का उभार हुआ जिसे स्वतंत्रता पूर्व और पश्यात दो भागों में भी बाँट सकते हैं। इन काव्यान्दोलनों के उद्भव में सबसे प्रमुख भूमिका नवजागरण एवं आधुनिकता के विचारधारा की उत्पत्ति का है।

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हिंदी की आरम्भिक आलोचना का विकास (तुलनात्मक आलोचना के विशेष संदर्भ में )-रवि कुमार

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स लेख में हिंदी की इसी आरम्भिक तुलनात्मक आलोचना के स्वरूप, बहसों, एक-दूसरे रचनाकार को बड़ा दिखने की प्रतिस्पर्धा और तुलनात्मक आलोचना के विकसित होने के कारण हिंदी आलोचना में आयी गिरावट को दिखाया गया है।

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धूमिल की कविताओं का ध्वनि स्तरीय शैलीचिह्नक विश्लेषण-सुशील कुमार

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सन् 1960 के बाद की कविता में धूमिल भाषिक शब्दावली एवं कविता मुहावरे के कारण विशेष स्थान रखते हैं। अधिकतर आलोचक इनकी कविताओं को सपाटबयानी कहकर आलोच्य कर्म से इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन ध्वनि स्तर पर कविताओं के भीतर की लय, सूत्रबद्धता एवं लेखिमिक स्तरीय प्रयोगों को अनदेखा कर देते हैं। जिन पर धूमिल कविताओं का सौंदर्य आधारित हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र कविताओं के इसी सौंदर्य-बोध, भाव-बोध के विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। कविताओं की भीतरी लय, स्थिति-बोध को प्रस्तुत किया गया है।

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फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का रिपोर्ताज ‘नेपाली क्रांति-कथा’ : स्पर्श-चाक्षुष-दृश्य बिंब की लय का बखान- अमरेन्द्र कुमार शर्मा

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फनीश्वरनाथ ‘रेणु’ के रिपोर्ताज लेखन में ‘नेपाली क्रांति-कथा’ एक विशिष्ट रिपोर्ताज इस अर्थ में है कि नेपाली लोकतंत्र के एक ऐतिहासिक मोड़ को न केवल यह व्यक्त करता है बल्कि भारत के साथ उसके संबंध के सूत्र को भी विश्लेषित करता है. यह क्रांति-कथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए अक्तूबर 1950 से मार्च 1951 के बीच छः महत्वपूर्ण तारीखों के बीच हिमालय की तराई में घटित होने वाली परिघटना का एक आख्यान रचती है.

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क्रांति की अवधारणा और संबंधित साहित्य-सच्चिदानंद सिंह

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प्रस्तुत शोध आलेख में क्रांति की अवधारण को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि क्रांति एक ऐसा परिवर्तन है जो कई रूपों में परिलक्षित होता है। एक तो यह चिंतन परंपरा में परिवर्तन के रूप में दिखता है (नवजागरण, ज्ञानोदय आदि), दूसरा सत्ता परिवर्तन जैसे फ्रांसीसी क्रांति, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, तीसरे प्रकार का परिवर्तन उत्पादन में तेजी से परिवर्तन (प्रक्रियागत परिवर्तन) के रूप में दिखाई पड़ता है जैसे औद्योगिक क्रांति।

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प्रकृति युद्धरत है. : प्रेम और संघर्ष के बीच स्त्री-डॉ. कर्मानंद आर्य

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रमणिका गुप्ता हमारे समय और संदर्भ की एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श को एक नई जमीन दी है. उन्होंने आजीवन उस कौम को सशक्त करने का काम किया जो किसी भी तरह के उत्पीड़न का शिकार रहे. अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से उन्होंने हाशिये पर पड़े हुए एक बड़े वर्ग को मुख्यधारा बना दिया जो सदियों से दर-दर की ठोकरें खा रहा था. बाबा साहब आंबेडकर के रास्ते पर चलने वाले रचनाकारों के बीच वे इन विमर्शों की सबसे बड़ी पैरोकार रही हैं. सामंती पृष्ठभूमि से आने वाला उनका स्वयं का जीवन जीवटता का एक सशक्त उदाहरण है. एक सामंती पितृसत्तात्मक समाज में पैदा होने वाली लड़की ने आखिर विद्रोह का रास्ता चुना और उसके लिए आजीवन संघर्ष करती रहीं, आज तक उनके जीवन का यही पाथेय रहा.  यहाँ हमने कविता में उनके अवदान और ‘प्रकृति युद्धरत है’ से संदर्भित कविताओं की विवेचना प्रस्तुत की है.

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रस का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता-आशा 

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रस  सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र का बहुत ही प्राचीनतम सिद्धांत है परन्तु  इसे व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठा बाद में प्राप्त हुई। यही कारण रहा कि अलंकार सिद्धांत जो रस सिद्धांत से बाद में आया लेकिन रस सिद्धांत से प्राचीन माना जाने लगा। रस के स्वरूप पर मुख्य रूप से भरतमुनि, अभिनव गुप्त, मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने प्रकाश डाला है। रस सिद्धांत के मूल प्रवर्तक लगभग 200 ई॰पू॰ आचार्य भरतमुनि माने जाते हैं।

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भौगौलिक चेतना के सन्दर्भ में हिन्दी ग़ज़ल-डॉ. पूनम देवी

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प्रकृति की श्रेष्ठ कृति मनुष्य को माना गया है । सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर की बनाई श्रेष्ठ कृति प्रकृति के प्रति अपने भावों को व्यक्त करने के लिए मनुष्य ने काव्य को अपना माध्यम बनाया । काव्य मनुष्य के भीतर की संवदेनाओं  को जागृत करने का कार्य करता है । काव्य का हिन्दी साहित्य में तथा हिन्दी काव्य के क्षेत्र में ग़ज़ल विधा का अपना विशिष्ट स्थान है । हिन्दी ग़ज़लकारों ने जीवन के विविध पक्षों को उजागर करने में प्रकृति के विभिन्न घटकों को माध्यम बनाया । हिन्दी ग़ज़ल विभिन्न प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से गाँव, समाज, देश तथा विश्व को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करती है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के विविध रूपों को भौगोलिक चेतना के रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के सुन्दर एवं प्रलयकारी दोनों ही पर्यावरणीय रूपों को प्रदर्शित कर भौगोलिक चेतना को दर्शाया गया है । हिंदी ग़ज़ल का महत्त्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय चेतना भी है । प्रस्तुत शोध आलेख इस विस्तृत परिदृश्य के आधार पर चुनिंदा हिन्दी ग़ज़लों में भौगोलिक चेतना को दो मुख्य तत्त्वों – प्रकृति वर्णन और पर्यावरण प्रदूषण के आधार पर देखने का प्रयास करता है ।

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तरक़्कीपसंद तहरीक और फ़ैज़ अहमद  फ़ैज़-अनिरुद्ध कुमार यादव

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तरक्क़ी पसंद तहरीक की स्थापना के साथ साहित्य समेत सभी क्षेत्रों में बदलाव के चिह्न दिखलाई पड़ते है।ये चिह्न कौन से थे इनकी पड़ताल की गई है साथ ही इन बिंदुओं पर फैज़ कितने खरे उतरते हैं इसको भी रेखांकित किया गया है। न सिर्फ उर्दू गजल गो बल्कि हिन्दी कवि में यह परिवर्तन कैसे आ रहा था और इनमें क्या समानता थी इसको भी उदाहरण सहित उदघाटित किया गया है।

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पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

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दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिक-आर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपा-झुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं।

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