प्रकृति युद्धरत है. : प्रेम और संघर्ष के बीच स्त्री-डॉ. कर्मानंद आर्य

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रमणिका गुप्ता हमारे समय और संदर्भ की एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श को एक नई जमीन दी है. उन्होंने आजीवन उस कौम को सशक्त करने का काम किया जो किसी भी तरह के उत्पीड़न का शिकार रहे. अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से उन्होंने हाशिये पर पड़े हुए एक बड़े वर्ग को मुख्यधारा बना दिया जो सदियों से दर-दर की ठोकरें खा रहा था. बाबा साहब आंबेडकर के रास्ते पर चलने वाले रचनाकारों के बीच वे इन विमर्शों की सबसे बड़ी पैरोकार रही हैं. सामंती पृष्ठभूमि से आने वाला उनका स्वयं का जीवन जीवटता का एक सशक्त उदाहरण है. एक सामंती पितृसत्तात्मक समाज में पैदा होने वाली लड़की ने आखिर विद्रोह का रास्ता चुना और उसके लिए आजीवन संघर्ष करती रहीं, आज तक उनके जीवन का यही पाथेय रहा.  यहाँ हमने कविता में उनके अवदान और ‘प्रकृति युद्धरत है’ से संदर्भित कविताओं की विवेचना प्रस्तुत की है.

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रस का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता-आशा 

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रस  सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र का बहुत ही प्राचीनतम सिद्धांत है परन्तु  इसे व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठा बाद में प्राप्त हुई। यही कारण रहा कि अलंकार सिद्धांत जो रस सिद्धांत से बाद में आया लेकिन रस सिद्धांत से प्राचीन माना जाने लगा। रस के स्वरूप पर मुख्य रूप से भरतमुनि, अभिनव गुप्त, मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने प्रकाश डाला है। रस सिद्धांत के मूल प्रवर्तक लगभग 200 ई॰पू॰ आचार्य भरतमुनि माने जाते हैं।

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भौगौलिक चेतना के सन्दर्भ में हिन्दी ग़ज़ल-डॉ. पूनम देवी

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प्रकृति की श्रेष्ठ कृति मनुष्य को माना गया है । सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर की बनाई श्रेष्ठ कृति प्रकृति के प्रति अपने भावों को व्यक्त करने के लिए मनुष्य ने काव्य को अपना माध्यम बनाया । काव्य मनुष्य के भीतर की संवदेनाओं  को जागृत करने का कार्य करता है । काव्य का हिन्दी साहित्य में तथा हिन्दी काव्य के क्षेत्र में ग़ज़ल विधा का अपना विशिष्ट स्थान है । हिन्दी ग़ज़लकारों ने जीवन के विविध पक्षों को उजागर करने में प्रकृति के विभिन्न घटकों को माध्यम बनाया । हिन्दी ग़ज़ल विभिन्न प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से गाँव, समाज, देश तथा विश्व को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करती है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के विविध रूपों को भौगोलिक चेतना के रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के सुन्दर एवं प्रलयकारी दोनों ही पर्यावरणीय रूपों को प्रदर्शित कर भौगोलिक चेतना को दर्शाया गया है । हिंदी ग़ज़ल का महत्त्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय चेतना भी है । प्रस्तुत शोध आलेख इस विस्तृत परिदृश्य के आधार पर चुनिंदा हिन्दी ग़ज़लों में भौगोलिक चेतना को दो मुख्य तत्त्वों – प्रकृति वर्णन और पर्यावरण प्रदूषण के आधार पर देखने का प्रयास करता है ।

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तरक़्कीपसंद तहरीक और फ़ैज़ अहमद  फ़ैज़-अनिरुद्ध कुमार यादव

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तरक्क़ी पसंद तहरीक की स्थापना के साथ साहित्य समेत सभी क्षेत्रों में बदलाव के चिह्न दिखलाई पड़ते है।ये चिह्न कौन से थे इनकी पड़ताल की गई है साथ ही इन बिंदुओं पर फैज़ कितने खरे उतरते हैं इसको भी रेखांकित किया गया है। न सिर्फ उर्दू गजल गो बल्कि हिन्दी कवि में यह परिवर्तन कैसे आ रहा था और इनमें क्या समानता थी इसको भी उदाहरण सहित उदघाटित किया गया है।

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पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

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दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिक-आर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपा-झुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं।

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लोक जीवन की पहचान दिखाती नव – वामपंथी कविता : राजेश जोशी की जुबानी: षैजू के

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राजेश जोशी स्वभाव से बड़े शरीफ किस्म के आदमी है। लेकिन कविता के माध्यम से वह आज के बाजारीकरण के युग में ऐसी व्यंग्य बात कह देते हैं कि समाज की खोखली व्यवस्था का पर्दाफाश हो जाता है। आज का समय भूमंडलीकरण, उपयोगितावादी और विज्ञापन का युग है, जिसमें मानव जीवन के मूलभूत गुणों का हनन हो रहा है। चाहे वह आपसी सदभावना हो, प्रेम हो, अपनापन हो, रिश्ते – नाते हो, समाज या परिवार हो।

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Excavating the essence of the ‘Progressive Realism’ in Manikarnika- Dharmaraj Kumar

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The entire world has undergone the process of the massive social and political change intending to emancipate the human beings. Change is the new slogan having its impact throughout the world. But this change seems challenging and disturbing the social orders in the name of replacing ‘the old’ into ‘new’. Such assertion often claims to bring into existence a new narrative through the assertive change in literature.

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वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका-सारिका ठाकुर

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Please share          वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका सारिका ठाकुर शोधार्थी,विनोबा भावे विश्वविद्यालयहजारीबाग,झारखंडSarikathakur406@gmail.comमो.नं.-9403758576स्थायी पता – आदर्श नगर, हीरापुर,धनबाद, झारखण्ड 826001 शोध सार वर्तमान

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खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं और ‘सोनम’ उपन्यास-डॉक्टर स्नेह लता नेगी

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Please share          खोरदेकपा परंपरा की जटिलताएं और ‘सोनम‘ उपन्यास डॉक्टर स्नेह लता नेगी,                                        हिंदी विभाग,                                    दिल्ली विश्वविद्यालय                                             दिल्ली। शोध सार आलोच्य उपन्यास ‘सोनम‘ भूटान

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मानस की भाषिक पूर्वपीठिका के रूप में संस्कृत का अवदान: एक संक्षिप्त विवेचन-डॉ. के. आर महिया

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Please share          मानस की भाषिक पूर्वपीठिका के रूप में संस्कृत का अवदान: एक संक्षिप्त विवेचन डॉ. के. आर महियासहायक आचार्य, संस्कृतराजकीय कन्या महाविद्यालय, अजमेरKrmahiya2027@gmail.com  शोध सार

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