Third Gender Discourse किन्नर –विमर्श

सभ्य समाज की जरूरत है किन्नर विमर्श

लैंगिकता के जिस आधार पर स्त्री विमर्श ने साहित्य तथा समाज में अपनी अस्मिता तथा अस्तित्व की लड़ाई को प्रस्तुत किया तथा एक नई दृष्टि से समाज को विचार करने पर मजबूर किया। तो उसी लैंगिकता के आधार पर साहित्य और समाज में किन्नर विमर्श ने भी एक नई बहस को छेड़ दिया।

हिंदी उपन्यास और किन्नर समुदाय का संघर्ष- शिवांक त्रिपाठी

हिंदी साहित्य में इन्हीं वर्गों को विशेष रूप से केंद्र में रखकर कुछ उपन्यासों की रचना की गई जिनमें ‘यमदीप’, ‘तीसरी ताली’, ‘गुलाम मंडी’, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’, ‘किन्नर कथा’ ‘मैं पायल…’ आदि प्रमुख है; इन उपन्यासों द्वारा किन्नर जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों एवं उनके संघर्षों को संवेदनात्मक स्तर पर बड़ी ही प्रमुखता से उठाया गया है

भारत में किन्नरों की सामाजिक स्थिति और मान्यता-गौरव कुमार

कुछ विद्वान इसका अर्थ अश्वमुखी पुरुष से करते हुए किन्नरों को पुरुष और ऐसी स्त्रियों को किन्नरी कहते हैं। वर्तमान समय में किन्नर का आशय हिजड़ों से ही लिया जाता है। सृष्टि की वृद्धि में स्त्री और पुरुष की एक समान भूमिका होती है।

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