सुशीला टाकभौरे कृत “नीला आकाश” उपन्यास में दलित जीवन का परिपेक्ष्य

उषा यादव 
शोधार्थी
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू विश्विद्यालय,
हैदराबाद,तेलंगाना
मो. 9948560575
ईमेल:ushayadav.741@gamail.com

भारतीय समाज में वर्ण भेद और जाति भेद की भावना वर्षो से चली आ रही है! नीला आकाश उपन्यास की कथा वस्तु दलित जीवन का यथार्थ हैं! यहाँ सवर्णों के षडयंत्रो के साथ दलितों के शोषण उत्पीड़न और आभाव पूर्ण जीवन का चित्रण किया गया हैं ! सुशीला टाकभौर इस बात मे विश्वास करती है, की दूसरों को बदलने से पहले हमें स्वयं को बदलना चाहिये ! जो दलित लोग सवर्णों के साथ रोटी बेटी के सम्बन्ध की बात करते है ! उन्हें सबसे पहले आपस में रोटी बेटी का सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये ! दलित स्त्री एवं दलित पुरूष आपस में एक दूसरे का सम्मान करें तथा एक दूसरे के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चले ! यह कार्य बिना अन्तर्जातीय विवाह के संभव नहीं है ! वे सर्वप्रथम दलितों में अन्तर्जातीय विवाह होना चाहिये ! इससे दलित एकता मजबूत होगी! दलितों के परिवार छोटे हों ताकि अनावश्यक खर्च से बचकर बच्चों की परवरिश अच्छी तरह से कर सके ! बच्चो को शिक्षा पाने के पूरे अवसर मिले महिलायों के विकास को भी महत्वपूर्ण मानना चाहिये ! व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक उत्थान के कार्यो को भी महत्व दिया जाये !

बीज-शब्द

सर्वगुण, उन्नयन, जीर्ण-शीर्ण, आशावादिता

परिकल्पना

भारतीय समाज में वर्णभेद और जातिभेद की भावना को मिटाना और एकता संगठन तथा भाईचारे की और अग्रसर होना!

भूमिका

इस उपन्यास में सुशीला टाकभौर ने भाषावादी सोच को सदेव जिन्दा रखने की हिमायती की है! चन्दरी अपने पति भीखू जी की सोच पर कहती है “समाज बदल रहा है और बदलेगा ! हम इसके जीते जागते प्रमाण है! महिलओं के पूर्ण व्यक्तिव् विकास को भी महत्वपूर्ण मानना चाहिये! पुरूष प्रधान समाज व्यवस्था में स्त्री सबलता जरुरी है ! तभी स्त्री पुरूष समानता की भावना आ सकेगी ! भीखू जी एवं चंदरी जैसे पात्र केवल स्वयं तक सीमित नहीं है ! वे अपने दलित समाज की मुक्ति और उत्थान के लिए प्रयासरत है”1 (नीला आकाश सुशीला टाकभौर पृष्ठ संख्या 7,8) “नीला आकाश” दलित जागृति का उपन्यास है, साथ ही जागरुकता का भी दलित सशक्तिकरण और स्त्री सशक्तिकरण दो केन्द्रीय बिंदु है, जिनके इर्द गिर्द घुमते हुए, पूरी कथा का परिवेश आगे बढता है ! इसके उद्देश के रूप में जाति विहीन समाज का गठन बता सकते है ! अम्बेडकर और गोतम बुद्ध के प्रति काफी आदर इस उपन्यास में दर्शाया गया है ! दलितों की व्यथा कथा द्वारा एकता की विजय गाथा की और लेखिका अग्रसर होती है ! सन २०१३ में यह उपन्यास लिखा गया ! “नीला आकाश” उपन्यास दलितों में आये हुए बदलावों को चित्रित करते हुए उनकी प्रगति को आख्यायित करता है ! इस उपन्यास की कथा पूर्व में भीकू जी और चंदरी के इर्द गिर्द घूमती है, दूसरी कथा नीलिमा और आकाश नामक निम्नवर्गीय चरित्रों की कथा जुड़ी हुई है ! इस उपन्यास को कई भागों में बांट कर मैं व्याख्या करना चाहूँगी!

दलित नारी:-

चंदरी अपनी बेटियों को पढ़ाती है ! स्कूल में दलित लड़कियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है ! छुआछूत, भेदभाव, अपमान को सह कर पढ़ पाना हर इन्सान के लिए बहुत ही मुश्किल का कार्य है ! एक बार चंदरी की बेटी शिकायत करती है “ मक्खन चतुर्वेदी मास्टर हमको बहुत घूर घूर कर हमेशा देखता है ! बनिया गुरु भी हमें घूरता रहता है ! ऐसे तो छुआछूत मानते है, मगर कभी कभी मेरा हाथ पकड़ लेते है हमे उनसे डर लगता है!”2. (वही पृष्ठ संख्या 36) अपनी बेटियों के प्रति चंदरी के मन में सहानुभूती तो है “बेचारी बच्चियाँ पाल-पोसकर उन्हें बड़ा करो और पराये लोगों के घर भेज दो सुख मिले तो ठीक नहीं तो दुःख संताप में भी हर हाल में निभाना पडता है!”3 .(वही पृष्ठ संख्या 38) गरीब माँ बाप की अपनी मज़बूरी होती है ! वे किसी तरह बेटियों का विवाह का देना अपना कर्तब्य मानते है! भले ही बेटी दुःख उठाये ! अतःगरीब पिछड़े वर्ग के समाज में अनमेल विवाह भी साधारण सी बात है ! कभी अशिक्षा और अज्ञान के कारण ना समझी ! चंदरी के घर जब पोती रूप में नीलिमा प्राप्त है तो वह फिर से वही सपने देखती है! जो कभी उसने अपनी चारों बेटियों के लिए देखा था ! निलिमा स्कूल में किये जाने वाले भेदभाव का सामना करते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त करके शिक्षिका बनती है! उच्च शिक्षा प्राप्त करके वह समाज जागृति के कार्य करने के साथ गाँव के बच्चो को मुफ्त में टूशन पढ़ाती है ! अपनी दादी चंदरी और बुधिया को वह ‘महिला मंडल’ नामक संस्था बनाकर अपनी जाति की महिलाओं को शोषण से मुक्त कराती है ! चंदरी और बुधिया अन्य गांवों में भी जाकर दलित चेतना लाने का बीड़ा उठाते हुए कहती है “ हम सब वीर सिपाही है अपने अपने मोर्चे पर डटे है! हमे अपना संग्राम जीतना है ! समाज से जाति भेद छुआछूत को तथा नारी स्थिति को बदलना हैं!”4.(वही पृष्ठ संख्या 100,101) परन्तु गरीब माँ बाप की अपनी मज़बूरी होती है ! वे किसी तरह बेटियों का विवाह कर देना अपना कर्तब्य मानते है, भले ही बेटी दुःख उठाये! वे समझते है की हम गरीब लोगों का कोई सहारा नहीं है ! बेटी जैसे जैसे जवान होती है , सभी की नज़रे उस पर गड़ी रहती है या फिर अकेले देख कर उसका बलात्कार करने की कोशिश जरुर करते है ! हम गरीबों का कोई सरकार नहीं है! जो हमारे प्रति कार्य करे ! कभी बेचारे गरीब माँ बाप की मज़बूरी रहती है, कभी अशिक्षा और अज्ञान के कारण ना समझी ! लेकिन यह बेटियों के साथ अन्याय है “ लड़के हमेशा अच्छे ही होते है, उनके सारे दुर्गुण माफ़ होते है! लड़की सर्वगुण सम्पन्न रहकर भी बस लड़की है!”5. (वही पृष्ठ संख्या 55) समाज की मानसिकता पर चंदरी गुस्सा करती है ! इस समाज में लड़कियाँ को पढ़ने नहीं देते! अधिक पढ़ेगी तो उसके बराबर पढ़ा लिखा लड़का नहीं मिलेगा! यदि वह अपनी पढ़ाई जारी रखती है तो उच्च शिक्षा के लिए उसे अपने शहर से दुसरे शहर भी जाना पडेगा! हाल ही केश के संदर्भ के बारे में बताते है “ बलरामपुर उत्तर प्रदेश राज्य में एक छात्रा निजी स्कूल में दाखिला लेने के लिए अपने घर से निकली थी1 परन्तु देर रात तक वह वापस अपने घर नहीं पहुच सकी “6.(अमर उजाला,बलरामपुर न्यूज़ डेस्क,1 अक्टूबर 2020) ऐसे हालातों को भी देख कर गरीब माँ बाप ही हिम्मत नहीं होती है, कि वह अपनी बेटियों को पढ़ने के लिए घर से बाहर निकाले !

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जाति भेदभाव की भावना:-

लेखिका ने उपन्यास में जातियों की भी चर्चा की है वे “मागं” तथा “वाल्मीकि” में बताते हुए कहती है कि ये दोनों जातियां दलित होते हुए भी अपने आपको एक दूसरे से उच्च मानती है ! जब मागं जाति की नीलिमा और वाल्मीकि जाति का आकाश दोनों बुद्ध धर्म की रीति से विवाह करके अपने समाज में एकता का संदेश फेलाते हुए अन्तर्जातीय विवाह करते है तो कई लोग इसका विरोध भी करते है ! नीलिमा कभी कभी वर्त्तमान के बारे में सोचती है” यदि वह नहीं पढ़ती तो क्या करती ? जो काम उसकी जाति के लोग रोजगार के रूप में कर रहे है, वह भी वही काम करती कहीं बेठकर सूपा,डलिया,टोकना बना रही होती ! नहीं तो अपनी बुआ लक्ष्मी और पर्वती की तरह कही झाड़ू पोछा लगाने का काम कर रही होती ! कही बर्तन धोने का काम कर रही होती ! सीता और राधा की तरह अस्पताल में सफाई का काम कर रही होती” 7.(“नीला आकाश”,सुशीला टाकभौर पृष्ठ संख्या 76) इस प्रकार वह यह सोच कर कापं जाती है ! परन्तु वह इस जाति भेद से ऊपर उठ कर पढ़ती भी है और अपने जातीय के लोगो को पढ़ाती भी है ! हम देखते है लोग अपने स्वार्थ लिए इन दलितों का सहारा लेते है और जब उनका काम निकल जाता है तो तुम एक दलित हो तुम्हारा यहाँ क्या काम है? कह कर निकाल देते है ! हर जगह दलितों के साथ भेदभाव दिखायी देता है ! होटल से चाय पीते वक्त भी इन दलित लोगों के साथ बहुत दुर्व्यवहार किया जाता है ! उन्हें सिर्फ उन्ही के कपों में चाय दिया जाता है! और कुछ भी खाने की सामाग्री दूर से दे दिया जाता है ! अपमान के साथ मिले चाय और नाश्ते की पूरी कीमत जैसे चुकानी पड़ती है ! पता नहीं कोन सा जुर्म कर दिया है इन लोगों ने ! “नीला आकाश” उपन्यास के अंश में – भीकू जी जातिवादी लोगों से बहुत चिढ़ते है ! कभी उनके पीठ पीछे और कभी सामने भी ऐसे लोगों को बेधड़क खरी खरी सुना देते है “ जाति के बिना क्या इंसान दिखायी नहीं देते है तुम्हे? अरे इंसान को इंसान समझो , तभी तुम इंसान कहलाओगे ऐसे समय चंदरी ही उन्हें समझा देती है “ भीकू जी इतना गुस्सा ठीक नहीं धीरज रखो धीरे धीरे जात पात की बात और छुआछूत के पुराने रीती रिवाज भी बदल जायेगें ! एक दो लोगों पर इतना गुस्सा ठीक करने का कोई फायदा ज्यादा नहीं ! अपनी बात इस तरह कहों की हजारों लोग सुने और समझे ! तभी यह समाज व्यवस्था बदलेगी”8.(वही पृष्ठ संख्या 22) भीकू जी और चंदरी समाज में जियो और जीने दो का सिदान्त को मानते थे ! वे दोनों मन से पूरी समाज वयस्था को बदलने की चाह रखते थे!

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दलित जागरण:-

महाराष्ट्र की अनेक पत्र पत्रिकायों में दलितों से होने वाले देश व्यापी अन्याय, अत्याचारों के समाचार , दलित जागरुक लोग छाप रहे थे! कई लेख , और भाषण क्रांति कारी कार्यो के विषय में सुनकर भी, सेवानगर के निवासी वहां के संकुचित वातावरण से बाहर नहीं निकल पाए ! शिक्षा और जागृति के आभाव में वे अपनी दरिद्रता और बेरोजगारी से जूझते हुए, अभाव और अपमान की जिंदगी जीते रहे ! तब आंबेडकर से जुड़े लोग अधिक जाग्रत होकर परिवर्तन के मार्ग पर आगे बढ़कर शिक्षा और नोकरी में प्रगति की और आगे बढ़े ! मगर “मातंग”और “मेहतर” जाति के लोग हिन्दू धर्म को मानते हुए गाँधी स्सिथितिजी की दया और सहानुभूति से प्रभावित रहते हुए, पहली ही जकड़े रहे ! अन्याय को सहते सहते ये दलित भी जागृत होना सीख चुके ! उनके मन में भी विद्रोह की भावना जाग उठी है ! वह भी ईट का जवाब पत्थर से देना सीख चुके है ! उपन्यासके संदर्भ में ही एक जगह चंदरी कहती है “ हम डरते है, मगर वे ज्ञानी पण्डित नहीं है अपने अहंकारऔर बड़े ऊचें होने के भाव को बचाने के लिए वे झूठ ,फरेब, अन्याय, अत्याचार सब करते है ! हमारे साथ खुलेआम बेईमानी करते है ! हमारा अपना कोई ऐसा हो, जो उन्हें उनके ऊचें सिहासन से नीचे उतार कर, जमींन पर खड़ा कर दे ! तभी वे हम जैसे अछूतों को बराबरी की नजर से देख सकेंगे ! तभी समाज में भाई चारा और अपनापन आ सकेगा”9.(वही पृष्ठ संख्या 44) ये अनपढ़ दलित जानते है कि शिक्षित होकर अन्याय और अत्याचार की परम्परा को मिटाना है ! गाँव में दलितों में केवल नीलिमा और आकाश पढ़े लिखे है ! नीलिमा “दलित समाज मित्र जागृति मंडल” मातंग, वाल्मीकि ,चमार, नवबुद्ध, महार बसोरऔर ऐसी सभी दलित पिछड़ी जातियों की जागृतिके लिए काम कर रही है ! महिलायों के उनयन तथा जागृति के लिए काम कर रही है ! दारुबंदी- नशेबंदी के लिये भी प्रयत्नहुआ ! महिलायों में आत्मविश्वाश बढानें के कोशिश हुई ! पति द्वारा दुर्व्यवहारपर स्वंय कड़े कदम उठाने लगी है! छोटा परिवार सुखी परिवार पर बल दिया ! नीलिमा की आवाज़ को हर महिलाओं ने समझा और अपने जीवन पर लागू भी किया ! “नीला आकाश” उपन्यास दलित जीवन के कठोर यथार्थ पर जीवंत दस्तावेज़ है ! जो अतीत,वर्त्तमान की आशाओं को व्यक्त करता है !

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अम्बेडकरवादी सोच :-

उपन्यास में अम्बेडकर और गोतम बुद्ध के प्रति काफी आदर भाव दिखाया गया है ! हिन्दू संस्कृतिकी जीर्ण शीर्ण परम्पराओं व अंध मान्यताओं का विरोध भी दर्शाया गया है ! “नीला आकाश” दरअसल दलितों ली मुक्ति गाथा है ! एक जगह भीकू जजी भीम नगर के प्रबुध्द लोगों से तथागत गौतम बुद्ध और डॉ अम्बेडकर की चर्चा सुनते रहते है ! बुद्ध धर्म के सिदान्त और गौतम बुद्ध की अहिंसा का संदेश , भीकू जी ने समझा है ! वे जीव हत्या का विरोध करने लगे ! डॉ अम्बेडकर ने अपने लोगों को बुद्ध धर्म को अपनाकर अपनी जाति के समता और सम्मान की राह दिखाई है, यह भी वे जान गए है अम्बेडकरवाद से जुड़ कर ही नीलिमा और आकाश ने अपने समाज की एकता को जाग्रित किया और समाज के लिए वे दोनों एक मिशाल भी बने !

निष्कर्ष

इस प्रकार सुशीला टाकभोरे जी ने “नीला आकाश” में दलित जीवन का यथार्थ सामने रखा है ! दलित शोषण उत्पीड़न और आभावपूर्ण जीवन जीते आ रहे है ! आज भी इनके घर गाँव दूसरे छोर पर ही होते है ! जहाँ सुविधाओं का अभाव रहता ही है ! शिक्षा इनके जीवन में नहीं होती है ! अगर कोई लेना भी चाहे तो सवर्ण लोगों की मानसिकता के शिकार होकर रह जाते है ! या तो उनकी बेटियों के साथ दुष्कर्म किया जाता है, या फिर उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है ! यदि वह इसके खिलाफ बोलना भी चाहे तो सवर्णों का बोल बाला चारों तरफ ही रहता है! पुलिस भी उन्हीं के इशारो पर चलती है ! इन बेचारों की कहीं भी सिफारिश नहीं होती है इन्हें अपने पैतृक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है ! यदि वे आगे बढने की भी सोचें तो इन्हें धमकी दि जाती है ! आज कई उपन्यासों , कहानी था कविताओं के माध्यम से इन रचनाकारों ने अपने समाज की स्थिति को समाज के सामने रखने का प्रयास किया है ! “नीला आकाश” उपन्यास में दलित जातियां समय के साथ परिवर्तन की और बढ़ती नजर आ रही है ! इस उपन्यास के पात्र अपने जीवन से प्रेरित होकर आगे आने वाली पीढ़ी को जागृत कर रहे है ! “नीला आकाश”दलित जीवन के कठोर यथार्थ का जीवंत दस्तावेज़ है, जो वर्त्तमान और भविष्य की आशाओं आकांक्षाओं को व्यक्त करता है ! नीलिमा और आकाश दोनों पात्रों को आगे जाकर दलित समाज की एकता के प्रतीक है ! जिस प्रकार आकाश का कोई अंत नहीं है ! जहाँ आकाश होगा वहाँ नीलिमा होगी ही ! अंततः यही कहा जा सकता है कि “नीला आकाश” दलित जाग्रति का उपन्यास है, साथ ही जागरूकता का भी ! दलित सशक्तिकरण और स्त्री सशक्तिकरण दो केंद्र बिन्दु है ! जिनके इर्द गिर्द पूरी कथा का परिवेश आगे बढ़ता है ! इस उपन्यास के माध्यम से जातिविहीन समाज,परम्पराओं से मुक्त होकर समतावादी समाज का दृष्टीकोण की मांग की गयी है! शिक्षा , संगठन और संघर्ष दलित मुक्ति का मार्ग है ! यह इस उपन्यास में भलीभांति दर्शाया गया है ! छोटा परिवार सुखी परिवार वाला संदेश हमें इस उपन्यास में मिल सकता है ! लेखिका हम सभी को सिर्फ यह संदेश देना चाहती है कि – यह कोई दलित कथा नहीं बल्कि बेबसी, मोहभंग आशावादिता की कथा है !

आधार ग्रन्थ

“नीला आकाश” – सुशीला टाकभौर, प्रकाशन विश्वभारती, नागपुर प्रथम संस्करण,२०१३ दिवितीय २०१९

 

संदर्भ ग्रन्थ

  1. “दलित लेखन में स्त्री चेतना की दस्तक” संकलन, सम्पादन – शिवरानी प्रभात पुहाल, प्रकाशक अक्षर शिल्पी ,दिल्ली २०१७
  2. “सुशीला टाकभौर के साहित्य में दलित महिला चेतना” डॉ. सरिता ,प्रकाशन साहित्य संस्थान, गाजियाबाद २०२०
  3. “दलित चेतना और सुशीला टाकभौर साहित्य”- डॉ. विनोद चौधरी ,प्रकाशन उत्कर्ष पब्लिशिंग एंड डिस्टरबूटिंग , कानपुर २०२०

 

 

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