‘आर्थिक दुर्बलता के कारण सामंती व्यवस्था का शिकार होती दलित स्त्रियाँ’

माधनुरे श्यामसुंदर

समाज में जो आज दलित स्त्रियों की दुरावस्था है आए दिन उनके साथ हत्या बलात्कार उत्पीडन की त्रासद घटनाएं घटती रहती है। इसके पीछे जितनी संवेदन शून्य जन समाज रहा है उस में कम उत्तरदाई हमारे प्राचीन शास्त्र रुढ़िवादी विचारधाराओं के पोषक व्यक्ति भी रहे हैं। इसी का परिणाम आज की दलित स्त्री भोग रही है। नीरा परमार का मानना है कि- “शास्त्रों ने स्त्री की अस्मिता, गरिमा और स्वतंत्रता को नकारते हुए अपने गंदे वसूलों से उसका कद छोटा ही किया है। कोई भी लड़की जब जन्म लेती है तब वह संपूर्ण व्यक्ति होती है। जैसे-जैसे वह बड़ी होती है उसे शास्त्र, रीति-रिवाज, लिंग, भेद के खांचों में कसकर औरत बनाया जाता है। यह मत करो, यह मत कहों, ऐसे मत उठो-बैठों, ऐसे मत बरतो की धाराएं फैलते-फैलते स्त्री मनुष्य की विकास यात्रा से बहुत दूर छिटक जाती है। हमारे धर्म और शास्त्रों ने स्त्रियों का शोषण योजनाबद्ध रूप से किया है। जब-जब स्त्रियों का दमन करना होता ऐसे ही ग्रंथों का हवाला देकर उसकी अस्मिता को कुचल ने का प्रयास किया जाता रहा है। हमारे धर्म ने स्त्रियों का आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कुंठित कर दिया है”। इसलिए परंपरागत व्यवस्था में स्त्री को कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे। इस कारण स्त्री पर दमन शोषण होता रहा।

भारतीय समाज में कई ऐसी परम्पराए हैं जो अपनी विकृति के कारण आज अभिशाप बन गई है। दहेज़ भी एक ऐसी ही कुरीति है जिसके कारण प्रतिवर्ष हजारों स्त्रियां इसकी बलि वेदी पर चढ़ जाती है। विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमे प्राचीन काल से ही सभी पिता पूरी सामर्थ्य से अधिकाधिक धन, वस्तुएं आदि अपनी विवाहित पुत्री को देते आएं है ताकि उसका भावी जीवन समृद्ध शाली हो सके व उपहार के रूप में शुरू हुई यह दहेज़ की परम्परा आज एक अनिवार्य समाज का अंग बन गई है। प्राचीन काल से चली आ रही यह परम्परा आज के आर्थिक युग में व्यक्ति की स्वार्थी महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले तब गई है। दहेज़ अकेला ऐसा नासूर है जिसके कारण भारतीय समाज में कन्या का जन्म होने पर अधिकरत परिवार खुशियां नहीं मनाते हैं। कन्या जन्म को अभिशाप माना जाने लगा। कन्या के जन्म के साथ ही माँ बाप उसके विवाह की चिंता करने लगते है। इसी का उदाहरण ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ उपन्यास में देख सकते है। यद्यपि देवी की जात लगाने के लिए हजारों के कर्जदार बनकर खेतों में बेगारी करते है। देवी के ख़ुशी के नाम पर अपने परिवार का सत्यानाश करके आर्थिक मज़बूरी में बड़ी बेटी भागों का विवाह एक तपेदिक के मरीज से करते है। मां द्वारा इस बेमेल विवाह पर सवाल उठाने पर पुरुष अहंकार गालियाँ देकर पिटाई करते हुए उसे ही बेटियां पैदा करने का दोष देता है। “धडाधड हुआ कोठारी में घुसा और दो तीन चपेड लगाकर सोना को चुप कर दिया, लौंडिया ही लौंडिया की लैन लगा दी जन-जन कै, जब ना सोची यू बात, कै इनके ब्याह भी करनै पडौगो चुप हराम जादी जो एक ही सबद मूं सू लिकाडौ तौ।” इस तरह आर्थिक मज़बूरी में भागों का विवाह करना पड़ता है।

इस के बाद दलित स्त्री को इस सामन्ती व्यवस्था में गाँव के भू मालिको एवं संपन्न वर्ग द्वारा दलित महिलाओं के प्रति जुल्म व दुर्व्यवहार होते आए हैं। ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ उपन्यास में तीन महिलाओं के साथ बलात्कार होता है जिस में अबोध चावली, रामबती गंगा की बहु आदि। इनके साथ दुष्कर्म भी होता है और एखाद हत्या भी कर दी जाती है। इस तरह अपराध जगण्य और क्रूरतम अपराध है। ऐसे विभिन्न कारणों से महिलाओं को इन अपराधो का सामना कारन पड़ता है। कई बार बलात्कार करने के बाद अपनी पहचान छिपाए रखने के लिए बलात्कारी पीड़ित स्त्री की हत्या कर देता है। इसका उदाहरण हम जस तस भय सवेर उपन्यास में देख सकते हैं। चौधरी देविपाल गाँव के सामंती वर्ग का प्रतिनिधि है। घांस लेने देविपाल के खेतों में गई रामरती, घुसिया, सन्नों बारिश में भीगने से बचने के लिए झोपड़ी में चली आई उनका पिछा करते हुए वह वही पहुँच जाता है। चौधरी देविपाल इन्हीं महिलाओं को डरा धमकाकर उनका यौन शोषण करता है। आपसी एकता के अभाव में घुसिया दोनों स्त्रियों को अकेला छोड़कर भाग आती है इस पर लेखक कहते हैं- ‘घुसिया पूरी शक्ति लगाकर प्रतिरोध करती रही, बेबस अवस्था में वह रोती कलपती रही, चिकती चिल्लाती रही। जैसी जी में आई गालियां भी बकती रही परन्तु कोई वहा उसकी पुकार सुननेवाला नहीं था क्योंकि वह नारी तो थी परन्तु थी तो दलित ही’। इसके बाद घुसिया का बलात्कार कर उसे छोड़ देता। लेकिन बलात्कार करते समय उसका मुन्ना देख लेता हैं ‘तभी उसी दंशती से चौधरी ने मुन्ना की गर्दन कुए की मन पर रख कर काट दी’। इस तरह चौधरी देविपाल दलित महिलाओं पर अत्याचार करता है। ऐसी विकृत मानसिकता से जुडे व्यक्ति पर टिप्पणी करते हुए निशांत सिंह कहते हैं- “कुछ व्यक्ति स्वभाव से ही विकृत मानसिकता के होते हैं दूसरों को सताकर उनको दुःख पहुंचाकर ऐसे व्यक्तियों को अजीब सा सुख मिलता है, संतोष मिलता है। कुछ व्यक्तियों की मानसिकता इतनी विकृत होती है कि वे चिकती चिल्लाती स्त्री से बलात्कार करना पसंद करते है”। यह पुरुष द्वारा किया जानेवाला सबसे घिनोना तथा अमानवीय कू कृत्य है। इसका विरोध करते हुए सुमेधा कहती है ऐसे जगण्य अपराध को खत्म करना ही होगा तभी दलित महिलाएं सर उठाकर जी सकेगी। “वर्षा और धीरे-धीरे मिट्ठी बहकर उस खाई में बह जाएगी वह तो युगों-युगों की कहानी है। जीवन अनित्य है कल किसने देखा। इसलिए आज ही इस खाई को करवट बदलनी होगी और जिस दिन यह खाई निश्चय पूर्वक करवट बदलेगी उसी दिन पडौस के उच्चे टीले को अपने में आत्मसात कर लेगी अर्थात जब मेहनत कश वर्ग इस कटु सत्य को समजेगा कि अर्थात निर्धन के साथ कथित रूप से समान रोटी-बेटी व्यवहार करनेवाले उसकी महिलाओं की इज्जत, अबरू, शील और लज्जा को अपनी वासना पूर्ति व वासना तृप्ति का साधन समजनेवाले उसका पेट काटकर उसका शोषण करनेवाले, उसे कीड़े मकौड़े जैसी जिंदगी देनेवाले ये सुविधाभोगी, सामन्तवादी एवं शोषक तथा कथित योग्य और दक्ष एशोआराम कर रहा है उसका पेट काटकर रंगरेलियां मनाई जा रही है। कुत्तों को मक्खन उसके मेहनत से खिलाया जा रहा है। जिस दिन गरीबी की परिभाषा बदल जाएगी उसी दिन निर्धनता का दुष्चक्र टूट जाएगा। उसी दिन मेहनतकशों का शोषण बंद होगा। इसके लिए उनमे इच्छा शक्ति जागृत करनी होगी, मार्क्स ने तो कहा भी था कि दुनिया के मजदूर एक हो जाओं क्योंकि तुम्हारे पास गुलामी की जंजीरों के अलावा खोने के लिए कुछ है ही नहीं।” इसलिए दलितों को अब ज्ञात हो रहा है कि ऐसी सामन्ती व्यवस्था का विरोध करना है तो इसके लिए हमें संघटित होना ही होगा।

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ऐसा ही मिट्ठी की सौगंध उपन्यास में देख सकते हैं सामाजिक न्याय के पक्षधर और उपन्यास के नायक विजेंद्र सिंह के साथ हरिया सूरज और अंकुर है। मदन सिंह अत्याचारों के खिलाफ दलित इन्स्पेक्टर जगजीवनराम को शीला के साथ बलात्कार की गवाही देते और मदन सिंह के जुल्मों को ख़त्म करने के लिए मिट्ठी की सौगंध खाते है। उपन्यास का आरंभ गाँव के जमीदार ठाकुर मदन सिंह से होता है शीला अपने माँ के साथ घर बैठी कुछ काम कर रही है, ठाकुर मदन सिंह आता है और उसकी माँ के सामने ही जबरदस्ती बलात्कार करता है। दोनों चीख चिल्लाकर उसका विरोध करते है पर उसकी मदत करने के लिए कोई नहीं आता। शीला की इज्जत लुट जाती है और उसकी असाय माँ कुछ नहीं कर पाती। अपनी बेटी के साथ हुई इस दुखद घटना का बड़ा अघात लगता है। परिणाम कुछ ही दिनों बाद माँ की मृत्यु हो जाती है। पिता का साया तो पहले ही उठ चुक था अब माँ भी नहीं रही। वह बिल्कुल अनाथ हो जाती है। उसकी दूर की मौसी से सहारा ले लेती है। वही उसे आगे जीने के लिए प्रेरित करती है। और ठाकुर मदन सिंह से बदला लेने के लिए उकसाती है- “मैं तेरा दर्द समजती हूँ बिटियां लेकिन तूने हिम्मत हारी तो कल को दूसरी शीला की इज्जत भी लुट जाएगी। किसी से बदला लेने के लिए अपने अन्दर ताकत इक्कटा करनी होती है। तू इस जमात तक पढ़ी है इसे तू टकरा सकती है उस ठाकुर रूपी कुत्ते से”। शीला जमुनी मौसी से सहमत है इसलिए ठाकुर से बदला लेने का मन बना लेती है। इस गाँव में शीला ही ऐसी अकेली लड़की नहीं है जिसके साथ बलात्कार हुआ है। ऐसी कितनी स्त्रियाँ है जो इस तरह के अत्याचारों से गुजरती है। इस संदर्भ में वीरेन्द्र सिंह यादव का कहना हैं कि- “शीला जैसी अनेक लड़कियां, गंगा, रधिया, शीला की मौसी जमुना इसी बलात्कार की शिकार है। उपन्यास कार ने जुल्मी ठाकुर के खिलाफ उसी के लड़के विजेंद्र सिंह को खड़ा किया जो दलित युवती शीला के सारे कष्ट उठाकर भी शादी करता है। इस के माध्यम से उपन्यासकार ने जाति बंधन तोड़ने की भी बात की है, लेकिन खतरे भी होते यह भी नहीं भूला। किस तरह शीला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को ख़त्म करने की ठाकुर मदन सिंह एवं उसकी माँ विजेंद्र सिंह की दादी माँ प्रयास करते हैं। और इंस्पेक्टर जनजीवन पर कातिलाना हमला करते है”। इस तरह शीला को न्याय दिलाने विजेंद्र सिंह खड़ा हो जाता है। ऐसा कम ही देखने को मिलता है जो अपने ही परिवार के खिलाफ ज्याता हुआ। ऐसे लोग कम ही मिलते है लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो न्याय के पक्षधर है। उनमे छप्पर उपन्यास की कमला को भी देखा सकते है। कमला के संदर्भ में माताप्रसाद का कहना है- “लेखक ने इस उपन्यास में कमला के माध्यम से बलात्कार और उत्पीडित जाति की दलित लड़कियों की करुण गाथा को उकेरा है। वही समाज को भी यह सन्देश दिया है कि ऐसी बेबस ललनाओं के साथ सहानुभूति रखकर उन्हें अपनाया जाए। उपन्यास में सामंत हरनाम सिंह की सुशिक्षित लड़की रजनी के असमानता के विरुद्ध आक्रोश फिर से दूर करने के लिए स्वयं भी उस संघर्ष में कूद पड़ना एक क्रांतिकारी कदम है जो समाजवाद की तरफ ले जाने में सहायक होता है। इस में हरनाम सिंह अपनी भूमि गरीबों में बाट देना आर्थिक समस्या का एक समाधान प्रस्तुत करता है”। इस तरह सामाजिक संतुलन बनाने के लिए क्रान्ति के साथ-साथ सवर्णों की मानसिकता में भी परिवर्तन होना जरुरी है तब जाकर महिलाओ पर अत्याचार होना बंद होगा।

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जिस तरह हमने अत्यचार को हिंदी उपन्यासों में देखा उसी प्रकार मराठी उपन्यासों में भी कोई कमी नहीं है फिर भी हम हाडकी हाडवला को उदाहरन के रूप में देखे तो सामन्ती व्यवस्था का शिकार यहाँ भी अनेक महिलाएं हो चुकी हैं। बायजा का पति अपने घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण काम की तलास में मुंबई जाता है और काम मिलने पर कुछ पैसे घर भेजते रहता है। लेकिन भेजे हुए पैसे से घर पूर्ण रूप से नहीं चलता। यही सोचते हुए बायजा अपने बेटे सावला को भूखा तडपता हुआ नहीं देख सकती। इसलिए वह बाजू के खेत में सब्जी लाने जाती है तभी किसी ने आवाज दी- “ये…तेरी माँ का भोसड़ा क्या करती है उधर” तर्रर से उसके ऊपर आता है यह सब देखकर बायजा घबरा जाती है और कहती है- “कुछ नहीं पटेल थोड़ी सी सब्जी ले रही थी”। तभी घुस्से वह कहता है ‘तेरे माँ के पति ने रखा है क्या’? ऐसे कहते ही उसके दोनों हातों को पकड़कर जमीन पर लेट दिया। ऐसे अचानक प्रहार से बायजा डरने लगी। यह सब सावला देख रहा था। उसे रहा नहीं गया और अपने हाथों में पत्थर उठाकर उसे मारने लगा। यह पत्थर किसको लग रहे थे इसकी उसे चिंता नहीं थी पर माँ पर होने वाले अत्याचारों का विरोध कर रह था। बायजा चिकने चिल्लाने लगी पर सावला के अलावा उसकी आवाज सुननेवाला कोई नहीं था। सावला को रहा नहीं गया एक बड़ा सा पत्थर उठाकर उसके सिर में जोर से डाल देता हैं तभी सिर से खून बहने लगता है। यह देखकर बायजा को हिम्मत मिलती है और उसकी चंगुल से छुट जाती है। उसके बाद बायजा ने ही उसे पत्थरों से मारना चालू किया तभी बायजा और सावला दोनों को उस से छुटकारा मिला”। इस तरह स्वाभिमानी बायजा अपनी इज्जत बचाती है। बायजा के व्यक्तित्व पर टिपण्णी करते हुए डॉ. हनमंत रामचन्द्र पोल का कहना है- “नामदेव ढसाल में हाडकी हाडवला में एक स्वाभिमानी स्त्री की कथा को कहा है”। एक दलित स्त्री जानबुजकर अपनी इज्जत गवाना नहीं चाहती। चाहे वह बायजा हो या मिट्ठी की सौंगंध की शीला हो या अन्य स्त्री। वह आर्थिक मज़बूरी के कारण सामंतों के खेतों में जाते हैं और समय आने पर बायजा जैसा प्रतिकार भी करते हैं।

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इस तरह हम देख सकते है कि दोनों भाषाओं के दलित उपन्यासों में सामन्ती व्यवस्था का शिकार होती दलित महिलाओं को देखा जा सकता है। ऐसा नहीं कि सामन्ती व्यवस्था में सारे सामंत बुरे है कुछ अच्छे भी है जो दलित समाज के दर्द को समज सकते है और उनको सहारा देते हैं। इसको हम अन्ना भाऊ के उपन्यास फकीरा में देख सकते है। जब रानोजी जोगनी का कटोरा लेकर गाँव आया था तभी उसकी जान जाती है अब घर का कर्ता व्यक्ति चले जाने के कारण उसकी पत्नी मजदूरी करने लगती है उसको देखकर रावसाहब पटेल को लगता है कि गाँव के खातिर उसने अपनी जान गवाई है और उसी के घर वाले मजदूरी कर रहे हैं। यह कैसा न्याय, तभी रावसाहब पटेल कहता है- “राधा मजदूरी कर रही है, ऐसा जब रानोजी को पता लगेगा तो वह मेरा सीर काट डालेगा। इसको कभी मजदूरी के लिए भेजना नहीं, घर में अनाज नहीं है यह ले कितना चाहिए एक दो तीन …और कितना चाहिए ले जा”। इस तरह समाज में रावसाहब, वीरेंद्र सिंह, कमला आदी जैसे लोग भी है जो सामाजिक समता के पक्षधर है। इसलिए जयप्रकाश कर्दम को भी लगता है कि- “सजा कोई समाधान नहीं रजनी। सजा देने की बजाय व्यक्ति की सुधार का प्रयास होना चाहिए। हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जाना चाहिए हमारा संघर्ष न्याय और समानता के लिए है। अतीत में हमारे साथ कैसा सलूक किया गया है, हम उस पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उस से अच्छा परिणाम निकलने की आशा नहीं है, हम विरोध नहीं सामंजस्य चाहते है”। इस से हम यह देख सकते है कि हम सामाजिक न्याय के पक्षधर तो है पर हिंसा के पक्षधर नहीं। इसलिए दलित साहित्य बुद्ध के विचारों से प्रेरित है।

सन्दर्भ :-

1 दलित अस्मिता – सं.विमला थोरात – पृ.सं. 28 अप्रैल – जून 2013

2 थमेगा नहीं विद्रोह – उमराव सिंह जाठव – पृ.सं. 144

3 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 13

4 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 49

5 औरत अस्मिता और अपराध – डॉ. निशांत सिंह – पृ.सं. 50

6 जस तस भय सवेर – सत्यप्रकाश – पृ.सं. 47

7 मिट्ठी की सौगंध – प्रेम कपाड़िया – पृ.सं. 70

8 दलित विमर्श के विविध आयाम – वीरेन्द्र सिंह यादव – पृ.सं. 254

9 दलित अभिव्यक्ति संवाद और प्रतिवाद – जयप्रकाश कर्दम – पृ.सं. 62

10 हाडकी हाडवला – नामदेव ढसाल – पृ.सं. 22

11 अस्मितादर्श – सं. डॉ. गंगाधर पानतावने – वार्षिक वेशेषांक 2013 : वर्ष 46, अंक 3, पृ.सं. 17

12 फकिरा – अन्ना भाऊ साठे – पृ.सं. 21

13 दलित अभिव्यक्ति संवाद और प्रतिवाद – डॉ. जयप्रकाश कर्दम – सं. रूपचंद गौतम – पृ.सं. 61

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