समाज में दोषमुक्त महिलाओं की स्थिति: मानवशास्त्रीय अध्ययन

गुंजन सिंह

*पीएचडी मानव विज्ञान, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, ईमेल- gunjansingh070@gmail.com, मोब-8485865894

सारांश- भारतीय समाज का तानाबाना मुख्यतः पित्रसत्तात्मक है. महिलाओं के लिए एक खास तरह की दर्जाबंदी होती है जिसके अनुकूल उनको व्यवहार करना होता है. ऐसा न करने पर महिलाओं को अच्छी और बुरी महिलाओं के रूप में चिन्हित किया जाता है. सामाजिक नियम कानून और आदर्श महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग अलग होते हैं. नैतिकता जितनी महिलाओं के लिए कठोर होती है उतनी पुरुषों के लिए नहीं होती है. हालाकीं नौतिकता के पैमाने बदलते रहते हैं. फिर भी समाज में अपराध एक ऐसा क्षेत्र रहा है जहां महिलाओं की भागीदारी जबर्दस्त कम रही है. किसी पुरुष का जेल में रहकर आना और किसी महिला का जेल से आना बहुत ही अलग बात है. पुरुष अपने सामान्य जीवन के लिए संघर्षरत रहते हैं लेकिन कोई महिला अपना सामान्य जीवन ही नहीं शुरू कर पाती है. यह लेख मुख्य रूप से उन महिलाओं से संबंधित हैं जिन पर गलत अभियोजन लगाया गया और उन्हें कुछ समय तक जेल में भी रहना पड़ा. यह लेख इस परिघटना का विश्लेषण करता है और महिलाओं पर इसके प्रभाव को विभिन्न आयामों के माध्यम से चर्चा में लाने का प्रयास किया करता है.

मुख्य शब्द– दोषमुक्त, भेदभाव, सामाजिक कलंक

परिचय- समाज में अपराध को अच्छा नहीं माना जाता है. यह एक असामान्य व्यवहार होता है. अगर किसी व्यक्ति पर एक बार ही सही अपराधी होने का आरोप लग जाता है तो क़ानूनी प्रक्रिया से निर्दोष साबित होने के बावजूद उसके ऊपर लगे आरोपों से समाज दोषमुक्त नहीं करता है. गैरकानूनी गिरफ्तारी और नजरबंदी से न केवल जीवन के वर्षों का नुकसान होता है, बल्कि रिहा होने के बाद भी सामाजिक कलंक यानि स्टिग्मा और बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है. कई बार तो आस पड़ोस और रिश्तेदार साथ देते हैं और सहानुभूति रखते हैं लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है. सामाजिक कलंक और बहिष्कार केवल व्यक्ति का ही नहीं होता है बल्कि परिवार का भी होता है. अगर परिवार में बच्चे हैं तो पुरे जीवन भर के लिए मानसिक आघात के साथ जीना पड़ता है. संघर्ष उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन जाता है. क्योंकि जैसी परवरिश व्यक्ति जेल से बाहर रहकर या बिना किसी आपराधिक आरोप लगे कर सकता है वैसी परवरिश वह जेल में रहकर नहीं कर सकता है. ऐसे व्यक्तियों के साथ सामाजिक भेदभाव कम या ज्यादा सभी के साथ अनिवार्यतः होता है. जेंडर गत गैरबराबरी होने के कारण महिलाओं को सामाजिक भेदभाव तो सहना ही पड़ता है लेकिन पारिवारिक भेदभाव भी उन्हें झेलना पड़ता है. भारत के जेलों में जो महिलाएं कैद हैं उनमें से अधिकांश माँ हैं. कुछ महिला कैदियों के साथ उनके बच्चे जेलों में ही बिना किसी अपराध के रहते हैं जबकि बहुत महिलाओं के बच्चे जेलों से बाहर बिना माँ के रहने को मजबूर होते हैं.

31 दिसंबर, 2019 तक 4,78,600 कैदियों में से 4,58,687 पुरुष कैदी थे और 19,913 महिला कैदी थी [1]. यह तय है कि 19,913 की संख्या में से सभी महिलाएं अपराधी नहीं है. उनमें से बहुत महिलाएं निर्दोष हैं जिनके ऊपर गलत अभियोजन चलाया जा रहा है. इन निर्दोष महिलाओं की जिन्दगी जेलों में बद से बदतर होती हैं. अपनी बेगुनाही के साथ जेलों में रहने के कारण ये मानसिक तनाव, अनिद्रा और अवसाद की शिकार होती हैं. स्वास्थ्य सम्बन्धी तमाम बीमारियाँ इनको घेर लेती हैं. दुखद ये होता है कि इनके लिए किसी भी तरह की चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध नहीं होती है.

गलत अभियोजन के लिए पुलिस, अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों को मुकदमें के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है, जो गलत सजा की ओर ले जाता है, जैसे कि गढ़े हुए सबूत, झूठी गवाही देना, या बेगुनाही के सबूत पर विचार करने से इनकार करना[2]. ऐसे कई मामले होते हैं जिनमें जमानत को नज़रंदाज़ किया जाता है. गलत पहचान के आधार पर हिरासत में लेना मुख्य उदाहरण है. पायल के घर के लोगों के बार बार यह कहने के बावजूद कि पुलिस ने गलत लड़की को जेल में रखा है उनकी जमानत होने में महीनो लग गए. इसका कारण यह भी होता है कि मामलों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता है.

‘भारत की 1,350 जेलों में से केवल 31 जेल महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, और केवल 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अलग-अलग महिला जेल हैं. बाकि जगह, महिला कैदियों को पुरुषों की जेलों के भीतर ही छोटे-छोटे घेरों में रखा जाता है. महिलाओं के जेल के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि एक जेल के भीतर एक जेल.[3] अधिकांश महिलाएं जिस जेल में होती हैं वो उनके घरों से बहुत दूर होता है. जेल में भी उनसे मिलने आने वाले लोगों की संख्या या तो बहुत कम होती है या नहीं होती है.

शोध प्रविधि- गलत अभियोजन के चलते जमानत होने तक या मुकदमें का फैसला आने में सालों लग जाते हैं तब तक महिलाओं को जेल में ही रहना पड़ता है. इस शोध आलेख में ऐसे कई महिलाओं से असंरचित साक्षात्कार लिया गया है जो कुछ समय तक जेल में रहीं और दोषमुक्त हुयी हैं. उनके परिवारों में विषय को लेकर संवाद स्थापित किया गया जिससे महिलाओं और उनके परिवार की स्थिति को बेहतर तरीके से समझा गया. अवलोकन एक महत्वपूर्ण शोध प्रविधि रही जिसके माध्यम से उन स्थितियों का भी अध्ययन संभव हो पाया जो साक्षात्कार के दौरान नहीं हो पाया था. प्रस्तुत शोध में इस परिघटना का विश्लेषण करने के लिए दो महिलाओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है जिनसे साक्षात्कार लिया गया था.

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वैक्तिक अध्ययन- गलत अभियोजन के कारण कुछ समय तक जेल में रहने और सालों तक मुकदमा चलने के कारण कई महिलाओं का जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित हो जाता है. वैक्तिक अध्ययन में समानता नहीं होती है और उस आधार पर सामान्य सैधान्तिकी का निर्माण संभव नहीं होता है. लेकिन इस परिघटना के कारण स्टिग्मा, सामाजिक भेदभाव और जीवन के संघर्ष लगभग एक जैसे होते हैं. यहाँ दो महिलाओं का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है जो लंबे असंरचित साक्षात्कार पर आधारित है[4].

  1. लखनऊ निवासी श्वेता 24 वर्ष (काल्पनिक नाम) को कम्पनी में हेरा फेरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें तीन महीने जेल में रहना पड़ा और करीब 10 वर्षों तक मुकादमा लड़ना पड़ा. जिस कम्पनी में वो थी वहां पर वह सिर्फ दो घंटे के लिए एक कलर्क की हैसियत से जाती थी. वो अपनी पढ़ाई कर रही थी और खाली समय में आय के इस श्रोत से भी जुड़ गयी थी. उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था उस कम्पनी के अधिकारी ने उन्हें सचिव के पद पर नियुक्त किया है. अधिकारी श्वेता के नाम से हेराफेरी का सारा काम कर रहा था. इस बात की पुष्टि जल्दी ही हो गयी. इसलिए जमानत भी तीन महीने में ही मिल गयी लेकिन यह तीन महिना ही उनकी जिन्दगी बर्बाद करने के लिए पर्याप्त साबित हुआ. उनके परिवार में माँ पिता और दो छोटे भाई हैं.
  2. लखनऊ निवासी पायल 18 वर्ष (काल्पनिक नाम) गलत शिनाख्ती के आधार पर जेल गयी थी. उनके मोहल्ले में मारपीट की घटना हुई थी. पुलिस ने गलत शिनाख्त के आधार पर उन्हें जेल ले गयी थी. एक महीने में जमानत मिल गयी थी लेकिन जमानत की राशि का भुगतान न कर पाने के कारण उन्हें दो महीने और जेल में रहना पड़ा. पायल का मुक़दमा करीब दो सालों तक चला था. लेकिन जेल के वातावरण और वहां हुई बदसलूकी के कारण वो गहरे अवसाद में चली गयीं थी. करीब एक साल तक उनका इलाज कराना पड़ा. मानसिक अस्थिरता उनकी जिन्दगी का हिस्सा बन गया है. उनके घर के लोग पायल के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. पायल के परिवार में माँ पिता और पांच भाई बहन हैं जिसमें से वो तीसरे नंबर पर हैं. दो बहने छोटी हैं.

विश्लेषण- पेनल रिफॉर्म एंड जस्टिस एसोसिएशन की महासचिव और पेनल रिफॉर्म इंटरनेशनल की अध्यक्ष रानी धवन शंकरदास ने अपनी पुस्तक ‘ऑफ वीमेन ‘इनसाइड’: प्रिज़न वॉयस फ्रॉम इंडिया’ [5](2020)में जेलों के अंदर महिलाओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन किया गया है.

रानी धवन कहती हैं कि ‘जेल अपने कानूनी अपराधों के अनुसार कैदियों को वर्गीकृत कर सकते हैं. लेकिन एक जेल का सामाजिक समूह विशेष रूप से एक महिला जेल में सभी कानूनी अपराधों के बारे में नहीं होता है. यह इस बारे में होता है कि महिलाएं किस तरह से प्रथा, परंपरा जो कि सदियों से निर्धारित होती हैं उनको तोडती हैं. इस तरह की महिलाएं सामाजिक और नैतिक वर्जनाओं की बाधाओं को पार कर चुकी हैं. समाज में अक्सर धर्म कानून की तुलना में अधिक मजबूत स्वीकृति होने की उम्मीद की जाती है और सामाजिक रूप से इसी की मान्यता भी होती है. इसलिए कानून की नज़र में दोषमुक्त हुआ व्यक्ति समाज की नज़र में भी दोषमुक्त हो ये जरुरी नहीं है.

समाज का स्वरूप पित्रसत्तात्मक होने के चलते महिलाओं के लिए जीवन में अगर कोई इस तरह की घटना हो जाती है तो उनके लिए समस्याओं का पहाड़ टूट पड़ता है. श्वेता को सामाजिक बहिष्कार, तिरस्कार, सामाजिक भेदभाव झेलना पड़ा. उनका केस दस सालों से भी अधिक समय तक चला. जिसके चलते उनका विवाह नहीं हो पाया. लेकिन वो संघर्षशील महिला हैं, अपनी आजीविका के लिए लगातार प्रयासरत रहती हैं. उन्हें इस बात का डर है कि उनके माता पिता की मृत्यु के बाद उनका क्या होगा? उनके दोनों भाई अपनी अपनी जिंदगी और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए हैं. उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है की वह जहाँ भी नौकरी के लिए आवेदन देती हैं वहां उनके पिछले जेल जाने की घटना और केस के चलते नौकरी नहीं मिल पाती है. वह कहती हैं कि ‘इस समाज में इस घटना के बाद न्यायलय ने भले ही मुझे दोषमुक्त कर दिया गया हो लेकिन मुझे बहुत बड़ी सजा मिल रही है. यह सजा जीवन भर के लिए भुगतना है. मैंने कुछ नहीं किया लेकिन जेल में रहकर आई हूँ ये लोग भूल ही नहीं पाते है. न ही मुझे भूलने देते हैं. अब मेरी जिम्मेदारी सिर्फ मैं हूँ. मुझे ही अपने आपको पालना है. मेरे पास अपना कोई परिवार नहीं है अपने कोई बच्चे नहीं है.’

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उनके अनुसार इस समाज में उनकी कोई भूमिका नहीं है. प्रदत प्रस्थिति में वो केवल बेटी और बहन की भूमिका में हैं. और वो भी आश्रित. अगर वो अपने आजीविका के लिए लगातार प्रयासरत नहीं रही तो पूरी तरह से भाइयों पर ही आश्रित होना पड़ेगा.

‘एक प्राथमिक समस्या जिसका सामना लड़कियों और महिलाओं को करना पड़ता है, वह है अकेले रहने का डर’.[6] अधिकांश महिलाएं आश्रित होती हैं. उन्हें अपने पिता या पति पर आश्रित होना पड़ता है. यह समाज और परिवार का एक नैतिक नियम होता है जिसमें महिलाओं की भूमिका सार्वजनिक जीवन में न होकर घर के अंदर होती है. लेकिन आश्रित होने से कई गुना ज्यादा डर महिलाओं को अकेले रहने से होता है. समाज में अकेली महिला के लिए तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. गलत अभियोजन के चलते जेल जा चुकी महिलाओं का सबसे बड़ा डर यही होता है. किसी भी तरह के सामाजिक नैतिक मूल्यों के मापदंड से विचलन को महिलाओं के चरित्र से जोड़ कर देखा जाने लगता है.

श्वेता और पायल पायल को अपने चरित्र को लेकर हमेशा ताने सुनने पड़ते हैं. वो कहती हैं कि ‘जैसे यह मान लिया गया है कि ‘जेल में मेरे साथ यौन संबंध स्थापित हुआ है. लोग यही कहते हैं कि लड़कियां जेल में कैसे बच सकती हैं’. कोर्ट में पेशी के लिए जाने पर सभी महिलाओं की तलाशी ली जाती थी. उनके सभी कपडे उतरवा लिए जाते थे. तलाशी लेने वाले लोगों को यह फर्क नहीं पड़ता था कि बिना कपड़ों को उन्हें पुरुष भी देख रहे हैं. जेल में आपकी इज्जत, आपका आत्मसम्मान, आपका आत्मविश्वास सब चकनाचूर हो जाते हैं. इस आघात को सहना किसी भी निर्दोष महिला के लिए आसान नहीं होता है.

समाज में महिलाओं और पुरुषों की भूमिका बहुत ही स्पष्ट तरीके से विभाजित होती है. वर्तमान समय में इसमें कुछ बदलाव जरुर हुये हैं जिसके चलते सार्वजानिक जीवन में महिलाएं ऐसे बहुत काम कर रहीं है जिसे आज तक पुरुष करते आये थे और उनका ही वर्चश्व था, परन्तु संरचनात्मक रूप से इसमें कोई बदलाव नहीं है. महिलाओं को उग्र स्वभाव का नहीं माना जाता है. उन्हें स्वभाव से निष्क्रिय माना जाता है. महिलाओं की किसी भी क्षेत्र में सक्रीय भूमिका यानि पहल की भूमिका को बुरा ही माना जाता है. परिवार में निर्णय की लेने की क्षमता महिलाओं की नहीं होती है और अगर होती भी है तो बहुत ही सीमित होती है. महिलाओं की सामाजिक भूमिका अपने दायित्यों का निर्वहन करना होता है. उसके इसी भूमिका को नैतिक रूप से सही माना जाता है. अपराध जगत में भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की सक्रीय भागीदारी बहुत ही कम होती है. लेकिन एक बार किसी महिला के जेल चले जाने से उस पर जो सामाजिक कलंक लगता है उसे समाज भूलने नहीं देता है और महिलाएं सामान्य जीवन नहीं जी पाती हैं. जबकि पुरुष भी सामाजिक कलंक का सामना करते हैं लेकिन समाज पुरुषों की तुलना में महिलाओं के प्रति ज्यादा क्रूर रवैया अपनाता है.

श्वेता की भी यही स्थिति है. वो कहती हैं कि ‘मेरे साथ तो ऐसा व्यवहार होता है जैसे लड़कियां मुझसे बात भी कर लेंगी तो वो बदनाम हो जाएँगी’. कोई मुंह से कुछ नहीं कहता लेकिन सबकी नज़रे और व्यवहार ऐसे हैं कि सब कुछ समझ में आ जाता है. अब मैं अगर घोषित रूप से बुरी लड़की बन गयी हूँ तो यहाँ रहूँ या कहीं और क्या फर्क पड़ता है’.

भारतीय समाज का तानाबाना मुख्यतः पित्रसत्तात्मक है. महिलाओं के लिए एक खास तरह की दर्जाबंदी होती है जिसके अनुकूल उनको व्यवहार करना होता है. ऐसा न करने पर महिलाओं को अच्छी और बुरी महिलाओं के रूप में चिन्हित किया जाता है. सामाजिक नियम कानून और आदर्श महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग अलग होते हैं. नैतिकता जितनी महिलाओं के लिए कठोर होती है उतनी पुरुषों के लिए नहीं होती है. हालाकीं नौतिकता के पैमाने बदलते रहते हैं. फिर भी समाज में अपराध एक ऐसा क्षेत्र रहा है जहां महिलाओं की भागीदारी जबर्दस्त कम रही है. किसी पुरुष का जेल में रहकर आना और किसी महिला का जेल से आना बहुत ही अलग बात है. पुरुष अपने सामान्य जीवन के लिए संघर्षरत रहते हैं लेकिन कोई महिला अपना सामान्य जीवन ही नहीं शुरू कर पाती है.

महिलाओं के साथ सोशल स्टिग्मा यानि सामाजिक कलंक बहुत गहरे स्तर पर जुडा होता है. किसी भी तरह के तथाकथित सामाजिक नैतिक मूल्यों के भटकाव या उसके विरोध मे जाने पर समाज उन्हें ‘बुरी महिलाओं’ की नजर से देखना शुरू कर देता है. समाज में बनाये गए नौतिक मूल्य महिला और पुरुष के लिए समान नहीं होते हैं. उनमें बहुत गैरबराबरी होती है. समाज में अविवाहित महिला को भी अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है. वर्तमान में आर्थिक रूप से सशक्त और कामकाजी कुछ महिलाएं विवाह न करने का निर्णय ले रहीं है. आत्मनिर्भर महिलाएं ही इस तरह के निर्णय ले पाने में सक्षम हैं. लेकिन समाज में इसकी संख्या भी बहुत कम है. आत्मनिर्भर महिलाएं भी इस तरह के निर्णय लेने का साहस नहीं कर पाती हैं. क्योंकि सामाजिक रूप से परिवार को ही मान्यता प्राप्त होती है जिसमें पति पत्नी और बच्चे होते हैं. इसे ही आदर्श माना जाता है. ऐसी स्थिति में अगर किसी महिला का विवाह इस कारण से न हो पा रहा हो कि वह जेल जा चुकी है तो उस महिला के लिए जीवन कितना कठिन हो जाता है इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. श्वेता के खिलाफ दायर की गयी याचिका में बहुत सी कमियां थी. जिसके कारण उनके ऊपर लगे आरोप की पुष्टि नहीं हो पा रही थी. लेकिन जल्दी जमानत मिलने और दस वर्षों तक चले मुकदमें ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. जिसके चलते उनका जीवन बुरी तरह से अस्त व्यस्त हो गया.

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पायल के माता पिता की मुख्य चिंता में यह बात शामिल हैं कि उनके लड़कियों की शादी में कोई समस्या न आये. उनका मानना है कि समाज में तो हमारी बदनामी हो चुकी है उसको तो सहना ही पड़ेगा लेकिन लड़कियों की शादी अच्छे घर में हो जाती तो हमारी सारी समस्याएँ खत्म हो जाएँगी.

श्वेता के परिवार की भी बहुत बदनामी हुई. जिसके चलते कुछ समय तक उनको सामाजिक वहिष्कार जैसा माहौल झेलना पड़ा. शादियों में आना जाना, किसी पारिवारिक कार्यक्रम या मोहल्ले में किसी भी तरह के कार्यक्रमों में बुलाना बंद कर दिया गया. वो खुद भी किसी सार्वजानिक स्थान पर जाने से बचने लगीं. इस तरह की घटनाओं में सबसे पहले महिलाओं के चरित्र पर ही सवाल उठता है. महिलाओं के साथ जो सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनको अपने परिवारों में भी जगह कम मिलने लगती है. कहीं भी आने जाने कर सवाल जवाब शुरू हो जाते हैं. महिलाएं वैसे भी बहुत नियंत्रित जीवन को जीती हैं. अगर किसी महिला के जीवन में इस तरह का हादसा हो जाये तो उसके ऊपर नियंत्रण और ज्यादा कस जाता है.

श्वेता बताती हैं कि वो तीन महीने तक जेल में रही थी. लेकिन वहां से आने के बाद करीब साल भर तक वो घर में ही रही. एक तो उन्हें कहीं बुलाया नहीं जाता था, दुसरे परिवार के लोग खुद उन्हें अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे, तीसरा खुद उनके अंदर भी घर से बाहर जाने का भय हो गया था. उनके छोटे भाई जो उम्र में उनसे बहुत छोटे हैं, उन्होंने भी रोकना टोकना शुरू कर दिया. करीब साल भर के बाद वो अपने एक मित्र के घर गयी थी. उन्होंने बताया कि मुझे रिक्शा में बैठने पर भी डर लगता था कि कोई कुछ कह न दे. कहीं मुझे कोई पहचान न ले.

इस तरह का सामाजिक कलंक व्यक्ति को अंदर से असहज बना देता है. जिसके कारण उसके मन में हमेशा तमाम चीजों का डर बना रहता है. उसके हर तरह के व्यवहार में इसका असर देखा जा सकता है. व्यक्ति का आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बहुत कम हो जाता है.

निष्कर्ष- 31 दिसंबर, 2019 तक 4,78,600 कैदियों में से 4,58,687 पुरुष कैदी थे और 19,913 महिला कैदी थी.[7] जेल से बाहर आने पर पुरुष समाज के भेदभाव से लड़ सकते हैं लेकिन महिलाएं नहीं. बहुत महिलाएं जेलों से बाहर ही नहीं आना चाहती क्योंकि जेल से बाहर उनके लिए कोई जगह नहीं होती है. ऐसे में पुनर्वास और मुवावजा बहुत जरुरी कदम हो जाता है खासकर महिलाओं के लिए. सुझाव के रूप में राज्य द्वारा अपने अधिकारियों के कदाचार के लिए मुआवजे का पुरस्कार भुगतान भी निर्धारित किया जाना चाहिए. गलत अभियोजन के लिए दोषी व्यक्तियों पर कार्यवाही होनी चाहिए और उनसे जुर्माना लेना चाहिए. यदि ऐसा निर्धारित किया जाता है, जिसे राज्य बाद में ऐसे संबंधित अधिकारियों से वसूल कर सकता है और कानून के अनुसार उनके खिलाफ उचित कार्यवाही भी शुरू कर सकता है. मुआवजा या तो विशेष अदालत द्वारा तय मौद्रिक पुरस्कार के रूप में वित्तीय सहायता या परामर्श, रोजगार प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, और अन्य ऐसी सेवाओं के रूप में गैर-वित्तीय सहायता के माध्यम से हो सकता है. यह दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के पीड़ितों की सहायता करते हैं अभियोजन और दोषसिद्धि से जुड़े सामाजिक कलंक और समाज में उनके पुनर्वास को आसान बनाते हैं. अपराध की गंभीरता और कारावास की अवधि और नुकसान और स्वास्थ्य, संपत्ति और प्रतिष्ठा को नुकसान कुछ ऐसे कारक हैं जिन पर मुआवजे की राशि का निर्धारण करते समय विचार किया जाना चाहिए.

संदर्भ सूची-

https://ncrb.gov.in/en/prison-statistics-india-2019(03.06.2020) 11pm

https://eji.org/issues/wrongful-convictions/(03.06.2020) 10pm

https://thewire.in/women/india-women-prisoners-rights(01.06.2020) 07pm

दोष मुक्त महिलाओं से और उनके परिवार के लोगों से विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है. यहाँ इस परिघटना को समझने के लिए विस्तृत बातचीत का बहुत ही संक्षिप्त विवरण दिया गया है.

Shankardass, Rani Dhavan (2016) Of Women ‘Inside’: Prison Voices From India, Routledge, India

https://www.law.northwestern.edu/legalclinic/wrongfulconvictions/events/documents/psychological-consequences-of-wrongful-conviction-in-women.pdf(02.06.2020) 11pm

https://ncrb.gov.in/en/prison-statistics-india-2019(03.06.2020) 05pm

  1. https://ncrb.gov.in/en/prison-statistics-india-2019(03.06.2020) 11pm

  2. https://eji.org/issues/wrongful-convictions/(03.06.2020) 10pm
  3. https://thewire.in/women/india-women-prisoners-rights(01.06.2020) 07pm
  4. दोष मुक्त महिलाओं से और उनके परिवार के लोगों से विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है. यहाँ इस परिघटना को समझने के लिए विस्तृत बातचीत का बहुत ही संक्षिप्त विवरण दिया गया है.
  5. Shankardass, Rani Dhavan (2016) Of Women ‘Inside’: Prison Voices From India, Routledge, India
  6. https://www.law.northwestern.edu/legalclinic/wrongfulconvictions/events/documents/psychological-consequences-of-wrongful-conviction-in-women.pdf(02.06.2020) 11pm
  7. https://ncrb.gov.in/en/prison-statistics-india-2019(03.06.2020) 05pm

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