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स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में राष्ट्रीय एकता

किसी भी देश में वर्ण-जाति,धर्म-संस्कृति और भाषा-क्षेत्र जैसी विविधता का होना असामान्य बात नहीं है। लेकिन ‘राष्ट्र’ में इन सबकी एकता का होना उतना ही अपरिहार्य है,जितना इनका अलग अस्तित्व रखना इनकी पहचान के लिए आवश्यक है। प्रसिद्ध भारतीय चिन्तक श्री मा स गोलवलकर ने ‘राष्ट्र’ शब्द को संबोधित करते हुए लिखा है-“ जो भाव राष्ट्र के अन्तर्गत है,वह सम्पूर्ण में अविच्छिन रुप से घुले-मिले पाँच विशिष्ट अंशों का योग है। प्रसिद्ध पाँच इकाइयाँ-भौगोलिक(देश),जातीय(जाति),धार्मिक(धर्म),साँस्कृतिक(संस्कृति) और भाषात्मक(भाषा) है।“1 प्राचीन भारत में ये पाँचों इकाइयाँ पूँजीभूत थी,इसलिए हामारा देश सुखी,समृद्ध और शांतिमय था और इन्हीं पूँजीभूत इकाईयों के बल पर हमने स्वतंत्रता हासिल की। लेकिन मध्यकाल की भाँति आज धीरे-धीरे पुन: जाति,भाषा,धर्म,संस्कृति तथा प्रान्तीय स्तर की संकुचित भावना हमारे मन-मस्तिष्क में अप्रत्यक्ष रुप में प्रवेश करती जा रही है,चाहे उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप की ही प्रधानता क्यों न हो। यह स्थिति हमारे देश,उसकी एकता और उसकी अन्तर्बाह्य सुरक्षा के लिए घातक रुप ले सकती है,यह विचारणीय प्रश्न है।

स्वतंत्रता के बाद भारत की राष्ट्रीय एकता को अखंड बनाए रखने के लिए हिन्दी साहित्य में कविता,कहानी,उपन्यास की भाँति हिन्दी में लिखित नाटकों में हमारी सामाजिक-साँस्कृतिक,धार्मिक-साम्प्रदायिक,राजनैतिक एकता को पुनर्स्थापित करने और उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए नाटककारों ने कथ्य,विचारधारा और अभिनय के स्तर पर अनेक सार्थक प्रयास किए हैं। जगदीश चंद्र माथुर ने ‘कोणार्क’,’शारदीया’ और ‘पहला राजा’ जैसे नाटकों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ बनाने में सफ़लता प्राप्त की है। हिन्दू-मुस्लिम धर्म तथा सम्प्रदायगत बढ़ती खाई को पाटना वर्तमान भारत के अस्तित्व की रक्षार्थ अत्यावश्यक है। हम सभी एक-दूसरे के समाज और धर्म का आदर करके ही अपनी मातृभूमि की गोद में समानता का हक पा सकते हैं।जगदीश चन्द्र माथुर के ‘शारदीया’ का नरसिंहराव युद्ध के पश्चात सिंधिया से यही शर्त लागू करने की प्रार्थना करता है-“पहली घोषणा तो यह कि दोनों राज्यों में हिन्दू और मुसलमानों को अपने धर्मकाज करने की पूरी आजादी होगी,न दखन में गोवध होगा ,न महाराष्ट्र में खुदापरस्ती पर रोक-टोक । और दूसरी घोषणा यह कि हिन्दू और मुसलमान दोनों परमात्मा की एक बराबर संतान है।इसलिए न हिन्दू मंदिरों का आघात होगा,न मुसलमान मजारों,पीरों और पैगंबरों का अपमान किया जाएगा। दोनों एक-दूसरे के साथ मेल-मिलाप से रहेंगे-एक माँ की गोद में दो भाई।“2 सभी धर्मों को भारतीय संस्कृति ने उदारता के साथ ग्रहण किया है और भविष्य में सर्वधर्म समभाव की यह धारणा यहां गूंजित होती रहेगी,’अशोक’ यही घोषणा करता है-“वैदिक धर्म,जैन धर्म और सद्धम्म और अन्य भी जो धर्म है,वे एक-सी पूज्य दृष्टि से देखे जाते हैं और देखे जाएंगे।“3 आज राजनीति में इसी धर्म निरपेक्षता की जरुरत है।

भारत में कभी-कभी दो जाति या धर्मों के त्योहार एक ही दिन आ जाते हैं और दोनों धर्मों के अनुयायी उन्हें मनाने के लिए जुलूस/शोभायात्रा निकालते हैं,तब अचानक उनमें धार्मिक जज्बात एकनिष्ठ रुप से आने लगते हैं और देखते ही देखते साम्प्रदायिक आग भड़क उठती है। आज का मनुष्य साम्प्रादायिकता की आग में जुलस रहा है। देश में चारों तरफ़ फ़ैलती यह आग और वैमनस्य की भावना सभी का नाश और अहित ही करेगी,यह कटु सत्य किसी से छिपा नहीं है। हम सभी सम्प्रदायों का सम्मान तथा उपकार करके ही अपने समुदाय का भी हित तथा उपकार कर सकते हैं।सेठ गोविन्ददास के ‘अशोक’ में कारुबाकी राजा अशोक से कहती है-“मनुष्य को दूसरे सम्प्रदायों का भी आदर करना चाहिए। ऐसा करने से अपने सम्प्रदाय की उन्नति और दूसरे सम्प्रदायों का उपकार होता है।इसके विपरीत आचरण से न केवल दूसरे सम्प्रदाय का अपकार ही होता है वरन अपने सम्प्रदाय को भी क्षति पहुँचती है….आपस में मिल-जुलकर रहना और दूसरे धर्म को आदर से सुनना ही अच्छा है।“4

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कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता की आज भी किंवदंत मिसाल है,क्योंकि वे हिन्दू की संतान और मुसलमान माता-पिता की परवरिश में पले-बढ़े थे। जन्मजात ही कबीर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप में हिन्दू-मुस्लिम समन्यशीलता को हमेशा बढ़ावा देते रहे और आज के सन्दर्भ में तो उनकी प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है।कबीर को अपने समय के दोनों धर्मों-सम्प्रदायों की कुरीतियों-बुराइयों का विरोध करने के कारण अनेक असहनीय कष्ट झेलने पड़े,लेकिन वे कभी इससे पीछे नहीं हटे और निरन्तर सुधार के रास्ते पर चलते रहे। भीष्म साहनी के ‘कबीरा खड़ा बजार में’ में कबीर अपनी माँ नीमा से कहते हैं-“कोई हिन्दू पूछेगा तो कहूँगा ब्राहमणी का बेटा हूँ। कोई तुर्क पूछेगा तो कहूँगा,नीमा मुसलमानिन का बेटा हूँ।यही ना ? इससे हिन्दू भी कोड़े नहीं मारेंगे और तुर्क भी कोड़े नहीं मारेंगे।तू यही चाहती है,ना ?”5

महात्मा गाँधी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अहिंसक नेतृत्वकर्ता रहे हैं। उनका स्वभाव और उनके जीवन के सिद्धांत भारतीयों की एकता और स्वतंत्रता-भावना से परिपूर्ण थे। वे मरकर भी भारत की आजादी के समय भारत के दो टुकड़े नहीं चाहते थे और विभाजन को वे खुद के सिद्धांतों के अनुरुप सदियों से साथ रह रहे हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने वाली सोच मानते थे। गाँधीजी की सोच और उनके सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। सुशील कुमार सिंह के ‘अलख आजादी की’ नाटक में गाँधीजी का कथन इसका प्रमाण है। “गाँधीजी:दो कौमों का सिद्धांत असत्य है…हिन्दुस्तान के मुसलमान विभाजन पर जोर दें तो मैं अहिंसा का पुजारी होने के नाते उन्हें रोक नहीं सकता…लेकिन यह एक कौम के रुप में साथ रहने के लिए अनगिनत हिन्दुओं और मुसलमानों ने सदियों तक जो काम किए हैं…उसे धूल में मिलाना है…मेरी आत्मा इस कल्पना के विरुद्द बगावत करती है कि हिन्दुत्व और इस्लाम दो परस्पर विरोधी संस्कृतियों और सिद्धांतों के प्रतिनिधि हैं।“6

धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर भारत में आज भी यदा-कदा वर्णों की असमानता चरम पर दृष्टिगत होती है। देश में जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव के चलते जाने कितनों की जान बेवजह ले ली जाती है,कितनों को सरेआम बेआबरू किया जाता है और कितने ही लोग स्वयं को उच्च वर्ण/ जाति का समझकर अपने से निम्न को नीच तथा हीन मानकर उनके साथ ‘प्रार्थी-सा’ व्यवहार करते हैं? आजादी के इतने वर्षों बाद भी ऐसी नराधम सोच का होना हमारी एकता के लिए विघातक सिद्ध हो रहा है,क्योंकि इससे एक ही धर्म में अनेक परतें बनती जा रही है। हरिकृष्ण प्रेमी के ‘शक्ति-साधना’ में पतंजलि पुष्यमित्र को ब्राहमण-क्षत्रियत्व से ऊपर ऊठकर सोचने की आवश्यकता पर बल देता हुआ कहता है-“इस धरती पर न कोई ब्राहमण न कोई क्षत्रिय । जाति और वर्णों की सीमाएँ धोखा है वत्स्। बुद्धि सबके पास ,भुजाएँ भी सबके पास है।जब मनुष्य मस्तिष्क से काम लेता है,तब वह ब्राहमण है,चाणक्य है।जब वह भुजाओं में मानव-कल्याण के लिए तलवार पकड़ता है,तब वह क्षत्रिय है,चंद्रगुप्त है।जागो मेरे चंद्रगुप्त निद्रा से जागो।“7

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धार्मिक,भाषिक,सामाजिक और प्रादेशिक रुप से भारतीय मनीषियों ने अखंड भारत की कल्पना की थी,जिसे हमें बनाए रखना है।‘शक्ति-साधना’ में श्रीचंद और पुष्यमित्र का संवाद इसी एकता का समर्थन करता हमें प्रेरित कर रहा है आज भी। “श्रीचंद: सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से सारा भारत सदा एक रहा है।किसी धर्म को लीजिए उसके अनुयायी हिमालय से लेकर भारतीय सागर तक फ़ैले हुए हैं-बौद्ध,वैदिक धर्मावलंबी और जैन।बौद्धों के मंदिर विहार,स्तूप भारत के प्रत्येक कोने में बने हुए हैं,इसी प्रकार जैन मंदिर भी और शिव,राम और कृष्ण के मंदिर भी। हमारी पवित्र नदियों में जहां उत्तर की गंगा-यमुना आदि को और मध्य की नर्बदा-गोदावरी को माना गया है तो वहीं दक्षिण की कृष्णा-कावेरी को भी। भारत के मनीषियों ने सदा ही एक और अखंड भारत की कल्पना की है। पुष्यमित्र:प्रकृति ने इसे अविभाज्य भू-खण्ड बनाया है,धर्म के नाम पर भी इसका विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई प्रदेश ऐसा नहीं जहां केवल केवल एक धर्म के निवासी हो,विभिन्न धर्मों के मानने वाले अपने विश्वास के अनुसर जीवन-यापन करते हुए भाई-भाई की भाँति रहते हैं।“8

प्राचीन भारत कर्म आधारित भारत था,इसलिए जाति-धर्म,उच्च-निम्न जैसे कोई शब्द ही नहीं थे। धीरे-धीरे कर्म से निकलकर हमारी व्यवस्था जाति-वर्ण पर आने लगी तो समाज में अस्पृश्यता-छुआछूत जैसी घृणास्पद परम्परा पनपी। इसके कारण हमारी सामाजिक एकता खंड-खंड होने लगी। आज के वैज्ञानिक युग में भी ऐसी भावना और सोच का होना आश्चर्यजनक भी है और भविष्य के भारत के लिए एक चेतावनी भी। शंकर शेष के ‘बाढ़ का पानी’ में इसी समस्या को गाँव में निम्न जाति के माने जाने वाले बटेसर के सत्य-कथन के माध्यम से उठाया है -“बटेसर:चारों ओर मनुष्य-मनुष्य को अस्पृश्य समझता है। आदमी अब चंद्रमा पर पहुँच चुका है,यह छुआछूत हमारे देश की छाती पर सबसे बड़ा घाव है। दूसरे लोग घाव का इलाज करते हैं,पर हम आज भी उसे पाल रहे हैं,इस बाढ़ ने हमें सबक दिया है। ठीक है वह हमारा सब कुछ बहाकर ले गयी,पर साथ ही हमारे मनों का मैल भी ले गई। पंडित,एक इससे भी भयानक बाढ़ हमारे देश को घेर रही है,यह है आपसी फ़ूट की।साम्प्रदायिकता की। अनुशासनहीनता की। स्वार्थ की और हिंसा की। यह बाढ़ हमें दिखाई नहीं देती,पर हम घिर गए हैं…”9 इसका समाधान भी यूं सुझाया गया है कि जैसे सूर्य-चंद्र,धरती-आकाश,हवा-पानी,पेड़-पौधे,जीव-जन्तु किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं,वैसे ही हमें भी एक होकर समानता-एकता का व्यवहार करना चाहिए। “ठाकुर:पंडित,भगवान क्या ब्राहमण के लिए अलग,ठाकुर के लिए अलग और अछूत के लिए अलग पानी बरसाता है? सब पानी एक है। फ़रक केवल हमारे दिमाग में है,…उसे मैंने छुआ है। नवल ने छुआ है,छीतू ने इसे हाथ लगाया है।तब तुम क्यों इस पानी को पार कर आए।देखो पंडित तुम्हारा तर्कशास्त्र ही गलत है-सब चीजें एक दूसरे को छू रही है।“10 प्रकृति का यह सन्देश हमें शिरोधार्य कर एकता के सूत्र में बँधे रहना होगा,एक मजबूत भारत के लिए।

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वर्तमान परिस्थितियों में भारत बाहरी दुश्मनों से तो चिंतित और घिरा हुआ है ही,आन्तरिक देशद्रोहियों से भी बुरी तरह संत्रस्त है,जख्मी है। ऐसे में देश के इन आन्तरिक गद्दारों और देशद्रोहियों का सफ़ाया करना अत्यावश्यक है ताकि देश एकता के सूत्र में बँधा रह सके। हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘शक्ति-साधना’ पर बल देते हुए इसका उपाय सुझाया है-“देश अनेक राज्यों और समुदायों में विभाजित है। हमें भारत के प्रत्येक नागरिक के ह्दय में देश के प्रति आस्था उत्पन्न करनी है। विदेशियों से पहले देशद्रोहियों का सफ़ाया करना है और सारे देश को एकता के सूत्र में बाँधना है।“11

हमारा सम्पूर्ण भारत एक परिवार है,जिसका प्रत्येक सद्स्य अगर अपने परिवार के प्रति समर्पित हो,हम बड़ों का आदर करें और बड़े-बुजुर्ग छोटों की उपेक्षा के बजाय उनको महत्व दें तो विदेशी कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो,वह हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है।इस पारिवारिक एकता के सूत्र को समझाते हुए प्रेमीजी लिखते हैं-“यह सम्पूर्ण भारत एक बड़ा परिवार है।परिवार का प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने सुख,अपनी सुरक्षा और अपनी स्वतंत्रता की चिंता करेगा तो लुटेरे एक-एक कर सबको लूट लेंगे। यदि सब मिलकर सबकी रक्षा करेंगे तो लुटेरे शक्तिशाली परिवार का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे।“12

इस प्रकार निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आजादी के बाद हिन्दी में लिखित ऐतिहासिक-सामाजिक नाटकों में हमारी सामाजिक-साँस्कृतिक,धार्मिक-साम्प्रदायिक,राजनैतिक एकता को पुनर्स्थापित करने और उसे अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए नाटककारों ने कथ्य,विचारधारा और अभिनय के स्तर पर अनेक सार्थक प्रयास किए हैं,जिनकी आज के भारत की एकता-अखंडता के लिए महत्ती आवश्यकता है।

सन्दर्भ ग्रंथ सूची:

1 श्री मा स गोलवलकर : हमारी राष्ट्रीयता पृष्ठ-32

2 जगदीश चंद्र माथुर : शारदीया पृष्ठ-44-45

3 सेठ गोविन्ददास : अशोक पृष्ठ-78

4 सेठ गोविन्ददास : अशोक पृष्ठ-114

5 भीष्म साहनी : कबिरा खड़ा बजार में पृष्ठ-22

6 सुशील कुमार सिंह : अलख आजादी की पृष्ठ-80-81

7 हरिकृष्ण प्रेमी : शक्ति साधना पृष्ठ-26

8 हरिकृष्ण प्रेमी : शक्ति साधना पृष्ठ-80

9 शंकर शेष : बाढ़ का पानी पृष्ठ-62

10 शंकर शेष : बाढ़ का पानी पृष्ठ-45

11 हरिकृष्ण प्रेमी : शक्ति साधना पृष्ठ-89

12 हरिकृष्ण प्रेमी : अमृतपुत्री पृष्ठ-19

डा मोहन लाल जाट

सहायक आचार्य-हिन्दी

स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय

सेक्टर-11,चंडीगढ़ मोबाइल -9016142497, email:dr.mohanlaljat@gmail.com

 

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