हिन्दी साहित्य और सिनेमा में एल०जी०बी०टी० समुदाय का मूल्यांकन

*सविता शर्मा

हिन्दी साहित्य में लगभग नब्बे के दशक से ही विमर्शों का दौर रहा है। हिन्दी कथा साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श एवं आदिवासी विमर्श अपनी निर्णांयक भूमिका के साथ अवस्थित हुए। दरअसल ये ऐसे विमर्श हैं जिन्होंनें आज़ादी से पहले ही संघर्ष करना शुरू किया और एक पूरा विमर्श बनते-बनते इन्हें कई साल लगे। किन्तु वर्तमान में हिन्दी साहित्य में ये तीनों विमर्श – दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श अपने चरम पर हैं।

साहित्य एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा प्रत्येक वर्ग की सुध ली जाती है। दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श के साथ-साथ समाज में कई अन्य वर्ग भी हैं। जिन्हें हाशिये के भी हाशिये पर जगह नहीं मिली है। इस प्रकार के विमर्श में सबसे मुख्य एल०जी०बी०टी० विमर्श है। एल अर्थात् ‘लेस्बियन‘, जी अर्थात् ‘गे‘, बी०अर्थात् ‘बाएसेक्सुअल‘ तथा टी० अर्थात् ‘ट्रांसजेंडर‘ है। यह एक ऐसा समूह है जिसका अस्तित्व तब से ही समाज में है जब से पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हुआ।

प्राचीन काल से ही इस एल०जी०बी०टी० वर्ग की उपस्थिति हमारे समाज में रही है और यही नहीं सम्मानीय स्थिति में रही है, जिसके प्रमुख उदाहरण हैं-

वात्सयायन का ‘कामसूत्र‘, वेद व्यास का महाभारत‘, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र‘ तथा ‘पुराण‘ आदि। वर्तमान में ‘खजुराहों के मंदिर‘ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जो कि यूनेस्को की धरोहर सूची में भी शामिल है। खजुराहों के मंदिर जो कि 11वीं सदी के चन्देलों नें बनवाए थे, तत्कालीन समाज में समलैंगिकता या एल०जी०बी०टी० समुदाय की उपस्थिति का एक जीता-जागता प्रमाण है। अतः इस समुदाय के अस्तित्व को हम मानते तो है किन्तु जाने नहीं।

हैरानी की बात तो यह है कि साहित्य जो कि अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। उसने भी इस समुदाय की ओर ध्यान नहीं दिया। हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० विषय पर लिखे गए ग्रंथ इतने है कि इन्हें आसानी से अंगुलियों पर गिना जा सकता है।

जिनमें से ज्यादातर ग्रंथ हाल ही में लिखे गए हैं। जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इन समुदायों को मनुष्य का दर्जा देने की पहल की गई। उच्चतम न्यायालय के ऐसे दो फैसले इस प्रकार हैं-

2014 में ट्रांसजेंडर समुदाय को तृतीय लिंग का दर्जा देते हुए 3 % का आरक्षण दिया तो 6 सितम्बर, 2018 में ‘धारा 377’ जो कि अप्राकृतिक यौन संबंधों के विरूद्ध थी को गैर-कानूनी बताते हुए ‘निजता के अधिकार‘ के तहत स्वेच्छा से 18 वर्ष के व्यस्क व्यक्ति स्त्री या पुरूष के साथ एकांत में संबंध बना सकते हैं मो मान्यता दी है।

ये दो फैसले माननीय उच्चतम न्यायालय ने जब से दिए हैं तब से ही ज़्यादातर हिन्दी जगत भी इन हाशिए के वर्ग के प्रति जागा है। इसमें भी केवल ट्रांसजेंडर के संदर्भ में ही। समलैंगिक समुदाय अभी भी समाज के साथ-साथ साहित्य में भी हाशिये पर ही है। जिस कारण एल०जी०बी०टी० समुदाय का संघर्ष और गहरा ही होता है कम नहीं।

साहित्य के साथ-साथ सिनेमा भी एक ऐसा माध्यम है जो समाज का आईंना होता है। किन्तु विडम्बना यह है कि साहित्य की तरह सिनेमा में भी इन एल०जी०बी०टी० वर्ग को लगभग नगण्य स्थान ही मिला है और मिला भी तो हास्यास्पद या नकारात्मक छवि के रूप में। इस प्रकार की कुछ फिल्में – संघर्ष, मर्डर-2, सड़क, दोस्ताना, कल हो न हो हैं।

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किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल नकारात्मक सिनेमा ही एल०जी०बी०टी० वर्ग पर बना है। कुछ सकारात्मक फिल्में भी इस वर्ग में हैं जैसे- तमन्ना, बोल, शबनम मौसी, डियर डैड, हनीमून ट्रेवल प्रा० लिमिटेड, शुभ मंगल ज़्यादा सावधान आदि।

दरअसल सिनेमा एक श्रव्य-दृश्य माध्यम है, जिस कारण जो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं उन पर भी फिल्मों का गहरा असर पड़ता है। जिस कारण सिनेमा को समाज में अपनी भूमिका समझते हुए वृहद स्तर पर ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो हाशिये पर जिंदगी जीने को मजबूर हैं, क्योंकि यदि साहित्य की जगह हमारी स्टडीरूम तक है तो सिनेमा की बैडरूम तक। अतः सिनेमा को चाहिए कि वृहद स्तर पर ऐसे विषय उठाए, क्योंकि इसकी पहुँच प्रत्येक उम्र के व्यक्ति से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक है। जिससे समाज में एल०जी०बी०टी० वर्ग की छवि बदलने तथा उन्हें भी आम मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने में आसानी होगी।

हिन्दी के प्रख्यात रचनाकार राजकमल चैधरी की बहुचर्चित बहुप्रशंसित कृति है ‘मछली मरी हुई‘। लेखक ने अपनी इस महत्त्वकांक्षी कृति में जहाँ महानगर कलकत्ता के उद्योग जगत की प्रमाणिक और सजीव तस्वीर प्रस्तुत की है, वहीं आनुषंगिक विषय के रूप में समलैंगिक स्त्रियों के रति-आचरण का भी इस उपन्यास में सजीव चित्रण किया है। इसमें ठनकती हुई शब्दावली और मछली के प्रतीक की ऐसी सृजनात्मक है जो लेखक की करूणा सर्वत्र सींचती रहती है।

उपन्यास को स्त्री-समलैंगिकता पर केन्द्रित उपन्यास के रूप में देखा जा सकता है, जो लेखक के इस विषय पर गहन शोध का ही परिणाम है।

समलैंगिकता पर आधारित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का ग्रंथ ‘कुल्लीभाट‘ एक प्रसिद्ध पुस्तक है। कुल्लीभाट अपनी कथावस्तु और शैली-शिल्प के नयेपन के कारण न केवल निराला के गद्य साहित्य की बल्कि हिन्दी के संपूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है।

कुल्ली के माध्यम से निराला दिखाते है कि केवल समलैंगिक होने के कारण समाज में वह हेय की दृष्टि से देखा जाता है हालांकि कुल्ली है बड़ा संवेदनशली व्यक्ति। कुल्ली के लिए जात-पात कोई मायने नहीं रखती उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है मनुष्यत्व, जिस बात को बाद में बाकी लोग मानते भी हैं। कुल्ली राजनीति में सक्रिय होता है किन्तु उसका अंत इतना दयनीय है, जिससे कि पाठक और स्वयं निराला भी उसकी पीड़ा महसूस करते हैं। समलैंगिकों के विभिन्न क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद उनके जीवन का अंत कितना दर्दनाक है यह हम ‘कुल्लीभाट‘ में देख सकते है। गोर्की के शब्दों में – ‘‘जीवन-चरित जैसे आदमियों के बने और बिगड़े, कुल्ली भाट ऐसे आदमी न थे। उनके जीवन का महत्त्व समझे, ऐसा अब तक एक ही पुरूष संसार में आया है, पर दुर्भाग्य से अब वह संसार में नहीं रहा।‘‘ (पृष्ठ सं० 13, कुल्लीभाट, निराला, राजकमल, पेपरबैक्स, नई दिल्ली)

यही नहीं बल्कि ट्रांसजेंडर अर्थात् किन्नर समुदाय पर लिखा गया प्रथम उपन्यास ‘यमदीप‘ भी इस समाज के दुख-दर्द को बेबाकी से बयां करता है। हमारे समाज के घोर अभिशप्त माने जाने वाले किन्नर समुदाय के अंतरंग जीवन की मार्मिक गाथा प्रस्तुत करने वाला यह उपन्यास अपने-आप में एक अद्वितीय कृति है। यह उपन्यास लेखिका नीरजा माधव को एक ओर तो स्त्री-लेखन एवं दलित-लेखन की भीड़ से अलग करता है, तो दूसरी ओर, नारी – अस्मिता और शोषित – उपेक्षित वर्ग के उन अनछुए पहलुओं को भी सामने रखता है, जिनकी ओर आज तक कोई सजग लेखनी उन्मुख ही नहीं हुई।

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साथ ही सुप्रसिद्ध कथाकार महेंद्र भीष्म का उपन्यास ‘किन्नर कथा‘ सख्.त भाषा में बेहद गंभीरता के साथ प्रश्न उठाता है कि प्रकृति ने किन्नरों के साथ अन्याय क्यों किया? क्यों हम किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल करने से बचते रहे हैं, क्यों यह माना जाता है कि वह हमारी तरह इन्सान नहीं हैं? राजघराने में अपनी जुड़वां बहन के साथ जन्म लेने वाली सोना उर्फ चंदा देखने में अतीव सुन्दर है, उसके बोलने पर ही पता लगता है कि वह किन्नर है। बचपन से ही उसे पिता ने लोकलाज के चलते अपने विश्वस्त दीवान को सौंप दिया था ताकि वह उसे मार डाले। लेकिन वह उसे एक किन्नर गुरू तारा को दे देता है। यहीं से सोना नाम बदलकर चंदा बन जाती है। संयोग से चंदा 15 बरस बाद अपनी ही जुड़वां बहन के विवाह में पहुँचती है। अद्भुत कथा – प्रवाह में बहा ले जाने वाली यह कथाकृति जहाँ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से टकराती है, वहीं कथारस की ऐसी सृष्टि भी करती है कि सांस थामे पाठक पढ़ता ही चला जाए। इसका पाठक संवेदना के उन तंतुओं से स्वतः जुड़ता चलता है जो बताते हैं कि हर किन्नर का एक अतीत होता है। परिवार से विस्थापन का दंश भुगतते हुए उसका अनाम संघर्ष उसे कैसे तपाता रहता है। बेहद गंभीरता के समय किन्नरों की दुनिया की पड़ताल करते हुए महेंद्र भीष्म का यह उपन्यास पाठकों की सोई संवेदना को झिंझोड़कर जगा देता है। किन्नरों की समस्याओं के साथ बाहरी दुनिया को अपने अनूठे अंदाज में परिचित करते हुए यह उपन्यास अपने आपको पढ़ा ले जाने का माद्दा रखता है।

इसी की तरह चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा’ भी है जिसमें लेखिका बताती है कि किस प्रकार केवल किन्नर भर होने से विनोद जैसे बच्चे अपने परिवार से दूर जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उपन्यास में विनोद बार-बार प्रश्न भी करता है कि यदि आँख की विकलांगता, टांग की विकलांगता या अन्य किसी शरीर के अंग की विकलांगता के कारण आप लोग अपने बच्चे को घर से बाहर नहीं फेकते तो केवल लिंग विकलांगता के बच्चों को इतनी बड़ी सज़ा क्यों? साथ ही लेखिका किन्नरों की समस्याओं के साथ-साथ घर वापसी जैसे समाधान भी उपन्यास में समझातीं हैं।

‘दरमियाना’ सुभाष अखिल का एक किन्नर विषय पर आधारित एक अन्य उपन्यास है, जिसमें लेखक इस समुदाय की व्यथा कहता है। दरअसल ‘दरमियाना’ नाम से 1980 में ‘सारिका’ में इनकी कहानी प्रकाशित हुई जिसे थर्ड जेंडर पर आधारित प्रथम कहानी भी माना जाता है, इसी को लेखक ने उपन्यास के रूप में भी अब लिखा है।

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सहानुभूति से अच्छा वर्णन स्वानुभूति में होता है और आत्मकथा इसका सबसे अच्छा माध्यम रहा है। किन्नर समाज पर आधारित ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी‘ (लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी) की आत्मकथा तो है ही साथ ही ‘पुरूष तन में फंसा मेरा नारी मन‘ मानोबी बंधोपाध्याय की एक और आत्मकथा है जिसमें मानोबी बताती हैं कि किस प्रकार उन्होंने किन्नर होने के बावजूद संघर्ष करते हुए पश्चिम बंगाल के एक कॉलेज में प्रिंसिपल का पद प्राप्त किया। अत्यंत बेबाकी से उन्होंने यह आत्मकथा लिखी है। इन आत्मकथाओं से अच्छा माध्यम इन हाशिये के समाज को जानने का शायद ही कुछ और हो।

यही नहीं बल्कि ‘हमख़्याल‘ एक अन्य कहानी संग्रह है जो समलैंगिक समाज के यथार्थ को पकड़ने की कोशिश करता है। एम० फिरोज़ की यह कृति तारीफ के काबिल है तो वहीं प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली‘ एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो अपने में सम्पूर्ण एल०जी०बी०टी० समुदाय को न सिर्फ समेटता है बल्कि उनकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक पक्षों को पाठकों के सामने रख के इस वर्ग की समस्याओं से रूबरू कराता है जो जन्म से लेकर मरण तक चलती ही रहती हैं। यही नहीं बल्कि यह उपन्यास यह भी बताता है कि दुनिया में हर जगह इस वर्ग की उपस्थिति है। एबीसीडी अर्थात् आरा, बलिया, छपरा प्रत्येक स्थान पर यह समुदाय मिल जाएगा। किन्तु हर जगह इस वर्ग की स्थिति ऐसी ही दोयम दर्जे की है।

इन तमाम रचनाओं के द्वारा हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० वर्ग की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं की पड़ताल तो की जा सकती है साथ ही साथ उनके संभावी समाधानों का भी पता लगाया जा सकता है।

दरअसल यह एक ऐसा विषय है जिस पर साहित्य और सिनेमा ने तो कम ध्यान दिया ही है साथ ही शोध की स्थिति भी लगभग नगण्य है। जिस कारण ये समाज निम्नत्तर स्थिति में जीवन जीने को अभिशप्त है। आँकड़ों के मुताबिक एल०जी०बी०टी० वर्ग की लगभग 25 लाख लोगों की जनसंख्या हैं जो कि दयनीय स्थिति में ही हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसलों से इनकी स्थिति में सुधार की कुछ उम्मीद है किन्तु समाज इन्हें कहाँ तक अपना पाएगा यह अभी भविष्य के गर्त में हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ

  1. माधव, नीरजा, यमदीप, सामयिक पेपरबेक्स, नई दिल्ली, 2017
  2. मुदग्ल, चित्रा, पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016
  3. सौरभ प्रदीप, तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2011
  4. चैधरी, राजकमल, मछली मरी हुई, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पेपरबैक्स संस्करण, 2009
  5. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी, कुल्ली भाट, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण, 2019
  6. सिंह, विजेंद्र प्रताप, कथा और किन्नर, अमन प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2016
  7. सिंह, विजेंद्र प्रताप, हिन्दी उपन्यासों के आइनें में थर्ड जेंडर, अमन प्रकाशन, कानपुर
  8. खराटे, मधु, हिन्दी उपन्यासों में किन्नर विमर्श, विकार प्रकाशन कानपुर
  9. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अतीत और वर्तमान, विकार प्रकाशन, कानपुर
  10. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर: हिन्दी कहानियाँ, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर
  11. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अनूदित कहानियाँ, अनुसंधान पब्ल्शिर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स, कानपुर

*शोधार्थी, पीएच.डी. हिन्दी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

ईमेल- savita3590@gmail.com

 

 

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