नलिन विलोचन शर्मा: साहित्यिक योगदान

अजय कुमार 

*शोध-छात्र, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, संपर्क नं. 7065710208, ईमेल. ajay1147@gmail.c

सारांश

नलिन विलोचन शर्मा ने हिन्दी आलोचना का नया मापदण्ड तैयार किया। वे अपने आलोचनात्मक रचनाओं, साहित्यिक टिप्पणियों और पुस्तक समीक्षाओं के जरिये हिन्दी साहित्य को नवीन रूप से आंदोलित करने में सफल हुए। वे नए-पुराने सभी लेखकों के बीच समान रूप से प्रतिष्ठित थे। कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, जीवनी आदि विधाओं में भरपूर लेखन कार्य किये। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया। उनके जीवन काल में ‘दृष्टिकोण’ और ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ नामक दो आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हुई। मृत्यु के उपरांत उनकी तीन आलोचनात्मक पुस्तकें-‘मानदंड’, ‘हिन्दी उपन्यास-विशेषत: प्रेमचंद’ तथा ‘साहित्य: तत्व और आलोचना’ प्रकाशित हुई। मौलिक और नयी आलोचना दृष्टि और साहित्येतिहास विषयक चिंतन के अलावा नलिन विलोचन अपने रचनाशीलता के कारण भी जाने जाते हैं। ‘हिन्दी आलोचना के विकास’ में हिन्दी के आलोचक नंदकिशोर नवल ने नलिन विलोचन के आलोचक का विवेचन किया। और प्रो. गोपेश्वर सिंह ने साहित्य अकादमी के लिए उन पर एक मोनोग्राफ लिखा। साथ ही साथ नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए एक लंबी भूमिका के रूप में नलिन विलोचन शर्मा के निबंधों को संकलित किया।

बीज शब्द:- आधुनिक हिन्दी आलोचना, आलोचना का मापदंड, नकेनवाद, प्रपद्यवाद,

यौन मनोविज्ञान, रूपवाद

प्रस्तावना

आधुनिक हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनका जन्म 18 फरवरी 1916 ई. को पटना में हुआ था और मृत्यु 12 सितम्बर 1961 ई. को हुआ। वे पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक, हिन्दी लेखक, कवि एवं आलोचक थे। नलिन विलोचन हिन्दी में ‘नकेनवाद’ आंदोलन के तीन प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक थे। वे दर्शनशास्त्र और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान पण्डित रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। शर्मा जी का संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेजी पर समान अधिकार था। साथ ही साथ फ्रेंच एवं जर्मन भाषा के अच्छे जानकार भी थे। अंग्रेजी ज्ञान के कारण ही उन्हें पश्चिम के साहित्य और वहाँ के साहित्य दृष्टि में आ रहे बदलावों का अच्छा ज्ञान था। चित्रकला में भी उनकी गहरी रूचि थी। इसी कारण उन्हें युवाकाल में ही उनके नाम के साथ आचार्य शब्द लगाकर लोग संबोधित करने लगे। नलिन विलोचन ने हिन्दी आलोचना का नया मापदण्ड तैयार किया। वे अपने आलोचनात्मक रचनाओं, साहित्यिक टिप्पणियों और पुस्तक समीक्षाओं के जरिये हिन्दी साहित्य को नवीन रूप से आंदोलित करने में सफल हुए। वे नए-पुराने सभी लेखकों के बीच समान रूप से प्रतिष्ठित थे। कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, जीवनी आदि विधाओं में भरपूर लेखन कार्य किये। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया। उनके जीवन काल में ‘दृष्टिकोण’ और ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ नामक दो आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हुई। मृत्यु के उपरांत उनकी तीन आलोचनात्मक पुस्तकें-‘मानदंड’, ‘हिन्दी उपन्यास-विशेषत: प्रेमचंद’ तथा ‘साहित्य: तत्व और आलोचना’ प्रकाशित हुई। मौलिक और नयी आलोचना दृष्टि और साहित्येतिहास विषयक चिंतन के अलावा नलिन विलोचन अपने रचनाशीलता के कारण भी जाने जाते हैं। ‘हिन्दी आलोचना के विकास’ में हिन्दी के आलोचक नंदकिशोर नवल ने नलिन विलोचन के आलोचक का विवेचन किया। और प्रो. गोपेश्वर सिंह ने साहित्य अकादमी के लिए उन पर एक मोनोग्राफ लिखा। साथ ही साथ नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए एक लंबी भूमिका के रूप में नलिन विलोचन शर्मा के निबंधों को संकलित किया।

नलिन विलोचन शर्मा हिन्दी के विलक्षण कहानीकारों में से एक थे। उनका रचनाकार व्यक्तित्व कविता के साथ-साथ कहानी लेखन के क्षेत्र में भी समान रूप से सक्रिय थे। उन्होंने यौन मनोविज्ञान पर अनेक कहानियां लिखी हैं। नलिन विलोचन की कहानियों के संदर्भ में निशांतकेतु ने लिखा है कि-“नलिन विलोचन शर्मा ने ‘विष के दाँत’ तथा ‘सत्रह असंगृहीतपूर्व कहानियां’ इन दो संग्रहों के माध्यम से हिन्दी में वह प्रयोग और चमत्कार किया जो मंटो उर्दू में कैथरीन मैंसफील्ड अंग्रेजी में और बालजाक फ्रेंच में, एक साथ मिलकर करते है। शर्मा जी ने यौन-विच्युति, विकृति दंश, सूक्ष्म मनोविज्ञान और प्रच्छन्न विवेचन-दर्शन का कहानियों में, जैसा स्वरूपण किया है, वह वस्तुत: अन्यतम है। भाषा का ऐसा घनत्व और शिल्प की ऐसी तराश के धरातल पर हिन्दी में थोड़ी ही कहानियां प्रशंसित होगी।”[1] उनकी कहानियों में सामाजिकता और मनोवैज्ञानिकता का बड़ा ही सफल प्रयोग हुआ है। उन्होंने अपनी कहानियों में सामाजिक सत्य को मनोवैज्ञानिक सत्य के साथ प्रतिष्ठित किया। “साहित्यिकता की दृष्टि से, हमें किस्से-कहानियों के घटना-वैचित्र्य, प्रवाह, नाटकीयता और मनुष्यता के अभाव खटकते है। प्रेमचंद ने साहित्य के इस उच्च और निम्न वर्ग की वैषम्य को अपनी कृतियों से दूर कर दिया था। उनकी रचनाओं में दोनों वर्गों की विशेषताओं का सफल समन्वय हुआ है।”[2]

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कविता के क्षेत्र में नलिन विलोचन शर्मा ने जिस तरह मौलिकता और विशिष्टतापूर्वक प्रयोग किए, उसी तरह कहानी के क्षेत्र में भी किए। उनकी कहानियों में सामाजिकता और मनोविज्ञान का बड़ा ही सूक्ष्म प्रयोग हुआ है। भाषा, भाव और शिल्प के हर स्तर पर उनकी कहानियां ठोस हैं। वे अपनी कहानियों को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सत्य के साथ प्रतिष्ठित करना चाहते थे। नलिन विलोचन शर्मा के शब्दों में:-“मोपासा या प्रेमचन्द की तुलना में जैनेन्द्र घटना को बहुत कम महत्त्व देते हैं उनकी कहानियाँ बहुधा उलझनपूर्ण मनोवैज्ञानिक अध्ययन मात्र होती हैं। वे चेखव या कैथराइन मैंसफील्ड की तरह घटनाओं का उपयोग इसलिए करते हैं कि कहाँ मौका मिले और पात्रों के किसी कोने का वातायन खोल दे।”[3]

नलिन विलोचन आधुनिक-दृष्टि और प्रयोगशीलता के कारण ही ‘मैला आँचल’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘सुनीता’ और ‘घेरे के बाहर’ जैसे उपन्यासों के पक्ष में जो कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से अलग थे। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक उपन्यास ‘मैला आँचल’ पर पहली समीक्षा इन्होंने ही लिखी जिसके कारण हिन्दी संसार का ध्यान ‘मैला आँचल’ की तरफ गया। उपन्यास संबंधी उनकी विशेषताओं की चर्चा करते हुए शिवपूजन सहाय लिखते हैं कि-“उपन्यासों की नीड़ परीक्षा में वे ऐसे परिपक्व अनुभवी हो गए थे कि कोई नया प्रसिद्ध उपन्यास पढ़ लेने के बाद, उनसे उनकी चर्चा चलने पर उनके तत्संबंधी विचार सुनकर दृष्टिकोण ही बदल जाता था।”[4]

नलिन विलोचन की कथा-आलोचना से संबंधित लेख और टिप्पणियाँ ‘हिन्दी उपन्यास: विशेषत: प्रेमचंद’ (1968ई.) में संकलित है। कवि रामधारी सिंह दिनकर ने इस संदर्भ में लिखा है कि-“हिन्दी उपन्यास के बारे में जो नलिन जी नहीं जानते वह कोई भी नहीं जानता।”[5] रचना प्रस्तुत करने वाली पद्धति के लिए हिन्दी साहित्य में सामान्यत: शैली, रूप आदि नाम उनके लिए प्रचलित हैं। आचार्य नलिन विलोचन शर्मा को इसके लिए ‘स्थापत्य’ नाम प्रिय था। हिन्दी साहित्य के तीन पक्षों में से विषय और विषयवस्तु को महत्त्व देते हुए, उन्होंने स्थापत्य को अपेक्षाकृत अधिक गौरव दिया।

नलिन विलोचन उपन्यास को ही हिन्दी साहित्य का उपेक्षित अंग मानते हैं। वे प्रेमचन्द के उपन्यासों में हिन्दी उपन्यास की वे दोनों धाराएं सहसा एक हो जाती हैं। इस संदर्भ में नलिन विलोचन लिखते हैं कि-“प्रेमचन्द के उपन्यास आपातत: मनोरंजन के साधन भी हैं। और सत्य के वाहक भी। स्वयं प्रेमचन्द के उपन्यासों में भी ‘गोदान’ इसका अपवाद है वह मात्र सत्य का वाहक है।”[6]

उपन्यास का शास्त्र तैयार करते हुए नलिन विलोचन शर्मा ने कथा-भूमि की सभ्यता को संस्कृति से जोड़कर देखा है। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है कि:-“हिन्दी उपन्यास का इतिहास, किसी भी देश के इतिहास की तरह हिन्दी-भाषी क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति के नवीन रूप के विकास का साहित्यिक प्रतिफलन है। समृद्धि और ऐश्वर्य की सभ्यता महाकाव्य में अभिव्यंजना पाती है, जटिलता, वैषम्य और संघर्ष की सभ्यता उपन्यास में…हमारे उपन्यास यदि आज पश्चिम उपन्यासों के समक्ष सिद्ध नहीं होते तो मुख्यत: इसलिए कि हमारी वर्तमान सभ्यता अपेक्षतया आज भी कम जटिल, कम उलझी हुई और कहीं ज्यादा सीधी-सादी है।”[7]

कविता में ‘प्रपद्यवाद ‘ के प्रवर्तक का श्रेय इन्हीं को है। ‘प्रपद्यवाद’ को ‘नकेनवाद’ भी कहा जाता है। ‘नकेन’ के ‘प्रपद्य’ (1956ई.) और ‘नकेन-2’ (1982ई.) प्रपद्य के दो संकलन है। इन कविताओं में वैज्ञानिकता और बौद्धिकता की प्रधानता है, जो उस समय बिल्कुल नई बात थी। कविता के संबंध में प्रो. गोपेश्वर सिंह लिखते हैं कि-“विलक्षण शैली और सर्वथा भिन्न मन-मिजाज की अपनी प्रपद्यवादी कविताओं के जरिए उन्होंने हिन्दी कविता को आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न करने की कोशिश की।”[8]

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प्रपद्यवाद की व्याख्या करते हुए केसरी कुमार लिखते हैं:-“प्रपद्यवाद प्रयोग का दर्शन है… प्रयोग के वाद से तात्पर्य यह है कि वह भाव और भाषा, विचार और अभिव्यक्ति, आवेश और आत्मप्रेषण, तत्व और रूप, इनमें से कई में या सभी में प्रयोग को अपेक्षित मानता है।”[9] इस कथन के साथ केसरी कुमार ने यह भी कहा है कि सतत प्रयोग करना ही प्रपद्यवाद है। प्रगद्यवादियों का मानना था कि कविता भाव विचार और दर्शन से नहीं लिखी जाती… वह नए विचारों एवं नए दर्शन से लिखी जाती है। नलिन विलोचन कवि के लिए ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ तथा ‘विज्ञान-सम्मत दर्शन’ की जरूरत पर बल देते हैं। वे मानते हैं कि कविता का उद्देश्य सत्य का संसाधन है।

नलिन विलोचन शर्मा ने सामाजिक परिवर्तनों से साहित्यकार की विमुखता और उसकी दृष्टिकोणहीनता की वकालत तो करते ही हैं, वे सामाजिक दृष्टि से साहित्य को एक प्रभावहीन वस्तु भी मानते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है:-“हम मानते हैं कि यदि कोई साहित्यकार किसी आंदोलन में विश्वास करता है तो उसे सीधे उसमें शामिल होना चाहिए, साहित्य की बीरबली खिचड़ी पकाने की कोशिश से होता ही क्या है!”[10]

अपनी एक पुस्तक –‘द यूज ऑफ पोएट्री एण्ड द यूज ऑफ क्रिटिसिज़्म’ में इलियट ने लिखा है- मुझे लगता है कि कवि यह मानता है कि उसकी कुछ सामाजिक उपयोगिता है। लेकिन मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि उसे धर्म-विज्ञान, उपदेशक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री या अन्य किसी रूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वह कुछ भी कर सकता हैं, किन्तु जब वह कविता लिखता है तो कविता ही लिखनी चाहिए कविता जो कविता के रूप में मान्य हो, न कि किसी अन्य रूप में। ठीक ऐसी ही मान्यता नलिन विलोचन की भी है। उन्होंने अपने एक निबंध ‘साहित्यकार की सामाजिक चेतना’ में लिखा है-“कलाकार को पूरा अधिकार है, अगर वह ऐसा चाहता हैं कि अपने समय की सामाजिक या राजनीतिक क्रांतियों की उपेक्षा करे और अगर वह महान कलाकार है, तो वह ऐसा करके अपने अमर बन जाने की संभावनाओं में वृद्धि कर सकता है।”[11]

1941ई. में रामचन्द्र शुक्ल ‘समालोचक और निबंधकार’ नामक निबंध में उन्होंने आचार्य शुक्ल की प्रशंसा की है। प्रशंसा का कारण यह था कि शुक्ल ने न तो ‘प्राचीन साहित्य को समकालीन आदर्शों की दृष्टि से हास्यास्पद’ माना। परंपरा की इस समझ और आधुनिकता के सम्यक बोध के साथ उन्होंने अपनी आलोचनात्मक कसौटी तैयार की।

नलिन विलोचन शर्मा का हिन्दी आलोचना में प्रवेश आ. रामचन्द्र शुक्ल के बाद होता है। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका और स्वतंत्रता आंदोलन का पूरे विश्व पर जो प्रभाव पड़ रहा था, उससे हिन्दी साहित्य भी अछूता नहीं था। मार्क्सवाद, फ्रायडवाद, अस्तित्ववाद, गांधीवाद और समाजवाद आदि जो देश-दुनिया के ज्ञान और दर्शन की प्रमुख धाराएं थी, इसका प्रभाव बुद्धिजीवियों पर पड़ना स्वाभाविक था। नलिन विलोचन पर भी इन विचारों का प्रभाव पड़ा। नलिन विलोचन ने संस्कृत की शास्त्रीय आलोचना और पश्चिम की आलोचना पद्धति का गहन अध्ययन किया था। लेकिन उन्होंने अनुसरण करने की बजाय अपने लिए नई आलोचनात्मक पद्धति की खोज की है। वे हिन्दी के पहले आधुनिक आलोचक थे। उन्हें रूपवादी आलोचक भी कहा जाता है। इस कारण उनकी रचना और आलोचना में विलक्षण नवीनता और मौलिकता प्रकट हुई है। इस आलोचना के संदर्भ में प्रो. गोपेश्वर सिंह लिखते है-“इलियट, एजरा पाउण्ड आदि को उन्होंने ठीक से पढ़ा था। भारतीय और पश्चिमी साहित्य के उनके गहरे अध्ययन और उन सबके सार्थक उपयोग को देखते हुए ठीक ही मैनेजर पाण्डेय उन्हें ‘सुपड़ आलोचक’ कहते है।”[12]

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नलिन विलोचन शर्मा की आलोचनात्मक कसौटी के मुख्य आधार हैं-‘मुक्ति और स्वच्छंदता’ इन दोनों में भी मुक्ति को वे मुख्य आलोचनात्मक कसौटी मानते हैं। उनके अनुसार पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और बर्नाड शॉ में स्वच्छंदता के गुण हैं, जबकि निराला और वाल्ट व्हिटमैन में मुक्ति की रचना में विषयगत नवीनता को वे रचना की मुक्ति की अपनी आलोचनात्मक कसौटी पर वे निराला को आधुनिक युग का सबसे बड़ा कवि और प्रेमचन्द को आधुनिक युग का सबसे बड़ा कथाकार घोषित करते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी इस संदर्भ में लिखते हैं कि -“ रचना को शास्त्र से जोड़ने वाली प्रक्रिया के रूप में आलोचना का विकास आधुनिक काल में ही होता। यह आलोचना काव्य का शास्त्र नहीं, काव्य का जीवन है जो बार-बार रचा जाता है।”[13] जैनेन्द्र, अज्ञेय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, और त्रिलोचन आदि कथाकारों पर भी नलिन विलोचन शर्मा ने महत्त्वपूर्ण आलोचना लिखी या इन कवियों पर समीक्षा लिखी है। वे साहित्य में विषयवस्तु को उतना महत्त्व नहीं देते थे, जितना उसके शिल्प और स्थापत्य को। प्रगतिवादी आलोचकों ने उन्हें रूपवादी और कलावादी आलोचक कहा भी है।

निष्कर्षत: रूप से कहा जा सकता है कि नलिन विलोचन शर्मा का साहित्यिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है। वे हिन्दी में ‘नकेनवाद’ के त्रेयी प्रवर्तकों में से एक थे। नलिन विलोचन संस्कृत, हिन्दी एवं अंग्रेजी के ज्ञाता थे, साथ ही फ्रेंच एवं जर्मन भाषा के अच्छे जानकार भी। वे अपने आलोचनात्मक लेखों, साहित्यिक टिप्पणियों और पुस्तक समीक्षाओं के जरिये वे हिन्दी साहित्य को नए ढंग से आंदोलित करने में सफल हुए। वे कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, जीवनी आदि विधाओं में भरपूर लेखन कार्य किये। कहानीकार के रूप में भी नलिन विलोचन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है। यौन मनोविज्ञान पर उन्होंने अनेक कहानियां लिखी हैं। उनकी कविताओं में वैज्ञानिकता और बौद्धिकता की प्रधानता है, जो उस समय बिल्कुल नई थी। मार्क्सवाद, फ्रायडवाद, अस्तित्ववाद, गांधीवाद और समाजवाद आदि जो देश-दुनिया के ज्ञान और दर्शन की प्रमुख धाराएं थी इसका प्रभाव नलिन विलोचन पर भी पड़ा। वे रामचन्द्र शुक्ल के बाद और हजारीप्रसाद द्विवेदी से पहले आधुनिक आलोचक थे। इसी कारण उनकी रचना और आलोचना में विलक्षण नवीनता और मौलिकता प्रकट हुई। नलिन विलोचन शर्मा हिन्दी आलोचना के विरल ही नहीं विलक्षण पुरूष थे।

संदर्भ:-

  1. कथांतर (भूमिका)- सं. निशांतकेतु, बी.टी.सी. पटना, प्रथम संस्करण-2005, पृष्ठ-8
  2. साहित्य तत्त्व और आलोचना-आ. नलिन विलोचन शर्मा, प्रकाशक-अनुपम प्रकाशन, पटना-4, प्रथम संस्करण-1995, पृष्ठ-209
  3. वही, पृष्ठ-210
  4. नलिन विलोचन शर्मा: संकलित निबंध- गोपेश्वर सिंह, प्रकाशक – नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया प्रकाशन, नई दिल्ली-110070, प्रथम संस्करण-2010, (भूमिका), पृष्ठ-19
  5. हिन्दी आलोचना का विकास-मधुरेश, प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण-2012, पृष्ठ-140
  6. संपा.-विनोद तिवारी, पक्षधर, वर्ष:-10,अंक:-19, (जुलाई-दिसम्बर-2015), नलिन विलोचन शर्मा, लेख-‘हिन्दी उपन्यास: उद्भव और विकास’ प्रकाशन-मुद्रक विनोद तिवारी, पंचशील गार्डेन, नवीन शाहदरा, दिल्ली, पृष्ठ-138
  7. संपा. नम्रता कुमार,गगनांचल, वर्ष-39, अंक-6, (नवम्बर-दिसम्बर, 2016); प्रो. गोपेश्वर सिंह, लेख-‘नलिन विलोचन शर्मा’; प्रकाशक- भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली; पृष्ठ-53-54
  8. नलिन विलोचन शर्मा: संकलित निबंध- गोपेश्वर सिंह, प्रकाशक – नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया प्रकाशन, नई दिल्ली-110070, प्रथम संस्करण-2010, पृष्ठ-10
  9. संपा. नम्रता कुमार, गगनांचल, वर्ष-39, अंक-6, (नवम्बर-दिसम्बर, 2016); प्रो. गोपेश्वर सिंह, लेख-‘नलिन विलोचन शर्मा’; प्रकाशक- भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली; पृष्ठ-52
  10. संपा. अशोक मिश्र, बहुवचन, अंक-52, (जनवरी-मार्च, 2017); साधना अग्रवाल, लेख-‘नलिन विलोचन शर्मा: एक विरल व्यक्तित्व’ प्रकाशक-महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र), पृष्ठ-52
  11. नलिन विलोचन शर्मा: संकलित निबंध- गोपेश्वर सिंह, प्रकाशक – नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया प्रकाशन, नई दिल्ली-110070, प्रथम संस्करण-2010, पृष्ठ-12
  12. वही, पृष्ठ-11
  13. आचार्य श्री नलिन विलोचन शर्मा की आलोचना साधना-सं. डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, प्रकाशक-अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-110030, प्रथम संस्करण-2003, पृष्ठ-29

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