निम्नवर्गीय आक्रोश और रेणु की रचनादृष्टि

*डॉ. रामउदय कुमार

सारांश:

भारतीय समाज में शोषण के जितने चक्र रहे हैं, उतनी ही उनके खिलाफ संघर्ष की कवायद भी रही है। निम्न वर्ग के ये संघर्ष अलग- अलग रूपों में हमारे सामने आते रहे हैं, आज़ादी से पहले भी, आज़ादी के बाद भी। फणीश्वरनाथ रेणु ने यह दोनों दौर देखे थे। आज़ादी के बाद स्वराज्य का स्वप्न जिस तरह टूटा वह भी उनके साहित्य में दर्ज़ है। रेणु संघर्षशील रचनाकार आंदोलनकारी थे। जो उन्होंने साहित्य में लिखा उसे जिया भी। अलग अलग रचनाओं में अलग अलग पात्रों के ज़रिये उन्होंने उन्होंने समाज में मौजूद इस आक्रोश को जगह दी। अपनी रचनाओं में वे किस तरह इस आक्रोश को देखते-समझते थे यह पत्र उसी दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करता है।

बीज शब्द:

रेणु, आक्रोश, राजनीति, अपराधीकरण, जाति, जनवाद, नक्सलवाद, हिंसा, मैला आँचल, परती-परिकथा

भूमिका:

फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य का ग्रामांचल अपने भविष्य का स्पष्ट संकेत देता है। वह है आज के ग्राम्य जीवन का कटु यथार्थ। आजादी के बाद निहित स्वार्थों की राजनीति, जाति-धर्म की राजनीति, राजनीति के अपराधीकरण, व्यवस्था में सामन्तों-पूँजीपतियों के वर्चस्व को रेणु के कथासाहित्य में हम उभरता हुआ पाते हैं। सदियों से दबे जनसमुदाय की उपेक्षा के परिणामस्वरूप उग्रवाद एवं उपेक्षितों के बीच बदले की भावना के उभार के साथ, उचित – अनुचित के विवेक का ह्रास हुआ है जिसने समाज को खोखला करना शुरू कर दिया है।

‘मैला आँचल’ का कालीचरण चरित्तर कर्मकार से मिल जाता है, जो भावी उग्रवाद का सूचक है। सोशलिस्ट पार्टी के साथ सोमाजट व वासुदेव आदि जैसे अपराधी प्रवृति के लोगों का जुड़ना आंदोलनों में विवेकहीन हिंसा के पनपने की सूचना देता है। ‘परती-परिकथा’ के लुत्तो का चरित्र जाति की राजनीति करने वाले हरिजन पात्र का है जो बदले की भावना में उफनता, लगातार गंदी राजनीति का शिकार होता जाता है। कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा लुत्तो का इस्तेमाल एवं ग्रामीण स्तर की राजनीति में उसका लगातार किनारे होते जाना उसे और भी अविवेकी बनाता है। लुत्तो की समस्या यह भी है कि वह अपने से नीची जाति के लोगों से उच्च वर्णों की तरह ही घृणा करता है। रेणु ने क्षुद्र स्वार्थों व पारंपरिक जातीय संस्तरीकृत घृणा-परम्परा पर बलि होते जनवाद की ओर यहाँ संकेत किया है।

जन आक्रोश का बिखरकर इस प्रकार व्यक्तिगत बदले की भावना एवं निजी अहंभाव में विसर्जित होते जाने की प्रक्रिया आज के नक्सलवाद की बड़ी कमजोरी है जिसे हम आज स्थानीय स्तर पर शिद्दत से महसूस करते हैं। इसीलिए रेणु हिंसक संघर्ष में यकीन नहीं करते। वे सामाजिक संरचना को बड़े नजदीक से जानते हैं और इसकी जटिलता से पूरी तरह वाकिफ हैं।

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यह जरूर है कि उग्रवाद के प्रति रेणु के यहाँ एक सहानुभूति भी पाई जाती है। 1970 ई० में रघुवीर सहाय को दिए साक्षात्कार में कहते है – “मुझे विश्वास था कि जब कोशी योजना सफल होगी तो जिन्हें अभी जमीन नहीं मिली है उन्हें आगे चलकर मिल जाएगी लेकिन वैसा नहीं हुआ…. आज भी 100 में से 75 लोग ऐसे हैं जिनके पास कोई भूमि नहीं है….किसी ने कुछ किया नहीं। आज जो लोग कुछ कर रहे हैं, वे नक्सलपंथी नाम से जाने जाते हैं, लेकिन जमीन की लड़ाई वे लड़ रहे हैं।”[1]

एक अन्य बातचीत में कथाकार मधुकर सिंह से 1971 में कहते हैं- “नक्षत्र मालाकार जनता का आदमी है। वह गिरफ्तार हुआ। आजीवन कारावास की सजा झेल रहा है….नक्षत्र का मतलब है, जनजीवन की जबर्दस्त छटपटाहट।”[2]

यह छटपटाहट हजारों वर्षों से उपेक्षित आम आदमी की है, जो नाना विकृतियों में फूटती है। यह हमारे रहनुमाओं से मोहभंग का परिणाम है। जैसा कि ऊपर भी दिखाया गया है रेणु के कथा चरित्रों में इस छटपटाहट एवं जनविद्रोही राजनीति व धर्म-जाति आदि अन्तर्विरोधों के अवरोध के सामने ये विकृतियाँ रूपाकर ग्रहण करती हैं। कालीचरण, बावनदास, बालदेव, लुत्तो आदि चरित्र इसके प्रत्यक्ष रूप हैं जो वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व द्वारा किनारे कर दिए गए और उस मोड़ पर खड़े पाए जाते हैं, जहाँ से उनके लिए भटकाव एवं विकृत राजनीति, उग्र एवं हिंसक राह खुलती है। कालीचरण उधर पाँव बढ़ाता है। बालदेव अन्त में जाति की राजनीति करने की सोचता है और लुत्तो तो खुद को जाति की राजनीति के लिए शाबाशी भी देता है।[3]

रेणु इस सहानुभूति के बावजूद हिंसक आंदोलन का समर्थन नहीं करते। वे प्रेमचंद की मानिंद मानवतावादी रचनाकार हैं जो मानवीय अंतर्वस्तु को तरजीह देता है। मधुकर सिंह से बातचीत के अन्त में वे कहते है – “नक्सलवाद तो एक प्रतीक है, गुस्सा है। इनके पास कोई नया समाधान नहीं है जमीन के लिए, अभी सही लड़ाई बाकी है जब सही जनता सामने खड़ी हो जाएगी तो बंदूक की सारी बातें हवा हो जाएंगी और जनता जमीन को स्वयं लड़कर ले लेगी।”[4]

रेणु की रचनादृष्टि गाँधीवाद से प्रभावित है। वे जब 1972 में चुनाव में खड़े हुए तब जुगनू शारदेय से बातचीत में उन्होंने कहा – “मैं इन समस्याओं को लेकर सरकार को कभी चैन नहीं लेने दूँगा -सभा के अन्दर और बाहर ! यदि लेखनी से काम ना हुआ तो व्यक्तिगत सत्याग्रह एवं आन्दोलन।”[5] परती परिकथा में कम्युनिस्ट रंगनाथ गुरूजी के तर्कों में जैसे स्वयं रेणु ही बोलते है। ह्रदय परिवर्तन जैसे विश्वासों के लिए पार्टी के लोग जब गुरूजी को झिड़कते हैं तो उनका कहना है – “आखिर किसी का पार्टी-सदस्य बनना हृदयपरिवर्तन नहीं तो क्या है। प्रचार की सामग्री और किसलिए होती है”[6] हिंसा की अमानवीयता के खिलाफ रेणु के कथा साहित्य में कई चरित्र व घटनाएँ गाँधीवादी मानवीय अंतर्वस्तु की लक्ष्यात्मकता के संकेत बनकर आते हैं। ‘मैला आँचल’ का एक प्रसंग यहाँ उदधृत करना मौजूं होगा। संथालों पर गाँव वाले धावा बोलते है। गाँव के गरीब लोग भी इसमें शामिल हैं। सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने इसमें जबर्दस्त मारकाट की। “एकदम फिरी ! आजादी है, जो जी में आवे करो। बूढी, जवान, बच्ची जो मिले। पाट का खेत है। कोई परवाह नहीं…!”[7] रुलाई को संगीत समझने वाली इस मनः स्थिति को क्या कहेंगे। पशुता का चरम ही न। सदियों से संचित उपेक्षाजन्य आक्रोश हिंसा के सही लक्ष्य को भटकाता है। ऐसे में एक प्रकार की तुष्टिमयी अपराधवृत्ति का विकास होता है। निरन्तर उपेक्षित व्यक्ति का हीनताबोध विरोधी को ही नहीं, अपनों का भी इसका शिकार बनाता है और इसकी निरन्तरता नृशंस गिरोहबद्धता में तब्दील हो रहती है। फिर इस प्रवृति के साथ बदले की हिंसा का जो सिलसिला चलता है, वह हमें गाँधी जी के इन शब्दों की याद दिलाता है कि आँख के बदले आँख लेने की प्रवृति तो समूचे विश्व को अंधा बना देगी।

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रेणु में भी प्रेमचंद की तरह जहाँ उपेक्षितों के संचित आक्रोश के प्रति सहानुभूति है, वहीं गाँधीवादी हृदयपरिवर्तनवाद मानवीय अन्तर्वस्तु, सहानुभूति, दया, करुणा, त्याग, प्रेम आदि की संरक्षा-सुरक्षा की चेतना भी है। इनके उपन्यासों-कहानियों के आदर्श में यह चीज है। यह जरूर है कि ये आदर्श-यथार्थ विषमता के आगे कभी – कभी अलग से उतरते प्रतीत होते है, पर हमेशा ऐसा नहीं है और फिर एक अलग स्थिति भी बनती है। मैं उसी की चर्चा करूँगा जो लेखकीय रचना दृष्टि के ख्याल से महत्वपूर्ण है।

प्रेमचंद व रेणु के अमर चरित्रों होरी व बावनदास की बात करें तो यह अलग सी स्थिति सामने आती हैं। इन दोनों चरित्रों का करुण अन्त एकबारगी हमें स्तबध कर देता है। एक पूरे परिवेश के बीच हमारे जाने – पहचाने चरित्र मृत्यु से जो गहन अवसाद जगाते है, वहाँ उच्छल आक्रोश की नहीं, अपितु गम्भीर विचार-मग्नता की स्थिति बनती है। इस ट्रेजेडी के इर्द – गिर्द जो पूरी दुनिया बच रही है, वह एक गहरे अवसाद और क्षोभ के बीच हममें एक गम्भीर समझ पैदा करती है – एक सम्यक परिस्थितिगत चेतना।

यह स्थिति कोरी भावुकता वाले आदर्शवाद और दिशाहीन आक्रोश के उच्छल भावावेग से नितान्त भिन्न हैं। इस स्थिति का प्रतिकार दोनों ग्राम कथाकारों के इन अमर चरित्रों की परिणति पर विचार करने पर चित्तवृतियों के परिष्करण व मानवीयता को सुरक्षित रख लड़ी गई ठण्डे दिमाग की लड़ाई से ही सम्भव है। होरी के अतिरिक्त मेहता – मालती के चरित्रों के जरिए एक सहज निःस्वार्थ बौद्धिक व्यक्तित्व का जो क्रमिक विकास हुआ है, हीरा एवं मातादीन के चरित्रों में जो परिष्कार सम्भव हुए हैं, वे प्रेमचन्द की दृष्टि के संकेतों को स्पष्ट करते हैं। गोबर का चरित्र भी परिस्थितियों की आँच में तपकर अधिक मानवीय हो सका है। रेणु के यहाँ बावनदास का चरित्र अपने अपराजेय संघर्ष के माध्यम से इन्हीं मानवीय अन्तर्वस्तुओं के पक्ष में दिखता है। एक निःस्वार्थ एवं विवेकपूर्ण जनपक्षधरता जो मानवीय सत्व से संकलित हो तमाम जनविरोधी शक्तियों के सामने अकेला भी खड़ा हो सकने का माद्दा रखता है – गाँधीवाद का सारभूत अंश है, जो विषम यथार्थ को होरी की तरह सम्पूर्ण रूप से उघाड़कर रखने देने में भी सक्षम है। यह रेणु की रचनादृष्टि का भी उत्कर्ष है। यह यूँ ही नहीं है कि ‘मैला आँचल’ के अस्वाभाविक आदर्शवादी अन्त के बाद बावनदास से सम्बन्धित एक वाक्य आता है – “चेथरियापीर में मानत करके किसी ने एक टुकड़ा और लटका दिया।”[8] मानो रेणु स्वयं उस आदर्शवादी अन्त से सहमत नहीं हैं। जैसे वे यह कहना चाहते हैं कि विषम परिस्थितियाँ इतनी आसानी से निपटनेवाली नहीं, बल्कि इनके लिए तो बावन की तरह पूर्ण समर्पित एक अनथक संघर्ष काम्य है जिसमें अपने लक्ष्य के लिए सर्वस्व लुटा देना पड़ सकता है। पर इस संघर्ष में मानवीयता का समावेश आवश्यक है, आक्रोश का नहीं। वर्त्तमान ग्रामीण यथार्थ के संदर्भ में रेणु प्रेमचन्द की मानवतावादी विरासत को आगे बढ़ाते हुए समकालीन परिदृश्य में अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करते हैं।

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सन्दर्भ सूची :

  1. रेणु रचनावली, (सं. भारत यायावर) राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पेपरबैक संस्करण, 2012
  2. परती परिकथा, फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018
  3. मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002

*सह आचार्य, हिन्दी विभाग,

शिवदेनी साव महाविद्यालय, कलेर (अरवल ), बिहार

  1. रेणु रचनावली भाग -4, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ – 411

  2. वही, पृष्ठ – 413
  3. परती परिकथा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
  4. रेणु रचनावली, राजकमल प्रकाशन, भाग -4 , पृष्ठ – 413
  5. रेणु रचनावली, भाग – 4, पृष्ठ – 426
  6. परती – परिकथा, पृष्ठ – 115
  7. मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ – 156
  8. मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, अंतिम वाक्य

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