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स्वामी विवेकानंद : जीवन और संदेश


स्वामी विवेकानंद : जीवन और संदेश

वंदना राय
शोध छात्रा
हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी।
8604448008
vandanaraibhuvsn@gmail.com

शोध सारांश :

प्रस्तुत शोध आलेख में स्वामी विवेकानंद का संदेश क्या है? आधुनिक युग जीवन में उनके प्रेरक व्यक्तित्त्व और जीवन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन-विश्‍लेषण किया गया है।

बीज शब्द :

जीवन, संदेश, विश्व, सर्वधर्म समन्वय, सहिष्णुता, धर्ममहासभा, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, सेवा, मानवता, विश्वबंधुत्व, आत्मा, वेदांत, शक्ति।

भूमिका :

स्वामी विवेकानंद का 39 वर्ष ( 1863- 1902 ई.) का जीवन काल अत्यंत संक्षिप्त है लेकिन उनके विचार और कार्य, उनके व्यक्तित्व निर्माण और धर्मप्रचार का संसार अत्यंत विस्तृत और विविधता से भरा हुआ है। किसी भी महापुरुष के जीवन तथा संदेश को समझने का सर्वाधिक प्रमाणिक तथा सर्वश्रेष्ठ साधन है उनका स्वयं का लेखन तथा वार्तालापों का संकलन स्वामी विवेकानंद ने अपनी आत्मकथा तो नहीं लिखी, किन्तु उनके लगभग 800 व्यक्तिगत पत्रों, बहुत से व्याख्यानों एवं वार्तालापों के विवरण और उनके गुरुभाइयों तथा शिष्यों द्वारा लिखित स्मृति-कथाएँ और संस्मरण उपलब्ध हैं, जो स्वामी विवेकानंद के जीवन और संदेश को जानने समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

शोध विस्‍तार –

स्वामी विवेकानंद का जन्म सोमवार 12 जनवरी, 1863 ई., पौष संक्रांति को कलकत्ता के सिमुलिया मुहल्ले में हुआ था। इनके पिता विश्वनाथ दत्त तथा माता भुवनेश्वरी देवी थीं। स्वामी विवेकानंद के बचपन नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। स्वामी विवेकानंद का जीवन एवं व्यक्तित्त्व बहुआयामी था। वे समाजविद्, शिक्षाविद्, समाजसेवी और देशभक्त थे। कई लोगों की दृष्टि में स्वामी विवेकानंद भारतीय दर्शन, आगम और योग सम्भूत संस्कृति के मूर्त विग्रह थे। किन्तु उनके व्यक्तित्त्व में केवल हिन्दुओं की अध्यात्मानुभूति ही अंगीकृत नहीं हुई थी, पश्चिम के दर्शन और विज्ञान के आविष्कारों ने भी स्वीकृति पायी थी। इनकी वाणी में संपूर्ण भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, समाजशास्त्र, परम्परा, आधुनिकता और शिक्षा की; भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य की, भारत की दयनीय अवस्था की उसकी धवल कीर्ति की उसकी उपलब्धियों और संभावनाओं की सबकी गूँज सुनाई देती है। स्वामी विवेकानंद त्याग की साकार मूर्ति थे, करूणा के सागर थे जिनका विशाल हृदय गरीबों, दुःखियों, पीड़ितों के लिए रोता था। वे एक उच्चकोटी के भक्त थे जो भक्ति से विभोर हो भाव समाधि में लीन हो जाया करते थे । वे एक सिद्ध योगी थे, जिसने वेदांत में वर्णित उच्च समाधि अवस्था निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति की थी तथा वे योगजशक्तियों के भी धनी थे । वे अद्वैत ज्ञान में प्रतिष्ठित ब्रह्मज्ञानी थे जो सर्वत्र ब्रह्मदर्शन करते थे। और वे एक महान कर्मयोगी भी थे जो अपने जीवन के अंतिम दिन तक लोक कल्याण के कार्यों में जुटे रहें। कृष्ण का समन्वय, बुद्ध की करुणा, शंकर की प्रखर प्रतिभा और रामानुज के हृदय की विशालता इन सबकी सामूहिक अभिव्यक्ति हम स्वामी विवेकानंद के जीवन और व्यक्तित्व में पाते हैं।

1880 ई. में श्रीरामकृष्ण परमहंस के साथ हुई स्वामी विवेकानंद की पहली भेंट मानों पुरातन से नवीन की, पश्चिम से पूरब की, शक्ति से ध्यान की और मानवतावाद से अध्यात्मवाद की भेंट थी। अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस की अनुभूतियों के परिप्रेक्ष्य में वेदांत के भव्य संदेश का प्रचार करना ही इनके जीवन का उद्देश्य था। भारत और विदेशों में अपनी साधुता, स्वदेश-भक्ति, संपूर्ण मानव-जाति के आध्यात्मिक उत्थान एवं प्राच्य और पाश्चात्य को वेदांत का संदेश देने वाले स्वामी विवेकानंद आज सबके आदर्श और प्रेरणा के स्रोत हैं।

विश्व को स्वामी विवेकानंद का संदेश :

स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि, मेरे पास एक संदेश है- जिसे मैं अपने ढंग से ही दूँगा। मैं अपने संदेश को न हिन्दू धर्म, न ईसाई धर्म, न संसार के किसी और धर्म के साँचे में ढालूँगा, बस ! अपने ही साँचे में ढालूँगा। विश्व धर्म महासभा, शिकागो 11 सितम्बर 1893 ई. को इन्होंने अपने वेदांत के भव्य संदेश को शब्द रूप दिया जिसका आधार था – ‘सर्वधर्म समन्वय।’ अपने ओजस्वी शब्दों में जब इन्होंने धर्म महासभा को संबोधित किया, ‘अमेरिकी बहनों और भाइयों’ तब तालियों की गड़गड़ाहट से हाल ऑफ कोलंबस गूँज उठा। स्वामी विवेकानंद ने धर्मसभा के स्वागत के उत्तर में कहा, आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ, और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। तत्पश्चात् विश्व मंच से स्वामी विवेकानंद ने अपना संदेश दिया – ‘‘यदि एक धर्म सच्चा है, तब निश्चय ही अन्य सभी धर्म सच्चे हैं। अतएव हिन्दू धर्म उतना ही आपका है, जितना मेरा।’’1 शिकागो धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने सार्वभौमिक धर्म का संदेश दिया। उनके सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा इतनी नवीन थी – विविधता को स्वीकार कर उसी में एकता के सूत्र को ढूँढने का आग्रह इतना प्रबल था कि उसके सामने सांप्रदायिकता निष्प्राण हो गई। फिर उनके संदेश बुद्धिप्रसूत न होकर अनुभूति प्रसूत थे । धर्म सहिष्णुता का संदेश देते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि, “Perfect acceptance, not tolerance only, we prech and Perform. Take care how you trample on the least rights of others.”2 अन्य सभी धर्मों के लिए स्वामी विवेकानंद का सहिष्णुता का संदेश है कि, ‘‘हम हिन्दू केवल सहिष्णु ही नहीं है, हम अन्य धर्मों के साथ मुसलमानों की मस्जिद में नमाज पढ़कर पारसियां की अग्नि की उपासना करके तथा ईसाइयों के क्रूस के सम्मुख नतमस्तक होकर उनसे एकात्म हो जाते हैं। हम जानते हैं कि निम्नतम जड़ पूजावाद से लेकर उच्चतम निर्गुण अद्वैतवाद तक सारे धर्म समान रूप से असीम को समझने और उनका साक्षात्कार करने के निमित्त मानवीय आत्मा के विविध प्रयास हैं। अतः हम इस सभी सुमनों को संचित करते हैं, और उन सबको प्रेमसूत्र में बाँधकर आराधना के निमित्त एक अद्भुत स्तवक निर्माण करते हैं।’’3 धर्मसभा के पहले दिन ही एक अज्ञात संन्यासी स्वामी विवेकानंद एक नये संदेश के वाहक, एक अभिनव संस्कृति के अग्रदूत हुए। वे सदैव ऐसे प्रथम हिन्दू संन्यासी के रूप में स्मरण किये जायेंगे जिन्होंने अपने धार्मिक शांति और विश्व बंधुत्व के संदेश के साथ समुद्र को पार कर पाश्चात्य देशों में जाने का साहस किया। युग-युगांतर से संन्यासी और योगी शिष्य-परम्परा से भारतीय ऋषियों के जिस ज्ञान, धर्म एवं सत्य का प्रचार कर रहें थे, धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने उसी धर्म और सत्य की पुनर्व्याख्या की, निर्भीकतापूर्वक उन्होंने अपना संदेश विश्व को सुनाया।

हिन्दू धर्म को आवश्यकता थी अपने ही भावादर्शों को सुव्यवस्थित और सुगठित करने की तथा संसार को जरूरत थी सत्य से भयभीत न होने वाले एक धर्म की। स्वामी विवेकानंद ने सबको सनातन धर्म का उदार संदेश दिया। शिकागो धर्म-महासभा के मंच पर स्वामी विवेकानंद के अतिरिक्त अन्य सभी धर्मों के प्रतिनिधि और प्रचारक भी उपस्थित थे सबने अपने-अपने धर्म की विशिष्टता सिद्ध की कि, ‘एकमात्र मेरा ही धर्म सत्य है।’ इस पर स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि सभी अपना धार्मिक संदेश तो दें, परन्तु दूसरे धर्मों में कोई त्रुटि न देखे। हिन्दू धर्म की सार्वभौमिकता के संबंध में स्वामी विवेकानंद का संदेश है कि, ‘‘विज्ञान की न्यूनतम खोजें जिसकी प्रतिध्वनि जैसी लगती है, उस वेदांत दर्शन के उच्च आध्यात्मिक स्तरों से लेकर विविधतामय पौराणिकतायुक्त मूर्ति-पूजा के निम्नतम विचार, बौद्धों के अज्ञेयवाद और जैनों के निरीश्वरवाद तक प्रत्येक और सबका स्थान हिन्दू धर्म में है।’’4 अकिंचन संन्यासी स्वामी विवेकानंद भारतीय ऋषियों का सार्वभौतिक एवं सार्वकालिक अखण्ड आत्मा का संदेश विश्व के समस्त मानवों के द्वार पर जाकर उन्हें सुना आयें। स्वामी विवेकानंद ने वेदांत के अखण्ड आत्मा का संदेश देते हुए कहा- ‘‘मनुष्य की आत्मा अनादि और अमर है, पूर्ण और अनंत है, और आत्मा का अर्थ है – एक शरीर से दूसरे शरीर में केवल केन्द्र परिवर्तन।’’5 स्वामी विवेकानंद ने संपूर्ण जगत के सम्मुख खड़े होकर अपने शब्दों में ईश्वरीय आनंद के संदेश की घोषणा की : ‘‘हे अमृत के पुत्रों ! सुनो हे दिव्य धामवासी देवगण !! तुम भी सुनों, मैंने उस अनादि पुरातन पुरुष को प्राप्त कर लिया है, जो समस्त अज्ञान, अंधकार और माया के परे है। केवल उस पुरुष को जानकर ही तुम मृत्यु के चक्र से छूट सकते हो। दूसरा कोई पथ नहीं है।’’6 स्वामी विवेकानंद के संदेश में मानव-जाति की एकता तथा ईश्वर के साथ उसकी अभिन्नता की प्रस्तुति है। इनका नाम चिरकाल के लिए मानव के देवत्व की घोषणा करने वाले एक अभिनव संदेश के साथ जुड़ गया।

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स्वामी विवेकानंद श्रीरामकृष्ण परमहंस के संदेशों के भाष्यकार थे। उन्होंने अपने गुरु श्रीरामकृष्ण देव के सार्वभौमिक एक्य और ईश्वर के एकत्व, सर्वधर्म समन्वय और अद्वैत वेदांत के संदेश को विश्व मानवता के समक्ष प्रस्तुत किया, जिनका कहना था – ‘‘सभी धर्म पथ एक ही शाश्वत, अनंत ईश्वरीय सत्य की ओर ले जाते हैं।’’7 स्वामी विवेकानंद श्रीरामकृष्ण परमहंस के संदेश वाहक थे, जिन्होंने समुद्र पार कर शिकागो के विश्व-धर्म महासभा के मंच से विश्व को सनातन धर्म का संदेश दिया। अपने संदेशों के बारे में स्वामी विवेकानंद का कहना है कि, ‘‘मैं जिन विचारों का संदेश देना चाहता हूँ, वे सब उन्हीं (श्रीरामकृष्ण) के विचारों को प्रतिध्वनित करने की मेरी अपनी चेष्टा है। इसमें मेरा अपना निजी कोई भी मौलिक विचार नहीं है, हाँ, जो कुछ असत्य या भूल है, वह अवश्य मेरा ही है। पर हर ऐसा शब्द, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहता हूँ ओर जो सत्य तथा हितकर है, वह केवल उन्हीं की वाणी को झंकृति देने का मेरा प्रयत्न मात्र है।…’’8 स्वामी विवेकानंद ने भारत के वेदांत को विश्व के सामने रखा। वैश्विक धर्म का पहला संदेश ‘सर्वधर्म समन्वय’ का देते हुए इन्होंने विश्व मंच से जगत के कल्याण के लिए अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के संदेश की घोषणा की। उन्होंने कहा मेरे गुरुदेव का मानव-जाति के लिए यह संदेश है कि, ‘‘प्रथम स्वयं धार्मिक बनो और सत्य की उपलब्धि करो। वे चाहते थे कि तुम अपने भ्रातृ स्वरूप समग्र मानव-जाति के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग दो।’’9 आत्मा का दिव्यत्व-अखण्डत्व, ईश्वर का एकत्व, विश्व बंधुत्व, सहिष्णुता और सर्वधर्म समन्वय स्वामी विवेकानंद के संदेशों के स्थायी सुर हैं। स्वामी जी के संदेश आध्यात्मिक है लेकिन वे समग्र मानव-जाति के कल्याण के लिए ही हैं।

पाश्चात्य देशों में स्वामी विवेकानंद ने विश्व मानव के कल्याण के लिए सार्वभौमिक धर्म के शाश्वत सत्य का प्रचार किया, विश्व बंधुत्व और मानवता का उनका संदेश है- सभी मानव एक होंगे और समूचा ब्रह्माण्ड एक ही ब्रह्मसत्ता की बहुमुखी अभिव्यक्ति मानी जायेगी। समूचा संसार ही उनका देश था और सभी मनुष्य उनके भाई-बहन थे । वे संपूर्ण जगत के थे और संपूर्ण जगत उनका था। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि क्या हम एक वैश्विक धर्म की संभावना और स्वरूप के विषय में विचार नहीं कर सकते ? वैश्विक धर्म के आदर्श की परिकल्पना कर उन्होंने सार्वभौमिक धर्म का अपना संदेश दिया- ‘‘यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म होना है, तो वह किसी देश या काल से सीमाबद्ध नहीं होगा, वह उस असीम ईश्वर के सदृश ही असीम होगा, जिसका वह उपदेश देगा ; जो न तो ब्राह्मण होगा, न बौद्ध, न ईसाई और न इसलाम, वरन् इन सबकी समष्टि होगा, जो इतना उदार होगा कि पशुओं के स्तर से किंचित उन्नत निम्नतम घृणित जंगली मनुष्य से लेकर अपने हृदय और मस्तिष्क के गुणों के कारण मानवता से इतना ऊपर उठ गये उच्चतम मनुष्य तक को, जिसके प्रति सारा समाज श्रद्धानत हो जाता है और लोग जिसके मनुष्य होने में संदेह करते हैं अपने बाहुओं से आलिंगन कर सके और उनमें सबको स्थान दे सके। वह धर्म ऐसा होगा, जिसकी नीति में उत्पीड़ित या असहिष्णुता का स्थान नहीं होगा; वह प्रत्येक स्त्री और पुरुष में दिव्यता को स्वीकार करेगा और उसका संपूर्ण बल और सामर्थ्य मानवता को अपनी सच्ची, दिव्य प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रित होगा।’’10 स्वामी विवेकानंद ने पूरे विश्व को सत्य का संदेश दिया – ‘‘सत्य हजार ढंग से कहा जा सकता है, और फिर भी हर ढंग सत्य हो सकता है। सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है, पर सत्य को किसी भी चीज के लिए छोड़ा नहीं जा सकता।’’11 उनका संदेश सत्य ही मेरा ईश्वर है तथा समग्र विश्व मेरा देश। विश्वभर में स्वामी विवेकानंद के संदेशों की स्वीकार्यता के विषय में स्वामी गंभीरानंद का कहना है कि, ‘‘केवल वाद-प्रतिवाद के माध्यम से ही उनका संदेश प्रचारित नहीं हुआ, अपितु उनका असीम प्रेम ही संदेश का सच्चा वाहक था। उन्होंने संपूर्ण विश्व को अपना कहकर अपना लिया था और मानवता को भी वे परम आत्मीय से प्रतिभात हुए थे ।’’12

स्वामी विवेकानंद मानवता के प्रेमी थे। वे मनुष्य को ही ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानते थे पर वे ही मानव-रूपी ईश्वर विश्व में सर्वत्र सताये जा रहे थे। वे मानवता का संदेश देते हुए कहते हैं कि, ‘‘हम मानव हैं, जो एक दूसरे की सहायता करने और एक दूसरे के काम आने के लिए जन्में हैं।’’13 मनुष्य-जाति के लिए मानवता का उनका संदेश है कि, ‘‘सब प्राणियों के प्रति करूणा रखो। जो दुःख में है, उन पर दया करो। सब प्राणियों से प्रेम करो। किसी से ईष्या मत करो। दूसरों के दोष मत देखो।’’14

अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस के सर्वधर्म समन्वय का संदेश घोषित कर उन्होंने भविष्य के सार्वभौमिक धर्म का संदेश देते हुए कहा कि, ‘‘प्रत्येक जाति या प्रत्येक धर्म दूसरी जाति या दूसरे धर्मां के साथ आपस में भावों का आदान-प्रदान करेगा, परन्तु प्रत्येक अपनी-अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करेगा और अपनी अंतनिर्हित शक्ति के अनुसार उन्नति की ओर अग्रसर होगा। शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा – ‘सहायता करो, लड़ो मत।’ ‘पर-भाव-ग्रहण, न कि पर-भाव विनाश’, ‘समन्वय और शांति, न कि मतभेद और कलह।’’15 धर्म एवं सहिष्णुता, सत्य एवं शांति, सर्वधर्म समन्वय एवं ईश्वर का एकत्व, मानवता एवं विश्व बंधुत्व और आत्मा का अखण्डत्व ही विश्व के लिए स्वामी विवेकानंद का संदेश था।

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भारत को स्वामी विवेकानंद का संदेश :

पाश्चात्य को दिये गये संदेश से भारत समझ गया कि स्वामी विवेकानंद के संदेश तथा कार्य के द्वारा हिन्दू समाज का बहुत कल्याण हुआ है और होगा; वे युग की आवश्यकता के अनुरूप कार्य में लगे हैं, वे हिन्दू धर्म के संरक्षक तथा देशनायक हैं। भारत पुनः जागृत होगा, पर युद्ध विग्रह की सहायता से नहीं, अपितु धार्मिक शांति के संदेश की अमृत वर्षा करके। पश्चिम में स्वामी विवेकानंद की सफलता इसी का पूर्वाभास देती है।

कोलम्बो से काश्मीर तक स्वामी विवेकानंद ने भारत को क्या संदेश दिया ? परिप्रेक्ष्य की भिन्नता के फलस्वरूप पूर्व और पश्चिम में उनके संदेश अलग-अलग रूपों में व्यक्त हुए। स्थान, काल और पात्र के अनुसार उन्होंने दोनों ही सभ्यताओं को उनके कल्याण के लिए युग की आवश्यकता के अनुरूप अपना संदेश दिया। भारत लौटकर पाश्चात्य देशों के उद्यम और ऐश्वर्य को देखकर स्वामी विवेकानंद ने भारत को जो संदेश दिया वह है, कर्म का संदेश। विवेकानंद मूर्तिमान ऊर्जा थे, मानव के लिए कर्म ही उनका संदेश था। अपने संदेशों के माध्यम से स्वामी विवेकानंद ने सोये हुए देशवासियां में अपूर्व आशा का संचार किया। पाश्चात्य देशों के लिए उनका संदेश ओजस्वी रहा पर भारत के लिए उससे भी अधिक ओजस्वी और महत्त्वपूर्ण है। त्याग और चरित्र-गठन इन दो बातों पर वे विशेष बल देते थे। स्वदेशवासियों की अकर्मण्यता और आलस्य को देखकर वे व्यथित हो जाते हैं। उनमें पुनः चेतना का संचार करने के लिए, राष्ट्र के उत्थान के लिए उन्होंने वेदांत की एक नवीन व्यावहारिक व्याख्या की। वे सदैव कहा करते थे, ‘शक्ति केवल शक्ति ही उपनिषदों का संदेश है।’ व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं। लोग कहते हैं – इस पर विश्वास करो, उस पर विश्वास करो, मैं कहता हूँ – “Have Faith in yourself, all power is in you – be conscious and bring it out.”16 (पहले अपने आप पर विश्वास करो सब शक्ति तुम्हारे भीतर है, इसे जानों और विकसित करो)। हे मानव ! तेजस्वी बनो, दुर्बलता को त्यागो और निर्भय बनो। स्वामी विवेकानंद शक्ति के जीवंत प्रतीक थे। वे वेदांत के शक्ति का संदेश देते हुए कहते हैं कि, ‘‘जगत की अनंत शक्ति तुम्हारे भीतर है। जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढके हुए हैं, उन्हें भगा दो। साहसी बनो। सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो। चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।’’17

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने जीवों के कल्याणार्थ देह धारण किया था, इस युग में शिव बोध से जीव सेवा का संदेश सर्वप्रथम उन्हीं के मुख से उच्चरित हुआ था। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के इस संदेश ‘जीवों पर दया नहीं, शिव बोध से उनकी सेवा’ को स्वीकार किया और ‘दरिद्रनारायण’ की अवधारणा दी – ‘दरिद्र देवो भव’, मूर्ख देवो भव।’ उन्होंने कहा, The poor, the Downtrodden, the ignorant, let these be your God. ‘दरिद्र, पददलित तथा अज्ञ तुम्हारें ईश्वर बनें।’’18 तुम सब उन्हीं की सहायता और सेवा करो। स्वामी विवेकानंद ने मानव-जाति को सेवा का संदेश दिया। ‘‘प्रत्येक जीव में वे ही अधिष्ठित हैं। ये सब उन्हीं के अभिव्यक्त रूप हैं। जो व्यक्ति जीवों की सेवा करता है, एकमात्र वही ईश्वर की पूजा कर रहा है।’’19 उन्होंने सेवा धर्म का संदेश देते हुए कहा कि, ‘‘आप लोग समझते हैं कि ईश्वर के आगे बैठकर यह कहने से कि हे ईश्वर तेरी नाक बहुत सुंदर है, तेरी आँखे चमकती हैं, तेरे हाथ बहुत लंबे हैं, वह प्रसन्न हो जायेगा। नहीं यह सब ढोंग है। जो शांति तुम पाना चाहते हो, वह आँख बंद करने से नहीं मिलेगी। आँखें खोलकर देखो कि तुम्हारे पास कौन है ? कौन गरीबी और बेबसी की हालत में पड़ा है ? किस रोगी और अपाहिज को सहायता की जरूरत है ? अपनी शक्ति भर उसकी सहायता करो। यही ईश्वर की सच्ची सेवा है। इसी से तुम्हें शांति मिलेगी।’’20 कोलकाता में प्‍लेग की महामारी के समय उन्होंने स्वयं रोगियों की सेवा की। सेवाधर्म रामकृष्ण मिशन का पहला कर्तव्य है।

शिक्षा मानव – जीवन की उन्नति एवं विकास का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। एक श्रेष्ठ शिक्षा-पद्धति पर ही राष्ट्र के भावी नागरिकों का भविष्य निर्भर करता है। स्वामी विवेकानंद ने भारत क लिए अपने संदेश में ‘शिक्षा’ को सबसे अधिक महत्त्व दिया है। वे कहते हैं, ‘‘यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमते हुए वहाँ के गरीबों के भी अमन-चैन और शिक्षा को देखकर मुझे अपने गरीब देशवासियों की याद आती थी और मैं आँसू बहाता था। यह भेद क्यों हुआ ? उत्तर मिला शिक्षा से।’’21 भारतीयों को शिक्षा का संदेश देते हुए वे कहते हैं, ‘‘स्मरण रहे कि जन साधारण और स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुए बिना देश की उन्नति का कोई दूसरा उपाय नहीं है।’’22 स्वामी विवेकानंद भारत के कल्याण के लिए कुछ आवश्यक सुधार चाहते थे। उनके मतानुसार सुधार का सर्वोत्कृष्ट माध्यम है – शिक्षा। ऐसी कोई व्याधि नहीं जो शिक्षा के द्वारा दूर न की जा सके। इसीलिए उनके संदेशों में शिक्षा का संदेश सबसे महत्त्वपूर्ण है।

स्वामी विवेकानंद के संदेश में … दो विचार सर्वोपरि मिलते हैं – सहिष्णुता और धर्म समन्वय। मानवीय बंधुता इनका अभीष्ट लक्ष्य था। इन्होंने प्रेम का महत्त्व समझाया – ईश्वर से लेकर साधारण जीव तक से प्रेम करना सिखाया। स्वामी जी का संदेश निःसंदेह आध्यात्मिक है, उनको दृढ़ विश्वास था कि आध्यात्मिकता की भूमि भारत का भविष्य उज्जवल है। इनका आदर्श वाक्य है, ‘‘सहायता झगड़ा नहीं’, ‘स्वांगीकरण, विनाश नहीं’, ‘समन्वय और शांति, संघर्ष नहीं।’’23 अपने संदेशों के चिर स्थायित्व के बारे में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि, इस शरीर का नाश हो जाने पर भी मेरा संदेश अमर रहेगा – ‘‘संभव है कि मैं इस शरीर को एक जीर्ण वस्त्र के समान त्यागकर बाहर आ जाना पसंद करूँ, परन्तु मैं कार्य करना बंद नहीं करूंगा। मैं मानव-जाति को सर्वत्र और तब तक सहायता एवं प्रेरणा देता रहूँगा, जब तक कि समग्र जगत – ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव नहीं कर लेता।’’24 स्वामी विवेकानंद सार्वभौमिक धर्म तथा विश्व – संस्कृति के प्रतीक हैं और उनका उदात्त संदेश संपूर्ण मानवता के लिए है। ज्ञान एवं भक्ति, कर्म और शक्ति, त्याग एवं चरित्र-गठन, सर्वसाधारण से प्रेम, शिक्षा और सेवा धर्म ही भारत के लिए स्वामी विवेकानंद का संदेश है।

युवाओं को स्वामी विवेकानंद का संदेश :

युवाओं से स्वामी विवेकानंद का प्रेम अपार था। वे युवाओं में लोहे सदृश मांसपेशियों तथा फौलादी दृढ़ता के हिमायती थे। स्वामी विवेकानंद का संदेश पौरुष तथा स्वावलंबन से परिपूर्ण होता है। युवाओं के लिए बल ही स्वामी विवेकानंद का संदेश है, ‘‘जिससे बल मिलता है, उसी का अनुसरण करना चाहिए। जो तुमको दुर्बल बनाता है वह समूल त्याज्य है।’’25 वे युवाओं को पौरुष का संदेश देते हुए कहते हैं कि, ‘‘ज्यों-ज्यों मेरी आयु बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों मुझे सब कुछ पौरुष में ही निहित दीख पड़ता है ; और यही मेरा नवीन संदेश है।’’26 Everything is possible, Nothing is impossible in the world. दुनिया में आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। ये कहना था 11वीं सदी के महान विचारक और युवा शक्ति के प्रतीक स्वामी विवेकानंद का। स्वामी विवेकानंद ऊर्जा की साकार मूर्ति थे। युवाओं को सदैव सकारात्मक बने रहने का संदेश देते हुए स्वामी जी कहते हैं कि, “No negative, all positive, affirmative. I am, god is and everything is in me. I will manifest health, purity, knowledge, whatever I want.”27 वर्तमान समय में युवाओं में अतीत के प्रति उदासीनता का भाव दिखाई दे रहा है। समाज की वर्तमान व्यवस्था से वे संतुष्ट नहीं हैं। वे इसमें परिवर्तन चाहते हैं। स्वामी जी युवाओं से कहते हैं, आत्मविश्वासी बनो। पूर्वजों के नाम से अपने को लज्जित नहीं, गौरवान्वित महसूस करो। युवाओं को अतीत के गौरवबोध का संदेश देते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि, ‘‘अपनी शक्ति को व्यर्थ बर्बाद न होने देना। अतीत की ओर देखो ; जिस अतीत ने तुम्हें अनंत जीवन रस प्रदान किया है, उससे पुष्ट होओ। यदि अतीत की परम्परा का सदुपयोग कर सको, उसके लिए गौरव का बोध कर सको तो फिर उसका अनुसरण कर अपना पथ निर्धारित करो। वह परम्परा तुम्हें दृढ़ नींव पर प्रतिष्ठित करेगी और इसके फलस्वरूप तुम देखोगे कि देश सामंजस्य पूर्ण समृद्धि की दिशा में अग्रसर हो रहा है।’’28 स्वामी विवेकानंद का मानना था कि, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण होता है। अतः वे युवाओं को चरित्र-गठन और शारीरिक बल का संदेश देते हैं – ‘‘बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु।’’29 युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद का संदेश है –

  • एक विचार लो, उसी विचार को अपना जीवन बनाओ – उसी का चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखों और उसी में जीवन बिताओं। तुम्हारा मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहे। दूसरे सारे विचार छोड़ दो, यही सिद्ध होने का उपाय है।
  • विचार ही हमारी कार्य – प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो, दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसी का चिंतन करो। पहले-पहल सफलता न भी मिले ; पर कोई हानि-नहीं, यह असफलता तो बिल्कुल स्वाभाविक है, यह मानव-जीवन का सौन्दर्य है। इन असफलताओं के बिना जीवन क्या होता है? यदि सहस्त्र बार भी असफल हो जाओ, तो एक बार फिर प्रयत्न करो।
  • अपना लक्ष्य ऊँचा रखो तो तुम सर्वोच्च चोटी तक पहुँचोगे।
  • अपनी उन्नति अपने ही प्रयत्न से होगी।
  • असहाय अनुभव करना बड़ी भारी भूल है। किसी से सहायता की याचना मत करो। अपनी सहायता हम स्वयं हैं। यदि हम अपनी सहायता नहीं कर सकते, तो हमारा सहायक कोई नहीं हैं।… तुम्ही एकमात्र अपने बंधु हो।
  • आप जैसा सोचोगे, वैसा हो जाओगे। यदि आप स्वयं को दुर्बल समझते हैं तो दुर्बल हो जायेंगे और मजबूत समझते हैं तो मजबूत हो जायेंगे।
  • उठो, जागो, और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।
  • भारत में विश्वास करो, अपने भारतीय धर्म में विश्वास करो। शक्तिशाली बनो, आशावान बनो और संकोच छोड़ो।
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स्वामी विवेकानंद के ये प्रेरणादायी संदेश युवाओं के जीवन मूल्य को बदल देते हैं।

क्या स्वामी विवेकानंद के संदेशों का सार कुछ शब्दों में कहा जा सकता है ? हाँ ! स्वामी विवेकानंद ने स्वयं कहा है : ‘‘मेरां संदेश कुछ ही शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है, वह है, मानव जाति को उसके देवत्व की शिक्षा देना तथा यह बताना कि उसे जीवन के प्रत्येक स्तर पर किस प्रकार अभिव्यक्त किया जाये।’’30 स्वामी विवेकानंद के इस संक्षिप्त संदेश का विस्तार हम उनके संभाषण, पत्र और व्याख्यानों में तथा इसकी व्यावहारिक अभिव्यक्ति स्वयं उनके जीवन में पाते हैं।

स्वामी विवेकानंद के संदेश के संदर्भ में सिस्टर निवेदिता का कथन है कि, ‘‘यदि वे न होते, तो आज सहस्त्रों लोगों को जीवनदायी संदेश प्रदान करने वाले वे ग्रंथ पंडितों के विवाद के विषय ही बने रह जाते।’’31

निष्कर्ष :

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन और संदेश के द्वारा मनुष्य जाति के भीतर एक नई चेतना जगायी, मानवीय इतिहास के मुख को मोड़ा। अपने जीवन तथा संदेश के माध्यम से इन्होंने विश्व में एक युगांतर उपस्थित किया, जिसे पूर्ण रूप से विकसित होने में संभवतः शताब्दियाँ लग जायेंगी। स्वामी विवेकानंद के भारतीय शिष्यों एवं गुरु भाइयों को लिखे गये हर एक पत्र से एक नवीन संदेश मिलता है, जो भाई चारा, समानता सहिष्णुता, गरीबों की सेवा, शिक्षा आदि जैसे मूल्यवान विचारों का जीवंत रूप होता है। आज 21 वीं सदी में हम जिस संकट और संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ अस्तित्त्व का संकट है, जीवन मूल्यों का संकट है और चहुँओर व्याप्त भ्रष्टाचार, घोर निराशा और अवसाद की समस्या है, आज का युवा वर्ग जिस तरह से दिशा हीन और अपने कर्तव्य बोध से मुँह मोड़ रहा है, ऐसे समय में यह बहुत जरूरी है कि एक बार स्वयं को जानने के लिए, अपने राष्ट्र को समझने के लिए स्वामी विवेकानंद को पढ़े, उनके संदेशों से प्रेरणा ले, उनके विचारों और संदेशों का मंथन करें और सार्थक एवं सकारात्मक बनने का प्रयास करें। विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में कहें तो – उनमें सब कुछ सकारात्मक है, कुछ भी नकारात्मक नहीं…।

संदर्भ ग्रंथ

1. विवेकानंद साहित्य, द्वादश पुनर्मुद्रण 2014, प्रकाशक – स्वामी तत्त्वविदानंद, खण्ड- 1 , पृ. – ज – , अद्वैत आश्रम कोलकाता

2. पत्रावली – स्वामी विवेकानंद, पंचम संस्करण 20 17, पृ. 171 , प्रकाशकः स्वामी ब्रह्मस्थानंद, रामकृष्ण मठ, धन्तोली नागपुर

3. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 1, पृ. – ज –

4. वही, पृ. – ट –

5. वही, पृ. 11

6. वही, पृ. 12

7. विवेकानंद साहित्य, खण्ड-7, पृ. 254-255

8. मेरी जीवन कथा, स्वामी विवेकानंद, प्रथम संस्करण 2015, प्रकाशक – स्वामी ब्रह्मस्थानंद, पृ. 31 , रामकृष्ण मठ, धन्तोली नागपुर

9. विवेकानंद साहित्य, खण्ड-7, पृ. 267

10. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 1, पृ. 20-21

11. विवेकानंद साहित्य, खण्ड 10, पृ. 214

12. युगनायक विवेकानंद, स्वामी गंभीरानंद, अष्टम पुनमुर्द्रण 2015, प्रकाशक – स्वामी ब्रह्मस्थानंद, भाग – 2, पृ. 2, रामकृष्ण मठ धन्तोली नागपुर

13. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 10, पृ. 216

14. वही, पृ. 215

15. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 1 , पृ. 27

16. विवेकानंद साहित्य, खण्ड-3, पृ. 311

17. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 2, पृ. 20

18. पत्रावली – स्वामी विवेकानंद, पृ. 224

19. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 6, पृ. 216

20 . स्वामी विवेकानंद और उनका अवदान, सं. – स्वामी विदेहात्मानंद, तृतीय पुनमुर्द्रण 2018, प्रकाशक :- स्वामी मुक्तिदानंद, पृ. 48-49, अद्वैत आश्रम कोलकाता

21. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 6, पृ. 311

22. वही, पृ. 37

23. विवेकानंद साहित्य, खण्ड-4, पृ. 258

24. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 10, पृ. 217

25. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 1 , पृ. 44

26. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 8, पृ. 130

27. पत्रावली – स्वामी विवेकानंद, पृ. 185

28. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 5, पृ. 180

39. विवेकानंद साहित्य, खण्ड – 9, पृ. 177

30. पत्रावली – स्वामी विवेकानन्द, पृ. 372

31. विवेकानंद साहित्य, खण्ड- 1 , पृ. -ठ –

 

 

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