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दलित लोकजीवन का सौंदर्य प्रतीक ‘मुर्दहिया’

दलित साहित्य का आरंभ ही दलित आत्मकथाओं से हुआ है। तुलसीराम ने ‘मुर्दहिया’ में अपने वैयक्तिक जीवन की पीड़ा, दुख, दर्द के साथ-साथ लोकजीवन में व्याप्त अंधश्रद्धा, अपशकुन, देवी देवता, भूत-प्रेत का जीवंत वर्णन किया है। दलित लोकजीवन का सौंदर्य ‘मुर्दहिया’ में साकार हो उठा है। इसलिए दलित आत्मकथाओं में तुलसीराम कृत ‘मुर्दहिया’ विशिष्ट स्थान रखती है।

हिंदी दलित कहानियाँ और भारतीय समाज-विजय कुमार

आज़ादी के बाद दलितों को शिक्षा का अधिकार मिला। मूक लोगों को वाणी मिली और चेतना आई जिससे उन्होंने रुढ़ियों और अमानवीय परंपराओं को नकार दिया। आठवें दशक में हिंदी दलित कहानी ऐसे ही समय में तेज़ी से उभरती है और अपनी उपस्थिति दर्ज करती है। तब से तक दलित कथाकर अपनी कहानियों के माध्यम से स्वयं को तलाशने के साथ-साथ सामाजिक परिवेश की गंभीर चुनौतियों से भी टकराते है

पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिक-आर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपा-झुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ-डॉ. सुधांशु शर्मा

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ                     डॉ. सुधांशु शर्मा                                कुम्हारिया, कांके             रांची, झारखंड                            8877541225    Sudhbharti@gmail.com शोध सारांश ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कहानियों में समाज के यथार्थ रूप की बेखौफ अभियक्ति की है । कहानियों की भाषा– शैली बेजोड़ है । दलित जीवन का दर्द, अदम्य लालसा, उसकी मनोस्थिति को जिन …

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