रस का स्वरूप और उसकी प्रासंगिकता-आशा 

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रस  सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र का बहुत ही प्राचीनतम सिद्धांत है परन्तु  इसे व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठा बाद में प्राप्त हुई। यही कारण रहा कि अलंकार सिद्धांत जो रस सिद्धांत से बाद में आया लेकिन रस सिद्धांत से प्राचीन माना जाने लगा। रस के स्वरूप पर मुख्य रूप से भरतमुनि, अभिनव गुप्त, मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने प्रकाश डाला है। रस सिद्धांत के मूल प्रवर्तक लगभग 200 ई॰पू॰ आचार्य भरतमुनि माने जाते हैं।

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हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर: चंदन कुमार

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कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

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