पीड़ा, आक्रोश और परिवर्तन का संकल्प-डॉ. रवि रंजन

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दलित तबके में आई जागृति ने उनमें सामाजिक-आर्थिक अन्याय को बनाए रखने वाले वर्ग और व्यवस्था के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। सामाजिक अन्याय के पक्षधरों और जिम्मेदार लोगों के प्रति दलितों का आक्रोश अब ज्यादा मुखर हो गया है। दलित मानस यातनाओं की आँच में तपा-झुलसा है अतः आक्रोश व प्रतिशोध के भाव अब इन कविताओं में आने लगे हैं।

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लोक जीवन की पहचान दिखाती नव – वामपंथी कविता : राजेश जोशी की जुबानी: षैजू के

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राजेश जोशी स्वभाव से बड़े शरीफ किस्म के आदमी है। लेकिन कविता के माध्यम से वह आज के बाजारीकरण के युग में ऐसी व्यंग्य बात कह देते हैं कि समाज की खोखली व्यवस्था का पर्दाफाश हो जाता है। आज का समय भूमंडलीकरण, उपयोगितावादी और विज्ञापन का युग है, जिसमें मानव जीवन के मूलभूत गुणों का हनन हो रहा है। चाहे वह आपसी सदभावना हो, प्रेम हो, अपनापन हो, रिश्ते – नाते हो, समाज या परिवार हो।

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