धूमिल की कविताओं का ध्वनि स्तरीय शैलीचिह्नक विश्लेषण-सुशील कुमार

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सन् 1960 के बाद की कविता में धूमिल भाषिक शब्दावली एवं कविता मुहावरे के कारण विशेष स्थान रखते हैं। अधिकतर आलोचक इनकी कविताओं को सपाटबयानी कहकर आलोच्य कर्म से इतिश्री कर लेते हैं, लेकिन ध्वनि स्तर पर कविताओं के भीतर की लय, सूत्रबद्धता एवं लेखिमिक स्तरीय प्रयोगों को अनदेखा कर देते हैं। जिन पर धूमिल कविताओं का सौंदर्य आधारित हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र कविताओं के इसी सौंदर्य-बोध, भाव-बोध के विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। कविताओं की भीतरी लय, स्थिति-बोध को प्रस्तुत किया गया है।

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