प्रकृति युद्धरत है. : प्रेम और संघर्ष के बीच स्त्री-डॉ. कर्मानंद आर्य

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रमणिका गुप्ता हमारे समय और संदर्भ की एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श को एक नई जमीन दी है. उन्होंने आजीवन उस कौम को सशक्त करने का काम किया जो किसी भी तरह के उत्पीड़न का शिकार रहे. अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से उन्होंने हाशिये पर पड़े हुए एक बड़े वर्ग को मुख्यधारा बना दिया जो सदियों से दर-दर की ठोकरें खा रहा था. बाबा साहब आंबेडकर के रास्ते पर चलने वाले रचनाकारों के बीच वे इन विमर्शों की सबसे बड़ी पैरोकार रही हैं. सामंती पृष्ठभूमि से आने वाला उनका स्वयं का जीवन जीवटता का एक सशक्त उदाहरण है. एक सामंती पितृसत्तात्मक समाज में पैदा होने वाली लड़की ने आखिर विद्रोह का रास्ता चुना और उसके लिए आजीवन संघर्ष करती रहीं, आज तक उनके जीवन का यही पाथेय रहा.  यहाँ हमने कविता में उनके अवदान और ‘प्रकृति युद्धरत है’ से संदर्भित कविताओं की विवेचना प्रस्तुत की है.

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