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स्त्री मुक्ति का भारतीय और पाश्चात्य संदर्भ

1946 में फ्रांसीसी भाषा में छपी सिमोन द बउवार की पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ में लेखिका ने यह स्पष्ट किया कि समाज में स्त्री की स्थिति मबवदक (दोयम) है थ्पतेज नहीं। इसके उत्पीड़न का कारण जेंडर है; सेक्स को जेंडर से अलग समझना चाहिए।

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‘‘स्त्री-मुक्ति की राहें’’ सपने और हकीकत

बाज़ार ने जो स्त्री को उसके आवरणों से मुक्त किया है वह स्त्री स्वतंत्रता की कामना से नहीं अपितु उसकी देह के अबाध इस्तेमाल के लिए। यह बाज़ारवाद का ही प्रभाव है कि आज स्त्री की चरित्रहीनता को उसकी प्रगतिशीलता का दूसरा रूप ही मान लिया गया है।

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