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भारतीय सिनेमा वाया स्त्री विमर्श – तेजस पूनिया

फिल्मों ने स्त्री जीवन के पारिवारिक और सामाजिक सवालों को ही नहीं उठाया है बल्कि राजनीतिक सवालों को भी उठाया है। उदाहरण के तौर पर स्त्री जीवन पर केंद्रित कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनका ज़िक्र लाज़मी है– ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, ‘दामिनी’, ‘बेंडिट क्वीन’, ‘मम्मो’, ‘फायर’, ‘सरदारी बेगम’, ‘मृत्युदंड’, ‘गॉड मदर’, ‘हरी-भरी’, ‘गजगामिनी’, ‘अस्तित्व’, ‘जुबैदा’, ‘क्या कहना’, ‘चांदनी बार’, ‘ज़ख्म’, ‘फिज़ा’ आदि में स्त्री जीवन को महत्वपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।

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यथार्थ के आईने में स्त्री-मधुमिता ओझा

स्त्री की अपनी इच्छाएं, जीवन के प्रति उसके अपने एप्रोच को तवज्जु दिए बगैर न तो स्त्री को समझा जा सकता है, न जेंडर समानता को, न स्त्री के प्रेम को और न ही स्त्री-विमर्श को। स्त्री-विमर्श को समझने के लिए स्त्री की ऑटोनोमी को समझना अनिवार्य है। यही कारण है कि लेखिका स्त्री को उसकी स्वायत्तता के प्रति जागरूक करती हैं।

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सत्ता, संस्कृति और स्त्री की स्वाधीनता-डॉ. मिथिलेश कुमारी

स्त्री की आज़ादी का प्रश्न समाज से कटा हुआ नहीं है। यह जितना स्त्रियों के सहज और सरल जीवन-यापन के लिए ज़रूरी है उतना ही सम्पूर्ण समाज के लिए भी। इस शोध-पत्र में सत्ता और संस्कृति के अंतर्संबंधों को स्त्री आज़ादी के परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की गयी है।

नारी-विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी’ उपन्यास में नारी संघर्ष: प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश,

नारी–विमर्श की दृष्टि से ‘कौन नहीं अपराधी‘ उपन्यास में नारी संघर्ष प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश                                                                                       अनुराधा कुमारी हिंदी विभाग                                                                                                                        शोधार्थी स्नातकोत्तर राजकीय कन्या महाविद्यालय                            …

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