भौगौलिक चेतना के सन्दर्भ में हिन्दी ग़ज़ल-डॉ. पूनम देवी

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प्रकृति की श्रेष्ठ कृति मनुष्य को माना गया है । सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर की बनाई श्रेष्ठ कृति प्रकृति के प्रति अपने भावों को व्यक्त करने के लिए मनुष्य ने काव्य को अपना माध्यम बनाया । काव्य मनुष्य के भीतर की संवदेनाओं  को जागृत करने का कार्य करता है । काव्य का हिन्दी साहित्य में तथा हिन्दी काव्य के क्षेत्र में ग़ज़ल विधा का अपना विशिष्ट स्थान है । हिन्दी ग़ज़लकारों ने जीवन के विविध पक्षों को उजागर करने में प्रकृति के विभिन्न घटकों को माध्यम बनाया । हिन्दी ग़ज़ल विभिन्न प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से गाँव, समाज, देश तथा विश्व को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करती है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के विविध रूपों को भौगोलिक चेतना के रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है । हिन्दी ग़ज़ल में प्रकृति के सुन्दर एवं प्रलयकारी दोनों ही पर्यावरणीय रूपों को प्रदर्शित कर भौगोलिक चेतना को दर्शाया गया है । हिंदी ग़ज़ल का महत्त्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय चेतना भी है । प्रस्तुत शोध आलेख इस विस्तृत परिदृश्य के आधार पर चुनिंदा हिन्दी ग़ज़लों में भौगोलिक चेतना को दो मुख्य तत्त्वों – प्रकृति वर्णन और पर्यावरण प्रदूषण के आधार पर देखने का प्रयास करता है ।

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