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हिन्दी यात्रा साहित्य में रामवृक्ष बेनीपुरी

हिन्दी यात्रा साहित्य में रामवृक्ष बेनीपुरी

करुणा सक्सेना
शोधार्थी, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, म. प्र.
ईमेल : karunasaxena@refiffmail.com

सारांश

यात्रा वृतांत लेखन हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है, जिसके माध्यम से विभिन्न साहित्यकारों ने अपने यायावरी अनुभवों को लिपिबद्ध किया है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपनी दो योरोपीय यात्राओं को बहुत ही रोचक एवं प्रभावी सम्प्रेषणीयता के साथ अपने यात्रा ग्रन्थों में उल्लेखित किया है। उनके दोनों ही यात्रा ग्रन्थ ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दृष्टि से यात्रा साहित्य में मील के पत्थर की तरह हैं। चूंकि बेनीपुरी की दोनों यात्राएँ देश की आजादी के लगभग तुरंत बाद की हैं अतः तत्कालीन समाज का चित्रण उनके लेखन में सहज ही देखा जा सकता है। बेनीपुरी की सजग दृष्टि जब विदेश में वहाँ के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक संरचनाओं और व्यवस्थाओं का अवलोकन करती है तब वे अपने देश भारत, जो हाल ही में स्वतंत्र हुआ था, उसके लिए भी एक व्यवस्थित समाज की कल्पना करते हैं। अपनी दोनों विदेश यात्राओं में बेनीपुरी औपचारिक कारणों से गये थे परन्तु उन्होंने अपनी दृष्टि मात्र औपचारिक नही रखी अपितु वे एक जागरूक यायावर की भांति देखी गई प्रत्येक वस्तु अथवा व्यक्ति का अवलोकन कर उसका प्रभावपूर्ण व सटीक तरीके से चित्रण करते हैं। उनके दोनों यात्रा ग्रन्थ ‘पैरों में पंख बाँधकर’ व ‘उड़ते चलो, उड़ते चलो’ हिन्दी यात्रा साहित्य में अपना विशेष स्थान रखते हैं।

बीज शब्द :- यात्रा साहित्य, यायावर, रामवृक्ष बेनीपुरी, यात्रा वृतांत

आमुख

मानव अनेकों भावनाओं से भरपूर एक भावुक जीव है। वह विभिन्न माध्यमों से अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है, कभी चित्रकारी के माध्यम से, कभी कविताओं के माध्यम से तो कभी जीवन यात्रा और अपने अनुभवों की लिपिबद्ध अभिव्यक्ति के माध्यम से। मानव मन की अकुलाहट, प्रेम, रोष और असमंजस के भाव निसंदेह ही संसार सम्मुख प्रकट होते हैं, ऐसे में यात्रा वृतांत मानव मन के भावों को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। कहने का आशय है कि यात्रा प्रेम हमें हमारे अंतर्मन से तो जोड़ता ही है साथ ही वह हमारी उस दृष्टि को भी निखारता जाता है, जिसे हम अपने आसपास की परिस्थितियों एवं समाज पर रखते हैं। यात्रा वृतांत मन, दृष्टि और दृष्टिकोण सभी के भेद खोलते हैं।

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसे यायावर हुए हैं जिन्होंने यात्रा साहित्य में अपनी महत्वपूर्ण कलम चलाई है। रामवृक्ष बेनीपुरी एक ऐसे ही सजग यायावर हैं। जिन्होंने यात्राओं से विशेष प्रेम किया, जीवन ने उन्हें जब-जब अवसर प्रदान किया उन्होंने यात्राएं की एवं अपने यात्रा अनुभवों को यात्रा वृतांतों के माध्यम से लिपिबद्ध भी किया। रामवृक्ष बेनीपुरी ने इन यात्रा वृतांतों में जीवन के विभिन्न पहलुओं के अनेकों चित्र आकर्षक रूप से उकेरे हैं। बेनीपुरी ने दो यात्रा वृतांत लिखे जो योरोप यात्रा से सम्बंधित हैं। उन्होंने पहली यात्रा 19 अप्रैल 1951 से 2 जून 1951 तक की थी, जिसे उन्होंने ‘पैरों में पंख बांध कर’ नाम से लिपिबद्ध किया। जिससे इंग्लैंड, स्कॉटलैन्ड, स्विट्जरलैन्ड और फ्रांसिसी देशों की राजनीति, मानसिक और आर्थिक संरचना देखकर 4 जून को अपने देश वापस लौटते हैं। ‘पैरों में पंख बांधकर’ में उन्होंने बहुत आत्मीयता के साथ अपनी सम्वेदनाएँ कलात्मकता रूप में व्यक्त की हैं। इस यात्रा का आयोजन ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विसेज द्वारा किया गया था, जिसमें भारत से छह पत्रकारों को चुना गया था और रामवृक्ष बेनीपुरी हिन्दी के पत्रकार के रूप में वहाँ गये थे। बेनीपुरी ने दूसरी योरोप यात्रा 11 मई 1952 से 19 जून 1952 के बीच की थी। जिसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वाधीनता कांग्रेस का अधिवेशन में सहभागिता की। इस संस्था का निर्माण पश्चिमी देशों ने कम्युनिस्ट विचारधारा के विरोध में किया गया था। इसमें अनेक देशों के संस्कृति कर्मी, कलाकार, विचारक, साहित्यिकार आदि सम्मिलित हुए थे। इस रोचक यात्रा का संकलन दूसरे यात्रा ग्रन्थ ‘उड़ते चलो उड़ते चलों’ में दिया गया है। जिसमें बेनीपुरी जी ने फ्रांस के अतिरिक्त लंदन, स्विट्जरलैन्ड और इटली की यात्राएँ की थीं।

इन यात्रा वृतांतों में बेनीपुरी द्वारा आँखों देखे यूरोपीय देशों के रोचक शब्द चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। विभिन्न व्यक्तियों के विवरण में हुए मर्मस्पर्शी चित्र यत्र-तत्र हैं। जैसे इंग्लैंड में एक दिन सुपारी निकालते हुए उसमें चूड़ी का एक टुकड़ा निकल आया और उन्हें पांच हजार सील दूर भारत में अपनी पत्नी और परिवार की याद आ गई। इनसे हम वृत्तांत के प्रारंभ में ही भेंट करते हैं जब हवाई अड्डे पर विदेश यात्रा के लिए विदाई देने परिवार, पत्नी, बहुएँ, मित्र, शुभेच्छु जमा हुए थे। “स्त्रियों के एक झुंड में रानी (पत्नी) खड़ी हुई थी। वह सुनती है, गरदन हिलाती है, कभी होठों पर हास्य की रेखा भी लाती है। इस हास्य की रेखा के पीछे क्या है, मैं जानता हूँ, जानता हूँ।”1 विवरण के ऐसे उल्लेख कथ्य को शुष्क होने से बचाते हैं और लेखक की संवेदनशीलता और संस्कारों के द्योतक हैं।

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भारतीय पत्रकारों के लिये ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विसेज़ द्वारा प्रायोजित यह यात्रा वस्तुतः एक तरह का कूटनीतिक प्रचार अभियान थी और प्रतिनिधि मंडल को इससे मेजबान देश की जीवन पद्धति, शासन तंत्र, सामाजिकता और नागरिकों के व्यक्तित्व को निकट से समझने जानने का अवसर मिला। बेनीपुरी के वृतांत में ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व के स्थानों का जिक्र तो है ही, साथ में वह साहित्य, राजनीति और सामाजिक वातावरण की चर्चा करते हैं। उन्हें लगता है ब्रिटिश समाज एक उन्मुक्त समाज है जहाँ व्यक्ति पूरी तह स्वतंत्र है। हाइड पार्क से लेकर यहाँ वहां के जो चित्र उन्होंने खींचे उनसे हमें एक वर्जना मुक्त लेकिन मर्यादित समाज की झलक मिलती है। प्रशासन के कार्यालयों की सादगी, पुलिस का व्यवहार और आम नागरिक का स्वप्रेरित आचरण उन्हें प्रभावित करता है। पत्रकार होने के नाते वह अखबारों की दुनिया में झाँकते हैं तो राजनीतिक कार्यकर्ता के नाते उनकी रुचि स्थानीय दलो के कार्यकलापों में भी है। सत्तारूढ़ लेबरपार्टी और इस देश के समाजवादियों की गतिविधियों को वह उत्सुकता से देखते हैं। भारतीय प्रवासियों में समाजवादी पक्षधरों से वह आत्मीय भाव से मिलते हैं और यह जानकार उन्हें संतोष होता है कि प्रवासी भारतीयों की समाजवादी पार्टी के डेढ सौ सदस्य हैं। वह थियेटर संगीत, कंसर्टों, म्यूजियमों के साथ एक मजदूर के घर भी जाना चाहते हैं। उन्हें यह देखकर खुशी होती है कि इस परिवार का जीवन यापन अन्य वर्णो से कमतर नही है। यह जनजीवन है तो दूसरी तरफ इंग्लैण्ड की भव्यता, परंपरा प्रियता और रूढ़िगत आग्रह भी है। यह यात्रा सूचना सेवा के द्वारा एक प्रायोजित यात्रा है और इसलिये मेजबान मेहमानो को अपने देश के विषय में ज्यादा से ज्यादा दिखाना चाहते हैं। इसलिये उन्हें वह सब दिखा देना चाहते हैं जिससे प्रगतिशील और समृद्ध देश की एक तस्वीर उनके सामने बन सके। यात्रा में भारतीय दल संसद देखता है। हाउस आफ लार्ड्स की भव्यता, हाउस आफ कामन्स की सादगी। सदनों की कार्यवाही देखता है। विश्व राजनीति को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों- चर्चित और एटली जैसे के रूबरू होता है। वह न्याय प्रणाली को अदालत में देखते हैं। नर्सरी स्कूल से लेकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय एक शिक्षा प्रणाली को देखते हैं। ओवरसीज लीग को लेकर सहयोग संस्था तक तक उनका परिचय कराया जाता है। वह ग्राम्य जीवन देखते हैं, और औद्योगिक ब्रिटेन की झाँकी बडे-बडे कारखानों के भ्रमण में उन्हें मिलती है। बेनीपुरी एक सजग पर्यटक है और हर दृश्य को अपने पाठक तक पहुंचाते हैं। वे बताते हैं कि सामाजिक दृष्टि से ब्रिटेन के समाज के स्त्रियो के साथ भेदभाव नही बरता जाता। वह वर्जना मुक्त और स्वतंत्र है। कल-कारखानों, कार्यालयों, सामाजिक गतिविधियों में उनकी बराबरी की भागीदारी है। बेनीपुरी नारी की जनजीवन में इसी उपस्थिति को रेखांकित करते हुए लिखते हैं- “देखिए यहाँ से वहाँ तक लड़कियों की कतारें। अधिकांश युवतियां हैं- मुग्धा से लेकर प्रौढा तक। सबके ओठों पर हंसी, आपस में कुछ बुदबुदा भी रही हैं, किन्तु हाथ नहीं रूकते।“2

अपनी इंग्लैड यात्रा में बेनीपुरी की बहुत इच्छा थी कि अपने आराध्य बर्नाड शॉ के स्मारक को देखें। इसका अवसर तो नहीं मिला किन्तु नाटककार शेक्सपीयर और कवि जान कीट्स के स्मारकों की यात्रा ने, जिन्हें वह तीर्थ यात्रा कहते हैं, उन्हें अभिभूत कर दिया। यह बताते हैं कि इन परिसरों में सब कुछ वैसे का वैसा ही संजोया सजाया गया है जैसे वह उन महापुरूषों के जीवनकाल में था। स्टेट फोर्ड ऑन एवन शेक्सपीयर का गाँव है। इंग्लैण्ड मूर्ति पूजकों का देश हैं अपने महापुरुषों, सेना नायकों, राजपुरूषों की स्मृतियों को सहेजने और इतिहास की निरंतर स्मृति के लिये वह उनकी मूर्तियाँ गढ़ता है और पार्कों, चौराहों, स्मारकों पर उन्हें खड़ा करता है। बेनीपुरी अपने वर्णन मे बार-बार इसका उल्लेखनीय करते हैं। उडते चलो-उड़ते चलो में अपनी पेरिस यात्रा के वर्णन में भी इन्होनें जोन आफ और नेपोलियन की मूतियों का वर्णन किया है। कीटस और शेक्सपीयर के स्मारक देखकर उन्हें क्षोभ होता है कि हमारे देश में साहित्यकारों की इतनी चिन्ता क्यों नही है और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सम्पूर्णानंद को इंग्लैड से ही राजापुर में गोस्वामी तुलसीदास और विस्फी में कवि विद्यापति की स्मृति संरक्षण का अनुरोध करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि इंग्लैड अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को लेकर बहुत भावुक है।

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जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है। बेनीपुरी की दूसरी विदेश यात्रा, सांस्कृतिक स्वतंत्रता कांग्रेस के सम्मेलन में भाग लेने के लिये हुई। पहली यात्रा में योरोप से उनकी वापसी पेरिस और ज्यूरिख होकर हुई थी और “पैरो में पंख बांध कर” के अंतिम पृष्ठों में उसकी कुछ झलकियाँ हैं। लेकिन पेरिस के अतिरिक्त इस यात्रा में लंदन, जेनेवा इन्टरलाकेन, बेनिस, फ्लोरेन्स और रोम के अर्थात फ्रांस इंग्लैण्ड स्विट्जलैण्ड और इटली के यात्रा विवरण “उडते चलो, उडते चलो” में शामिल हैं। डायरी शैली में लिखे गये इस यात्रा वृतांत में बेनीपुरी का प्रांजल गद्य, चित्रात्मक शैली, सहज संवाद, सूक्ष्म दृष्टि और प्रभावशील संप्रेषण देखने को मिलता हैं।

जिस दिन बेनीपुरी पेरिस पहुँचे वह राष्ट्रीय उत्सव का दिन था। फ्रांस अपनी दो महान संतानों की जयंती मना रहा था- नेपोलियन और जोन ऑफ आर्क। यात्रा विवरण राष्ट्रीय स्तर के समारोहों से शुरू होता है। शहीदों को श्रद्धाजंलि देने के लिये श्रद्धावनत देशवासियों के उल्लेख के साथ। यह एक महोत्सव था जिसमें अनेक विश्वविख्यात स्वनामधन्य संस्कृतिकर्मी भाग ले रहे थे। सम्मेलन कई सत्रों में चलना था और साहित्य विषयक सत्रों में बेनीपुरी तथा भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के आमंत्रित किया गया था। पहले ही दिन बेनीपुरी वार्साई के उस महल का विवरण देते हे जो 1789 की राज्यक्रांति का घटना स्थल था चौदहवें लुई द्वारा निर्मित विशाल और अन्य राजमहल, उसकी वह बालकनी जहाँ से मेरी ऐन्तोइन ने प्रदर्शनकारी भीड़ को सलाह दी थी रोटी नही है तो केक खाओ। जहाँ से विद्रोहियों ने घसीटकर राजपरिवार का कत्ल कर दिया था। वार्साई ही वह स्थल है जहाँ इतिहास का दूसरा महानाटक खेला गया। पहले विश्व युद्ध खेल में इसी महल के विशाल हाल में फ्रांस के क्लीर्मंसो अमेरिका के विल्सन और इंग्लैण्ड के लॉयड जार्ज ने युद्ध समाप्ति के संधि-पत्र पर दस्तखत किये थे। पर्यटन यात्रा का यह प्रारंभ अपने आप में क्या प्रतीकात्मक नहीं है। यात्रा का अधिकांश विवरण सांस्कृतिक स्वाधीनता कांग्रेस और सम्मेलन की गतिविधियों से जुडा हुआ है। सम्मेलन की कार्यवाही, उसमें होने वाली विश्वविख्यात विचारकों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के भाषण, बहसें, स्थान-स्थान पर उद्धृत की गई हैं। सम्मेलन के ही तत्वावधान में संगीत सभाओं, नाटकों आदि सहवर्ती कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया है। उनका वर्णन भी यहाँ है। सांस्कृतिक स्वाधीनता कांग्रेस अपने आप में विवादास्पद रही है। इसे अमरीकी वित्त से पोषित माना जाता हे और इसके द्वारा सोवियत संघ की कम्युनिस्ट व्यवस्था के विरोध में जनतंत्र का प्रचार किया जाता था।

इसके अतिरिक्त इस वर्णन में जो कुछ है। वह वास्तविक रूप से एक पर्यटक द्वारा देखा गया यथार्थ है। बेनीपुरी फ्रांस के ऐतिहासिक स्मारकों, जनजीवन की झाँकियों और कला तथा साहित्य में चल रहे आन्दोलनों की चर्चा करते हैं और अपनी समर्थ कथन शैली से इस यात्रा विवरण को रोचक, पठनीय और स्पंदित-जीवंत बना देते हैं। यात्रा के पहले ही दिन यात्रा-अनुभव का एक उदाहरण देखें- “…हाँ, यहाँ परियाँ नाचती हैं, गाती हैं। नाचती हैं विविध रूपों में, विविध हाव-भावों में। पहले सुसज्जित श्रंगार देखिए, फिर नग्न सौन्दर्यं। नग्न सौन्दर्य -चौंकिए नहीं घबराइये नहीं, यह पेरिस है। और पेरिस की बेटियों को ही जगमग सौन्दर्य की वह अलक्षित चीज विधाता ने दी है कि वह इस रूप में आपके सामने आ सके खडी हो सके, नाच सके, और दर्शकों की धमनियों के रक्त को भी नचा सके।“3

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अपने यात्रा विवरण में बेनीपुरी कला प्रदर्शनियों, मेलों, वन भ्रमण आदि का उल्लेख करते हैं और उनके द्वारा जनजीवन के चित्र सामने आते रहते हैं। वह सांस्कृतिक जीवन में चल रहे अभियानों औऱ वैचारिक द्वंद्वों को भी प्रस्तुत करते रहे हैं। कहते हैं फ्रांस नए विचारों की उर्वरा भूमि है और हर नये कला साहित्य संगीत का श्रीगणेश यहीं से होता है। महापुरूषों से जुडे हुए अतीत में उनकी विशेष रूचि है। 11 मई से 19 जून तक का समय पेरिस प्रवास में बिता कर घर वापसी के दौर में बेनीपुरी लंदन पहुँचे। यहां के दृश्य देखे हुए और जाने-पहचाने थे। इस बार प्रवास में ‘क्यू गार्डन’ देखा। ब्रिटिश म्यूजियम ओर साइंस म्यूजियम देखे। पुस्तक संग्रहालय में अपनी और भारतीय लेखकों की पुस्तके देखकर आनंदित हुए। रिजेन्ट पार्क के ओपन एयर थियेटर को देखकर एक नई विद्या का पता लगा। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में मधुशाला के कवि बच्चन से भेंट ओर खुले वातावरण के अतिरिक्त एक और आकर्षण या जीव विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का संग्रह देश विदेश के जानवर की अस्थियों और जैव संग्रह, इस तरह सजाए गए कि जीवन के विकास का इतिहास साकार हो उठा। लंदन में अंग्रेजी के नये कवि स्टीफन स्पेन्डर के यहाँ रात्रिभोज। दस जून को बेनीपुरी लंदन से जेनेवा रवाना हुए। स्विटजरलैण्ड घडियों के लिये मशहूर है। वे लिखते हैं- “अपने गृह उद्योगों के लिये प्रसिद्ध है। वे वहाँ के किसान हैं, कारीगर हैं, जो अपने हाथ के बल ओर कौशल से अपने देश के बल और कौशल से अपने देश को सुखी संपन्न बनाए हुए हैं और उसके राजनीतिज्ञों ने भी सदा यह बुद्धिमानी दिखलाई कि अपने देश को युद्ध से परे रखा।“4

बेनीपुरी और साथी लेखकों की योरोप यात्रा का अंतिम गंतव्य इटली का ऐतिहासिक नगर रोम था जहाँ वह फ्लोरेन्स से पहुँचे। रोम में ऐसा क्या नहीं है जिन्होंने अपने संघातों से इतिहास और समय के पदचापों को दिशा न दी हो। कण कण में मानवता की कल्लोलित धारा को थाम कर रोम ने युगों की कहानियाँ रची हैं। सभ्यता के यहाँ मौजूद भग्नावशेष आज भी स्मृतियों से स्पंदित हैं। पर्यटक के कानों में फुसफुसाते हैं। रोम का कोलोजियम रोम के जलने पर सितार की धुन में खोए नीरो के स्वर्ण महल के अवशेष, चिरप्रसिद्ध केपिटल सात पहाडियों पर बसा यह नगर पर्यटन के लिये असाधारण महत्व रखता है और इसने अपने अतीत की स्मृतियों को बटोर कर भी रखा है।

निष्कर्ष

इस प्रकार अपने दोनों यात्रा वृतांतों में बेनीपुरी देखे गए सभी स्थानों का उल्लेख और चित्रण बहुत ही सहज व प्रभावी सम्प्रेषणीयता के साथ करते हैं। कथायें-अंतर्कथाएँ विवरणों को विश्वसनीय और सजीव बनाती हैं। सारे संदर्भ और इसके प्रति लेखक की संवेदनशील प्रतिक्रिया इन दोनों यात्रा वृतांतों को रोचक, पठनीय और जानकारियों व सूचनाओं के स्रोत के रूप में उपयोगी बनाती है। यही बेनीपुरी के यात्रा लेखन की विशिष्ट गुणवत्ता है जो रामवृक्ष बेनीपुरी का हिंदी के यात्रा साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान स्पष्ट करती हैं।

सन्दर्भ

  1. रामवृक्ष बेनीपुरी, पैरों में पंख बाँधकर, संस्करण 2015, अनामिका पब्लिशर्स दिल्ली, पृ. 22
  2. वही ; पृ. 112
  3. रामवृक्ष बेनीपुरी, उड़ते चलो, उड़ते चलो, संस्करण 2012, प्रभात प्रकाशन दिल्ली, पृ. 23
  4. वही ; पृ. 121

 

JANKRITI । जनकृति

Multidisciplinary International Magazine

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