भारतीय लोक साहित्य में पर्यावरण: विकास कुमार गुप्ता

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भारतीय लोक साहित्य में पर्यावरण

विकास कुमार गुप्ता
होजाई, असम पिन-782435
Vikashg891@gmail.com
9854716533

आदि काल से ही नहीं बल्कि युगो-युगो से है और यह एक दूसरे के पूरक हैं । इन दोनों का संबंध सदियों से स्थापित है और दिनों दिन यह और भी विस्तार होते जा रहे हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय साहित्य हो या पर्यावरण जब भी इनकी चर्चा की जाती है तो भारत की संस्कृति, लोक साहित्य और धर्म का विषय हमारे सामने खुद-ब-खुद उभरकर आ ही जाता है इसका एक ही कारण है कि इनका आपसी में घनिष्ठ संबंध । इसलिए अगर आप इन किसी भी विषय पर अगर चर्चा करते हैं तो यह एक दूसरे के पूरक बनकर हमारे सामने आएंगे ही इसे हम नकार नहीं सकते ।

                भारत में लोक साहित्य और पर्यावरण का संबंध आपको पूरे भारत में सभी राज्यों में भिन्न-भिन्न जाति जन-जातियों , धर्मों आदि में आपको इन दोनों का संबंध पूर्ण रूप से देखने को मिलेगा । इससे वंचित रह कर कोई भी व्यक्ति अपनी दैनिक कार्य हो या कोई विशेष कार्य वह अपनी कार्य की पूर्ति नहीं कर सकता । पर्यावरण का संबंध हर उस वस्तु जीव-जंतु प्रकृति से है जिसमें प्राण है । पर्यावरण का जिक्र आपको तब अधिक मात्रा में पूरा होने का पता चलेगा जब आप किसी धार्मिक स्थल पर उपस्थित हो या आप खुद कोई धार्मिक कार्य अनुष्ठान करा रहे हो तब आपको पर्यावरण से संबंधित वस्तुओं का आभास और उस वस्तु की इच्छा अधिक प्रतीत होती है । जिसमें सबसे पहले

पर्यावरण से संबंधित मनुष्य, पेड़-पौधे (नीम, आम, बेल, वट, केले, बरगद, चंदन, तुलसी, पीपल) आदि जीव जंतु (गाय, मुर्गी, मछली, कछुआ, सर्प) आदि सूर्य, चंद्र, मिट्टी, जल आदि पर्यावरण से संबंधित सभी वस्तुएं खाद्य पदार्थ आदि की हमें खासकर पूजा पाठ में जरूरत होती है । जिसमें मनुष्य प्रकृति और पर्यावरण की पूजा करता है और स्वस्थ रहने की कामना भी करता है । भारत में सूर्य देव, नदियों, वृक्षों, चंद्रदेव, तुलसी, वटवृक्ष, गाय, बरगद, आदि अनेक चीजों की पूजा सदियों से करता आ रहा है जिसका सीधा संबंध हमारे पर्यावरण और पर्यावरण का धर्म से और धर्म का जाति जनजातियों की अलग-अलग संस्कृति और लोक आस्था से है जो कि मनुष्य की आस्था का प्रतीक है । वह साफ-साफ हमें आपसी तालमेल होने का दिखाई पड़ता है इससे भारत की कोई भी राज्य छुटी नहीं है उस राज्य में भले ही विभिन्न जातियां रहती हूं उनका संबंध पर्यावरण और धर्म से है ।

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              भारत में हमेशा चिंतन के विविध पहलू रहे हैं भारत हमेशा विश्व को प्रेरणा देने वाला देश रहा है आज वर्तमान में चल रहे पर्यावरण  से संबंधित समस्या को भारत ही रास्ता दे सकता है इसमें हम सिर्फ पर्यावरण का जो संबंध धर्म से है बस उसका सही सही सदुपयोग करना है जैसे:-

लोक साहित्य और नदियां :-  हम नदियों को लोकमाता कहकर पुकारते हैं शास्त्रों में भी स्नान करते समय शप्त नदियों को याद करने का विधान है । विश्व की किसी भी संस्कृति में नदी और इसकी महत्ता को लेकर इतनी चिंतित नहीं है फिर भी आज विकास की अंधी दौड़ की वजह से हमारे देश में नदियां प्रदूषित हो रही है और भी ऐसे अनेक कार्य है जिससे नदियां प्रदूषित हो

रही हैं नदियों का प्रदूषण ना हो और उनका अच्छी तरह से उपयोग हो यही हमारी संस्कृति की सीख है ।

लोक साहित्य और धरती :- सुबह उठते ही हम सर्वप्रथम धरती माता को वंदन करते हैं एवं उनसे क्षमा याचना करते हैं कि हम उन पर ना चाहते हुए भी पैर रख रहे हैं धरती हमारी बोझ को ग्रहण करती है और हमारी ज्यादातर प्रक्रिया धरती पर ही होती है एवं धरती का हमारे ऊपर विशिष्ट योगदान है । इसलिए हमें धरती का उपकारी रहना चाहिए यदि सभी लोग धरती को इसी तरह मां मानने लगे तो हम लोग धरती के प्रदूषण को तो दूर करेंगे ही अपितु पूरी पृथ्वी की रक्षा भी कर सकेंगे । हमने तो वसुधैव कुटुंबकम का विचार विश्व के समक्ष रखा जिसका अर्थ यह होता है कि पूरी वसुधा यानी कि पृथ्वी हमारे लिए एक कुटुंब जैसी है विश्व के हर एक पशु पक्षी और वनस्पति के प्रति मित्रता भाव यही हमारी संस्कृति है ।

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लोक साहित्य और वृक्ष या पेड़पौधे :-  हर हिंदू के घर में प्रायः तुलसी का पौधा रहता ही है । तीज त्यौहार पर घर में उसकी पूजा-अर्चना भी होती है हमारे देश में ईश्वर को चढ़ाने वाले भोग (प्रसाद) में भी तुलसी का पत्र रखा जाता है तुलसी के बिना पूजा अधूरी है । हम तो माला में भी तुलसी का उपयोग करते हैं उसी तरह बरगद, नीम, पीपल आदि के पेड़ों का भी विशिष्ट महत्व है । गीता में भी श्री कृष्ण कहते हैं कि पीपल का वृक्ष सबसे ज्यादा प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन देता है । हमारी सबसे पौराणिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ही इस बात का प्रमाण है कि हम पूर्व से ही वनस्पति के अभ्यास के आदि रहे हैं । हमने वनस्पति की प्रकृति महत्व और उससे उगने वालों स्थानों के बारे में सोचा है हमें हमारे पूर्वजों से वनस्पति और वृक्षों के बारे में इतना ज्ञान देने

के लिए आभार व्यक्त करना चाहिए । वृक्षों का काटने के बजाय उनका संवर्धन हो ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है । वृक्ष का महत्व एक संस्कृत सुभाषित में दिखाया गया है वृक्ष खुद धूप में खड़े होकर दूसरों को छाया प्रदान करते हैं अन्य को फल प्रदान करते हैं हमें इसकी संरक्षण करना चाहिए । करवा चौथ और  वट सावित्री के व्रत तो हमारे प्रकृति पूजा के साक्षात उदाहरण हैं । ऋग्वेद की एक ऋचा में फसल के कितने भाग किन पशु को देनी चाहिए  उसका भी वर्णन है । हमारे यहां लोग  नदी स्नान , पर्वत पर तीर्थ यात्रा कर रहे हैं । इत्यादि का महत्व मनुष्य को धार्मिक मान्यताओं को पर्यावरण के साथ जागृत करना है ।

                सभी धर्मों का अवलंबन पर्यावरण है । प्रकृति को अलग करके धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इहलोक और परलोक के बीच ईश्वर का साक्षात स्वरूप प्रकृति ही है वस्तुतः पंचतत्व ही पंच परमेश्वर है यही अंतर पर्यावरण और धर्म है । धर्म ना बाहरी आडंबर है और ना ही कर्मकांड धर्म तो धारण करने की अवस्था है धर्म वह है जिसे धारण किया जाए । पर्यावरण ना तो नया नाम है और ना ही उसकी अवधारणा ही नयी है । धर्म के नाम पर तो बहुत काम हुए लेकिन ईश्वरीय संरचना पर कुछ भी काम नहीं । हमें ईश्वरीय संरचना पर काम करना अति आवश्यक है जिससे पर्यावरण और धर्म दोनों की रक्षा की जा सके ।

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                लोक साहित्य और पर्यावरण का संबंध अगर आप आगे देखते हैं तो हमारे त्योहारों में भी भली-भांति नजर आती है । जिसमें उत्तराखंड का उत्तरायण पर्व हो या केरल का ओणम पर्व कर्नाटक की रथ सप्तमी हो या फिर बिहार का छठ पर्व आदि देख सकते हैं । इसके अलावा आप आंचलिक पर्व और त्योहारों को

भी देख सकते हैं इसमें अरुणाचल प्रदेश में द्योनी पोलो पर्व हो या असम का बिहू नृत्य भी इसमें शामिल है । पूरे भारत में संक्रांति के दिन ही अलग-अलग राज्यों में भी प्रकृति से संबंधित त्यौहार को मनाया जाता है इसमें पोंगल लोहड़ी इत्यादि शामिल है और भी ऐसे अनेक राज्य है जिसमें पर्यावरण से संबंधित धर्म को लोक आस्था का प्रतीक मानकर पूजा किया जाता है । यह हमारी भारतीय संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है जो प्रकृति ने हमारे पूर्वजों को दिया और आज भी किसी न किसी रूप में हम पर्यावरण को ध्यान में रखकर इसकी समय-समय पर पूजा-पाठ और प्रार्थना भी करते हैं और संरक्षण भी जो कि पूरे भारतवर्ष के लिए फलदायी है ।

         आत: हम स्पष्ट रुप से कह सकते हैं कि पौराणिक कालो से ही पर्यावरण का संबंध मानव  से है जो आज भी आधुनिक काल में भी विभिन्न धर्मों के लोग भिन्न-भिन्न तरीके से इसकी पूजा अर्चना कर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं और इसका भली-भांति संरक्षण आदि  भी करते हैं और आगे भी करते रहेंगे इसमें मनुष्यों को थोड़ा सही दिशा देने की आवश्यकता

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