भारत में किन्नरों की सामाजिक स्थिति और मान्यता

गौरव कुमार,
एम.एस.डब्लू. छात्र
महात्मा गाँधी फ्यूजी गुरूजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र,
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
संपर्क सूत्र - 9525120945
ईमेल – gkjamui01@gmail.com

सारांश

भारत के प्राचीन इतिहास में किन्नरों का समाज में एक सम्मानजनक स्थान रहा है और इन्हें गायन विद्या का मर्मज्ञ माना जाता था। तुलसीदास ने “सुर किन्नर नर नाग मुनीसा” के माध्यम से किन्नरों के उच्च स्तरीय अस्तित्व को रेखांकित भी किया है। हालांकि सामाज का एक बड़ा हिस्सा किन्नर और हिजड़ों को अलग-अलग मानता है। किन्तु जब किन्नर शब्द के अर्थ पर विचार किया जाता है तो किन्नर शब्द का अर्थ है विकृत पुरुष और यह विकृति लैंगिक भी हो सकती है। जबकि कुछ विद्वान इसका अर्थ अश्वमुखी पुरुष से करते हुए किन्नरों को पुरुष और ऐसी स्त्रियों को किन्नरी कहते हैं। वर्तमान समय में किन्नर का आशय हिजड़ों से ही लिया जाता है। सृष्टि की वृद्धि में स्त्री और पुरुष की एक समान भूमिका होती है। स्त्री−पुरुष के संयोग से उत्पन्न होने वाली संतान जब प्राकृतिक रूप से लिंग विकृति का शिकार होकर जन्म लेती है, तब उसके प्रति समाज का भेदभाव पूर्ण रवैया समझ से परे होना स्वाभाविक है। लिंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ किये जाने वाले सामाजिक भेदभाव को लैंगिक असमानता या लैंगिक भिन्नता माना जाता है।

बीज शब्द – किन्नर, तृतीय लिंग समुदाय, समाज, मान्यता

भूमिका

मनुस्मृति के अनुसार पुरुष अंश की तीव्रता से नर तथा स्त्री अंश की तीव्रता से स्त्री संतान का जन्म होता है। परन्तु जब दोनों का अंश एक समान होता है, तब तृतीय लिंग का शिशु जन्म लेता है या फिर नर−मादा जुड़वा संतान पैदा होती हैं। समाज ने तृतीय लिंग वाली संतान को क्लीव, हिजड़ा, किन्नर, शिव−शक्ति, अरावानिस, कोठी, जोगप्पा, मंगलामुखी, सखी, जोगता, अरिधि तथा नपुंसक आदि अनेक नाम से जाना जाता है। क्लीव और किन्नर संस्कृत भाषा के शब्द हैं, यहाँ हिजड़ा जो शब्द हैं वह उर्दू शब्द है। जो कि अरवी भाषा के हिज्र से बना है। जिसका अर्थ होता है कबीले से अलग रहना।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2014 में इन्हें थर्ड जेंडर अर्थात् तृतीय लिंग के रूप में परिभाषित किया था। वही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 1945 में मानव अधिकारों के सन्दर्भ में जारी घोषणा पत्र में कहा गया है कि रंग, लिंग, प्रजाति, भाषा, धर्म, राजनीति, पद, जन्म, सम्पत्ति या अन्य किसी भी आधार पर किसी के भी साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। भारतीय संविधान के भाग−3 के अनुच्छेद 14 से 18 तक सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्राप्त है। इसके आधार पर जाति, धर्म, जन्म−स्थान और लिंग के आधार पर किसी के भी साथ भेदभाव करना पूर्ण रूप से कानूनन जुर्म है। इस तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिंग भेद को पूर्ण रूप से वर्जित माना गया है। इसके बावजूद भी किन्नरों के प्रति समाज का रवैया पूरी तरह से भेदभाव वाला ही है।

किन्नरों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए समय−समय पर सरकार तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। परन्तु परिणाम लक्ष्य से अभी भी बहुत पीछे हैं। बीते वर्ष 2018 में धारा 377 के तहत सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय किन्नरों के लिए काफी राहतकारी है। इसी के बाद रायपुर में आयोजित एक विवाह समारोह में 15 युवकों ने किन्नरों के साथ विवाह करके सामाजिक तौर पर उन्हें अपना जीवन साथी बनाने का निश्चय कर विवाह कर लिया। जबकि इसके पूर्व इस तरह के संबंध गुमनामी के अँधेरे में ही रहते रहे हैं। इस वर्ग को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए इससे भी आगे जाकर प्रयास करने होंगे। ऐसे बच्चों को सामान्य बच्चों की तरह शिक्षित बनाकर ही समाज में इन्हें बराबरी का हक दिलाना होगा। अभी तक प्रायः ऐसे बच्चे स्कूल नहीं भेजे जाते हैं। जो जाते भी हैं वह अपने असामान्य व्यवहार के कारण प्रायः हास्य का पात्र बन जाते हैं। साथी छात्रों से लेकर शिक्षकों तक का व्यवहार उनके साथ सामान्य नहीं होता है। कई बार तो साथी छात्रों या मनचले शिक्षकों द्वारा उनका शारीरिक शोषण भी होता है। जिससे उनमें हीन भावना पैदा होना स्वाभाविक है। ऐसे ही अनेक कारणों से उनकी शिक्षा बीच में ही रूक जाती है और वह अशिक्षित रह जाते हैं और मुख्य धारा से धीरे-धीरे बाहर हो जाते हैं।

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प्रस्तुत शोध पत्र का प्रमुख उद्देश्य “किन्नरों के सामाजिक संदर्भों में” विषय को जानना और समझना है। यह शोध पत्र प्राथमिक और द्वितियक स्त्रोतों पर आधारित है। जिसमें संबंधित पुस्तक, लेख, व्याख्यान से तथ्यों का संकलन किया गया है। (शुक्ल)

भारत में किन्नरों की सामाजिक स्थिति

भारत में किन्नरों को सामाजिक तौर पर बहिष्कृत ही कर दिया जाता है। उन्हें समाज से अलग–थलग कर दिया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्हें न तो पुरुषों में रखा जा सकता है और न ही महिलाओं में, जो लैंगिक आधार पर विभाजन की पुरातन व्यवस्था का अंग है। यह भी उनके सामाजिक बहिष्कार और उनके साथ होने वाले भेदभाव का प्रमुख कारण है। इसके फलस्वरूप वे शिक्षा हासिल नहीं कर पाते और बेरोजगार रह जाते हैं। इसलिए भीख मांगने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता। सामान्य लोगों के लिए उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का लाभ तक नहीं उठा पाते।

किन्नर समाज के लोग अपनी अलिंगी देह को लेकर जन्म से मृत्यु तक अपमानित, तिरस्कृत औऱ संघर्षमयी जीवन व्यतीत करते हैं तथा आजीवन अपनी अस्मिता की तलाश में ठोकरें खाते हैं। हिन्दी साहित्य में लिखी आत्मकथाओं में देखने पर सहज ही ज्ञात होता है कि इन किन्नरों का जीवन कितना कठिन और संघर्ष से भरा है। ‘मैं पायल’ उपन्यास में यह गीत किन्नरों के सामाजिक यथार्थ को दर्शाने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है –

‘अधूरी देह क्यों मुझको बनाया।

बता ईश्वर तुझे ये क्या सुहाया।

किसी का प्यार हूँ न वास्ता हूँ।

न तो मंजिल हूँ मैं न रास्ता हूँ।

कि अनुभव पूर्णता का हो न पाया।

अजब खेल यह रह-रह धूप छाया।

किन्नर जीवन पर केन्द्रित इस गीत में उनके मर्म की पीड़ा का बयान साफ दिखाई देता है। किन्नर गुरु पायल सिंह के वास्तविक जीवन और उनके द्वारा किये गए संघर्ष पर आधारित इस उपन्यास में पूरे किन्नर समाज के यथार्थ को साफ देखा जा सकता है। उपन्यास में पायल तीखा सवाल उठाते हुए साफ कहती है ‘हमें किन्नर नहीं, इंसान समझा जाए’।

‘पुरुष तन में फंसा मेरा नारी मन’ आत्मकथा में सोमनाथ एक ऐसा पुरुष है जिसने जन्म तो एक पुरुष के रूप में लिया किन्तु उसका मन, भावनाएँ और इच्छाएँ स्त्री जैसी हैं। इसी से उसे अपने जीवन में हिजड़ा, लौंडा, बृहन्नला आदि उपहासास्पद शब्दों का सामना करना पड़ता है। स्कूल में सहपाठियों द्वारा उसे चिढ़ाना, उसके बाद कॉलेज और नौकरी में भी इसी तरह का व्यवहार इनके सामाजिक यथार्थ के परिचायक हैं।

बस उनकी इतनी सी माँग है कि वे मुख्यधारा से जुड़कर रहना चाहते हैं। वे समाज में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। देश के विकास में वे भी अपना योगदान सुनिश्चित करना चाहते हैं। लेकिन मुख्यधारा का समाज ऐसा होने देना नहीं चाहता। समाज में इनके लिए जो धारणा बनी हुई है वह जस की तस विद्यमान है। तभी तो इनका यथार्थ अंधेरे से घिरा हुआ दिखाई देता है जिसे उजाले में लाने के लिए ये संघर्ष कर रहे हैं। ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी’ आत्मकथा किन्नरों के सामाजिक यथार्थ, उनके संघर्ष और उस संघर्ष के माध्यम से समाज में अपनी एक खास पहचान बना लेने की सच्ची कहानी है। इस आत्मकथा में लक्ष्मी के बचपन से अब तक के सफर के यथार्थ को रखा गया है। बुलंदी तक पहुँचने से पहले उसने जो संघर्ष किया, पीड़ा व दर्द सहा वह किन्नरों के वर्तमान सामाजिक यथार्थ को समझने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। छोटे होने पर अगर स्टेज पर नाचता था तो लोग उसे छक्का, मामू, बायक्का कहकर चिढ़ाते थे। स्कूल में जाने पर बच्चों द्वारा उससे गलत तरीके से छेड़ना व तंग करना, मानसिक तौर पर उसे नीचा दिखाना आदि बातें साक्ष्य हैं कि किन्नर का जीवन कैसे बीतता है।

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किन्नरों के समक्ष पैसा कमाने के दो ही जरिये बचे हैं या तो भीख माँगना या फिर देह व्यापार। घर पर नाच गाने के लिए जाना और वहाँ पहुँच कर घर वालों से बधाई माँगना आसान नहीं है। साथ ही घर-परिवार के लोग इन्हें अपने घर में नहीं आने देना चाहते। इसका कारण है समाज का इनके प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण। साथ ही पुलिस तन्त्र हिजड़ों को अलग परेशान करता है, उन्हें रातो-रात उठाकर ले जाता है, किन्नर अचानक कैसे गायब हो जाते हैं और काफी खोजबीन के बाद उसकी लाश मिलती है, हिजड़ों की जिन्दगी से जुड़ी इन तथ्यों को भी बारीकी से देखने की जरूरत है। (कुमार)

छोटा बच्चा जन्मा आंचल की छांव में।

नगाड़े बजे मिठाइयां बाटी जली दीप उस गांव में।

सब कुछ ठीक चलता रहा जीवन की राह में।

10 साल बाद घटना घटी एक माह में।

लोगों ने कहा यह तो पुरुष है ना महिला क्योंकि बेदर्द जमाने ने उसे नाम दिया था हिजड़ा।

एक प्रश्न है अर्धनारीश्वर का स्वरूप जब हमको स्वीकार है।

तो ईश्वर की यह रचना हमको क्यों अस्वीकार है।

दिव्यांगजन भी तो समाज को भाते हैं।

पर हम हिजड़ों को राहत क्यों नहीं दे पाते हैं।

कुत्ते-बिल्ली की भी यहां की जाती है कद्र हाय जमाना कितनी खुदगर्ज है।

क्या इसी बेवफाई का नाम मर्द है! क्या इसी बेवफाई का नाम मर्द है!

रवीना जी के द्वारा यह कविता मैंने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार के दौरान श्रोता के रूप में सुना था। उसके आधार पर किन्नरों की क्या स्थिति है? समाज में उसे हमें समझने में यह कविता पूर्ण रूप से मददगार साबित होती है कि कैसे एक समाज जब तक वह लड़का या लड़की है तब तक ठीक है। सब कुछ साधारण-सा है, मानता है। वही जैसे पता चलता है कि यह बच्चा तो लड़का है ना लड़की है वहां से समाज का बच्चे के प्रति जिसे भगवान का स्वरूप भी माना जाता है। उसे नकार दिया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है। रविना जी इस कविता के माध्यम यही प्रश्न उठा रही है, समाज के हर तबके से बच्चे, बूढ़े, महिला, पुरुष, युवक-युवती सभी से प्रश्न पूछ रही है। अर्धनारीश्वर जो भगवान का स्वरूप है, उसे हम स्वीकार करते हैं तो फिर हम एक जीते जागते इंसान को जिनके अंदर संवेदनाएं हैं। उन्हें स्वीकार क्यों नहीं करते हैं। अपने दर्द को बयां करने के लिए कुत्ते-बिल्ली तक का उदाहरण इस कविता में पढने को मिलेगा। उन्हें भी आप सम्मान देते हैं, अपने घर में जगह देते हैं। अपने परिवार का सदस्य मानते हैं तो फिर हमें क्यों हमें समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। समाज का अंग नहीं माना जाता है। हमें एक इंसान के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है। समाज के लिए सुसंगत नहीं माना जाता है। ऐसा क्यों वह जवाब मांग रही हैं।

किन्नर समाज के अस्तित्व के लिए यह कविता अपने आप में बहुत कुछ बयां करती है हम सबके लिए हमें उन्हें समाज से अलग ना करने की जगह इस प्रकार हम अपने आपको सुसंगत संस्कृति आधारित मानते हैं। उन्हें भी दर्जा मिलना चाहिए और इसके लिए किन्नर समाज की ओर से कई ऐसे उदाहरण आपको देखने को मिलेंगे जो कि समाज में एक सकारात्मक पहल के माध्यम से संघर्ष के आधार पर लोगों की मानसिकता को परिवर्तित करने का कार्य किया गया है।

निष्कर्ष : अपनी बात को निष्कर्ष के रूप में रवीना जी के एक व्याख्यान के कुछ बिंदुओं के माध्यम से रख रहा हूँ कि हम सेक्स को तीन रूपो में देखते है पहला है जेंडर के रूप में , दूसरा है प्रजनन के रूप में और तीसरा है आंनद। जेंडर हमारी अभिव्यक्ति है, हम किस प्रकार रहना चाहते है, किस प्रकार व्यवहार करना चाहते है। वो जैविक सेक्स की बात करती है। जो दो प्रकार के होते है मेल और फीमेल। जिसमे हम मर्दाना और औरताना व्यवहार करते है। वो प्रश्न करती है कि क्यो समाज ने हमारे व्यवहार करने की अभिव्यक्ति को मर्द और औरतों में बांट दिया है। वो कहती है कि व्यवहार के साथ साथ भाषा , दैनिक जीवन की वस्तुओं के उपयोग को भी 2 वर्गों में बाँट दिया गया है, जैसे- बचपन से ही बच्ची के हाथ मे गुड़िया थमा दिया जाता है और जो लड़का होता है उसे बेट बॉल,गाड़ी । वो कहती है कि इस सीमित मानसिकता और जेंडर द्वारा जो आचरण समाज ने निर्धारित किए है, हम उन मानसिकता को चुनौती देते है, इसलिए समाज से निष्काषित कर दिए जाते है।

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उन्होंने इस मिथक की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जिसमें हम सब सोचते है कि यदि किसी बच्चे के पैदा होने पर उसके जननांग पूर्ण रूप से विकसित नही है तो वो ट्रांसजेंडर है। यह बहुत बड़ा मिथक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, इस प्रकार के किसी बच्चे को यदि ट्रांसजेंडर या हिजड़ा से संबोधित किया जाय तो यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आएगा। इस प्रकार के बच्चे का उपचार मेडिकल में उपलब्ध है जिसे ऑपरेशन या अन्य तरीके से ठीक किया जा सकता है।

जो लोग कहते है कि LGBTQ परश्चिमी सभ्यता का परिणाम है तो रवीना जी अपने प्राचीन प्रमाणों का उदाहरण देती है जिसमे समलैंगिकता और ट्रांस समुदाय के अस्तित्व होने का साक्ष्य मिलता है। रामायण में किन्नर समुदाय के होने का प्रमाण मिलता है। जब 14 साल के वनवास के बाद राम जी सरयू नदी के किनारे आते है तो वहाँ स्थित झोपड़ी में किन्नर समुदाय से उनकी मुलाकात होती है। महाभारत में “श्रीखण्डी च महारथा” अर्थात श्रीखण्डी नाम की किन्नर रथ की वाहक होती है। उर्वसी द्वारा अर्जुन को किन्नर होने का श्राप मिला था । गुप्त काल मे महर्षि वात्सायन के “कामसुत्र” अध्याय 15 में समलैंगिकता के बारे में बताया गया है। मुगल काल के दौरान अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत के सेनापति के रूप में एक ट्रांसजेंडर मल्लिका ही उस पद में थे। उस दौर में राजा हो या रानी उनके अंगरक्षक यही समुदाय के लोग होते थे। यदि अन्य धर्म की बात करे तो क्रिस्चन और इस्लाम में इन्हें देवदूत के रूप में देखा जाता है। प्राचीन समय मे इन समुदाय की स्थिति काफी अच्छी देखी जाती है। कोणार्क मंदिर और खजुराहो मंदिर समलैंगिक सेक्स के परोक्ष रूप से साक्ष्य हमे देती है। इसलिए हम नही कह सकते की यह सोच पश्चिमी है।

1875 में कार्ल गुस्तव जंग जो कि एक मनोचिकित्सक थे उन्होंने कहाँ था कि कोई भी व्यक्ति एक निर्धारित व्यवहार नही कर सकता। वो एक मर्द या औरत की तरह ही व्यवहार नही कर सकता, यदि वो पुरुष है तो उसका रुझान जरूरी नही है कि स्त्री के तरफ ही हो, पुरुष के तरफ भी उसका रुझान हो सकता है, या हो सकता है कि उसका रुझान स्त्री और पुरुष दोनों के तरफ हो। वो कहते है कि लोगो की अभिव्यक्ति मिश्रित हो सकती है वो मिश्रित व्यवहार कर सकता है, यह प्राकृतिक क्रिया है। इसे हम किसी सीमा में नही बांध सकते।

संदर्भ सूची

कुमार, स. (n.d.). किन्नरों के जीवन का सच. Retrieved from सब लोग.

शुक्ल, ड. द. (n.d.). लैंगिक भिन्नता के शिकार किन्नर अखिर कैसे जुड़ेंगे समाज की मुख्य धारा से? Retrieved from प्रभा साक्षी.

 

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