मैं उबलता हुआ पानी जिसे भाप बन कर ख़त्म होते रहना है …

(वरिष्ठ आलोचक, सर्जक विश्वनाथ त्रिपाठी से प्रियंका कुमारी की बातचीत)

नाम-प्रियंका कुमारी
पी.एच.डी. शोधार्थी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
फोन. 7678118393

समकालीन आलोचना जगत् में वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। एक आलोचक के साथ-साथ आप एक सफल सर्जक, इतिहासकार, गद्यकार एक कुशल अध्यापक और एक अच्छे शिष्य भी रहे हैं । आमतौर पर माना जाता है कि एक सफल आलोचक का सफल सर्जनात्मक लेखक होना या सफल सर्जनात्मक लेखक का सफल आलोचक होना प्रायः संभव नहीं होता लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने साहित्य के माध्यम से इस मान्यता को  गलत साबित किया है ।

आपकी  प्रकाशित कृतियाँ हैं- हिन्दी आलोचना – 1970 ,लोकवादी तुलसीदास – 1974, प्रारम्भिक अवधी – 1975, मीरा का काव्य – 1979, हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास – 1986 (2003 में हिन्दी साहित्य का इतिहास : सामान्य परिचय नाम से पुनः प्रकाशित),देश के इस दौर में (परसाई केन्द्रित) – 1989 , हरिशंकर परसाई – 2007, कुछ कहानियाँ : कुछ विचार – 1998, पेड़ का हाथ (केदारनाथ अग्रवाल केन्द्रित) – 2002, केदारनाथ अग्रवाल का रचना लोक, जैसा कह सका, नंगातलाई का गाँव (स्मृति-आख्यान) – 2004, गंगा स्नान करने चलोगे -2012 ,अपना देस-परदेस (विविध विषयक आलेख एवं टिप्पणियाँ) – 2010, व्योमकेश दरवेश (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की जीवनी एवं आलोचना) -2011, गुरु जी की खेती-बारी (संस्मरण) – 2015, उपन्यास का अन्त नहीं हुआ है – 2015 , कहानी के साथ-साथ – 2016, आलोचक का सामाजिक दायित्व – 2016 ।

प्रश्न- आपका जन्म कहां और किस परिवेश में हुआ था ?

उत्तर- मैं अपने ननिहाल में पैदा हुआ था।   मुझसे पहले मेरा एक वड़ा भाई था लेकिन बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी थी, उसके मृत्यु के  लगभग 7-8 वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ। सन्  1931 ई. में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के  बिस्कोहर गाँव के एक निम्नमध्यवर्गीय किसान बाह्रण परिवार  में मेरा जन्म हुआ था।  बिस्कोहर गाँव हिमालय की तलहटी में बसा हुआ है बिस्कोहर गाँव होने के साथ-साथ एक छोटा कस्बा भी था इसलिए उसे  बाजार भी कहते थे। वहाँ आसपास के किसान अपने-अपने उपज को लेजाकर बेचते थे।  वहाँ दवाई, सब्जी, मिठाई और कपड़ों की छोटी-छोटी दुकानें थी।  उस समय मेरे गाँव में  भी पूरे भारत के समान स्वाधीनता की लहर थी।

 

प्रश्न-आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ हुई ?

उत्तर-मेरे गांव में प्राथमिक स्कूल था। लेकिन पहले मेरी शिक्षा वहाँ नहीं हुई क्योंकि कोई मुझे लेकर स्कूल में दाखिला कराने नहीं ले गया था । मेरे गाँव में एक शिवाला(मंदिर) था । उसमें  पंडित जी पढ़ाते थे वह नियमित रूप से ना कोई वेतन पाते थे ना वहां पर पढ़ाते थे। वहाँ कक्षाएँ नहीं होती थी। जिसको जो मन करता था वह वहाँ जाकर वह पढ़ लेता था । मेरे पड़ोस के एक-दो लड़के वहाँ जाते थे तो मैं भी उनके साथ पढ़ने चला जाता था। कोई फीस वगैरह नहीं होती थी । होता यह था कि किसी  पर्व-त्यौहार के दिन उनको कुछ दे दिया जाता था( अनाज दे दिया जाता था) क्योंकि  उनका कोई नियमित तनख्वाह नहीं था।  कुछ दिन बाद मैं प्राथमिक स्कूल जाने लगा दर्जा चार तक मैंने वहाँ पढ़ाई की।  फिर गांव में एक माध्यमिक स्कूल भी खुल गया ।  यह भी सरकारी नहीं था चंदे से चलता था ।  बीच में माध्यमिक स्कूल बंद हो गया कक्षा सात का एग्जाम मैंने प्राइवेट तौर पर दिया। फिर  आगे की पढाई बलरामपुर कस्बे में, उच्च शिक्षा कानपुर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में तथा  पीएच०डी० मैंने  पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ से की।

प्रश्न-साहित्य के प्रति आपके मन में रुचि  कब जगी ?

उत्तर-बचपन  से ही साहित्य के प्रति  मेरी रुचि थी । जब मैं केवल छह साल का था तब  मेरे गाँव में कांग्रेस सरकार बनी थी वहां पर पुस्तकालय खुले वहां पर  तरह-तरह की किताबें  पढ़ी ।   मेरे गांव में  पंडितो का मोहल्ला था  वहाँ के  ओरी पंडित ने  मुझे आठ वर्ष के उम्र में ही भारत भारती जो मैथिलीशरण गुप्त की है पड़ने को  दिया था और मैं उसको पुरा पढ़ गया अभी तक मुझे उसके बहुत सारे पंक्तियाँ याद  हैं-

लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ?

फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।

सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है,

उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन ? भारत वर्ष है॥

हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है,

ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है ?

भगवान की भव-भूतियों का यह प्रथम भण्डार है,

 

विधि ने किया नर-सृष्टि का पहले यहीं विस्तार है॥एक और पंडित जगदंबा प्रसाद पांडेय जी थे जिनका उल्लेख मैंने नंगातलाई का गाँव में किया है  पंडित जी  कविता भी करते थे और आर्य समाजी भी थे। उनकी कविताएँ आर्य्यमित्र में भी छपी थी, कविताओं के बारे में बहुत बात करते थे। उनकी कविता की पंक्ति –     मुल्क को तक़सीन करवाया है दोनों जीम ने (जीम फ़ारसी लिपि का जीम वर्णं, जिसका आशय जिन्ना और जवाहरलाल से है)

गाँव के एक और पंडित  जी थे वो भी कविता लिखते थे । इश्तहार के रुप में पर्ची छपवा कर बाँटते थे । वे रसिक संप्रदाय के थे राम जी की उपासना करते थे वो शायर थे मैंने उर्दू इसलिए सिखा क्योंकि  वह गाँव के वातावरण मैं था। सबसे पहले कविता का संस्कार मुझे गाँव से ही मिला।

 प्रश्नः आपने अपने कर्म जीवन की शुरुआत कब की?

उत्तर-मेरा जन्म गाँव के एक बाह्रण परिवार में हुआ था। लेकिन मेरे यहाँ पुरोहिती का काम नहीं होता था । मेरे पिताजी  पुरोहितों को अच्छा नहीं मानते थे। पिताजी धार्मिक थे लेकिन कर्मकांडी  नहीं  थे । वहाँ पैसे के लिए ना कोई अवकाश था ना कोई क्षमता। सबसे पहले जो पैसा  है वह बलरामपुर जब पढ़ने के लिए जा रहा था तो   पिताजी ने ₹5 दिया था।  बलरामपुर में जीजा के पास आगे की पढाई करने के लिए गया  जीवन का वास्तविक  सामना वहीं हुआ । उससे पहले कभी- कभी श्राद्ध  पर जाता था तो कोई कोई 2 पैसे दे देता था  औऱ कभी नहीं भी देता था ।मैंने कई बार ट्यूशन पढ़ाने की कोशिश की लेकिन नियमित नहीं पढ़ा पाने के कारण कोई पैसा भी नहीं देता था । एक दुकानदार से ट्यूशन का पैसा लेने गया तो दुकानदार वालों ने कहा तुम भागो यहां से पैसा वैसा कुछ नहीं मिलेगा तुम पढ़ाते नहीं हो । क्लास आठवीं में सबसे ज्यादा नंबर आने पर मुझे 8 रुपये प्रतिमाह सरकार द्वारा वजीफा मिलता था।  लेकिन जेल जाने पर वह भी बंद हो गई थी । 15 नवंबर, 1958 को देवी सिंह बिष्ट महाविद्यालय नैनीताल में अध्यापक नियुक्त हुआ। 8 अक्टूबर, 1959 को किरोड़ीमल कॉलेज दिल्ली में नियुक्ति हुई। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में अध्यापन। 15 फरवरी, 1996 को 65 वर्ष पूरे होने के बाद सेवानिवृत्त हो गया।

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प्रश्नः  आपने सर्जनात्मक रचना भी की है और आलोचनात्मक भी दोनों लिखते समय आपको क्या विशेष तैयारी करनी पड़ती हैं?

उत्तर- आप ये समझिये कि जब मैं  विद्यार्थी  था तो  में वाद-विवाद,  कविता प्रतियोगिता में बहुत भाग लेता था। लेकिन साहित्य में एक तरह से दीक्षित होकर मैंने कभी भी साहित्य की सर्जना नहीं की। मैंने कोई योजना बनाकर इस विधा में लिखना है इस तरह से कभी नहीं लिखा । जब मैं बनारस आया तब मुझे बनारस का वातावरण बिल्कुल अलग लगा।   वहां का वातावरण साहित्यिक आभा  से मंडीत था । मैं वहां अपने आप को खोया हुआ समझता था ।जैसे गांव का कोई आदमी नगर में आकर खो जाता है। बनारस में मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का सानिध्य मिला और नामवर सिंह तथा केदारनाथ सिंह का साथ मिला।  वहां पर अक्सर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होती थीं। मैं वहां जाता था।  मैं  कवि सम्मेलन में भी जाता था ।मेरा भी मन करता था कि मैं कविता लिखूँ । मैं  जिस हॉस्टल में रहता था वहां  शर्म के मारे खाना खाने नहीं जाता था,  क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं होते थे। वहां के महाराज ने कहा कि आप चिंता मत करो मैं आपको यहीं पर खाना लाकर दे दिया करूंगा उन्होंने कहा कि मेरा खाना खाकर बहुत सारे लोग बड़े  बने हैं । इम्तिहान भी पास आ गया था। उस समय ऐसा लगता था कि जैसे कोई आदमी रेगिस्तान में खड़ा है। मैं बहुत चिंतित रहता था, एक दिन मैं सोच रहा था कि पढ़ाई लिखाई तो मैं कर रहा हूं लेकिन नौकरी कहां मिलेगी?  मैं अपने परिवार के लोगों की क्या सहायता कर पाऊंगा? जो मुझसे इतना उम्मीद करते हैं ।  फिर डायरी में मैंने कुछ पंक्तियां लिखी मेरे परिवार के लोग बड़े लड़ाके थे गरीबी के बावजूद मैंने कविताएं नहीं लिखी, बल्कि  डायरी पर ऐसे ही मेरे मन में जो बातें थी जो भाव उमड़ रहे थे , वो लिख दी मैंने , यह सन्  1955 की बात होगी-

मेरा बाप-विजित एवरेस्ट

मेरी मां- अभाव-शेषनाग से विषतप्त क्षीर- सागर

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मेरी बहन-मैले चिथड़ों से बनी पर कोई गुड़िया

और मैं-

उबलता हुआ केतली का पानी,

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एक दिन सब बैठे थे कविता पढ़ रहे थे और नामवर जी ने मेरी ओर  देखते हुए कहा कि कुछ आप भी लिखते हैं मैंने बहुत शर्माते हुए यह सुना दिया क्योंकि मैं कविता नहीं समझता था। नामवर जी ने केदारनाथ सिंह से  कहा कि यह देखिए यह पहली कविता है विश्वनाथ त्रिपाठी की ।   मुझे कुछ बताए बिना वह इलाहाबाद में उसको छपने के लिए दे दिए थे । बाद में उस कविता का अमेरिका और जर्मनी में अनुवाद हुआ । कई वर्षों के बाद 1962 या 63 में बोल्यो जनरल ऑफ पोएट्री में जो अमेरिका से निकलती थी उसमें एक कविता का अनुवाद छपा अज्ञेय जी ने भी मुझे कहा कविता लिखते रहो।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध हटाने के लिए सन 1949 में आंदोलन हुआ था। सत्याग्रह किया था उसमें मैं जेल चला गया था उस समय मैंने जेल में भी कविताएं लिखी थी।  मैं  तब 16 साल का था तो जेल में मैंने कविताएं लिखी थी अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था कि इसे तुम दे दो मैं छपने के लिए दे दुँगा लेकिन  वह कविता है आज तक कहीं नहीं छपी है ।

बाद में नामवर जी  दिल्ली आ गए उन्होंने आलोचना पत्रिका  की शुरुआत की थी आलोचना में मैं लिखने लगा।  आलोचना का जो काम मैंने किया जैसे लोकवादी तुलसीदास, मीराबाई पर  लिखा परसाई पर लिखा है या कहानियों पर लिखा तो मेरे मन में सिर्फ यह रहा कि जो पढ़ाया या  जो पढ़ता था और जो बहुत अच्छा लगता था। तो मेरे मन में यह जिज्ञासा रहती थी कि वह मुझे क्यों अच्छा लग रहा है तुलसीदास में पढ़ता था और मुझे बहुत प्रभावित करते थे मेरे पिताजी तुलसीदास का पाठ करते थे। लोकवादी तुलसीदास किताब लिखी क्योंकि मैंने मध्यकालीन जीवन देखा है उसमें मैं रहा हूं । तुलसी और कबीर जैसा हू-ब-हू  तो नहीं लेकिन  उनके जैसा मैंने देखा है ।

यहां जब मैं गांव से दिल्ली में आया तो गांव की बहुत याद आती थी । तब लगा कि मुझे लिखना चाहिए,मैंने सबसे पहले अपने गाँव के लक्खा बुआ के बारे में लिखा । राजकमल वाले ने कहा ये बहुत बढ़िया हैं इसे रखिएगा, उसके बाद मेंने और लिखा गाँव पर वो  करीब 30 वर्ष बाद  नंगातलाई का गाँव पुस्तक  के रुप में छपी ।

 कविता को छोड़ दीजिए जब मैं  व्योमकेश दरवेश लिख रहा था तब भी मेंने  रुप के बारे में नहीं में नहीं सोचा। जैसा मेरे मन में आता वैसा  मैं लिख देता था, उसको गद्य में लिख देता था मेरे लिए यही समस्या नहीं थी कि क्या लिखा जाए मेरे लिए यह समस्या थी कि  जो मैं लिख रहा हूँ उसमें शब्द इस्तेमाल कैसे किया जाए । भाव को प्रकट करने के लिए शब्द और वाक्य संगठन, वाक्य-संरचना, वाक्यों को गद्य में कैसे पिरोया जाए मेरे लिए यह समस्या है। मेरे मन में जो आया बस मैं उसी को लिखता लेकिन  लिखते समय बहुत परेशानी होती है जैसे रचनात्मक प्रक्रिया । मैंने  जीवन में इस पर ध्यान नहीं दिया कि किस फॉर्म में लिखना है। मेरे जीवन में जो  साहित्य की समस्या थी वही  जीवन की भी समस्या थी। साहित्य और जीवन की समस्या दोनों अलग-अलग नहीं है। जो मैंने अपने गांव में देखा जो अनुभव किया उसे कैसे उतारा जाए यह मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या थी । “नंगातलाई का गाँव” में एक अजीब सा  बिखराब है मैं कभी मां की बात करता हूं तो कभी बत्तखों   के अंडे देने की, तो कभी अपने गुरु  हजारी प्रसाद द्विवेदी जी पर आ जाता हूं। मैंने मन को कभी साहित्यिक बंधन में नहीं बांधा है जो मन में आया वह लिखना शुरू कर देता हूँ । बिसनाथ का बलरामपुर जो तद्भव में आ रहा है असल में वो अब  केबल बलरामपुर का नाम रह गया है लेकिन उसकी कहानी बलरामपुर से आगे निकल गई है । अब बलरामपुर केवल प्रतीक बन कर रह गया अब कानपुर तक बात आ गई है आगे लिखा तो बात बनारस ,दिल्ली तक भी आएगी…।

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 मेंने फार्म को ध्यान में रखकर कभी नहीं लिखा चाहे वो आलोचना,कविता या संस्मरण ही क्यों न हो । मेरे मन में जो आया मैंने वही लिखा।Top of Form

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प्रश्नः-    स्मृति पर आधारित संस्मरण आधुनिक विधाओं में एक प्रमुख विधा है। संस्मरण लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली ।

उत्तरः-  गंगा स्नान करने चलोगे में कई व्यक्तियों  के संस्मरण हैं  (इसमें विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखित दस व्यक्तियों पर संस्मरण संकलित है जिनका क्रम इस प्रकार है, हजारी प्रसाद द्विवेदी,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,रामविलास शर्मा, त्रिलोचन,भीष्म साहनी, भैरवप्रसाद गुप्त, नामवर सिंह , फ़िराक़ गोरखपुरी,तथा डा.भरतसिंह उपाध्याय) ।इस पुस्तक का शीर्षक गंगा स्नान करने चलोगे मेरे गुरु आर्चाय हजारी प्रसाद द्विवेदी का  ही वाक्य है । यह जो शीर्षक है वह वास्तव में प्रतीकात्मक है ,हमारे समय में ऐसे व्यक्ति थे जिनके प्रति हमारे मन में आदर,श्रद्धा का भाव होता था लेकिन सभी लोग ऐसे नहीं थे, मैंने जिनके बारे में लिखा इनमें ऐसे गुण थे जिसके कारण सभी के मन में इनके प्रति  आदर और श्रद्धा का भाव था,आप जब कभी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते हो जिनसे मिलकर आपको लगता हो कि इनका जीवन ऐसा है जिससे बहुत कुछ सिखा जा सकता है ,उनके जीवन  से आपको पैगाम मिलता है । अच्छे काम करने की प्रेरणा मिलती है । उनके साथ आप ऐसे समय  बिताते हो जिससे आपको लगने लगता है कि आपका जीवन सार्थक हो गया हो ,उनका जीवन आपको बहुत कुछ सिखाते है । जब मैं ऐसे गुरु के संपर्क में रहा तो मुझे लगा कुछ लिखना चाहिए और मैंने लिखा। लिखने में ऐसा होता है कि ,आपको प्रत्येक स्मृति ,घटना महत्त्वर्पूंण लगता है। चाहे वह उन व्यक्ति की मूल्यवत्ता ,नैतिकता ,ही क्यों न हो सभी मन में रहता है , और उनकी यदि रचना है तो उसमें भी सौन्दर्य को देखते हैं ,जाहिर है कि रचनाकार अपनी रचना में   ऐसे व्यक्ति को विषय बनाते हैं जिनमें ये सारे गुण हो। संस्मरण में लेखक का भी व्यक्तित्व  आ जाता है ,गुरु जी का जो प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा ,उन्हीं से संस्मरण लिखने की प्रेरणा मिली।

प्रश्नः-  अपने संस्मरण गंगा स्नान करने चलोगे में  दस प्रतिष्ठित साहित्यकारों को रखने का कोई खास वजह?

उत्तरः-    सामान्य के बारे में मैंने  नंगातलाई  के गाँव में लिखा है ,उसमें बहुत सामान्य से सामान्य व्यक्तियों का वर्णंन हैं। गंगा स्नान करने चलोगे इस शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि ये प्रतीकात्मक है , आप अपने जीवन में ऐसे व्यक्ति से मिलें जिनसे मिलने से गंगा स्नान जैसी पवित्रता आ जाती है ,इसलिए ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखा जो सामान्य से ज्यादा अधिक महत्त्व रखते हैं। इनसे मिलने से आध्यात्मिक ,मानसिक, बौद्धिक ,सांस्कृतिक संपन्नता आ जाती हैं इसलिए ऐसे बड़े लेखक के बारे में लिखा जो अपने  व्यक्तिगत रुप में  भी बड़े थे। ये संस्मरण ऐसे दस व्यक्तिगत जीवन और साहित्यकारों  के बारे में  हैं जो  अपने बिरादरी के भी बड़े लोग थे

प्रश्नः-आपके संस्मरण गंगा स्नान करने चलोगे  में एक भी स्त्री पात्र न होने की कोई खास वजह।

उत्तरः- असल में उस समय काशी  में कोई ,स्त्री थी ही नही, और जहाँ तक मुझे ध्यान आ रहा है ,इस रचना में कोई दलित भी नहीं है, ऐसा मैंने जानबूझ कर नहीं किया कि मुझे यह नहीं लिखना हैं । बल्कि  मेरा संपर्क उन व्यक्तियों से उतना गहरा नहीं था ,जिससे की मैं लिख सकता था उस समय, महादेवी वर्मा मेरे संपर्क में थी लेकिन इतना संपर्क  नहीं था कि संस्मरण लिख पाउ यह मेरी जीवन की कमी होगी लेकिन  अगर आगे और लिखा  तो जरुर इसको ध्यान रखुँगा। मेरे संस्मरण नंगातलाई के गाँव औऱ गुरुजी की खेती बाड़ी में स्त्री पात्र है।            

प्रश्नः  स्वतंत्रता पश्चात सांप्रदायिक सौहार्द को आप किस रूप में देखते हैं ?

उत्तर- सांप्रदायिक सौहार्द  स्वतंत्रता पूर्व जितना  था  उतना  आज नहीं है।  हाल ही में मैंने देखा है कि जैसे-जैसे समृद्धि आई है गांव में पूंजीवादी संस्कृति जिस ढंग से फैल रहा है। जिस तरह  पैसा आया है।  गांव में जिस तरह से शिक्षा आई है , यह शायद अपनी अस्मिता का अस्मिता के प्रति आग्रह है। जिस प्रकार से वहां पर शिक्षा आई है उसी प्रकार से अलगाव की भावना भी आई है। यह केवल एकतरफा नहीं हैं। गांव में जो व्यक्ति रह रहें हैं  वह सभी अपना कुछ-कुछ न  कार्य कर रहे हैं ,लेकिन बेरोजगार युवा उनके लिए कोई  काम नहीं है। मैंने देखा है कि किस प्रकार से गांव में बिजली आ जाने से टीवी आ गई है । अब गांव और दिल्ली में कोई अंतर नहीं है।  परिवहन के विकास से गाँव औऱ नगरों के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है, नंगातलाई का गाँव भी अब वह गाँव नहीं रह गया है। पहले हमारे गाँव में रामचरितमानस का पाठ होता था जिसमें ढोलक एक मुस्लिम बजाते थे । गायत्री मंत्र होते थे यज्ञ होते थे। उसमें जो नौजवान लोग होते थे, बच्चे होते थे उन्हें कुछ करने की प्रेरणा मिलती  थी। जीवन मूल्य मिलते थे।मेरे गांव में मुसलमानों की बहुत अच्छी आबादी थी वहां हिंदू मुसलमान लोग सब मिलकर ही रहते थे।

प्रश्न- आजकल की किसान आत्महत्या पर आप क्या कहना चाहेंगें?

उत्तर- देखिए यह  जो किसान आत्महत्या करते हैं। वह बहुत कारणों से करते  हैं।  खेती  मैं पैसा बहुत अधिक लगता और लोग सोचते हैं कि हमें मुनाफा भी बहुत अधिक हो।  खेती जो है बरसात पर निर्भर करती है, कीड़े-मकोड़ो और  बाढ़ के कारण खेती नष्ट हो जाती है तो बहुत नुकसान होता है। किसानों में थोड़ा सा लालच भी होता है कि व्यापारी को इतना मुनाफा होता है तो हमें क्यों नहीं । ज्यादा मुनाफा  के लिए वह अच्छी खेती के लिए पैसा उधार लेते है, लेकिन न चुका पाने के कारण अपमान के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। किसान का आत्मह्तया करना आर्थिक कारण है बाजाड़ का उतार-चड़ाव किसान नहीं सह पाता। व्यापारी अगर पैसा वापस नहीं कर पाते हैं तो कुछ नहीं होता लेकिन किसान का बड़ा अपमान होता है।  आज कल सोशल मीडिया पर भी इतनी ज्यादा जानकारियां दे देते हैं। ऐसे घोर अश्लील विज्ञापन ,फिल्में दिखातें हैं । एक अजीव बात है कि एक अजीब तरह की सैक्स की नई नैतिकता पर एक उच्छश्रृंखलता परोसते  हैं । जिससे मनुष्यों के संयम में कमी आई है। आजकल नौजवान भी आत्महत्या करने लगे हैं। अब व्यक्ति की कोई कीमत नहीं रह गई है । व्यक्ति की ही कोई कीमत नहीं हैं तो उसके जीवन मूल्य की क्या कीमत होगी? अब तो छोटी-छोटी बात पर एक –दूसरे को मार देते हैं।  पहले धर्म का एक अँधविश्वासी रुप था जिसमें  लोगों को कम-से कम परलोक का डर दिखाकर संयमित तो रखता था । अब  संयुक्त परिवार टूट रहा है,पारिवारिक मुल्य समाप्त हो रहे हैं, नैतिकता,परोपकार की भावना  खत्म हो रही है, जिसकी कीमत मुनष्य को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।

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प्रश्नः-  क्या  संस्मरण लिखते समय आपने डायरी पद्धति का प्रयोग किया था?                

उत्तरः- यह संस्मरण (गंगा स्नान करने चलोगे) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों का संग्रह हैं, इस किताब के लिए  मैंने कोई भी लेख अलग से नहीं लिखे । मैंने इसको लिखने के लिए किसी प्रकार के नोट्स नहीं लिखे थे । जो कुछ भी  मेरे मन में स्मृति में बसी थी ,उसी का वर्णन किया है । मेरे मन में आया लिखना है और मैंने लिख दिया ।

     जानबूझ कर संदेश नहीं दिए ,यदि मिलता है तो ठीक है ,हर पाठक की एक पाठकीय पक्रिया होती है ,जब पाठक किसी पाठ को पड़ता  है तो ,पाठक अपना खुद का एक पाठ तैयार करता है और जो पाठ तैयार होता है वह एक सच्चा पाठ होता है । कहीं -कहीं पर लिखते समय यह जरुर मन मैं आया कि पण्डित जी इतने बड़े आदमी थे ,लोग जब इस संस्मरण को पड़े तो उनके मन में इनके प्रति श्रद्धा का भाव हो  क्योंकि जब कोई किसी से श्रद्धा करते हैं तो वह चाहते हैं कि सभी के मन में उनके प्रति श्रद्धा हो ।

 

प्रश्नः शलाका सम्मान हिंदी अकादमी को ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। इस वर्ष आपको मिली है, आपको कैसा महशूश होता है जब आपका नाम किसी पुरस्कार से जुड़ता है?

उत्तर- पहले तो बहुत अच्छा लगता था , उन लोगों का बहुत ध्यान आता है जो इन सम्मानों  के अधिकारी हैं उनको मिलना चाहिए सम्मान, लेकिन ऐसे लोगों को नहीं मिलता है। उपेक्षाएं हो रही है । इसमें सम्मान मिलने के बाद आनंद के भाव के साथ-साथ दुख भी होता है। सभी लोग बधाई देते हैं तो अच्छा लगता है । याद आता है अपने गुरु की हजारी प्रसाद द्विवेदी की अपने माता-पिता की वह होते तो बहुत खुश होते । याद आता है अपने गांव की।  सम्मान पहले मिलता था तो बहुत अच्छा लगता था लेकिन अब अपराध बोध सा लगता है, लेकिन अब मेरे लिए तो एक सामान्य प्रक्रिया है इससे पहले मुझे कई सारे सम्मान मिल चुके है उस सम्मान की कड़ी में यह भी एक  है। (गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ॰ रामविलास शर्मा सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य सम्मान – हिन्दी अकादमी द्वारा, शान्तिकुमारी वाजपेयी सम्मान, शमशेर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, व्यास सम्मान – (‘व्योमकेश दरवेश’ के लिए), भाषा सम्मान – साहित्य अकादमी द्वारा, मूर्तिदेवी पुरस्कार, भारत भारती सम्मान)।

 

प्रश्नः-   आपने अपने संस्मरण में अपने गुरू के प्रति जो आदर भाव दर्शाया है, क्या आप उसके माध्यम से वर्तमान हिन्दी अकादमिया से जुड़े अध्यापक एवं विद्यार्थी को कोई संदेश देना चाहते थे।

उत्तरः-  निसंदेह इससे पाठक को कुछ जानने को मिलेगा ,इससे व्यक्तिगत जीवन को समझने  के साथ-साथ उनके साहित्य को भी समझने में मदद मिलेगी । मेरे मन में एक बात बसी है कि ,साहित्यकार के व्यक्तिगत जीवन का  बहुत गहरा प्रभाव उनके साहित्य पर पड़ता है । उनके साहित्य पर प्रभाव यांत्रिक ढंग से नहीं लेकिन स्वछंद भाव से छिपा होता है रचनात्मकता के लिए यह नैपथ्य का काम करता है ,रचनाकार आत्माभिव्यक्ति करता है ,आत्म का निर्माण व्यक्ति अपनी जीवन में ही करता है ,आप जिसे आत्म कहते हैं, उसमें आपका जीवन किसी न किसी रुप में विद्यमान रहता है । यह जानी –पहचानी,अनजानी चीजों से बनी होती है अच्छे रचनाकार को पता नहीं होता कि वह कहाँ से उदाहरण उठा कर ला रहे हैं , लेकिन जुड़ा होता है उनके जीवन से उदाहरण  के लिए अपने गुरु द्विवेदी जी के बताये हुए शब्दों को याद करके कहते हैं कि ,एक दिन उन्होंने एक कहानी सुनायी जिसमें  दुष्यंत एक चित्र को देखते हैं जिसमें  हिरणी अपनी आँख ,बारहसिंहा के सिंह से खुजला रही थी ,उनकी व्याख्या गुरुजी  इस प्रकार करते हैं कि ,हिरणी की आँख सबसे सुंदर होती है, और बारहसिंहा की सिंह इतनी नुकीली कि  जरा सी इधर-उधर हुआ तो आँख खत्म। लेकिन हिरणी  कितने विश्वास के साथ आँख खुजला रही थी ,इस चित्र को देखकर दुष्यंत को आंतरिक पश्चाताप होता है कि उसके उपर शंकुतला ने भी ऐसा ही विश्वास किया था । इसमें  रचनाकार ने कुछ कहा नहीं लेकिन  चित्र के माध्यम से सब कुछ कह दिया।

अंत में मुझे त्रिपाठी जी के व्यक्तित्व के अनुकूल कवि घनानंद द्वारा लिखित दो पंक्तियाँ याद पड़ रही हैः-

वहै मुसक्यान वहै मृदु बतरानि ,वहै

लडकीली बानि आनि उर में आरति है ।

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