करोना महामारी और बेरोज़गारी

आरती शर्मा
शोधार्थी
हिंदी विभाग
त्रिपुरा विश्वविद्यालय
9250458560
arti6945@gmail.com

भारत में बेरोज़गारी की दर में निरंतर वृद्धि होती रही है । जहाँ गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर होता गया है । करोना महामारी के कारण न केवल भारत की ही अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है बल्कि पूरे विश्व पर इसका प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है । पहले लॉक डाउन के शुरुआती दिन तो लोगों ने बहुत ही अच्छे से गुजारे । उस समय तक किसी को ये नहीं पता था कि लॉक डाउन लंबा चलने वाला है । फैक्ट्रियाँ, होटल, स्कूल, विश्वविद्यालय, रेस्टोरेन्ट, कारखाने, साप्ताहिक बाज़ार, परिवहन के साधन, मल्टीनेशनल कंपनियाँ सब कुछ बंद । तीन महीनों से सब काम ठप्प पड़ा है । अर्थव्यवस्था पहले से ही खराब थी और अब जब सब कुछ बंद हैं तो क्या मुनाफ़ा होगा ? नील बट्टे सन्नटा की स्थिति बनी हुई थी । महामारी के दौरान जो हिदायतें सभी को दी गईं उसका पालन करना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि ये न केवल दूसरों को लिए बल्कि स्वयं के लिए भी जरूरी हैं । देश का निम्न वर्गीय तबका दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, फेरीवाले, सड़क किनारे दुकान लगाने वाले विक्रेता, फैक्ट्रियों, दुकानों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर काम करने वाले कारीगर जिन पर महामारी और बेरोज़गारी की दोहरी मार पड़ी । देश का गरीब तबका जो देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर जीवनयापन के कार्य और साधन खोजता है । जो अपने परिवार से दूर रहकर उनके अच्छे भविष्य के लिए निरंतर संघर्ष करता आया है । ये देश का वो तबका है जिनके बिना काम संभव नहीं हैं । तो बिना काम और रुपए के कब तक शहरों में जीवनयापन करते । सरकार के पास इनको देने के लिए इतनी भी सुविधा नहीं थी कि इनको जीवन की मूलभूत अवश्यकता खाने-पीने की सुविधा के साथ सकुशल इनके घर तक पहुंचाया जा सकें । अपने ही दम पर इन सब लोगों ने यात्रा शुरू की । बिना इसकी परवाह किए कि ये घर तक पहुँच पाएंगे भी या नहीं । पर परिवार वालों से मिलने की खुशी ने करोना का कहर और सरकार की क्रूर नीतियों से लड़ कर अपनी हिम्मत को जिलाए रखा । धूप और गर्मी की मार, भूख- प्यास से बेहाल, बच्चे, बूढ़े, औरतें और मर्द हर उम्र के लोग निकल पड़े थे चुनौती देने को । उस पर भी सरकार का दमन कि इतनी दूर से पैदल यात्रा करके आने पर उनको घर तक नहीं जाने दिया जाता । घर न जाने दिए जाने की सही वजह तो समझ में आती है पर उनको ठहराने के पुक्ता इंत्जामात भी नहीं किए गए । आज देश का निम्न वर्गीय तबका जिसके पास नौकरी की दूर-दूर तक कोई संभावनायें नहीं हैं । क्योंकि धंधा मंदा होने की वजह से कारीगरों को नौकरी से निकाल दिया गया है । तीन महीने काम नहीं हुआ तो कारोबार में कोई मुनाफ़ा नहीं मिला जिसके कारण कारीगरों की संख्या में कटौती करना शुरू हुआ । जहाँ एक दुकान में पाँच कारीगर काम करते थे वहाँ अब एक या दो ही कारीगर को रखा गया है । अब ये कोई नहीं जानता कब उनका नंबर आ जाए नौकरी से हाथ धोने के लिए । पर्वतीय क्षेत्रों (शिमला-मनाली) में तो गर्मी के मौसम में ही कमाई होती है । जहाँ दुनियाँ भर से लोग आते हैं और पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आमदनी बढ़ जाती है । पर इस साल उनको कोई आमदनी नहीं हुई । देश का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग भी बेरोज़गार घूम रहा है । बड़ी- बड़ी एम. एन. सी. कंपनियों में काम करने वाला पढ़ा-लिखा व्यक्ति आज नौकरी की तलाश में घूम रहा है । आज वह कोई भी काम करने के लिए मजबूर है । प्राईवेट विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की स्थिति भी खराब है । जहाँ उनको वेतन भी नहीं मिल रहा और कक्षाएँ भी ऑनलाइन लेनी पड़ रही हैं । एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति बनी हुई है । नौकरियाँ हैं नहीं और बेरोज़गार अधिक होते जा रहे हैं ।

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इसके साथ जो लोग स्वरोजगार का काम करते थे, छोटे-मोटे काम धंधे करके परिवार का पोषण करने वाले लोग सभी घर पर बिना काम के बैठे हैं और आमदनी का कोई साधन नहीं है । करोना महामारी जिसके इलाज के लिए अभी तक वैक्सीन तैयार नहीं हो पाई । जो दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है । करोना महामारी के बढ़ते प्रकोप के चलते विश्व में भारत तीसरे स्थान पर पहुँच गया है । सोचिए आप एक अच्छी ख़ासी कंपनी में काम कर रहे हैं और अचानक आपको पता चले कि आपकी नौकरी चली गई ! कल की ही तो बात थी कि आप करोना महामारी में भी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे । आपकी नौकरी इसलिए चली गई क्योंकि जिस कंपनी में आप काम कर रहे थे वो कंपनी चीन की कंपनी है । भले ही आप भारतीय हैं, पर आप काम एक चीनी कंपनी के ऐप्स के लिए कर रहे हैं । सरकार ने ये नहीं सोचा कि कंपनी में काम करने वाले कितने ही भारतियों को बेरोज़गार होना पड़ेगा । बिना उनके भविष्य के बारे में सोचे या उनको दूसरा कोई काम दिए बगैर ही ऐप्स को बेन कर दिया गया । जिन स्थितियों से देश गुजर रहा है ऐसे में नौकरी का बिना किसी वाजिव कारण के चले जाना और साथ ही दूसरी नौकर की कोई उम्मीद न होना दोनों ही ख़तरनाक हैं । देश में जिन लोगों की अचानक नौकरियाँ चली गई हैं या लॉक डाउन के कारण अचानक रोज़गार बंद हो गया है, उन्हें आर्थिक परेशानी के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है । देश में मानसिक रोगी को पागल कहा जाता है जबकि ये परेशानी भारत में हर दूसरे व्यक्ति को है । किसी मानसिक रोगी को डॉक्टर के पास जाने की सलाह नहीं दी जाती बल्कि किसी बाबा-वबा या टोने-टोटके करने की सलाह दी जाती है । आज बेरोज़गारी ने न जाने कितने ही भारतियों को आत्महत्या करने के लिए बाध्य किया है । आत्महत्या करने में पत्रकार, अभिनेता, डॉक्टर, आम आदमी सभी शामिल हैं । भारत में युवा आत्महत्या की दर निरंतर बढ़ रही है । करोना महामारी ने इस दर को और भी अधिक बढ़ा दिया है । आज व्यक्ति इतना अकेला हो गया है कि उसको अपनी बातों को बयां करने के लिए एक भी ऐसा साथी नहीं मिलता जिसके साथ वो अपना दुःख बाँट सकें । घर के अंदर रहकर बेरोज़गारी से झुझना या बाहर निकलकर करोना महामारी से लड़कर नई नौकरी की तलाश करना दोनों ही व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ भी रहे हैं और नए संघर्ष की ओर बढ़ने की प्रेरणा भी दे रहे हैं । समाज का प्रत्येक व्यक्ति आज बेरोज़गारी की मार झेल रहा है । जिससे निपटने के लिए सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे समाज को एक जुट होकर एक दूसरे का साथ देना होगा । तभी करोना महामारी और दूसरी उभरती महामारी ‘बेरोज़गारी’ से लड़ सकेंगे ।

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