समय के संदर्भ को दर्ज करता डायरी का गद्य

(विशेष संदर्भ:मोहन राकेश की डायरी )

डॉ.दीना नाथ मौर्य
सहायक प्राध्यापक
हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय,प्रयागराज
ईमेल : dnathjnu@gmail.com

शोध सारांश

डायरी के संबंध में यह कहा जाना सही होगा कि इसमें लेखक के अनुभव उसके सबसे निकट रहकर अंकित होते हैं और एक साहित्यिक विधा के रूप में यह पूर्णतः तथ्याश्रित,आत्मपरक तथा आत्म प्रकाशन की भावना से पूर्ण होती है.विधागत रूप में इसमें तरलता का भाव भी पाया जाता है जो अपने अन्दर उपन्यास,कहानी,रेखाचित्र और संस्मरण सभी को समाहित कर लेती है.डायरी लेखन का उपयोग इन सबमें किया जा सकता है.यह व्यक्तित्व प्रकाशन का सर्वाधिक प्रमाणिक माध्यम होती है.निबंध से भी भिन्न निजता की प्रमाणिकता के साथ इसका रूपबंध तैयार होता है.समाज में व्यक्ति की महत्ता के साथ ही साहित्य में इस कथेतर गद्य की प्रतिष्ठा बढ़ती गयी और यह आत्म विज्ञापन से अलग लेखक के जीवन संघर्ष और सांस्कृतिक संवाद को प्रकट करने वाली विधा के रूप में स्थापित होती गयी. मोहन राकेश एक साहित्यकार थे लेकिन उनकी लिखी हुई डायरी मात्र ‘एक साहित्यिक की डायरी’ नहीं कही जा सकती. यह डायरी मोहन राकेश के जीवन के अनेक तथ्यों को सुरक्षित रखते हुए उनके व्यक्तित्व की अनेक परतों को उजागर करती है. मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की तरह मोहन राकेश की डायरी में सिर्फ साहित्य और रचना-प्रक्रिया पर ही बहस नहीं है समकालीन सांस्कृतिक सन्दर्भ और निजी जीवन के प्रसंग भी वहां उपस्थित हैं अपने तिथिवार ब्यौरों के उन क्षणों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त होता है जहाँ से एक लेखक की मनोदशा का निर्माण संभव होता है. मोहन राकेश को आमतौर पर शिक्षित शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता का लेखक माना जाता है. उनकी कहानियाँ शहरी जीवन के मध्यवर्गीय प्रसंग को जोड़कर देखी जाती हैं. उनकी डायरी हमें मोहन राकेश के दूसरे व्यक्तित्व से परिचित कराती है जहाँ वे इस व्यवस्था पर क्षोभ प्रकट करते हैं.इसकी अ-समान संरचना पर कुपित होते हैं और मनुष्य मात्र की समानता की बात करते हैं.यहाँ डायरी मोहन राकेश की रिपोर्ट भर नहीं होती है वह एक ऐसे समाज की दास्ताँ बनती है जो आजादी के बाद भी सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया था.मोहन राकेश ने अपनी प्रतिबद्धता को किसी विचारधारा की जड़ता से मुक्त रखते हुए अपने आस-पास के जीवन से जोड़ने का सफल प्रयास किया. अपने लेखन में उन्होंने उस जन का पक्ष लिया जो इस नयी व्यवस्था में भी अभागा है. अनुभवों से भरी मोहन राकेश की डायरी को पढ़ने के बाद यह कहना गलत न होगा कि उनकी डायरी उनके आत्मसंघर्ष का लेखा-जोखा है. जिसमें उनकी रचना-प्रक्रिया और लेखकीय संघर्ष के मूल छिपे हैं.समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य और हिंदी भाषा के समाज को समझने में उनका यह निजवृतांत सामाजिक होकर उपस्थित है.उनकी डायरी के गद्य लेखन में भी नाटक और कहानी के शिल्प का मिलाजुला रूप समकालीन संदर्भ की सहज पहचान करा जाता है.प्रस्तुत शोध पत्र में डायरी विधा की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए ‘मोहन राकेश की डायरी’ को आधार बनाकर लेखक के अपने समय और संदर्भ के साथ गद्य लेखन के आत्मसंघर्ष को समझने का प्रयास किया गया.

बीज शब्द

कथेतर गद्य, डायरी लेखन, मोहन राकेश, रचनाशीलता, आत्म संघर्ष, नई कहानी, हिंदी नाटक, निजी जीवन, आत्म प्रकाशन

डायरी: शब्द, अर्थ एवं परिभाषा 

‘डायरी’शब्द निजी लेखन को प्रकट करता है.साहित्य की इस विधा में लेखक के व्यक्तिगत जीवन को अभिव्यक्ति मिलती है यद्यपि कि डायरी में उल्लिखित घटनाओं का लेखक के अपने जीवन में घटित होना आवश्यक नहीं है वे देखी और सुनी भी हो सकती हैं.इस प्रकार से डायरी में जहाँ एक ओर लेखक के अपने जीवन-प्रसंगों का वर्णन हो सकता है वहीं दूसरी ओर उसमें युगीन सामाजिक,राजनीतिक,धार्मिक तथा साहित्यिक परिस्थितियों का अंकन भी होता है. आत्म प्रकाशन अथवा आत्मपरक शैली में लिखी गयी इस विधा से लेखक अपने समय के साथ संवाद करता है. डायरियाँ तिथिवार होती हैं और पाठक के समक्ष समय का समूचा कोलाज लेखक के सन्दर्भ का आईना बनकर सामने आता है. बाहरी परिस्थितियां ही व्यक्ति की मनोदशा एवं भाव जगत की दिशा तय करती हैं.इस तरह नितान्त वैयक्तिक होकर भी डायरी लेखन एक संवाद होता है- अपने समय से और स्वयं अपने से. इसी रूप में यह विधा ‘वाह्य का आभ्यंतरीकरण’ का परिणाम भर नहीं रह जाती,अंतर का वाह्यीकरण भी इसकी विशेषता बनती है. क्योंकि“मनुष्य अपने भाव जगत की रचना स्वयं करता है किंतु वह इस कार्य को देशकाल की किन्हीं परिस्थितियों में ही संपन्न करता है और ये परिस्थितियां उसकी इच्छा पर निर्भर नहीं होती. भावों की व्यक्तिगत अनुभूति के कारण उसके लिए वस्तुगत सत्ता को स्वीकार करना कठिन होता है.वाह्य जगत का इन्द्रियबोध और मनुष्य के मन का भावजगत एक ही यथार्थ के दो पक्ष हैं जो एक दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र न होकर परस्पर संबद्ध हैं.” 1डायरी विधा की महत्ता मनुष्य के मन के भावजगत और वाह्यजगत की संबंधता तथा उसके अंतर्विरोध के परिचय कराने में निहित है.

‘हिंदी साहित्य कोश’ में डायरी को परिभाषित करते हुए उसे आत्मकथा का ही एक रूप बताया गया है. “डायरी आत्मकथा का ही बदला हुआ रूप है.डायरी में सामान्यतःताजे अनुभवों को लिखा जाता है या संभव है कि कभी-कभी बीते हुए अनुभवों का पुनर्मुल्यांकन कर लिया जाए…साहित्यिक दृष्टि से डायरी में संबद्धता या संगति और शिल्पगत कलात्मकता की कमी हो सकती है पर स्पष्ट कथन,आत्मीयता और निकटता आदि विशेषताएँ डायरी की उक्त कमी को पूरा करती है.”2 शाब्दिक उत्पति के नजरिये से देखें तो डायरी शब्द अंग्रेजी भाषा का है जो लैटिन शब्द ‘डायिस’ से बना है. जिसके संबंध में डॉ.बैजनाथ सिंह का मत है कि “उसमें (डायरी) व्यक्ति नहीं,व्यक्तित्व के माध्यम से एक प्रकार से जीवन ही रूपायित होता है.डायरी,व्यक्ति का नहीं व्यक्ति द्वारा रोजाना जिए गये जीवन की झाँकी प्रस्तुत करती है.वह दैनिक स्थूलता में से सूक्ष्म की पकड़ को प्रस्तुत करती है. वह लेखक की संवेदनात्मक की प्रस्तुति है.डायरी में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं परन्तु यथार्थ का रूप चित्रण भी उसमें नहीं हो सकता.” *3 डायरी यथार्थ से आरंभ तो होती है किन्तु विचारों के संवहन में कल्पना का मिश्रण या टेक लेखक पर निर्भर करता है.

डायरी साहित्य 

आत्म प्रकाशन को भारतीय साहित्य परंपरा का अंग नहीं माना जाता रहा है. आधुनिक काल में आकर साहित्य रचना में यह प्रवृत्ति दिखायी पड़ती है.नवजागरण काल से लेकर बाद के वर्षों में आत्म के जरिए सत्य का साक्षात्कार किया जाने लगा.जाहिर है यह यथार्थ का भोगा हुआ रूप था जिसमें परवर्ती अस्मिता विमर्श के सूत्र छिपे थे.जिस आत्म प्रकाशन को परम्परा में नकारात्मक रूप में देखा जाता था वही अब प्रमाणिकता की कसौटी बन जाते हैं.डायरी के संबंध में यह कहा जाना सही होगा कि इसमें लेखक के अनुभव उसके सबसे निकट रहकर अंकित होते हैं और एक साहित्यिक विधा के रूप में यह पूर्णतः तथ्याश्रित,आत्मपरक तथा आत्म प्रकाशन की भावना से पूर्ण होती है.विधागत रूप में इसमें तरलता का भाव भी पाया जाता है जो अपने अन्दर उपन्यास,कहानी,रेखाचित्र और संस्मरण सभी को समाहित कर लेती है.डायरी लेखन का उपयोग इन सबमें किया जा सकता है.यह व्यक्तित्व प्रकाशन का सर्वाधिक प्रमाणिक माध्यम होती है.निबंध से भी भिन्न निजता की प्रमाणिकता के साथ इसका रूपबंध तैयार होता है.समाज में व्यक्ति की महत्ता के साथ ही साहित्य में इस कथेतर गद्य की प्रतिष्ठा बढ़ती गयी और यह आत्म विज्ञापन से अलग लेखक के जीवन संघर्ष और सांस्कृतिक संवाद को प्रकट करने वाली विधा के रूप में स्थापित होती गयी.

See also  श्रृंखला की कड़ियाँ में निहित स्त्री-चेतना-डॉ. चैताली सिन्हा

रोजाना की घटनाओं के वर्णन से जुड़े रहने के कारण यद्यपि इसे कथेतर गद्य में रखा जाता है तथापि आख्यान परकता से भी डायरी का पुराना संबंध रहा है.आखिरकार किसी भी लेखक/रचनाकार का जीवन एक आख्यान ही तो होता है.दस्तावेजीकरण से इस आख्यान की ब्यौरेवार जानकारी मिलती है जो शायद आत्मकथा लेखन में संभव नहीं हो पाता. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि –“डायरी ऐसी वर्णनात्मक कथेतर गद्य विधा है जो अपनी प्रकृति में जीवनी परक है.इसमें लेखक की अनुभूतियाँ जीवन-दर्शन,दृष्टिकोण आदि की तिथि-क्रम से अंकन किया जाता है.यह लेखक के जीवन खण्डों की संवेदनात्मक प्रस्तुति है,जिसमें आत्म निरीक्षण,आत्म संबोधन की प्रमुखता होती है.”4 डायरी-लेखक अपने जीवन की विभिन्न घटनाओं,स्थितियों,समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक हलचलों को देखता,भोगता है,उन्हें समझता-अनुभव करता है उन्हें ही अपनी डायरी में लिखता जाता है. जहाँ भोगने और लिखने वाले मन के अंतर को प्रमाणिकता की कसौटी माना जाता है.कथाकार कमलेश्वर ने डायरी की इस विधा की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि –“डायरियाँ लेखक का अपना और अपने हाथ से किया हुआ पोस्टमार्टम होती हैं….एक लेखक कैसे तिल-तिल जीता और मरता है-अपने समय को सार्थक बनाते हुए खुद को कितना निरर्थक पाता जाता है और अपनी निरर्थकता में से कैसे वह अर्थ पैदा करता है-इसी रचनात्मक आत्म संघर्ष को डायरियाँ उजागर करती हैं.” 5

मोहन राकेश की डायरी 

इस रूप में हम डायरी को आम सजग साहित्यकार के रचनात्मक संघर्ष का इतिहास भी कह सकते हैं क्योंकि डायरी के माध्यम से एक साहित्यकार की रचना-प्रक्रिया की पड़ताल हो सकती है, स्वयं डायरी लेखक की निगाहों के साथ एक दस्तावेज के रूप में उसके परिवेश,उसकी मानसिक वृत्तियों और अंतर्क्रियाओं का दृष्टा बना जा सकता है. मोहन राकेश एक साहित्यकार थे लेकिन उनकी लिखी हुई डायरी मात्र ‘एक साहित्यिक की डायरी’ नहीं कही जा सकती. यह डायरी मोहन राकेश के जीवन के अनेक तथ्यों को सुरक्षित रखते हुए उनके व्यक्तित्व की अनेक परतों को उजागर करती है. मुक्तिबोध की ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की तरह मोहन राकेश की डायरी में सिर्फ साहित्य और रचना-प्रक्रिया पर ही बहस नहीं है समकालीन सांस्कृतिक सन्दर्भ और निजी जीवन के प्रसंग भी वहां उपस्थित हैं अपने तिथिवार ब्यौरों के उन क्षणों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त होता है जहाँ से एक लेखक की मनोदशा का निर्माण संभव होता है. कमलेश्वर ने डायरियों को आत्म-संघर्ष से इन्हीं अर्थों में जोड़कर देखा है.मोहन राकेश की डायरी के सबंध में उन्होंने लिखा है कि –“राकेश की डायरियाँ आत्म-संघर्ष के सघन एकांतिक क्षणों का लेखा-जोखा है,जो वह किसी के साथ नहीं बाँट पाया या उसने बाँटना मंजूर नहीं किया ..आदमी के अकेलेपन की यह यात्रा अब और त्रासद हो जाती है,जब उसकी यात्रा में कुछ ठण्डी और शीतल छायाएं आती हैं. वे ठण्डी शीतल छायाएं जीवन के मरुस्थल को और बड़ा कर देती हैं और मन के संन्नाटे और सूनेपण को अधिक गहरा.”6

डायरी,लेखक के बीते हुए समय को अनबीता बनाए रखती है.उसके निर्णयों को टटोलने और विकल्पों को दोहराने की छूट देती है.एक समय में,जो कागज पर थम गया है.इसलिए यह समय के प्रति लेखक की प्रतिक्रिया है.अपने साहित्यिक जीवन के आरंभ से ही मोहन राकेश नियमित रूप से डायरी लिखते रहे इस संकोच के साथ कि ‘मैं जिन्दगी भर डायरी लिखने की आदत नहीं डाल सका’. उनकी डायरी में आत्मकथा और संस्मरण दोनों का मिला-जुला रूप दिखायी पड़ता है जिससे राकेश की साहित्यिक जीवन-यात्रा का विस्तार से पता चलता है.उनकी डायरी से उनके परिवेश,मित्रों,प्रेम-प्रसंग,साहित्यिक गतिविधियों तथा नयी कहानी आन्दोलन का अंतरंग विवरण भी प्रस्तुत होता रहा है. यह राकेश जैसे आदमी के अकेलेपन की वह यात्रा है जिसमें सारी भीड़ उनके अन्तः से होकर गुजराती है.मोहन राकेश की डायरी 1948 से 1968 तक के कालखंड को अपने भीतर समेटती है. इस प्रस्तावना के साथ कि “जिस हवा में फूल अपने पूरे सौंदर्य के साथ नहीं खिल सकता,वह हवा अवश्य ही दूषित हवा है.जिससे समाज में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का पूरा विकास नहीं कर सकता वह समाज दूषित समाज है.”7

मोहन राकेश को आमतौर पर शिक्षित शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता का लेखक माना जाता है. उनकी कहानियाँ शहरी जीवन के मध्यवर्गीय प्रसंग को जोड़कर देखी जाती हैं. उनकी डायरी हमें मोहन राकेश के दूसरे व्यक्तित्व से परिचित कराती है जहाँ वे इस व्यवस्था पर क्षोभ प्रकट करते हैं.इसकी अ-समान संरचना पर कुपित होते हैं और मनुष्य मात्र की समानता की बात करते हैं.यहाँ डायरी मोहन राकेश की रिपोर्ट भर नहीं होती है वह एक ऐसे समाज की दास्ताँ बनती है जो आजादी के बाद भी सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया था.मोहन राकेश ने अपनी प्रतिबद्धता को किसी विचारधारा की जड़ता से मुक्त रखते हुए अपने आस-पास के जीवन से जोड़ने का सफल प्रयास किया. अपने लेखन में उन्होंने उस जन का पक्ष लिया जो इस नयी व्यवस्था में भी अभागा है.आठ जनवरी 1953 को कन्नौर में अपनी डायरी में उन्होंने पूना में थर्ड क्लास वेटिंग हाल का जो नजारा पेश किया वह निःसंदेह दुखदायी था. उन्होंने लिखा कि- “पूना में थर्ड क्लास के वेटिंग हाल में कुछ समय बिताना पड़ा था वहाँ बहुत से स्त्री-पुरुष थे जो विकलांग थे,या आकृति के रूखेपन के कारण मनुष्येतर से मालूम पड़ते थे…काले पड़े हुए शरीर सूखी हुई त्वचा,जीवन के प्रति नितांत निरुत्साह भाव,चेष्टाओं में शैथिल्य और बुद्धि के नियंत्रण का अभाव. जिस समाज में मनुष्य की एक ऐसी श्रेणी बन सकती है,उसके गलित होने में संदेह ही क्या है?”8

राकेश की डायरी में इस तरह के अनेक प्रसंग है जो उनकी विश्व दृष्टि के उस पक्ष को उजागर करते हैं जो उनकी कहानियों और उपन्यासों में उभर कर नहीं आ पाती है. मोहन राकेश के जीवन को प्रभावित करने वाली बड़ी घटनाओं में उनके अपने वैवाहिक संबंधों का विच्छेद भी रहा है.दाम्पत्य संबंधों और स्त्री-पुरुष संबंधों पर राकेश ने लगभग सभी विधाओं में लिखा.वे दाम्पत्य जीवन में विवाह को नहीं,प्रेम को महत्त्व देते रहे.अपने स्वयं के जीवन में भी उन्होंने संबंध विच्छेद का निर्णय इसी आधार पर लिया. 26 जनवरी 1957 को वे लिखते हैं “इस दौरान जिंदगी के सबसे बड़े द्वन्द से गुजरा हूं – मैंने पिछले छह साल की घुटन को समाप्त करना चाहा है-जिस औरत से मैं प्यार नहीं कर सकता,उसके साथ मैं जिंदगी किस तरह काट सकता हूँ? आज वह मुझ पर ‘वासना से चालित’ और ‘इंसानियत से गिरा हुआ’ होने का आरोप लगाती है-क्योंकि मैंने उससे तलाक चाहा है,क्योंकि मैं अपने अभाव की पूर्ति के लिए एक ऐसे व्यक्ति का आश्रय चाहता हूँ,जो मुझे खींच सकता है.”9

मोहन राकेश की डायरी इन्हीं अर्थों में उनके स्वयं द्वारा अपनी निजता का किया गया पोस्टमार्टम है कि वे इसमें अपने जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी बड़ी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करते हैं.इन प्रसंगों के चलते उनकी डायरी आत्मकथात्मक शैली भी अख्तियार करती है.मोहन राकेश कहानी का प्लाट अपने आस-पास के जीवन से उठाते थे. उनकी कहानी रचना-प्रक्रिया की जानकारी भी हमें उनकी डायरी के पन्नों से मिलती है. ‘परमात्मा का कुत्ता’ हो अथवा ‘जानवर और जानवर’ इन दोनों कहानियों का संबंध राकेश के निजी अनुभवों से रहा है. 30 अप्रैल 1957 को जालंधर में उन्होंने नोट किया (डायरी में) कि “आज क्या-क्या लिखूं?पहले आज की ही कहानी-कस्टम आफिस के बाहर वह शख्स बैठा था, मोटी सी पगड़ी बांधें-अपने आप से ढीले छोड़े और बक रहा था –“हिंदुस्तान को आजादी दिलाई सुभाष ने,आजादी दिलायी भगत सिंह ने,महात्मा गांधी ने दिलायी ये आजादी या इन कुत्तों ने जो अब आजादी के साथ संभोग कर रहे हैं.”10 डायरी का यह अंश राकेश की कहानी ‘परमात्मा का कुत्ता’ का संवाद भी बनता है. जाहिर है निजी अनुभव को कथा-संरचना में ढाल कर प्रस्तुत करने की कला मोहन राकेश जैसे रचनाकार व्यक्तित्व की विशेषता थी.

मोहन राकेश ने अपने प्रश्न का उत्तर कि “क्यों लिखता हूँ’ देते हुए लिखा है कि-“मुझे जीवन के संबंध में अपनी प्रतिक्रियाओं को लिखकर व्यक्त करना स्वाभाविक लगता है इसलिए लिखता हूँ.”11 डायरी के कई अंश उनकी इस स्वाभाविकता को प्रमाणित करते हैं.डायरी लेखन के संबंध में अरुण प्रकाश ने लिखा है कि “डायरी में लेखक को रोजमर्रापन और उससे उपजा चिंतन-मनन होना आवश्यक होता है.”12 मोहन राकेश की डायरी दैनंदिनी जीवन की घटनाओं के क्रम में उनके चिंतन को भी प्रकट करती है.जिसमें निजी अनुभवों,विश्वासों और आकांक्षाओं के प्रति एक दार्शनिक अंदाज भी दिखायी पड़ता है,समाज,साहित्य,संस्कृति और राजनीति;व्यक्ति के अंतः से किस प्रकार गुजरती रहती है और इन सबसे संवाद करता हुआ वह अपने एकालाप में खुद को कहाँ स्थापित कर अथवा ढूढ़ रह होता है? डायरी लेखन में सारी चीजें समायोजित होकर सामने आती हैं.अपने से बात करना और साथ ही समाज के साथ संवाद की प्रक्रिया को जारी रखना एक चुनौती भरा काम होता है.जिससे हर साहित्यकार गुजरता है. संवाद और एकालाप की यह पद्धति मोहन राकेश की डायरी में भी दिखायी पड़ती है.सामान्य जीवन व्यवहार की साधारण बातों पर स्वयं से बात करते हैं तो कहीं फिलासफर होकर जीवन और सत्य की जटिल शब्दावली के साथ उपदेशक नजर आते हैं.8 जनवरी 1953 की डायरी यह है कि “किसी भी अपरिचित व्यक्ति से चाहे उसके भाषा,उसका मजहब,उसका राजनीतिक विश्वास तुमसे कितना ही भिन्न हो,यदि मुस्कराकर मिला जाए तो जो तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाता है.वह कोरा मनुष्य होता है,कुछ ऐसी ही मुस्कुराहट की नाना प्रतिक्रिया नाना व्यक्तियों पर मैंने लक्षित की है.”13 फिर 12 जून 1957 को डायरी में दर्ज किया कि “जीवन में एकरसता और ऊब का अनुभव क्यों होता है? असाधारणता के वहम के कारण जब हम और असाधारण की खोज करते हैं तो एक स्थिति पर आकर हम थक जाते हैं,क्योंकि हर असाधारण सी असाधारणता बहुत शीघ्र ही साधारणता में बदल जाती है. व्यक्ति की अधिक परिपक्वता उसे यह देखने की दृष्टि देती है कि जीवन का आकर्षण उसकी असाधारणता में न होकर उसकी साधारणता में है .”14 संवाद और एकालाप की यह पद्धति उनकी रचना-प्रक्रिया को स्पष्ट करती है और शब्दावली बोझिल न होकर सामान्य जीवन व्यवहार की होती है.

रचना कर पाने या न कर पाने का जो द्वन्द किसी भी कलाकार में होता है उसे राकेश की डायरी के पन्नों में देखा जा सकता है. 8 अक्टूबर 1967 को नई दिल्ली में वे लिखते हैं – “अपने आप की यंत्रणा.जो चाहता हूँ,वह सब न कर पाने,न लिख पाने की. जिस रूप में आस-पास की जिंदगी अपने अंदर घटित होती है,जिन उलझे हुए बिम्बों,ध्वनियों और ग्राफों में मन उसके प्रभावों को ग्रहण करता है,उनकी उन्हीं की आंतरिक अन्विति में व्यक्त करना-यह एक चुनौती नहीं,विवशता सी लगती है.पर परिणाम के रूप में जो कुछ लिखकर सामने आता है,वह इतना क्रूड,स्थूल और खंडित होता है कि अपना सारा प्रयत्न केवल अपने को व्यस्त रखने या बहलाए रखने का बहाना जान पड़ता है.”15

समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में मोहन राकेश बखूबी सक्रिय थे उन्होंने अपने जीवन में अनेक यात्राएँ की,इन यात्राओं का उद्देश्य कभी साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद रहा तो कभी पर्यटन की स्वेच्छा.इलाहाबाद के साहित्यिक मित्रों मार्कंडेय,उपेन्द्रनाथ अश्क तथा दुष्यंत कुमार से उनके अंतरंग संबंध थे.उनकी डायरी में दराज घटनाओं में उस समय की साहित्यिक राजनीति का भी पता चलता है.इस रूप में यह डायरी समकालीन साहित्यिक वाद-विवाद को जानने-समझने के लिए एक दस्तावेज बनती हैं. 16 मई 1957 की डायरी में मार्कंडेय,अमरकांत,कमलेश्वर,अश्क,शेखर जोशी और दुष्यंत कुमार से मुलाकात का वर्णन है. उन्होंने लिखा है कि –“सायंकाल अमरकांत और शेखर जोशी मिलने के लिए आ गये. मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी हुई कि उन दोनों ने प्रोफेशनल ढंग से बातें नहीं की….इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल से वे लोग बहुत कुछ ‘फ्रस्ट्रेटेड’ से महसूस हुए. ‘परिमल’ ग्रुप से तो वे अपने को अलग समझते थे,इसलिए उससे उन्हें गिला नहीं था. उन्हें गिला था तो परिचय के अपने साथियों –कमलेश्वर,मार्कंडेय और दुष्यंत से.”16 डायरी में मोहन राकेश ने दुष्यंत से जमींदारी के सुने गये अनुभव भी दर्ज किये हैं, जो उस समय में हो रहे सामाजिक-आर्थिक बदलाव के अंतर्विरोध का संकेत है. 16 मई 1957 की डायरी के पन्नों पर उन्होंने लिखा है कि “दुष्यंत ने अपने कुछ जमींदारी के अनुभव भी सुनाए कि किस तरह उसने कई बार किसानों के घर जलवाए हैं और उनके यहाँ रिवाल्वर रखकर बरामद कराए और उन्हें जेल काराई है. ‘वहां जाकर साहित्यिकता –वाहित्यिकता सब भूल जाते है प्यारे लाल! वहां तो ठाठ से जमींदारी करते हैं.”17

1954 तक की डायरी में मोहन राकेश अपने आप में उलझे नजर आते हैं.लेखन के प्रति उनकी निष्ठा और नौकरी बार-बार आपस में टकराते हैं और वह सामंजस्य बैठने में भी कठिनाई का अनुभव करते हैं. इस दौरान संपर्क में आने वाली लड़कियों की रोमांटिक अनुभूतियाँ उनकी स्त्री संबंधी धारणा के रूप दे रही थी.नर-नारी के अनेक धरातलों की तलाश भी इसी दौरान हुई है. वीना के संसर्ग का प्रसंग प्राम्भिक डायरी का सबसे खूबसूरत और सार्थक प्रसंग में है.18 मोहन राकेश के जीवन में दो पत्नियों शीला और पुष्पा से संबंध विच्छेद के बाद अंततः अनीता के साथ जीवन बिताने का निर्णय उनकी ‘एक और जिंदगी’ की खोज था.अनीता के संसर्ग के बाद डायरी में एक खुलापन आता है.मोहन राकेश ने अपने जीवन में जिन व्यक्तियों को अधिक समय तक जाना और पहचाना है उनके संबंधों में अपनी धारणा को बहुत ही स्पष्ट रूप में व्यक्त किया है. 2 सितम्बर 1958 की डायरी में उन्होंने अपनी माँ के संबंध में विस्तार से लिखा है-“मैंने अपने आज तक के जीवन में जिस सबसे महान व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त किया है,वह मेरी माँ है.यह भावुकता नहीं है.मैंने बहुत बार तथस्थ रूप से इस नारी को समझने का पर्यटन किया है और हर बार मेरे छोटेपन ने मुझे लज्जित कर दिया है.बड़े से बड़े दुःख से मैंने उसे अविचल धैर्य में स्थिर रहते देखा है.जीवन की किसी भी परिस्थिति में उसे कर्तव्य निष्ठा से नहीं हटाया.परन्तु अपनी कर्मभ्यता के लिए रत्ती भर अहंभाव तो उसमें नहीं है.वह कर्म करती है,जैसे उसका अस्तित्व है,जीवन है,स्वभाव है…घर में उसका अस्तित्व वैसे ही है जैसे विश्व में वायु का. वह प्राण देती है,परन्तु अदृश्य रहकर.” 19 अपने व्यवहार और व्यक्तित्व के प्रति सचेत होकर मोहन राकेश ने डायरी में जीवन के जिन मार्मिक अंशों को दर्ज किया है उससे अनेक रचनात्मक संघर्ष का पता चलता है.डायरी लेखन किसी योजना के तहत किया जाने वाला कार्य नहीं है फिर भी प्रकाशन की सचेतनता मोहन राकेश की इस डायरी में न सिर्फ वस्तुगत स्तर पर प्रभावित करती है बल्कि उसके शिल्प के निर्धारण में भी वह दिखायी पड़ती है.जैसा कि वीरेंद्र मेंहदीरत्ता ने संकेत किया है कि –“डायरी छपने की सचेनता ने प्रारंभिक डायरी को अनुभव के ताप के बिना नीरस और विवरणात्मक बना दिया है .”20

शिल्प के स्तर पर देंखे तो मोहन राकेश की डायरी 1948 से 1964 तक का कालखंड समेटे हुए एक औपन्यासिक रचना लगती है.दिन-ब-दिन घटनाओं के अंकन के साथ ही सांसारिक चीजों को देखने की एक समझ इसमें है.डायरी की भाषा किसी खास ढांचे में नहीं है वह संदर्भ के साथ आकार ग्रहण करती है.कहीं यह काव्यात्मक लहजा लिए हुए चलती है तो कहीं दार्शनिकता के पुट के साथ शब्दों का संयोजन हुआ है.मनःस्थिति के अनुकूल भाषा भी प्रवाहित होती है.भाषा का एक लहजा दृष्टव्य है.2 फरवरी 1958 की डायरी लगता है मोहन राकेश डायरी नहीं उपन्यास लिख रहे हों.- “संध्या की उदासी में एक अपना ही पुलक होता है, संध्या की ध्वनियाँ ह्रदय को भारी भी कर देती हैं,पुलकित भी. तेरहवीं का चाँद बिलकुल सामने था.खेत थे,पानी था,वृक्ष थे.हल्की चाँदनी में पानी अबरक की तरह चमकता था.धुँआ उमड़ता हुआ आता,आँखों में भर जाता.मैं आँखे मूँद लेता तब लगता,गाड़ी की तेज रफ्तार है,गाड़ी का शब्द मेरा शब्द है-शब्द की गूँज मेरी गूँज है- मैं व्यक्ति नहीं,गति हूँ,शब्द हूँ .” 21 मोहन राकेश की डायरी के शिल्प में वर्णनात्मक विवरण से अधिक संवादात्मक स्थितियां आयी हैं. ये संवाद स्वयं से भी किये गये हैं और दूसरों से भी. ऐसी स्थितियों में डायरी का शिल्प नाटक का रूप ग्रहण करता है.जहाँ छोटे-छोटे संवाद कुछ मनः स्थितियां और फिर व्यक्ति का जीवन राग.डायरी में संवाद की ऐसी प्रविधि आद्यांत है. 2 सितंबर 1964 की डायरी में लिखा है कि- “कल- शरद देवड़ा और राजेन्द्र घर पर.मार्कंडेय का पत्र.टैरेस पर चाय और राजेन्द्र के लाजिक से पैदा एक लतीफा-..तो कहानीकार कुल कितने?,उसने हाथ मिलाया.,‘उपन्यासकार दो?’,उसने फिर हाथ मिलाया.,और नाटककार सिर्फ एक?’,उसने हाथ हटा लिया.बोला,हस्साला,कहाँ से बात निकालकर लाया है.”22 इस तरह के अनुभवों से भरी मोहन राकेश की डायरी को पढ़ने के बाद यह कहना गलत न होगा कि उनकी डायरी उनके आत्मसंघर्ष का लेखा-जोखा है. जिसमें उनकी रचना-प्रक्रिया और लेखकीय संघर्ष के मूल छिपे हैं.समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य और हिंदी भाषा के समाज को समझने में उनका यह निजवृतांत सामाजिक होकर उपस्थित है.उनकी डायरी के गद्य लेखन में भी नाटक और कहानी के शिल्प का मिलाजुला रूप समकालीन संदर्भ की सहज पहचान करा जाता है.

See also  ‘जंग लगी तलवार’ और श्रमिक जीवन-मिनहाज अली

सन्दर्भ सूची –

  1. राम विलास शर्मा,आस्था और सौन्दर्य,राजकमल प्रकाशन दिल्ली,2002,पृष्ठ संख्या 31
  2. संपादक धीरेन्द्र वर्मा,हिंदी साहित्य कोश,ज्ञान मंडल,वाराणसी,2000,खंड 1,पृष्ठ संख्या 268
  3. डॉ.हरिमोहन,साहित्य विधाएं:पुनर्विचार,वाणी प्रकाशन,दिल्ली,2006,पृष्ठ संख्या 259
  4. डॉ.हरिमोहन,साहित्य विधाएं:पुनर्विचार,वाणी प्रकाशन,दिल्ली,2006,पृष्ठ संख्या 260
  5. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 11
  6. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 11
  7. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 23
  8. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 20
  9. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 35
  10. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 41
  11. मोहन राकेश,साहित्य और संस्कृति,राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली,2011,पृष्ठ संख्या 41
  12. अरुण प्रकाश,गद्य की पहचान,अंतिका प्रकाशन,गाजियाबाद,2012,पृष्ठ संख्या 142
  13. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 18
  14. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 67
  15. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 307
  16. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 44
  17. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 45
  18. वीरेंद्र मेंहदीरत्ता,मोहन राकेश का साहित्य,हरियाणा अकादमी,1986,पृष्ठ संख्या 184
  19. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 201
  20. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 183
  21. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 163
  22. मोहन राकेश की डायरी,राजपाल प्रकाशन,दिल्ली,2010,पृष्ठ संख्या 277

 

 

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