साहित्य और कला के अध्ययन में मार्क्सवाद का महत्त्व

*अनीता

मार्क्सवादी कला और साहित्य-चिन्तन मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित है। इसके दो प्रमुख आधार हैं,एक द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और दूसरा ऐतिहासिक भौतिकवाद । द्वंद्वात्मक भौतिकवाद एक विकास का सिद्धांत है जो वाद, प्रतिवाद और संवाद के द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। तो वहीं ऐतिहासिक भौतिकवाद में मानव समुदाय का मूल प्रयत्न आर्थिक या उत्पादन-परक है। इसी के लिए वह श्रम का आधार ग्रहण करता है और इन्हीं तत्वों से कला और साहित्य का निर्माण होता है। मार्क्स के साथ एंजिल्स ने भी मिलकर कार्य किया।

मार्क्सवाद के साहित्य और कला-संबंधी विचार इनकी (मार्क्स और एंजिल्स से) पुस्तक ‘लिटरेचर एण्ड आर्ट’ मे है, जो इनके ‘ए कण्ट्रीब्यूशन टु दि क्रिटिक ऑफ़ पोलिटिकलइकोनामी नामक ग्रंथ की प्रस्तावना का अंश है मार्क्स के अनुसार साहित्य और कलाएं समाज के आर्थिक -भौतिक जीवन से उत्पन्न होती है तथा उसी पर आधारित भी होती है और जैसे-जैसे इनमें परिवर्तन होता है वैसे-वैसे साहित्य, कला तथा विचारधारा में भी परिवर्तन होता है। इनके अनुसार साहित्य और कला केवल परिस्थितियों से प्रभावित ही नहीं होती, बल्कि उन्हें प्रभावित भी करती है। जिस कारण सामाजिक क्रांति एवं समाज के पुनर्निर्माण में भी कला एवं साहित्य महत्त्वपूर्ण कार्य करते है।

कला के उद्भव और विकास में श्रम की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि श्रम के कारण ही-मानव हाथ नें वह उच्च क्षमता प्राप्त की, जिसकी बदौलत रेफेल की सी चित्रकारी, थोर्वाल्दसें की सी मूर्तिकारी और पागानीनी का सा संगीत आविर्भूत हो सका।

यह कला तथा साहित्य ही है जो मनुष्यों को पशु-पक्षियों के श्रेणी से अलग करता है, क्योंकि, वे केवल अपने तथा अपने परिवार के बारे में ही सोचते है, जबकि मनुष्य सभी के विषय में सोचता है, और यही सामाजिकता साहित्य सृजन की शर्त है। जब मनुष्य स्वतंत्र होकर सृजन करता है तो उसकी शैली भी भिन्न होती है। साथ ही कलात्मक प्रतिभा कुछ व्यक्तियों में ही सीमित तभी तक होती है जब तक श्रम विभाजन असंतुलित होता है। साम्यवादी समाज में विसंगतियाँ न होने से सभी लोग अन्य कार्यों के साथ कलात्मक भी होंगे क्योंकि कला चेतना व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतिफलन है। धर्म को मार्क्स अफीम की भांति मानते है, जिस कारण धार्मिक साहित्य थोड़े समय के बाद सार ही न हो जाता है। वे साहित्य को समाज का दर्पण भी नहीं मानते हैं बल्कि साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का अचूक हथियार ही मानते है।

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मार्क्स के प्रमुख सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद के अनुसार समाज के दो ढांचे है, पहला आधारभूत ढांचा (base) और दूसरा उस पर आश्रित अर्थात् अधिरचना (superstructure)। दूसरे ढांचे के अंतर्गत समाज, साहित्य, कलादर्शन एवं संस्कृति संबंध तत्त्व आते है। इस तरह आर्थिक व्यवस्था सबकी नियामक है। माक्र्स के इस विचार की साहित्य में सबसे अधिक आलोचना भी हुई। ग्राम्सी ने अपनी पुस्तक ‘प्रिसन नोट बुक‘ में ‘आधार व अधिरचना‘ को नए तरीके से देखा, जिसे उन्होंने हेजेमोनी (hegemony) का सिद्धांत कहा। इनके अनुसार सभी चीज़ों को आर्थिक ढांचा निर्धारित नहीं करता बल्कि प्रकृति के आधार पर समाज अपनी संस्कृति गढ़ता है न कि बंदूक की नोकसे। कलाएँ सापेक्षित रूप से स्वतंत्र होती है, जिस कारण हेजोमोनी के अंदर से ही विरोध शुरू होता है। अर्थात् कला ही विरोध करके सच्चाई समाज को बताती है।

लुईस अल्थुसर के ‘आधार और अधिरचना‘ के बारे में राय है कि आधार तो ठीक है किन्तु ‘अधिरचना‘ दो प्रकार की होती है- पोलिटीगोलीगल और विचार धारा। ये दोनों आपस में संबंधित है। जिस कारण परिवर्तन होता है। कला को विचारधारा की भूमिका मानते हुए अल्थुसर यह मानते है कि कला समाज में परिवर्तन कर सकती है, क्योंकि यह यथार्थ में हस्तक्षेप करती है, इसके अलावा एडोरनों और जार्जलुकाच की बहस जो कि ‘एस्सेआनथोमस‘ पुस्तक में है अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से कला और साहित्य पर विचार करने वाले प्रमुख नाम है-मैक्सिमगोर्की, क्रिस्टोफरकाडवेल, अनसर्टफिशर, जार्जलूकाच आदि हैं। मैक्सिमगोर्की के अनुसार कला के लिए कल्पना, ज्ञान और नयी दृष्टि आवश्यक होती है। कल्पना को उन्होंनें बिम्बों में विचार करने की क्रिया माना है। इन्होंने मनुष्य को सारे विचारों और भावों का स्रष्टा कहा है। वह लेखक के लिए यह आवश्यक मानते है कि वह जीवन के ऊपरी यथार्थ की बजाय आंतरिक यथार्थ पर गहरी नज़र डाले। भाषा के बारे में इनकी स्पष्ट राय है कि जन सामान्य के बीच प्रचलित भाषा और साहित्य की भाषा में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। भाषा को वे जनता द्वारा निर्मित वस्तु मानते है। ‘एक पाठक‘ कहानी में गोर्की ने लेखक और पाठक के संवाद के माध्यम से बताया है कि साहित्य का उद्देश्य मनुष्य को अपने को समझने, आत्मविश्वास को जगाने, सत्य की खोज आदि करने के साथ-साथ मनुष्य की कृण्ठा, निराशा, दासता आदि को दूर करना है।

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एक अन्य विद्वान क्रिस्टोफरकाडवेल के भी मार्क्सवादी विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इल्यूज़न एण्ड रियलिटी‘ में है। काडवेल कला को प्रयत्न और संघर्ष से उत्पन्न तत्त्व मानतें है उनके अनुसार कला और संस्कृति सतत् गतिशील है। ये बात कला और संस्कृति के इतिहास से समझी जा सकती है। सभी कलाओं का रूप अपने समय के समाज की स्वतंत्रता संबंधी भावनाओं से निर्मित होता है। कला स्वतंत्रता की एक शैली है। यों तो सभी वस्तुएँ नष्ट होती रहतीं और उत्पन्न होती रहती है, पर कला तत्व तब तक बना रहता है, जब तक मनुष्य रहता है। सच्ची सौंदर्य-भावना का उद्भव वर्ग विहीन, शोषण मुक्त समाज में ही सम्भव हो सकता है। तभी श्रम सौंदर्य मणि होगा।

जार्जलूकाच का मार्क्सवादी कला तथा साहित्य चिंतन में विशेष योगदान है। यह प्रथम विद्वान है, जिन्होंने यथार्थ की मार्क्सवादी व्याख्या की है। लूकाच के अनुसार मनुष्यता की सम्पूर्ण विरासत के प्रति मार्क्सवाद की गहरी रूचि और संरक्षण की भावना है। कला और साहित्य ही है जो मनुष्य के विकास के इतिहास को समग्रता में प्रदर्शित करता है। अतः हमारे नव-निर्माण में उसका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। लूकाच के विचार से कला, मानव की सामाजिक और नैतिक समस्याओं से गहराई तक जुड़ी रहती है। अतः वह हमारे लिए सामग्री का स्रोत भी है और नव-निर्माण का माध्यम भी।

मार्क्सवादी सौंदर्य शास्त्र तथा समाजवादी यथार्थवाद के सैद्धांतिक पक्षों के साथ-साथ इसके व्यवहारिक पक्ष पर भी विचार की आवश्यकता है। हिन्दी साहित्य में मार्क्सवादी कला तथा साहित्य पर विचार करें तो 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ यहाँ माक्र्सवादी धारा तेजी से उभरती हुई दिखती है। इस विचार के मूल में भी समाज, आमजन तथा सामाजिक यथार्थवाद आदि ही केन्द्र में है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर नंददुलारे वाजपेयी, मुक्तिबोध, डॉ. रामविलास शर्मा, तथा डॉ. नामवर सिंह तक सभी लोगों ने इस पर विचार किया हैं। 1969 ई० में नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में शिवदान सिंह चैहान ने समाजवादी विचारधारा का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव (1919-1939) शीर्षक निबंध पढ़ा था। इस निबंध में शिवदान सिंह जी ने मार्क्सवादी विचारधारा तथा हिन्दी साहित्य के यथार्थवादी रूझानों को मुखर रूप से प्रस्तुत किया है।

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किसी भी मार्क्सवादी साहित्यिक समालोचक के लिए इस बात की गहराई से छानबीन करना एक आवश्यक कार्यभार है कि कला कर्म और साहित्यिक सृजन के क्षेत्र की हर क्रिया शीलता के पीछे जो भी नया तत्त्व उदित हो रहा है उसका मूल प्रेरक क्या है? मार्क्सवादी साहित्यिक विचार को लेनिन, माआत्सेतुंग और ग्राम्शी ने आगे बढ़ाने का कार्य किया। इस प्रकार मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन का मूल उद्देश्य कला और साहित्य की समाज परकता तथा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उसकी अवधारणा के साथ सर्जना माने जा सकते है। कला और साहित्य विचारधारा का ही एक अंग है। मनुष्य उस विचारधारा का केंद्र बिन्दु है। इस चिंतन में जहाँ एक ओर परम्परा-बोध है, वहीं दूसरी ओर यथार्थ-बोध भी आवश्यक है। इतिहास परम्परा-बोध एवं यथार्थ-बोध के आधार पर सामाजिक दृष्टि से यथार्थ चित्रण आवश्यक है।

संदर्भ ग्रन्थ

  1. पाश्चात्य काव्यशास्त्र इतिहास, सिद्धांत और वाद – डॉ.भगीरथ मिश्र, (विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी)
  2. आलोचना के सौ बरस – अरविंद त्रिपाठी (प्रकाशक-शिल्पायन, दिल्ली)
  3. वाद विवाद संवाद – डॉ. नामवर सिंह (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
  4. आधुनिक हिन्दी आलोचना -डॉ. रामचंद्र तिवारी संदर्भ एवं दृष्टि, (विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी)
  5. तीसरा रूख़- पुरूषोत्तम अग्रवाल (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली)
  6. हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली – डॉ. अमरनाथ (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
  7. हिन्दी काव्य में माक्र्सवादी चेतना, डॉ.जनेश्वर वर्मा, ग्रन्थम प्रकाशन, कानपुर
  8. प्रगतिवाद पुनर्मूल्यांकन, हंसराज रहबर, नवयुग प्रकाशन, दिल्ली
  9. मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, डॉ. राम विलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  10. मार्क्सवाद साहित्य चिंतन: इतिहास तथा सिद्धान्त, शिवकुमार मिश्र, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल
  11. आलोचना के सिद्धान्त, शिवदान सिंह चैहान, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  12. मार्क्सवाद के मूल सिद्धान्त, जनेश्वर वर्मा, समाजवादी साहित्य सदन, लखनऊ
  13. कम्युनिष्ट पार्टी का घोषणा पत्र, कार्ल मार्क्स , फ्रेडरिक एंगेल्स, नेशनल बुक एजेंसी, कोलकाता
  14. हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना: सैद्धान्तिक, श्याम कश्यप, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।

*शोधार्थी, एम.फिल. ,हिंदी

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय,

नई दिल्ली

ईमेल: vermaanita937@gmail.com

 

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